रविवार, 12 सितंबर 2010

गुजरात के मंत्री अमित शाह हत्या के इल्जाम में गिरफ्तार: भाग 2

आडवाणी मण्डली इस बात की अनदेखी कैसे कर सकती है कि इस मामले की जाँच पहले गुजरात की सी0आई0डी0 के पास थी और जब सी0आई0डी0 की जाँच में अमित शाह का नाम इस मामले में आने लगा तो शाह ने सी0आई0डी0 चीफ पर दबाव डाला और कागजात की जाँच करने के बहाने उन्होंने जाँच इंचार्ज गीता जौहरी से तमाम कागजात ले लिए। जब सी0आई0डी0 ने दोषी पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध मुकदमें दर्ज करने के लिए कहा तो वे इसके लिए सहमत नहीं हुए। फरवरी 2007 में ही टाइम्स आॅफ इण्डिया की एक रिपोर्ट में इन तमाम बातों का पर्दाफाश किया गया था। सी0बी0आई0 ने जाँच के सम्बन्ध में जो चार अंतरिम रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दी थी उनमें से एक रिपोर्ट में इस मामले में गृहमंत्री अमित शाह की संलिप्तता का कई बार उल्लेख था, पर सरकार के दबाव के कारण गुजरात सी0आई0डी0 इस मामले में आगे बढ़ने से कतरा रही थी। उसी के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी 2010 को इस जाँच को सी0बी0आई0 को सौंपा था और 31 जुलाई को इसकी प्रगति रिपोर्ट देने के आदेश दिए थे। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात का खासतौर पर जिक्र किया था कि अमित शाह के मोबाइल के काॅल डिटेल्स को ध्यान से देखा जाए। उन्हीं काॅल डिटेल्स में और अधिक सुनिश्चित सबूत मिलने से उनकी संलिप्तता की पूरी पुष्टि हो गई है।
अतः कम से कम इस मामले में सी0बी0आई0 के दुरुपयोग का बी0जे0पी0 का बहाना नहीं चल सकता।
सी0बी0आई0 ने जिस अमित शाह से पूछताछ करने के लिए दो बार समन जारी किए थे, 25 जुलाई रविवार को जब वे सी0बी0आई0 के दफ्तर पहुँचे तो उनसे कोई पूछताछ करने के बजाय वह उन्हें
सीधे मजिस्ट्रेट के घर ले गई, सी0बी0आई0 ने पूछताछ के लिए उन्हें अपनी हिरासत में रखने का निवेदन तक भी नहीं किया और मजिस्ट्रेट के पास उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेजने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहा।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को इससे कभी कोई वास्ता नहीं रहा कि गुजरात में या अन्य कहीं अल्पसंख्यकों पर क्या गुजरती है, वे फर्जी मुठभेड़ में मारे जाते हैं या अन्य तरह से सताए जाते हैं। आजकल उनका सबसे पहला फोकस तो परमाणु दायित्व बिल को येनकेन प्रकारेण पारित कराना है जिसके लिए उन पर अमरीका का भारी दबाव है। अमरीका ने कह दिया है कि परमाणु दायित्व बिल को पारित किए बिना भारत-अमरीका परमाणु करार पर अमल नहीं होगा।
उनका दूसरा फोकस है वित्त क्षेत्र, बैंकिग, बीमा, पेंशन क्षेत्र में तथाकथित आर्थिक सुधारों पर संसद की मुहर लगवाना क्योंकि उसके लिए उन पर देशी-विदेशी पूँजीपतियों और बहुराष्ट्रीय निगमों का और विश्व बैंक/अंतर्राष्ट्रीय मुद्राकोष का जबर्दस्त दबाव है।
सरकार इन दोनों मामलों में भाजपा का सहयोग लेने के लिए पर्दे के पीछे निरन्तर प्रयासरत रहती है। पिछले ही सप्ताह वित्तमंत्री ने भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज को अपने घर खाने पर बुलाकर मंत्रणा की थी। आखिर भाजपा भी तो आर्थिक उदारवाद की ही समर्थक है। जब आर्थिक मामलों में एक जैसी राय है तो दूसरे मामलों में कुछ तो छूट देनी ही पड़ती है।
अमित शाह, अफजल गुरू और सतवंत सिंह के बीच रिश्ता
किसी गुरू के जब कई शिष्य होते हैं तो उन के बीच जो रिश्ता बनता है उसके अनुसार उन्हें गुरूभाई माना जाता है। इसी तरह अलग-अलग मुल्जिमों का बचाव यदि कोई एक ही वकील करता है तो उनके बीच जो रिश्ता कायम होता है उसके अनुसार उन्हें वकील भाई माना जाए तो गैर मुनासिब नहीं होगा।
इस लिहाज से सतवंत सिंह, अफजल गुरू और अमितशाह के बीच वकील भाई का रिश्ता बनता है। इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह, संसद पर आतंकवादी हमले के मुजरिम अफजल गुरू और सोहराबुद्दीन फर्जी मुठभेड़ के मुल्जिम अमित शाह-इन तीनों के बीच यह समानता तो है ही कि तीनों भारतीय दंड संहिता की अन्य धाराओं के साथ ही साथ धारा 302 (हत्या करने) के मुल्जिम हैं। इससे भी बड़ी समानता यह है कि अदालत में तीनों का बचाव करने वाला वकील भी एक ही है। यानी भाजपा के एक प्रमुखतम नेता राम जेठमलानी, जो वाजपेयी सरकार में कानून मंत्री रह चुके हैं और आजकल राज्यसभा सदस्य हैं।
ं वैसे तो भाजपा अफजल गुरू को जल्दी से जल्दी फाँसी देने के लिए बड़ा शोर मचाती है। पर दूसरी तरफ भाजपा के ही एक बड़े नेता ने अफजल को बचाने के लिए अपने वकालती ज्ञान के तमाम जौहर दिखलाए थे।

-आर.एस. यादव
फोन0 011-२३२३०७६२
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
समाप्त

1 टिप्पणी:

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।