सोमवार, 4 अक्तूबर 2010

गुलामी और लूट का खेल-तमाशा : राष्ट्रमंडल खेल, भाग 1

आजाद भारत के लिए वह एक शर्म का दिन था। 29 अक्टूबर को आजाद और लोकतांत्रिक भारत की निर्वाचित राष्ट्रपति अगले राष्ट्रमंडल खेलों की मशाल को ब्रिटेन की महारानी से लेने के लिए स्वयं चलकर लंदन में उनके महल मंे पहुँची थीं। मीडिया को इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा, भारतीय राष्ट्रपति को सलामी दी गई तथा शाही किले मंे ठहराया गया, इसी से वह अभिभूत था। किसी ने यह सवाल नहीं उठाया कि ब्रिटिश साम्राज्य के समाप्त होने और भारत के आजाद होने के 63 वर्ष बाद भी हम ब्रिटिश महारानी को मान्यता क्यों दे रहे हैं? साम्राज्य की गुलामी की निशानी को हम क्यों ढो रहे हैं?
राष्ट्रीय शर्म का ऐसा ही एक अवसर कुछ साल पहले आया था, जब भारत के प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ने आॅक्सफोर्ड विश्वविद्यालय मंे मानद उपाधि मिलने के जवाब मंे अपने भाषण मंे अंग्रेजों की गुलामी की तारीफ मंे पुल बाँधे थे। उन्होेंने कहा था कि भारत की भाषा, शास्त्र, विश्वविद्यालय, कानून, न्याय व्यवस्था, प्रशासन, किक्रेट, तहजीब सब कुछ अंग्रेजो की ही देन है। किसी और देश का
प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ऐसा कह देता तो वहाँ तूफान आ जाता। लेकिन यहाँ पत्ता भी नहीं खड़का। ऐसा लगता है कि गुलामी हमारे खून में ही मिल गई है। राष्ट्रीय गौरव और स्वाभिमान की बातें हम महज किताबों और भाषणों में रस्म अदायगी के लिए ही करते हैं।
3 से 12 अक्टूबर 2010 को दिल्ली मंे होने वाले जिन राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भारत सरकार और दिल्ली सरकार दिन-रात एक कर रही है, पूरी ताकत व अथाह धन झोंक रही है, वे भी इसी गुलामी की विरासत हैं। इन खेलों मंे वे ही देश हिस्सा लेते हैं जो पहले ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहे हैं। दुनिया के करीब 180 देशों में से महज 48 देश इसमें शामिल होंगे। राष्ट्रमंडल खेलों की संरक्षक ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ द्वितीय हंै और उप संरक्षक वहाँ के राजकुमार एडवर्ड हैं। हर आयोजन के करीब 1 वर्ष पहले महारानी इसका प्रतीक डंडा आयोजक देश को सौंपती हैं और इसे ‘महारानी डंडा रिले’ कहा जाता है।
साम्राज्य और गुलामी की याद दिलाने वाले इन खेलों के दिल्ली में आयोजन की तैयारी कई सालों से चल रही है। ऐसा लगता है कि पूरी दिल्ली का नक्शा बदल जाएगा। कई स्टेडियम, खेलगाँव, चैड़ी सड़कें, फ्लाईओवर, रेलवे पुल, भूमिगत पथ, पार्किंग स्थल और कई तरह के निर्माण कार्य चल रहे हैं। पर्यावरण नियमों को ताक पर रखकर यमुना की तलछटी में 118 एकड़ में विशाल खेलगाँव बनाया जा रहा है, जिससे इस नदी और जनजीवन पर नए संकट पैदा होंगे। इस खेलगाँव से स्टेडियमों तक पहुँचने के लिए विशेष 4 व 6 लेन के भूमिगत मार्ग और विशाल खंभो पर ऊपर चलने वाले मार्ग बनाए जा रहे हैं। दिल्ली की अन्दुरूनी और बाहरी, दोनों रिंगरोड को सिग्नल मुक्त बनाया जा रहा है, यानी हर क्रासिंग पर फ्लाईओवर होगा। दिल्ली मंे फ्लाईओवरों की संख्या सैकड़ों में पहुँच जाएगी। एक-एक फ्लाईओवर का निर्माण कई-कई करोड़ रुपयों में होता है। उच्च क्षमता बस व्यवस्था के नौ काॅरिडोर बनाए जा रहे हैं।
दिल्ली मेट्रो का तेजी से विस्तार हो रहा है और 2010 यानी राष्ट्रमंडल खेलों तक यह दुनिया का दूसरा सबसे लंबा मेट्रो रेल नेटवर्क बन जाएगा। तेजी से इसे बनाने के लिए एशिया में पहली बार एक साथ 14 सुरंग खोदनें वाली विशाल विदेशी मशीनें इस्तेमाल हो रही हैं। इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर 9000 करोड़ रुपए की लागत से नया टर्मिनल और रनवे बनाया जा रहा है ताकि एक घंटे मंे 75 से ज्यादा उड़ाने भरी जा सकें। इस हवाई अड्डे को शहर से जोड़ने के लिए 6 लेन का हाईवे बनाया जा रहा है और मेट्रो से भी जोड़ा जा रहा है।
मात्र दस दिन के राष्ट्रमंडल खेलों के इस आयोजन पर कुल खर्च का अनुमान लगाना आसान नहीं है, क्योंकि कई विभागों और कई मदों से यह खर्च हो रहा है। सरकार के खेल बजट में तो बहुत छोटी राशि दिखाई देगी। उदाहरण के लिए, हाई-टेक सुरक्षा का ही ठेका एक कंपनी को 350 करोड़ रु0 मंे दिया गया है। किन्तु यह उस खर्च के अतिरिक्त होगा, तो सरकारी पुलिस, यातायात पुलिस और सुरक्षा बलों की तैनाती के रूप में होगा।
एक वर्ष पहले इंडिया टुडे ने अनुमान लगाया था कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन पर कुल मिलाकर 80,000 करोड़ रु0 खर्च होंगे। अब यह अनुमान और बढ़ जाएगा। कहा जा रहा है कि ये अभी तक के सबसे महँगे राष्ट्रमंडल खेल होंगे। सवाल यह है भारत जैसे गरीब देश में साम्राज्यवादी अवशेष के इस दस-दिनी तमाशे पर इतनी विशाल राशि खर्च करने का क्या औचित्य है? देश के लोगों की बुनियादी जरुरतें पूरी नहीं हो रही हैं। आज दुनिया के सबसे ज्यादा भूखे, कुपोषित, आवासहीन और अशिक्षित लोग भारत में रहते हैं। इलाज के अभाव मंे मौतें होती रहती है। गरीबों को सस्ता राशन, गाँवो में पेयजल, इलाज की पूरी व्यवस्था, बुढ़ापे की पेन्शन और स्कूलों में पूरे स्थाई शिक्षक एवं भवन व अन्य
सुविधाएँ देने के लिए सरकार पैसे की कमी का रोना रोती है और उनमें कटौती करती रहती है। निजी-सरकारी भागीदारी और निजीकरण के लिए भी वह यही दलील देती है कि उसके पास पैसे की कमी है। फिर राष्ट्रमंडल खेलों के इस तमाशे के लिए इतना पैसा कहाँ से आ गया? सरकार का झूठ और बेईमानी यहीं पकड़ जाती है। जरुरतें क्या हैं और सीमित संसाधनों को खर्च करने की प्राथमिकताएँ क्या हांे, इस पर राष्ट्रीय बहस चलाने का वक्त आ गया है।
तुलसीदास को रत्नावली ने फटकारा था कि जितना राग तुमने मुझसे लगाया है, उतना भगवान से लगाते तो तुम्हारा कल्याण हो जाता। आज सरकार को यह कहने वाला कोई नहीं है कि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए दिखाया जा रहा समर्पण व तत्परता व लगाए जा रहे संसाधन और युद्ध स्तर पर हो रही कार्यवाही का आधा भी तो देश की साधारण जनता के कष्टों को दूर करने के लिए करो। सारे नेता, सारे प्रमुख दल, बुद्धिजीवी और मीडिया झूठी शान वाले इस आयोजन की जय, जयकार में लगे हैं। विपक्षी नेता और मीडिया आलोचना कर रहे हैं तो इतनी ही कि निर्माण कार्य समय पर पूरे नहीं हांेगे, लेकिन इसके औचित्य पर वे सवाल नहीं उठाते। इस तमाशे में ठेकेदारों, कम्पनियों तथा कमीशनखोर नेताओं की भारी कमाई होगी। उनकी पीढ़ियाँ तर जाएँगी। विज्ञापनदाता देशी-विदेशी कंपनियों की ब्रिकी बढ़ेेगी। मीडिया को भी भारी विज्ञापन मिलेंगे। घाटे मंे सिर्फ रहेगी देश की साधारण जनता। यह लूट और बरबादी है।

-सुनील
मो0: 09425040452
क्रमश:

1 टिप्पणी:

sahaytaa ने कहा…

इस देश का दुर्भाग्य है कि इधर सम्पूर्ण उत्तर भारत बढ की विभीषिका से त्रस्त था, उधर देश का शासनाध्यक्छ के चेहरे पर कोई शिकन नही वो क्वीन बैटन उठाने मे मस्त था ! इधर प्रजातंत्र का केद्र -बिन्दु-जनता बिजली पानी को मोहताज है उधर दे्श का शासक वर्ग कभी आई पी एल कभी कामन वैल्थ गेम्स जैसे कार्यक्रम मे सह्भागिता कर
पैसे काबिजली का दुरुप्योग कर रहा है!