गुरुवार, 7 अक्तूबर 2010

गुलामी और लूट का खेल-तमाशा : राष्ट्रमंडल खेल, अंतिम भाग

गुलामी और लूट का खेल-तमाशा : राष्ट्रमंडल खेल, भाग 1

यह कहा जा रहा है कि राष्ट्रमंडल खेलों के लिए जो इन्फ्रास्ट्रक्चर बन रहा है, वह बाद में भी काम आएगा। लेकिन किनके लिए? निजी कारों को दौड़ाने और हवाई जहाजों मंे उड़ने वाले अमीरों के लिए यह वल्र्ड-क्लास सिटी बन जाएगी। लेकिन तब तक दिल्ली के ही मेहनतकश झुग्गी झोपड़ी वासियों और पटरी-फेरी वालों को दिल्ली के बाहर खदेड़ा जा चुका होगा। उनको हटाने और प्रतिबंधित करने की मुहिम पिछले कुछ समय से चल रही है, उनके पीछे भी राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन है। किन्तु सवाल यह भी है कि पूरे देश का पैसा खींचकर दिल्ली के अमीरों के ऐशो-आराम के लिए लगाने का अधिकार क्या सरकार को है? देश के गाँवो और पिछड़े इलाकों को वंचित करके अमीरों-महानगरों के पक्ष मंे यह एक प्रकार का पुनर्वितरण हो रहा है।
यह भी दलील दी जा रही है कि इस आयोजन से देश में खेलों को बढ़ावा मिलेगा। यह भी एक भ्रांति है। उल्टे, ऐसे आयोजनों से बहुत मँहगे, खर्चीले एवं हाई-टेक खेलों की एक नई संस्कृति जन्म ले रही है, जो खेलों को आम जनता से दूर ले जा रही है और सिर्फ अमीरों के लिए आरक्षित कर रही है। आज खर्चीले कोच, विदेशी प्रशिक्षण, अत्याधुनिक स्टेडियम और मँहगी खेल-सामग्री के बगैर कोई खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ सकता। पिछले ओलंपिक मंे स्वर्ण पदक प्राप्त करने वाला भारतीय निशानेबाज अभिनव बिन्द्रा एक उदाहरण है, जिसके परिवार ने खुद अपना शूटिंग रेन्ज बनाया था और उसे यूरोप मंे प्रशिक्षण दिलवाया था। इस देश के कितने लोग इतना खर्च कर सकते हैं?
इन खेलों और उससे जुड़े पैसे व प्रसिद्धि ने एक अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा को जन्म दिया है, जिसमें प्रतिबंधित दवाओं, सट्टे और मैच-फिक्सिंग का बोलबाला हो चला है। जबरदस्त व्यवसायीकरण के साथ खेलों मंे खेल भावना भी नहीं रह गई है और खेल साधारण भारतवासी से दूर होते जा रहे हैं। टीवी चैनलों ने भारतीयों को खेलने के बजाय टीवी के परदे पर देखना, खिलाड़ियों के फैन बनना, आॅटोग्राफ लेना आदि जरुर सिखा दिया है। व्यापक दीवानगी पैदा करके टीवी चैनल और विज्ञापनदाता कम्पनियों की खूब कमाई होती है। अब तो चियर गल्र्स और ड्रिंक्स गल्र्स के रुप में इनमें भौंडेपन, अश्लीलता और नारी की गरिमा गिराने का नया अध्याय शुरु हुआ है। जनजीवन के हर क्षेत्र की तरह खेलों का भी बाजारीकरण हो रहा हैं, जिससे अनेक विकृतियाँ पैदा हो रही हैं। क्रिकेट और टेनिस जैसे कुछ खेलों मंे तोे बहुत पैसा है। इनमें जो खिलाड़ी प्रसिद्धि पा लेते हैं, वे मालामाल हो जाते हैं। लेकिन हाकी, कबड्डी, खो-खो, कुश्ती, दौड़-कूद जैसे पारंपरिक खेल उपेक्षित होते गए हैं। इनमें चोटी के खिलाड़ियों की भी उपेक्षा व दुर्दशा के किस्से बीच-बीच में आते रहते हैं।
राष्ट्रमंडल खेलों के बजाय इसका आधा पैसा भी देश के गाँवो और कस्बों मंे खेल-सुविधाओं के प्रदाय और निर्माण में, देहाती खेल आयोजनों में और देश के बच्चों का कुपोषण दूर करने में लगाया जाए तो देश में खेलों को कई गुना ज्यादा बढ़ावा मिलेगा। खेलों मंे छाये भ्रष्टाचार, पक्षपात और असंतुलन को भी दूर करने की जरुरत है, तभी अंतर्राष्ट्रीय स्पर्धाओं में भारत की दयनीय हालत दूर होगी और वह पदक तालिका में ऊपर उठ सकेगा।
लुब्बे-लुबाब यह है कि राष्ट्रमंडल खेल इस देश की गुलामी, संसाधनों की लूट, विलासिता और गलत खेल संस्कृति के प्रतीक हैं। सभी देश भक्त लोगों को पूरी ताकत से इसके विरोध में आगे आना चाहिए।


-सुनील
मो0: 09425040452

3 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
मध्यकालीन भारत-धार्मिक सहनशीलता का काल (भाग-२), राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। नवरात्रा की हार्दिक शुभकामनाएं!

khalid a khan ने कहा…

ye ayojan khel ke liye nahi pujiptiyo ek lut ke liye tha....shandar pastuit