मंगलवार, 16 नवंबर 2010

आरएसएस किसका पक्षधर ? हिटलर का ? देश विरोधी संगठनो का...?? (भाग 2)

शांति के लिए विस्फोट
अपने मष्तिस्क में इस बात को बिठाना जरूरी है कि कैसे प्राचीन राष्ट्रों ने अपनी अल्पसंख्यक समस्या का निपटारा किया वे अपने राज्य में किसी भी भिन्न तत्व को स्वीकारने के लिए तैयार नहीं रहे प्रवासियों को प्राकृतिक तौर पर जनसँख्या के मुख्य भाग में अर्थात राष्ट्रीय नस्ल में अपने आपको मिलाना होता है, उनकी संस्कृति भाषा और महत्वकांक्षा को स्वीकारते हुए, अपने अलग अस्तित्व की हर भावना को त्यागते हुए, अपने विदेशी मूल के होने को भूलते हुए अगर वे ऐसा नहीं करते तो वे केवल विदेशियों की तरह रह सकते हें, राष्ट्र के तमाम बन्धनों और नियमो से बंधे हुए राष्ट्र को सहन करते हुए किसी भी विशेष सुरक्षा के ही नहीं बल्कि किसी भी अधिकार सुविधा के हकदार होकर
ऐसे विदेशी तत्वों के लिए सिर्फ दो रास्ते खुले हेंया तो राष्ट्रीय नस्ल में पूरी तरह घुल मिल जाएँ, इसकी संस्कृति को स्वीकार लें, या राष्ट्रीय नस्ल के रहमोकरम पर देश में रहे जब तक राष्ट्रीय नस्ल इजाजत नहीं देती है और अगर राष्ट्रीय नस्ल की इच्छा हो तो देश छोड़कर चले जाएँयही एकमात्र तार्किक और उचित समाधान हैकेवल इसी तरह राष्ट्रीय जीवन स्वस्थ्य और बिना परेशानी के चल सकता हैकेवल ऐसा करके राष्ट्र की राजनीति में कैंसर की तरह पनप रहे एक राज्य के भीतर दूसरे राज्य के पैदा होने के खतरे से बचा जा सकता है

पुराने समझदार देशों के अनुभव के आधार पर ये कहा जा सकता है कि हिंदुस्तान में गैर हिन्दू जनता को या तो हिन्दू संस्कृति और भाषा अपना लेनी चाहिए, हिन्दू धर्म का आदर और सम्मान करना सीखना चाहिएतथा हिन्दू राष्ट्र का गुणगान करने के अलावा और कुछ नहीं करना चाहिए, अर्थात उन्हें केवल इस देश और इसकी वर्षों पुरानी परम्पराओं के प्रति असहिशूष्ता और अकृतज्ञता का दृष्टिकोण अपनाना होगा, बल्कि इसके बजाये प्रेम और निष्ठा का सकरात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा, संक्षेप में इन्हें विदेशी नहीं बने रहना चाहिए, अन्यथा समस्त प्रकार के विशेषाधिकारों, प्राथमिकता पर आधारित व्यवहार तथा यहाँ तक कि नागरिक अधिकारों से वंचित रहकर उस देश में रहना होगा। इसके अलावा उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है।

आरएसएस को पहचानें किताब से साभार
(क्रमश:)

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