शुक्रवार, 4 मार्च 2011

सी.आई.ए व उसका मीडिया

ओबामा ! ईट का जवाब पत्थर से दिया जायेगा

लीबिया के सैनिक तानाशाह कर्नल गद्दाफी के सम्बन्ध में तरह-तरह के दुष्प्रचार सी.आई. के इशारे पर पश्चिमी मीडिया ने शुरू कर दिया है। मीडिया में छाप रहा है कि गद्दाफी ने कहा कि खून की होली खेलूँगा-लीबिया को जलाकर ख़ाक कर दूंगा-तीसरे विश्व युद्ध की आशंका जैसी अफवाहबाजी वाले समाचार सुर्ख़ियों में हैं। इन सब समाचारों को प्रसारित का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि दुश्मन की शक्ल को राक्षस की शक्ल दे दो। वहीँ संयुक्त राष्ट्र उससे जुड़े संगठन युद्ध स्तर पर लीबिया के खिलाफ अपना अभियान जारी रखे हुए हैं। यह संगठन भी अमेरिकी साम्राज्यवाद के हितों की रक्षा करने का कार्य करता है। मानवाधिकार, संप्रभुता, न्याय, लोकतंत्र जैसे शब्दों का इस्तेमाल यह संगठन अमेरिकन साम्राज्यवाद के विरोधियों को परस्त करने के लिये करते हैं।
ईराक, अफगानिस्तान में अमेरिकन सेनाओं ने जो भी कुछ किया है वह मानव इतिहास में राजसी प्रवित्तियों को मात करता दिखाई देता है। संयुक्त राष्ट्र संघ, अमेरिकी साम्राज्यवादियों के मित्रों को आज सबसे ज्यादा चिंता लीबिया की ही है। वह चाहते हैं की किसी भी तरह से लीबिया को अप्रत्यक्ष रूप से गुलाम बना कर उसकी प्राकृतिक संपदाओं को लूट सकें। इसके लिये नो फ़्लाई जोन जैसी कार्यवाहियां अमेरिकन जहाजों का लीबिया की तरफ रवाना होना उनके मुख्य उद्देश्य की तरफ इंगित करता है। वहीँ ईरान ने खुलकर धमकी दी है कि यदि नाटो सेनाओं ने लीबिया पर सैन्य कार्रवाई की तो वहां उसके सैनिकों की कब्रगाह बन जाएगी। ईरान के राष्ट्रपति मुहम्मद अहमदीनेजाद ने धमकी दी कि यदि अमेरिका और उसके मित्र देशों ने उत्तरी अफ्रीका या फिर मध्य पूर्वी देशों में किसी पर भी हमला बोलने की कोशिश की, तो उन्हें करारा जवाब मिलेगा।
क्यूबा, वेनेजुएला, ब्राजील जैसे देशों ने भी अमेरिकी तानाशाही का विरोध किया है। इन देशों ने लीबिया को मित्र देशों का समूह गठित करने की बात भी कही है


सुमन
लो क सं घ र्ष !

5 टिप्‍पणियां:

Ashish Shrivastava ने कहा…

क्या आप अंतरराष्ट्रीय खबरों को देखते/सुनते/पढ़ते है ? या आंख मूँद कर अमरीका विरोध की पोष्ट लिखते है ?

You Tube ही देख ले! गदाफी के विडीयो है जिसमे वो खून खराबे की बात कर रहा है. मान लेते है वो नहीं बोल रहा है फिर भी जो लीबिया में निहत्थे नागरीको पर गोलीयां अमरीका चल रहा है क्या ?

हद हो जाती है अंधे विरोध की !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

आपकी पैनी नजर के कायल हो गये हैं हम तो!

Kajal Kumar ने कहा…

इन पश्चिमी राष्ट्रों को काश कोई ये बताए कि तेल म्यंमार में भी बहुत है केवल लीबिया में ही नहीं (पर हो सकता है कि चीन के नाम से सांप सूंघ जाता हो)

बेनामी ने कहा…

amerika kee chhodiye. aap apni kahen. janta ka vidroh aapko shayad cia kee chaal lagta hai.

vaise aapki parti aur apki parti kee mitr parti ka samajvad bangal men nanga ho chuka hai.

aur aapki parti ke kuchh logon ne 40 saal pahle bharat men kranti kee samajh aur program banane ke bare men vichar kiya tha, vah samjh aur program abhi tak thande baste men pada hai.

agar kio program ( jo kee nahin hai )hai, to uski ek kapi bhejiyega. keval bhejiyega hee nahin balki apne blog par prakashit hee ka dijiyega kyonki aapki parti koi leninvadi gupt parti to hai nahin, khuli aur khule program kee parti hai jiske sansadiy neta rashtripati ko milne aise jate hain jaise ek gramin petti burjua apne ganv ke sarpanch ko milta hai. aapko aur aapke sansadmargiyon kee is uchch sthiti par badhai. comredo puto-falo dudho nahao.

Sachi ने कहा…

मुझे याद है, जब 98 में भारत ने परमाणु परीक्षण किया था, तो वर्तमान माओवादियों और तत्कालीन कम्युनिस्टों, लाल बुद्धिजीवी और उनके चमचों ने बड़ी रैलियाँ की थी। हम शांति के पुजारी हैं और पता नहीं क्या क्या... मैं बड़ा प्रभावित हुआ।

कुछ दिनों के बाद जब ईरान परमाणु कार्यक्रम पर आगे बढ़ा, और अमरीका आग बबूला हुआ, तो यही लोग फिर से लाल झंडे लेकर आगे बढ़े और चिल्लाये : यह किसी देश की संप्रभुता पर चोट है। ईरान को परमाणु बम बनाना चाहिए।

तब मैं सोचा, कि बड़े बुजुर्ग सही ही कह गए हैं, ये लाल रंग, दर असल रंगे सियार हैं। शांति का सिद्धान्त क्या ईरान पर लागू नहीं होता। अच्छा खैर ये सब पुरानी बातें हैं, मैं भूल जाता हूँ। रात गई बात गई।

कल अमरीका से परमाणु तकनीक मिल रहा था, जो मनमोहन सिंह ने अंतत: हासिल कर ली, उसको लेकर ये लाल है तौबा मचा रहे थे। चलो उसको भी अब तीन साल हो गए। हमारा मनमोहन भी कमजोर प्रधानमंत्री साबित हुआ।

अब मुद्दे की बात: इन कम्युनिस्टों को फिडेल कास्त्रो, और स्टालिन के पास छोड़ देना चाहिए, और फिर देखेंगे कि वहाँ विरोध करने पर इनके साथ क्या सलूक होता है। वैसे पास में चीन ही है, जो अपने राजनीतिक विरोधी को नोबल पुरस्कार में जाने तक ही नहीं दिया, साथ ही, उसके पूरे खंडन को नज़रबंद कर दिया। थ्येन आन मेन तो कब की पुरानी बात है। गद्दाफ़ी का अपने विरोधियों पर किया जाने वाला हमला इन्हें नहीं दिखता है।

खैर भगवान सबको खाना देता है, कोई मार्क्स और अमरीका विरोध के नाम पर मैक्डोनल्ड में खाता है, तो कोई गरीब भगवान का नाम लेकर घर पर ही रूखी सूखी खाता है, और देशभक्त कहलाता है।