गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

असम: धरतीपुत्रों को बांटने की साजिश


हाल में (मार्च-अप्रैल 2011) असम में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा और खासतौर पर नरेन्द्र मोदी जैसे पार्टी नेताओं ने जिस मुद्दे को जमकर उछाला, वह था बांग्लाभाषियों, विशेषकर मुसलमानों, की असम में कथित घुसपैठ। सांप्रदायिक पार्टियाँ और संगठन यह झूठा प्रचार कर रहे हैं कि अधिकांष बांग्लाभाषी मुसलमान, बांग्लादेषी घुसपैठिए हैं। इस मिथक का सहारा लेकर ये पार्टियाँ और संगठन, अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने और हिन्दुओं की भावनाएं भड़काने का अपना पुराना खेल खेल रहे हैं।
बंगाली मुसलमानों का मुद्दा समय-समय पर राष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया जाता रहा है। बंगाली मुसलमानों को-चाहे वे बांग्लादेश के निवासी हों या पश्चिम बंगाल के- देश की सुरक्षा के लिए खतरा बताया जाता है।साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, स्वामी असीमानंद, अभिनव भारत आदि द्वारा किए गए आतंकी हमलों के लिए इन्हें दोषी ठहराया जाता रहा है। इन हमलों का दोष बांग्लादेषी आतंकी संगठनों के सिर मढ़ा जाता रहा है और यह आरोप भी लगता रहा है कि इन संगठनों की भारत में रह रहे बांग्लादेषी मुसलमान मदद करते हंै। असम में बांग्लाभाषी मुसलमानों का मुद्दा उछाल कर उसके जरिए समाज का साम्प्रदायिक धु्रवीकरण करने का अभियान लंबे समय से चल रहा है।
असम में बड़ी संख्या में मुसलमानों-विषेषकर बांग्लाभाषी मुसलमानों-को “डी“ (डाउटफुल अर्थात संदेहास्पद) मतदाता करार देकर उन्हें मताधिकार से वंचित कर दिया गया है। इन गरीब, असहाय लोगों पर यह जिम्मेदारी लाद दी गई है कि वे यह साबित करें कि वे भारत के वैध नागरिक हैं। भाजपा का यह आरोप है कि कांग्रेस, बांग्लादेशी मुसलमानों को उन क्षेत्रों में बसा रही है जहाँ से उसे कम वोट मिलते हैं।
असम के नेल्ली में सन् 1983 में मुसलमानों का कत्लेआम हुआ था। इस कत्लेआम में 5000 से ज्यादा निर्दोष मुसलमान मारे गए थे। असम की एक जनजाति को भड़का कर यह कत्लेआम करवाया गया था। यह आरोप लगाया गया था कि बांग्लादेशी मुसलमानों ने वोट डालकर चुनाव परिणामों को प्रभावित किया। इस मुद्दे को आॅल असम स्टूडेंट्स यूनियन-जो आर.एस.एस. से नियंत्रित है-ने चुनावों में भुनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
बांग्लाभाषी मुसलमानों का मसला काफी जटिल है और इसका इतिहास बहुत पुराना है। सन् 1826 में असम पर कब्जा करने के बाद तत्कालीन ब्रिटिष सरकार ने यह निर्णय किया कि आसपास के अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों के निवासियों को तत्समय बहुत कम आबादी वाले असम में बसाया जाए। तदानुसार, “जनरोपण कार्यक्रम“ शुरू किया गया जिसके अंतर्गत अविभाजित बंगाल के निवासियों को असम में बसने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा ताकि बंगाल में कृषि भूमि पर बढ़ते दबाव को कम किया जा सके। इस कार्यक्रम के तहत जो बांग्लाभाषी असम में बसाए गए उनमें मुसलमानों की बड़ी संख्या थी। इन प्रवासियों ने असम में कृषि का विकास किया। वे बहुत मेहनती थे और असम के विकास में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया।
भारत के विभाजन के बाद, असम-जो तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान का पड़ोसी बन गया था- से काफी संख्या में हिन्दू पलायन कर सीमा से दूर स्थित राज्यों में बस गए। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना द्वारा चलाए गए दमन चक्र से पीडि़त कई लोगों ने वहां से भाग कर असम में शरण ली। इनमें से अधिकाँश हिन्दू थे। दूसरी ओर, असम में सांप्रदायिक राजनीति के उदय से आतंकित हो लगभग 6 लाख असमिया मुसलमानों ने बांग्लादेश को अपना नया घर बना लिया।
बांग्लादेश के कुछ निवासी-मुख्यतः रोजी की तलाश में- भारत के अन्य शहरों में बस गए। मुंबई और दिल्ली में बांग्लादेशी मुसलमान प्रवासियों का हौव्वा खड़ा किया जाता रहा है। जाने-माने मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सदस्यता वाली अनेक जन जाँच समितियों ने मुंबई में बांग्लादेशी मुसलमानों के “खतरे“ की तह में जाने की कोशिश की है। इनमें से एक जन जाँच समिति - जिसमें शमा दलवई और इरफान इंजीनियर शामिल थे- इस निष्कर्ष पर पहॅुची कि मुंबई में बांग्लादेशी मुसलमानों की आबादी 20 हजार से ज्यादा नहीं है। दावा यह किया जाता है कि मंुबई में तीन लाख बांग्लादेशी “घुसपैठिए“ निवास कर रहे हैं। मुंबई में रह रहे बांग्लादेशियों में से अधिकाँश जरी का अत्यंत श्रमसाध्य काम करते हैं। उनकी महिलाएं बहुत कम वेतन पर घरों में काम करती हैं। वे बहुत बदहाली में अपनी जिंदगी बसर कर रहे हैं। उनका लगभग पूरा समय और ऊर्जा दो जून की रोटी जुटाने में खर्च हो जाती है। उनके घर, मुंबई के उपनगरों के बाहरी क्षेत्रों में, गटरों और नालियों के नजदीक बनाई गई कच्ची झोपडि़याँ हैं।
यही स्थिति अन्य महानगरों - विशेषकर दिल्ली में है। वहाँ भी सांप्रदायिक तत्वों ने इस मुद्दे से राजनैतिक लाभ उठाने की भरपूर कोशिश की है।
बेहतर जीवन की तलाश में अपना देश छोड़कर दूसरे देश में जाना-चाहे कानूनी हो या गैरकानूनी तरीके से-पूरी दुनिया में बहुत आम है। गरीब वर्ग तो यह करता ही है अपेक्षाकृत समृद्ध व षिक्षित वर्ग भी यही करता है। भारत में असंख्य नेपाली और तिब्बती प्रवासी रहते हैं। बड़ी संख्या में भारतीय युवक-युवतियाँ अमरीका, ब्रिटेन, कनाडा, मलेशिया, सिंगापुर, श्रीलंका आदि में बस गए हैं या काम कर रहे हैं। इन प्रवासियों के दो में से एक उद्देश्य है - गरीबी व बदहाली से मुक्ति या फिर अपने आर्थिक-सामाजिक स्तर का उन्नयन। यह त्रासद है कि इस षुद्ध सामाजिक-आर्थिक परिघटना को सांप्रदायिक तत्व अपने हित साधन के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारत के अन्य इलाकों की तरह, असम में भी अंग्रेजों ने अपनी फूट डालो और राज करो की नीति पर अमल किया। उन्हांेने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच बैरभाव उत्पन्न किया। उन्नीसवीं सदी में चलाए गए “जनरोपण कार्यक्रम“ से असम के स्थानीय निवासियों का नाखुष होना स्वभाविक था। अंग्रेजों के हिन्दुओं व मुसलमानों को एक-दूसरे के खिलाफ भड़काने से समस्या और बढ़ी। अंग्रजों ने असम में “लाईन सिस्टम“ भी लागू किया, जिसके अंतर्गत विभिन्न धर्मावलम्बियों को अलग-अलग इलाकों में बसने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इससे यह समस्या और गंभीर हो गई। एक प्राकृतिक घटनाक्रम भी असम में तनाव को बढ़ा रहा है। विषाल ब्रम्हपुत्र नदी की धारा की दिषा बदलती रहती है और इस कारण उसके तट पर रहने वालों को अपना घरबार छोड़कर अन्यत्र शरण लेनी पड़ती है। इन विस्थापितों में से अधिकांष गरीब होते हैं और उन पर बांग्लादेषी घुसपैठिए का लेबिल चस्पा कर दिया जाता है।
असम की सांप्रदायिक स्थिति पर तुंरत ध्यान दिए जाने की जरूरत है। “डी“ मतदाता के मुद्दे के कारण भी वहाँ व्यापक जनाक्रोष है। असम एक अत्यंत गरीब राज्य है और उसे विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ाए जाने की जरूरत है। ऐतिहासिक परिस्थितियों और प्राकृतिक परिघटनाओं से जनित जनाक्रोश का कुछ तत्व राजनैतिक लाभ उठा रहे हैं। असम के सभी निवासियों के बीच प्रेम व बंधुत्व को बढ़ावा देने के सकारात्मक प्रयास होने चाहिए। सांप्रदायिक तत्वों के दुष्प्रचार का डटकर मुकाबला कर ही हम राज्य में व्याप्त सामाजिक अलगाव व विभाजन के भाव को दूर कर सकते हैं। यही असम की प्रगति की राह को प्रषस्त करेगा और वहाँ हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन पर अंकुश लगाएगा।

-राम पुनियानी
(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)



1 टिप्पणी:

Manpreet Kaur ने कहा…

बहुत ही अच्छे शब्द !मेरे ब्लॉग पर आये ! हवे अ गुड डे !
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