गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

बोल! अरी, ओ धरती बोल!


बोल! अरी, ओ धरती बोल! राज सिंहासन डाँवाडोल!
बादल, बिजली, रैन अँधियारी, दुख की मारी प्रजा सारी
बूढ़े, बच्चें सब दुखिया हैं, दुखिया नर हैं, दुखिया नारी
बस्ती-बस्ती लूट मची है, सब बनिये हैं सब व्यापारी
बोल! अरी, ओ धरती बोल! ...............................................

कलजुग में जग के रखवाले, चाँदी वाले, सोने वाले,
देसी हों या परदेसी हों, नीले पीले गोरे काले
मक्खी भुनगे भिन-भिन करते ढूँढे हैं मकड़ी के जाले,
बोल! अरी, ओ धरती बोल! ...............................................

क्या अफरंगी, क्या तातारी, आँख बची और बरछी मारी!
कब तक जनता की बेचैनी, कब तक जनता की बेजारी,
कब तक सरमाए के धंधे, कब तक यह सरमायादारी,
बोल! अरी, ओ धरती बोल! ...............................................

नामी और मशहूर नहीं हम, लेकिन क्या मजदूर नहीं हम
धोखा और मजदूरों को दें, ऐसे तो मजबूर नहीं हम,
मंजिल अपने पाँव के नीचे, मंजिल से अब दूर नहीं हम,
बोल! अरी, ओ धरती बोल! ...............................................

बोल कि तेरी खिदमत की है, बोल कि तेरा काम किया है,
बोल कि तेरे फल खाये हैं, बोल कि तेरा दूध पिया है,
बोल कि हमने हश्र उठाया, बोल कि हमसे हश्र उठा है,
बोल कि हमसे जागी दुनिया, बोल कि हमसे जागी धरती
बोल! अरी, ओ धरती बोल! ...............................................

-मजाज़ लखनवी
जन्म: 19 अक्तूबर 1911 जन्म स्थान: रुदौली, बाराबंकी

1 टिप्पणी:

किलर झपाटा ने कहा…

मजाज़ साहब की सुन्दर कविता पढ़वाने का बहुत बहुत शुक्रिया सुमन जी।