शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

विनायक सेन की सजा यानी लोकतंत्र का बदरंग चेहरा


27 दिसम्बर को लगभग सभी अखबारों में एक अजीब सा दृश्य था। पहले पन्ने पर बाईं ओर राजद्रोह के अपराध में आजीवन कारावास की सजा के बाद सींखचों के पीछे छत्तीसगढ़ के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता डाॅ0 विनायक सेन का चित्र था और दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे राजा, कलमाड़ी और नीरा राडिया के मुस्कराते हुए चेहरे थे। यह हमारे लोकतंत्र का शायद असली चेहरा है जिसमें भ्रष्टाचारी, बलात्कारी और गुण्डे कानून का मखौल उड़ाते हुए खुलेआम घूम रहे हैं और दूसरी तरफ मेडिकल कालेज से निकलने के बाद पैसों की अंधी दौड़ के पीछे भागने की जगह अपना सारा जीवन गरीब आदिवासी बच्चों की सेवा को समर्पित कर देने वाले डाॅ0 विनायक सेन जैसे समाजसेवियों को यह राज्यव्यवस्था अपना दुश्मन घोषित कर सींखचों के पीछे डाल रही है।
आखिर डाॅ0 सेन का कसूर क्या था? उनके ऊपर जेल में बंद एक बयासी वर्षीय नक्सली विचारक को पत्र पहुँचाने का आरोप है! यह अलग बात है कि राम जेठमलानी से लेकर प्रशांत भूषण जैसे कानूनविदों की निगाह में न तो इन आरोपों के पक्ष में पेश किए गए सबूत उनको अपराधी साबित करते हैं और न ही यह ‘अपराध’ किसी ऐसी श्रेणी में आता है जिसके लिए उन्हें इतनी कड़ी सजा दी जाए। जाने-माने अर्थशास्त्री तथा नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन इसे यूँ ही ‘कानून के साथ बेहूदा मजाक’ नहीं कहते। वैसे मामला अब रायपुर उच्च न्यायालय में चल रहा है और इस पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि इसके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है। अपने इस आलेख में मैं बस इस फैसले और ऐसे ही तमाम फैसलों तथा नव साम्राज्यवाद के इस युग में प्रशासन के रवैय्ये के निहितार्थों को तलाश करने का प्रयास करुँगा।
डाॅ0 सेन पर जिस तरह से फैसला दिया गया है वह न्यायपालिका के लगातार सत्ता वर्ग से प्रभावित होते जाने को साफ तौर से दिखाता है। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारवाद की नीतियों के लागू होने के बाद से ही पूरे शासक वर्ग का चरित्र बदला है। इससे पहले लोकतंत्र को कम से कम जबानी जमाखर्च के रूप में उपयोग करने वाली सरकारों ने अपना नकाब उतार कर फेंका तो अखबारों से लेकर न्यायपालिका तक की जबान बदल गई। इसका एक मानीख़ेज़ असर फिल्मों और धारावाहिकों में देखा जा सकता है जहाँ अब तक नायक रहा ट्रेड यूनियन नेता अब खलनायक में बदल गया तथा नायकों के रूप में अमीरजादों का प्रादुर्भाव हुआ। अखबारों में पूँजीपतियों की विलासितापूर्ण जीवनशैली के महिमामण्डन के लिए पेज थ्री का आविष्कार हुआ तो समाजसेवा अब एन0जी0ओ0 के ‘काज’ में सिमट गई। किसान, मजदूर, आदिवासी इस पूँजी की दुनिया में उपस्थित असुविधाएँ थीं

-अशोक कुमार पाण्डेय

क्रमश:

2 टिप्‍पणियां:

वन्दना ने कहा…

आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
http://tetalaa.blogspot.com/

Kajal Kumar ने कहा…

राजद्रोह एक संगीन मामला है, यूं ही नहीं थोप देना चाहिये. अगर यह आरोप लगाया जाए तो टिकना भी चाहिये.