अशोक कुमार पाण्डेय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
अशोक कुमार पाण्डेय लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

हिन्दी का शोककाल

   हंस के सम्पादक और नई कहानी की त्रयी के सदस्य रहे राजेन्द्र यादव के अवसान के बाद से ही मानो हिन्दी का शोककाल चल रहा है, गोरखपुर से ख्यात कवि और आलोचक परमानन्द श्रीवास्तव जी के जाने की ख़बर आई, फिर लखनऊ से प्रख्यात व्यंग्यकार के.पी.सक्सेना जी के, अभी हम इस आघात से उबर भी नहीं पाए थे कि हिन्दी-राजस्थानी के अत्यंत सम्मानित लेखक विजयदान देथा ने अपने गाँव बोरून्दा में अपनी आखिरी साँस ली। जीवन भर बच्चों के लिए उत्कृष्ट साहित्य का सृजन करने वाले हरिकृष्ण देवसरे का बाल दिवस वाले दिन ही चले जाना जैसे एक बड़ी विडंबना रच गया, तो उसके तीन दिन बाद ही वरिष्ठ कवि और लेखक ओम प्रकाश बाल्मीकि जी के निधन की खबर देहरादून से आई। महीने भर से कम समय में अपने परिवार के इतने सदस्यों को खोकर हिन्दी का साहित्य समाज जिस शोक और संताप में डूबा है उसे शब्दों में तो कोई क्या व्यक्त कर पाएगा, बस जैसे कि एकयुग अपने बीतने की घोषणा कर रहा हो, जैसे नाटक के एक दृश्य के दुखांत के बाद यवनिका के पतन के साथ कोई शोकाकुल संगीत बज रहा हो, जैसे नई पीढ़ी के कन्धों पर जिम्मेदारियाँ इस शोक के साथ चुपचाप आकर बैठ गई हों। युग समाप्त हो जाने वाली बात मैं किसी अतिरिक्त भावुकता में नहीं कह रहा। जिन रचनाकारों को हमने खोया है वे सभी अपने-अपने क्षेत्रों के बड़े लेखक ही नहीं बल्कि ट्रेंड सेंटर जैसे थे, राजेन्द्र यादव कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ नई कहानी के प्रवर्तक थे, यह स्वाधीनतोŸार भारत के  मध्यवर्गीय जीवन के संत्रास की तीव्रतम अभिव्यक्ति वाला दौर था, ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’ जैसी कहानियों और ‘सारा आकाश’ जैसे उपन्यास ने जैसे इस नए भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को एकदम से सामने ला दिया, साथ ही, अक्सर सामूहिकता का दावा करते लेकिन व्यक्तिगत परिक्षेत्र में संचालित होते साहित्य कार्य से आगे बढ़कर उन्होंने हंस जैसी पत्रिका निकाली और अक्षर प्रकाशन की नींव डाली। हंस सिर्फ पत्रिका नहीं एक आन्दोलन में तब्दील हुई। सहमति-असहमति अलग बात है पर हिन्दी साहित्य में स्त्री और दलित आवाजों के लिए जगह तलाशने और उन्हें सम्मान सहित मुख्य धारा में लाने का जो जरूरी काम हंस ने किया उसने हिन्दी साहित्य की परिधि का महत्वपूर्ण विस्तार किया। यही नहीं, हंस अपनी लोकतांत्रिकता और सम्पादकीयों की प्रखर पक्षधरता के साथ-साथ इस बात के लिए भी याद किया जाएगा कि इसके सम्पादक ने एक लघु पत्रिका के लिए यह जरूरी मानक स्थापित किया कि पत्रिका सम्पादक के आत्म प्रचार के लिए नहीं होती। राजेन्द्र जी शायद ही कभी सम्पादकीय के इतर दिखाई देते थे। बाद में पहल जैसी पत्रिका में ज्ञानरंजन जी ने यही किया और कुछ अन्य पत्रिकाओं ने। राजेन्द्र जी की बीमारी के बाद हंस ने अपनी चमक  धीरे-धीरे खो दी थी, अब कम से कम मुझे तो उन लोगों से कोई उम्मीद नहीं दिखती जिनके हाथों में इसकी विरासत है कि वे हंस की परम्परा को समृद्ध कर पाएँगे। विजयदान देथा, जिन्हें उनके आत्मीय बिज्जी कहा करते थे, लोक साहित्य के दुर्लभ अध्येता और साधक थे, भारतीय मानस और मेधा का उत्कृष्ट उदाहरण, जिन्होंने लोक कथाओं को अपने विशिष्ट अंदाज में प्रस्तुत किया। उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं का चैदह खण्डों में ग्रंथमाला ‘बातां रही फुलवारी’ का पुनर्लेखन और संग्रहण किया। ‘उलझन’ व अलेखूं हिटलर’ उनके राजस्थानी कहानी संकलन हैं। इसके अलावा भी हिन्दी और राजस्थानी में उनके अनेक कहानी संग्रह और उपन्यास आए, उन पर नाटक खेले गए, फिल्में बनीं और दोनों भाषाओं में वह सम्मानित हुए। जीवनपर्यत्ंा अपने गाँव में ही रहने वाले बिज्जी लोक के अनूठे चितेरे होते हुए भी उन्हें अपने समय और समाज के आईने में देखने के हामी थे, निरन्तर लालच और मुनाफे की होड़ में क्षत-विक्षत होती मानवता और बिखरते सामाजिक ताने-बाने उनकी चिंता के केन्द्र में थे।
    परमानन्द श्रीवास्तव मेरे गोरखपुर विश्वविद्यालय के दिनों में हिन्दी विभाग में थे, हिन्दी कविता के साथ-साथ विश्व साहित्य के अनेक गहन अध्ययन और समझ का मैं व्यक्तिगत रूप से गवाह हूँ। आलोचक के रूप में उन्होंने हिन्दी को ‘प्रतिबद्ध कविता’ जैसा पद ही नहीं दिया बल्कि जिस उदारता और सम्बद्धता के साथ उन्होंने नए से नए लोगों की रचनाओं को पढ़ा और उन पर लिखा, वह दुर्लभ है, अंतिम समय तक सक्रिय रहे परमानन्द जी मनुष्य के तौर पर जितने सहज और सरल थे एक आलोचक के रूप में उतने ही गंभीर और नीर-क्षीर विवेकी। हिन्दी की बेहद तोल मोल वाली आलोचना की दुनिया में उनकी उपस्थिति आश्वस्त करने वाली थी। के.पी. सक्सेना व्यंग्य की दुनिया के एक अत्यन्त सुपरिचित हस्ताक्षर थे, तो हरिकृष्ण देवसरे ने बच्चों के लिए किए जाने वाले बचकाने लेखन के बरक्स रोचक और अर्थपूर्ण लेखन से हिन्दी की कई पीढि़यों के बचपन को समृद्ध किया। ओम प्रकाश बाल्मीकि हिन्दीके दलित साहित्य के एकदम आरम्भिक झंडाबरदारों में से थे। उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ हमारे सामाजिक ढाँचे के मनुष्य विरोधी जातिवादी उत्पीड़न का जिन्दा दस्तावेज है, एक कवि, कहानीकार और विचारक के रूप में उन्होंने आजीवन शेाषण और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलन्द की। उनकी आवाज आथेंन्टिक भी थी और पुरअसर भी, जिसकी गूँज हिन्दी साहित्य ही नहीं समाज में भी साफ-सुनाई दी। उत्तर भारत में मजबूती से उभरे दलित आन्दोलन में बाल्मीकि जी जैसे साहित्यकारों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जाहिर है ऐसे साहित्यकारों को खोकर हम थोड़े और
निर्धन हुएहैं और वे खाली जगहें कभी भरी न जा सकेंगी, लेकिन उनका लिखा अब भी हमारे साथ है, वह अमत्र्य है, लाइट हाउस की तरह तूफानों में भी हमें रास्ता दिखाता, बस उन राहों पर चलना और उन्हें आने वाली पीढ़ी के लिए और स्पष्ट कर देना, यही उनकी यादों का सही तरीका हो सकता है और श्रद्धांजलि का असल मानी।
    -अशोक कुमार पाण्डेय
 मो0 8375072473
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

शनिवार, 23 अप्रैल 2011

विनायक सेन की सजा यानी लोकतंत्र का बदरंग चेहरा भाग 2


किसान, मजदूर, आदिवासी इस पूँजी की दुनिया में उपस्थित असुविधाएँ थीं जिनको समेटने और निपटाने के लिए हर संभव प्रयास किए गए। न्यायपालिकाएँ भी इसकी भागीदार बनीं और इस दौर में तमाम मजदूर-किसान विरोधी फैसले सामने आए। आजादी के बाद से ही स्थापित मान्यताएँ एक-एक करके ध्वस्त होने लगीं। हालत यह हुई कि किसी जनपक्षीय मुद्दे पर धरने-प्रदर्शन-बंद के बाद बजाय इसके कि उस मुद्दे पर बहस हो, बहस इस बात पर की जाने लगी कि इससे कितना नुकसान हुआ! जाहिर है पूँजी के इस खुले खेल के लिए अभिव्यक्ति के
अधिकार, लोकतंत्र, समानता जैसी बातें बेहद असुविधाजनक थीं। आखिर हमारे प्रधानमंत्री ने कुछ साल पहले विदेश में बोलते हुए निजीकरण के क्षेत्र में हर पाँच साल पर होने वाले चुनावों को एक अवरोध बताया ही था। विनायक सेन भी एक ऐसा ही अवरोध पैदा कर रहे थे। छत्तीसगढ़ के प्राकृतिक संसाधनों को वेदान्त जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हवाले किए जाने में अवरोध। सलवा जुडूम के नाम पर आदिवासियों को उनके घरों से भगाए जाने में अवरोध। सरकारों के पूँजीपतियों के खेल का हिस्सा बनते जाने में अवरोध!
जिस तरह से पिछले दिनों नई आर्थिक नीतियों के नाम पर देश भर में लूट का दौर चला है उसमें सबसे बड़ा खेल जमीनों के कब्जे का है। छत्तीसगढ़, उड़ीसा जैसी तमाम जगहों पर आदिवासियों और किसानों की जमीनें छीन कर उन्हें कौडि़यों के मोल देशी-विदेशी पूँजीपतियों के हवाले करने का खेल चल रहा है, उसका कोई भी विरोध बर्दाश्त करने को सरकारें तैयार नहीं हैं। विनायक सेन इस खेल का विरोध करने वालों में सबसे आगे थे। उन्होंने देश-विदेश के तमाम मंचों से गरीबों और आदिवासियों के हक की बात उठाई थी और इसीलिए वह सरकार की आँख की किरकिरी बने हुए थे और इसी विरोध के चलते उन्हें अब तक बच्चों के स्वास्थ्य पर बनी समिति का सम्मानित सदस्य बनाने वाली सरकारें उनके खिलाफ होकर उन्हें नक्सलियों का हरकारा साबित करने पर तुल गईं। झूठे सबूत गढ़े गए और सारे पुलिसिया दंद-फंद का प्रयोग कर उन्हें फँसाया गया। अपने खिलाफ उठी किसी भी आवाज को कुचलने पर आमादा ये सरकारें हिटलर के शासन की याद दिला रही हैं। फासीवाद का खतरा न केवल भारत बल्कि दुनिया भर में मँडरा रहा है। पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार जब विनायक की तुलना पाकिस्तान में कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज उठाकर अपनी जान गँवाने वाले सलमान तासीर से करते हैं तो इसके पीछे यही बात है।
लेकिन आमतौर पर चुप रहने वाला वाम-लिबरल समाज इस मुद्दे पर चुप नहीं है। न केवल भारत बल्कि अमरीका, इंग्लैण्ड, पोलैण्ड, जर्मनी सहित तमाम देशों के बुद्धिजीवियों ने इस घटना की कठोर निंदा की है बल्कि इस अन्याय के खिलाफ सड़कों पर भी उतरे हैं। अमत्र्य सेन, अरुंधती राय, नोम चाम्स्की सहित दुनिया भर के बुद्धिजीवियों ने इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है। देश के भीतर भी दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, मद्रास आदि हर छोटे-बड़े शहर में विनायक सेन के समर्थन में सभाएँ, धरना-प्रदर्शन और अन्य कार्यक्रम हुए हैं। भले एक छोटी सी संख्या आज विरोध में दिख रही हो लेकिन उन्माद और चुप्पी के इस मिले-जुले माहौल में सिविल समाज की उपस्थिति का एहसास भी कम नहीं है।
हालाँकि इन सबका सरकारों के ऊपर कोई असर पड़ता नहीं दिख रहा है। हालात ये हैं कि अभी वर्धा के अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में कार्यरत उनकी पत्नी इलीना सेन के खिलाफ एक सेमीनार में कुछ विदेशी विद्वानों को आमंत्रित करने के ‘आरोप’ में मामला दर्ज किया गया। जबकि न केवल उन विदेशी विद्वानों को वीसा आदि सभी जरुरी कागजी कार्रवाइयाँ पूरा करने के बाद आने की अनुमति मिली थी बल्कि इलीना के खिलाफ जो आरोप लगाए गए हैं वे विदेशियों को अपने यहाँ ठहराने और इसकी सूचना प्रशासन को न देने वाले होटल मालिकों के खिलाफ ही लगाया जा सकता है। ऐसे में अगर इलीना अपने परिवार पर सरकारों से जान का खतरा होने की आशंका व्यक्त करती हैं तो इसमें क्या गलत है? यह प्रकरण बताता है कि सरकारें अपनी तानाशाही लागू करने के लिए किस हद तक जा सकती हैं।
आज सवाल एक विनायक सेन की सजा का नहीं है। सवाल किसी एक विचारधारा का भी नहीं है। सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र का मतलब सिर्फ पाँच साल में एक बार वोट दे देना होता है? क्या जनता को अपने खिलाफ हो रही साजिशों के खिलाफ आवाज उठाने का भी हक नहीं है? क्या इस देश में नीरा राडिया, राजा, कलमाड़ी और येदियुरप्पा जैसे भ्रष्टाचार के आरोपी ही देशभक्त हैं और सवाल उठाने वाला हर शख्स देशद्रोही? विनायक सेन को सजा किसी एक आदमी को मिली सजा नहीं है बल्कि महात्मा गांधी और नेल्सन मंडेला की उस पूरी परंपरा को सजा है जो अन्याय के विरोध को हमारा अधिकार बताती है और अगर इस बार हमने इसका पुरजोर विरोध नहीं किया तो सत्ता के दमन का चक्र और तेज होगा तथा जनता के पक्ष में उठने वाली हर आवाज को बेरहमी से कुचल दिया जाएगा।


-अशोक कुमार पाण्डेय
समाप्त

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

विनायक सेन की सजा यानी लोकतंत्र का बदरंग चेहरा


27 दिसम्बर को लगभग सभी अखबारों में एक अजीब सा दृश्य था। पहले पन्ने पर बाईं ओर राजद्रोह के अपराध में आजीवन कारावास की सजा के बाद सींखचों के पीछे छत्तीसगढ़ के जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता डाॅ0 विनायक सेन का चित्र था और दूसरी तरफ भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे राजा, कलमाड़ी और नीरा राडिया के मुस्कराते हुए चेहरे थे। यह हमारे लोकतंत्र का शायद असली चेहरा है जिसमें भ्रष्टाचारी, बलात्कारी और गुण्डे कानून का मखौल उड़ाते हुए खुलेआम घूम रहे हैं और दूसरी तरफ मेडिकल कालेज से निकलने के बाद पैसों की अंधी दौड़ के पीछे भागने की जगह अपना सारा जीवन गरीब आदिवासी बच्चों की सेवा को समर्पित कर देने वाले डाॅ0 विनायक सेन जैसे समाजसेवियों को यह राज्यव्यवस्था अपना दुश्मन घोषित कर सींखचों के पीछे डाल रही है।
आखिर डाॅ0 सेन का कसूर क्या था? उनके ऊपर जेल में बंद एक बयासी वर्षीय नक्सली विचारक को पत्र पहुँचाने का आरोप है! यह अलग बात है कि राम जेठमलानी से लेकर प्रशांत भूषण जैसे कानूनविदों की निगाह में न तो इन आरोपों के पक्ष में पेश किए गए सबूत उनको अपराधी साबित करते हैं और न ही यह ‘अपराध’ किसी ऐसी श्रेणी में आता है जिसके लिए उन्हें इतनी कड़ी सजा दी जाए। जाने-माने अर्थशास्त्री तथा नोबेल पुरस्कार विजेता अमत्र्य सेन इसे यूँ ही ‘कानून के साथ बेहूदा मजाक’ नहीं कहते। वैसे मामला अब रायपुर उच्च न्यायालय में चल रहा है और इस पर इतना कुछ लिखा जा चुका है कि इसके विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है। अपने इस आलेख में मैं बस इस फैसले और ऐसे ही तमाम फैसलों तथा नव साम्राज्यवाद के इस युग में प्रशासन के रवैय्ये के निहितार्थों को तलाश करने का प्रयास करुँगा।
डाॅ0 सेन पर जिस तरह से फैसला दिया गया है वह न्यायपालिका के लगातार सत्ता वर्ग से प्रभावित होते जाने को साफ तौर से दिखाता है। नब्बे के दशक में आर्थिक उदारवाद की नीतियों के लागू होने के बाद से ही पूरे शासक वर्ग का चरित्र बदला है। इससे पहले लोकतंत्र को कम से कम जबानी जमाखर्च के रूप में उपयोग करने वाली सरकारों ने अपना नकाब उतार कर फेंका तो अखबारों से लेकर न्यायपालिका तक की जबान बदल गई। इसका एक मानीख़ेज़ असर फिल्मों और धारावाहिकों में देखा जा सकता है जहाँ अब तक नायक रहा ट्रेड यूनियन नेता अब खलनायक में बदल गया तथा नायकों के रूप में अमीरजादों का प्रादुर्भाव हुआ। अखबारों में पूँजीपतियों की विलासितापूर्ण जीवनशैली के महिमामण्डन के लिए पेज थ्री का आविष्कार हुआ तो समाजसेवा अब एन0जी0ओ0 के ‘काज’ में सिमट गई। किसान, मजदूर, आदिवासी इस पूँजी की दुनिया में उपस्थित असुविधाएँ थीं

-अशोक कुमार पाण्डेय

क्रमश:

मंगलवार, 1 फ़रवरी 2011

सुना है हाकिम सारे दीवाने अब ज़िंदां के हवाले होगे

सुना है हाकिम सारे दीवाने अब ज़िंदां के हवाले होगे

सारे जिनकी आँख ख़ुली है

सारे जिनके लब ख़ुलते हैं

सारे जिनको सच से प्यार

सारे जिनको मुल्क़ से प्यार

और वे सारे जिनके हाथों में सपनों के हथियार

सब ज़िंदां के हवाले होंगे!

ज़ुर्म को अब जो ज़ुर्म कहेंगे

देख के सब जो चुप न रहेगें

जो इस अंधी दौड़ से बाहर

बिन पैसों के काम करेंगे

और दिखायेंगे जो उनके चेहरे के पीछे का चेहरा

सब ज़िंदां के हवाले होंगे

जिनके सीनों में आग बची है

जिन होठों में फरियाद बची है

इन काले घने अंधेरों में भी

इक उजियारे की आस बची है

और सभी जिनके ख़्वाबों में इंक़लाब की बात बची है

सब ज़िंदां के हवाले होंगे

आओ हाकिम आगे आओ

पुलिस, फौज, हथियार लिये

पूंजी की ताक़त ख़ूंखार

और धर्म की धार लिये

हम दीवाने तैयार यहां है हर ज़ुर्म तुम्हारा सहने को

इस ज़िंदां में कितनी जगह है!

कितने जिंदां हम दीवानों के

ख़ौफ़ से डरकर बिखर गये

कितने मुसोलिनी, कितने हिटलर

देखो तो सारे किधर गये

और तुम्हें भी जाना वहीं हैं वक़्त भले ही लग जाये

फिर तुम ही ज़िंदां में होगे!

* ज़िंदां- कारावास


अशोक कुमार पाण्डेय

शनिवार, 25 दिसंबर 2010

राम चबूतरे से हिन्दू राष्ट्र के सिंहासन तक

‘इस दृष्टिकोण से हिन्दुस्थान की विदेशी नस्लों को या तो निश्चित तौर पर हिन्दू संस्कृति और भाषा अपना लेनी चाहिए, हिन्दू धर्म का सम्मान तथा उस पर श्रद्धा रखना सीखना चाहिए, हिन्दू नस्ल और संस्कृति यानी हिन्दू राष्ट्र के गौरवान्वन के अलावा किसी और विचार को मन में नहीं लाना चाहिए और हिन्दू नस्ल में समाहित हो जाने के लिए अपनी पृथक पहचान त्याग देनी चाहिए या फिर वे इस देश में पूरी तरह हिन्दू राष्ट्र के गुलाम होकर रह सकते हैं, बिना किसी दावे के, बिना किसी भी विशेषाधिकार के और उससे भी आगे बिना किसी भी वरीयतापूर्ण व्यवहार के, यहाँ तक कि उन्हें कोई नागरिक अधिकार भी नहीं मिलेंगे। उनके लिए कोई और रास्ता अपनाने की छूट तो कम से कम नहीं ही होनी चाहिए। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं, हमें उन विदेशी नस्लों से जिन्होंने रहने के लिये हमारे देश को चुना है, ऐसे ही निपटना चाहिए जैसे प्राचीन राष्ट्र निपटते हैं’’-
आर0एस0एस0 के द्वितीय सरसंघचालक सदाशिव माधव गोलवलकर की किताब ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ से (पेज 47)
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपनी स्थापना से ही हिन्दू राष्ट्रवाद की स्थापना के लक्ष्य को लेकर संचालित रहा है। इसके प्रमुख सिद्धांतकार गोलवलकर और उनके प्रेरणास्रोत सावरकर इस हिन्दुत्व को स्पष्ट तौर पर एक ऐसे देश के रूप में परिभाषित करते हैं जिस पर केवल हिन्दुओं का हक है और इससे अलग धर्म को मानने वाले उनकी दृष्टि में केवल ‘विदेशी’ हैं। ऊपर उद्धृत किताब के पेज 43 पर गोलवलकर साफ कहते हैं कि ‘’हिन्दुस्तान एक प्राचीन हिन्दू राष्ट्र है और इसे निश्चित तौर पर होना ही चाहिए, और कुछ और नहीं केवल एक हिन्दू राष्ट्र। वे सभी लोग जो राष्ट्रीय यानी कि हिन्दू नस्ल, धर्म, संस्कृति और भाषा को मानने वाले नहीं होते वे स्वाभाविक रूप से वास्तविक ‘राष्ट्रीय’ जीवन के खाँचे से बाहर छूट जाते हैं।
हम दुहराते हैं- ‘हिन्दुओं की धरती हिन्दुस्तान में हिन्दू राष्ट्र रहता है और रहना ही चाहिए- जो आधुनिक विश्व की वैज्ञानिक पाँच जरूरतों को पूरा करता है। फलतः केवल वही आंदोलन सच्चे अर्थों में ‘राष्ट्रीय’ हैं जो हिन्दू राष्ट्र के पुनर्निर्माण, पुनरोद्भव तथा वर्तमान स्थिति से इसकी मुक्ति का उद्देश्य लेकर चलते हैं। केवल वही राष्ट्रीय देशभक्त हैं जो अपने हृदय में हिन्दू जाति व राष्ट्र के गौरवान्वीकरण की प्रेरणा के साथ कार्य को उद्यत होते हैं और उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए संघर्ष करते हैं। बाकी सभी या तो गद्दार हैं और राष्ट्रीय हित के शत्रु हैं या अगर दयापूर्ण दृष्टि अपनाएँ तो बौड़म हैं’’। यही संघ का सच है, उसका राष्ट्रवाद है और उसकी देशभक्ति है। इसीलिए इस बात पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वह अल्पसंख्यकों के खिलाफ प्रत्यक्ष-परोक्ष घृणा पर ही पलता है। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद का विध्वंस इसी घृणा की सबसे आक्रामक अभिव्यक्ति थी। लेकिन उस दौर का उन्माद बनाए रख पाने में संघ और उसके गिरोह सफल नहीं हो पाए और केन्द्रीय सत्ता के साथ-साथ उत्तर-प्रदेश की सत्ता भी जल्दी ही उनके हाथों से निकल गई। हालाँकि यह मान लेना कि साम्प्रदायिकता के खूँखार दैत्य से भारत को मुक्ति मिल गई, नादानी और सरलीकरण ही होगा। गुजरात से लेकर कंधमाल तक देश के तमाम हिस्सों में हिन्दुत्व गिरोह ने आतंक के तार फैलाए हैं और पहले मालेगाँव मामले में प्रज्ञा ठाकुर की गिरफ्तारी और फिर अभिनव भारत तथा संघ से जुड़े तमाम लोगों के देशभर में आतंकवादी घटनाओं में शामिल होने के जो सबूत मिले हैं उसकी रोशनी में हम इसकी तैयारियों और खतरनाक मंसूबों को समझ सकते हैं। यहाँ यह बता देना समीचीन होगा कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरु मेमोरियल संग्रहालय और पुस्तकालय में वह डायरी आज भी उपलब्ध है जिसमें हेडगेवार के निकटस्थ सहयोगी बी0डी0 मुंजे ने मुसोलिनी से अपनी मुलाकात और संघ के सैन्यीकरण की योजनाओं पर विस्तार से लिखा है।
ऐसे में पिछले दिनों बाबरी मस्जिद पर हाईकोर्ट का जो फैसला आया उस पर इस गिरोह द्वारा अपनाई गई संत मुद्रा किसी को भी चैंका सकती थी। कल तक ‘आस्था के सवाल अदालत में हल न होने’ की बात करने वाले लोग ‘अदालत के फैसले के पूरे सम्मान’ की ही बात नहीं कर रहे थे अपितु ‘मसले को आपसी बातचीत से सुलझाने’ तक की बात कर रहे थे। इसका एक कारण तो अदालत द्वारा ‘आस्था को तर्क पर वरीयता’ देने वाला फैसला था जिस पर इतना कुछ लिखा और कहा जा चुका है कि कुछ अलग से कहने की जगह मैं बस जस्टिस राजेन्द्र सच्चर को उद्धृत करना चाहूँगा। समयांतर के नवंबर अंक में प्रकाशित साक्षात्कार में वे कहते हैं- ‘यह फैसला बेतुका है, कोई अदालत हिन्दुओं की इस आस्था के आधार पर कि वह राम की जन्मस्थली है इस विवाद का फैसला कैसे कर सकती है? अदालत में आस्था का कोई अर्थ नहीं होता है।‘ और इसी वजह से संघ परिवार ने अपने पक्ष में दिए गए फैसले को बड़ी ‘उदारता’ से स्वीकार किया और इससे जुड़े लोगों ने इसे ‘राम जन्म भूमि आंदोलन के औचित्य’ के स्वीकार का प्रमाण से लेकर ‘राम के चरित्र की प्रामाणिकता पर मुहर भी माना’।
लेकिन यह इकलौता कारण नहीं था। देश भर में मीडिया, जनपक्षधर बुद्धिजीवियों और आमजनों द्वारा किसी भी हाल में शांति बनाए रखने का और कम से कम तात्कालिक सांप्रदायिक सद्भाव का जो माहौल बनाया गया था उसमें किसी ‘विजय जुलूस’ या भड़काऊ बयान का जो उल्टा प्रभाव पड़ सकता था उससे संघ गिरोह बखूबी परिचित था। इसीलिए ‘फैसले का सम्मान’, ‘बातचीत से सुलझाने’ और अब ‘आगे बढ़ने’ जैसे धोखादेह शब्दों में उसने अपने असली मंसूबों को छिपाना उचित समझा। लेकिन जैसे-जैसे समय बीता और स्थितियाँ सामान्य हुईं इन लोगों ने अपना असली रंग दिखाना शुरु कर दिया है। अलग-अलग मंचों से जो बयान आए उनसे साफ है कि इन्हें उस दो तिहाई जमीन से भी संतोष नहीं जो अदालत ने इन्हें दी है, साथ ही शायद यह डर भी है कि अगर मुस्लिम पक्ष उच्चतम न्यायालय तक जाता है तो फैसला कुछ और भी हो सकता है। इसीलिए जहाँ एक तरफ चाशनी पगे शब्दों की कूटनीति से उन्हें अदालत में दुबारा जाने से रोकने की कोशिश की गई वहीं संत सम्मेलन जैसे मंचों से पूरी जमीन कब्जाने और मुसलमानों को ‘पंचकोशी की पवित्र सीमा के भीतर मस्जिद न बनाने देने’ जैसी बातें करके अपने असली उद्देश्य को पूरा करने की भी भरपूर कोशिश की जा रही है। संघ के इतिहास को जानने वाले लोग उसके दोमुँहेपन से बखूबी परिचित हैं। ऊपर जिस साक्षात्कार का जिक्र किया गया है उसमें जस्टिस सच्चर एक वाजिब सवाल उठाते हैं कि आखिर मुसलमानों से ही क्यों कहा जाए कि आप आगे बढ़ें? यह सवाल संघ परिवार के सामने भी तो रखा जा सकता है। वे क्यों नहीं आगे बढ़ते? यहाँ तक कि इस फैसले के साथ वह जीत का अनुभव तो कर रहे हैं लेकिन संतुष्ट नहीं हैं। वे वहाँ पूरी भूमि पर राम मंदिर का निर्माण करना चाहते हैं। यदि यह हिन्दू आस्था का सवाल है, तो क्या यह मुस्लिम आस्था का सवाल नहीं है?’
दरअसल, संघ के लिए राम मंदिर आस्था का नहीं राजनीति का सवाल है। वह इसे अपने व्यापक मंसूबों की राह के मील का पत्थर बनाना चाहता है जिससे एक तरफ वह अपने समर्थकों को एक झूठे राष्ट्रवादी गौरव से भर कर और अधिक आक्रामक होने के लिए प्रेरित कर सके तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों के मन में भय और पराजयबोध इस क़दर भर जाए कि वे अपनी स्थिति को देश के भीतर ‘दोयम दर्जे’ के नागरिक की तरह स्वीकार कर लंे। वह इस राम चबूतरे पर चढ़ कर हिन्दू राष्ट्र के सिंहासन तक पहुँचना चाहता है। दुर्भाग्य से हमारी वर्तमान राजनीति में सक्रिय अधिकांश दल इस हकीकत को या तो समझ नहीं रहे या हिन्दू मतों की लालच में सब जानते-बूझते हुए खामोश हैं। यह एक ख़तरनाक लक्षण है- हमारे लोकतंत्र के लिए भी और हमारी उस साझा विरासत के लिए भी जिससे देश की अखंडता निर्धारित होती है। राजनैतिक नेतृत्व और न्यायपालिका से भरोसा उठ जाने का जो परिणाम होता है वह हम कश्मीर और उत्तर-पूर्व में पहले से ही देख रहे हैं। असद जैदी समयांतर के उसी अंक में जब यह सवाल उठाते हैं कि ‘क्या हिंदुत्ववादी गिरोह और आपराधिक पूँजी द्वारा नियंत्रित समाचारपत्रों और टी0वी0 चैनलों और उनके शिकंजे में फँसे असुरक्षित, हिंसक और लालची पत्रकार और ‘विशेषज्ञ’ अब इस कल्पित और गढ़ी गई आस्था के लिए परंपरा, ज्ञान, इतिहास, पुरातत्व, कानून, इंसाफ, लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों की बलि देंगे? यह अधिकार इन्हें किसने दिया है?’ तो उसके मूल में यही चिंता है।
इसीलिए आज सवाल सिर्फ किसी एक मस्जिद या मंदिर का नहीं रह गया है। सवाल इससे कहीं अधिक व्यापक है। सवाल संघ गिरोह के मंसूबों को पहचानने और इसके खिलाफ व्यापक अभियान चलाए जाने का है। सवाल राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के लम्बे दौर में अर्जित साझा विरासत की रक्षा का है। सवाल भगत सिंह के शोषणमुक्त समाज की स्थापना का है। सवाल यह है कि जब राजनैतिक व्यवस्था के प्रमुख खिलाड़ी, कार्यपालिका और न्यायपालिका उस विरासत को झुठला कर बहुसंख्यक आस्था को अल्पसंख्यक आस्था पर वरीयता दे रहे हैं तो हम क्या इस देश को चुपचाप यूँ ही एक गृहयुद्ध और सर्वसत्तावादी धार्मिक राष्ट्रवाद की गोद में चले जाने देंगे? इस देश के सभी न्यायप्रिय तथा लोकतंत्र समर्थक लोगों के लिए ये सवाल अब केवल अकादमिक बहस नहीं जीवन-मरण के सवाल हैं। हम इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जहाँ हमारी चुप्पी आने वाली पीढ़ियों को एक बर्बर युग की ओर ढकेल देगी।

-अशोक कुमार पाण्डेय
मोबाइल- 09425787930
(लेखक सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं)
Share |