शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

हिन्दी का शोककाल

   हंस के सम्पादक और नई कहानी की त्रयी के सदस्य रहे राजेन्द्र यादव के अवसान के बाद से ही मानो हिन्दी का शोककाल चल रहा है, गोरखपुर से ख्यात कवि और आलोचक परमानन्द श्रीवास्तव जी के जाने की ख़बर आई, फिर लखनऊ से प्रख्यात व्यंग्यकार के.पी.सक्सेना जी के, अभी हम इस आघात से उबर भी नहीं पाए थे कि हिन्दी-राजस्थानी के अत्यंत सम्मानित लेखक विजयदान देथा ने अपने गाँव बोरून्दा में अपनी आखिरी साँस ली। जीवन भर बच्चों के लिए उत्कृष्ट साहित्य का सृजन करने वाले हरिकृष्ण देवसरे का बाल दिवस वाले दिन ही चले जाना जैसे एक बड़ी विडंबना रच गया, तो उसके तीन दिन बाद ही वरिष्ठ कवि और लेखक ओम प्रकाश बाल्मीकि जी के निधन की खबर देहरादून से आई। महीने भर से कम समय में अपने परिवार के इतने सदस्यों को खोकर हिन्दी का साहित्य समाज जिस शोक और संताप में डूबा है उसे शब्दों में तो कोई क्या व्यक्त कर पाएगा, बस जैसे कि एकयुग अपने बीतने की घोषणा कर रहा हो, जैसे नाटक के एक दृश्य के दुखांत के बाद यवनिका के पतन के साथ कोई शोकाकुल संगीत बज रहा हो, जैसे नई पीढ़ी के कन्धों पर जिम्मेदारियाँ इस शोक के साथ चुपचाप आकर बैठ गई हों। युग समाप्त हो जाने वाली बात मैं किसी अतिरिक्त भावुकता में नहीं कह रहा। जिन रचनाकारों को हमने खोया है वे सभी अपने-अपने क्षेत्रों के बड़े लेखक ही नहीं बल्कि ट्रेंड सेंटर जैसे थे, राजेन्द्र यादव कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ नई कहानी के प्रवर्तक थे, यह स्वाधीनतोŸार भारत के  मध्यवर्गीय जीवन के संत्रास की तीव्रतम अभिव्यक्ति वाला दौर था, ‘जहाँ लक्ष्मी कैद है’ जैसी कहानियों और ‘सारा आकाश’ जैसे उपन्यास ने जैसे इस नए भारतीय समाज के अंतर्विरोधों को एकदम से सामने ला दिया, साथ ही, अक्सर सामूहिकता का दावा करते लेकिन व्यक्तिगत परिक्षेत्र में संचालित होते साहित्य कार्य से आगे बढ़कर उन्होंने हंस जैसी पत्रिका निकाली और अक्षर प्रकाशन की नींव डाली। हंस सिर्फ पत्रिका नहीं एक आन्दोलन में तब्दील हुई। सहमति-असहमति अलग बात है पर हिन्दी साहित्य में स्त्री और दलित आवाजों के लिए जगह तलाशने और उन्हें सम्मान सहित मुख्य धारा में लाने का जो जरूरी काम हंस ने किया उसने हिन्दी साहित्य की परिधि का महत्वपूर्ण विस्तार किया। यही नहीं, हंस अपनी लोकतांत्रिकता और सम्पादकीयों की प्रखर पक्षधरता के साथ-साथ इस बात के लिए भी याद किया जाएगा कि इसके सम्पादक ने एक लघु पत्रिका के लिए यह जरूरी मानक स्थापित किया कि पत्रिका सम्पादक के आत्म प्रचार के लिए नहीं होती। राजेन्द्र जी शायद ही कभी सम्पादकीय के इतर दिखाई देते थे। बाद में पहल जैसी पत्रिका में ज्ञानरंजन जी ने यही किया और कुछ अन्य पत्रिकाओं ने। राजेन्द्र जी की बीमारी के बाद हंस ने अपनी चमक  धीरे-धीरे खो दी थी, अब कम से कम मुझे तो उन लोगों से कोई उम्मीद नहीं दिखती जिनके हाथों में इसकी विरासत है कि वे हंस की परम्परा को समृद्ध कर पाएँगे। विजयदान देथा, जिन्हें उनके आत्मीय बिज्जी कहा करते थे, लोक साहित्य के दुर्लभ अध्येता और साधक थे, भारतीय मानस और मेधा का उत्कृष्ट उदाहरण, जिन्होंने लोक कथाओं को अपने विशिष्ट अंदाज में प्रस्तुत किया। उन्होंने राजस्थान की लोक कथाओं का चैदह खण्डों में ग्रंथमाला ‘बातां रही फुलवारी’ का पुनर्लेखन और संग्रहण किया। ‘उलझन’ व अलेखूं हिटलर’ उनके राजस्थानी कहानी संकलन हैं। इसके अलावा भी हिन्दी और राजस्थानी में उनके अनेक कहानी संग्रह और उपन्यास आए, उन पर नाटक खेले गए, फिल्में बनीं और दोनों भाषाओं में वह सम्मानित हुए। जीवनपर्यत्ंा अपने गाँव में ही रहने वाले बिज्जी लोक के अनूठे चितेरे होते हुए भी उन्हें अपने समय और समाज के आईने में देखने के हामी थे, निरन्तर लालच और मुनाफे की होड़ में क्षत-विक्षत होती मानवता और बिखरते सामाजिक ताने-बाने उनकी चिंता के केन्द्र में थे।
    परमानन्द श्रीवास्तव मेरे गोरखपुर विश्वविद्यालय के दिनों में हिन्दी विभाग में थे, हिन्दी कविता के साथ-साथ विश्व साहित्य के अनेक गहन अध्ययन और समझ का मैं व्यक्तिगत रूप से गवाह हूँ। आलोचक के रूप में उन्होंने हिन्दी को ‘प्रतिबद्ध कविता’ जैसा पद ही नहीं दिया बल्कि जिस उदारता और सम्बद्धता के साथ उन्होंने नए से नए लोगों की रचनाओं को पढ़ा और उन पर लिखा, वह दुर्लभ है, अंतिम समय तक सक्रिय रहे परमानन्द जी मनुष्य के तौर पर जितने सहज और सरल थे एक आलोचक के रूप में उतने ही गंभीर और नीर-क्षीर विवेकी। हिन्दी की बेहद तोल मोल वाली आलोचना की दुनिया में उनकी उपस्थिति आश्वस्त करने वाली थी। के.पी. सक्सेना व्यंग्य की दुनिया के एक अत्यन्त सुपरिचित हस्ताक्षर थे, तो हरिकृष्ण देवसरे ने बच्चों के लिए किए जाने वाले बचकाने लेखन के बरक्स रोचक और अर्थपूर्ण लेखन से हिन्दी की कई पीढि़यों के बचपन को समृद्ध किया। ओम प्रकाश बाल्मीकि हिन्दीके दलित साहित्य के एकदम आरम्भिक झंडाबरदारों में से थे। उनकी आत्मकथा ‘जूठन’ हमारे सामाजिक ढाँचे के मनुष्य विरोधी जातिवादी उत्पीड़न का जिन्दा दस्तावेज है, एक कवि, कहानीकार और विचारक के रूप में उन्होंने आजीवन शेाषण और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज बुलन्द की। उनकी आवाज आथेंन्टिक भी थी और पुरअसर भी, जिसकी गूँज हिन्दी साहित्य ही नहीं समाज में भी साफ-सुनाई दी। उत्तर भारत में मजबूती से उभरे दलित आन्दोलन में बाल्मीकि जी जैसे साहित्यकारों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जाहिर है ऐसे साहित्यकारों को खोकर हम थोड़े और
निर्धन हुएहैं और वे खाली जगहें कभी भरी न जा सकेंगी, लेकिन उनका लिखा अब भी हमारे साथ है, वह अमत्र्य है, लाइट हाउस की तरह तूफानों में भी हमें रास्ता दिखाता, बस उन राहों पर चलना और उन्हें आने वाली पीढ़ी के लिए और स्पष्ट कर देना, यही उनकी यादों का सही तरीका हो सकता है और श्रद्धांजलि का असल मानी।
    -अशोक कुमार पाण्डेय
 मो0 8375072473
 लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

1 टिप्पणी:

शकुन्‍तला शर्मा ने कहा…

राजेन्द्र जी को विनम्र श्रध्दाञ्जलि ।