मंगलवार, 10 मई 2011

गुलामी की जंजीरों तोड़ने के लिए........

( यह लेख भगत सिंह और उनके साथियों द्वारा लिखे गये थे तथा अप्रैल 1928 के "कीर्ति" समाचार प्रत्र में छपा था । उस लेख को संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ। )

10 मई वह शुभ दिन है जिस दिन कि "आज़ादी की जंग " शुरू हुई थी | भारतवासियों का गुलामी की जंजीरों तोड़ने के लिए यह प्रथम प्रयास था |यह प्रयास भारत के दुर्भाग्य से सफल नही हुआ ,इसलिए हमारे दुश्मन इस "आज़ादी की जंग " को फिर "गदर "और "बगावत" के नाम से याद करते है और इस आज़ादी की जंग में लड़ने वाले नायको को कई तरह की गालिया देते है |
यदि 1857 की आज़ादी की जंग में तात्याटोपे ,नाना साहिब , झांसी की महारानी ,कुमार सिंह (कुवँर सिंह ) और मौलवी अहमद साहिब आदि वीर जीत हासिल कर लेते तो आज वे हिन्दुस्तान की आज़ादी के देवता माने जाते और सारे हिन्दुस्तान में उनके सम्मान में राष्ट्रीय त्यौहार मनाया जाता।
1857 की आज़ादी की जंग के जितने इतिहास लिखे गये है, वे सारे के सारे ही या तो अंग्रेजो ने लिखे है जो कि जबरदस्ती तलवार के जोर पर ,लोगो कि मर्जी के खिलाफ हिंदुस्तान पर कब्जा जमाए बैठे है और या अंग्रेजो के चाटुकारों ने |
जंहा तक हमे पता है इस आज़ादी कि जंग का एकमात्र स्वतंत्र इतिहास लिखा गया ,जो कि वैरिस्टर सावरकर ने लिखा था और जिसका नाम "1857 की आज़ादी की जंग का इतिहास "THE HISTORY OF THE INDIAN WAR OF INDEPENDENCE 1857 था |
यह इतिहास बड़े परिश्रम से लिखा गया था और इंडिया आफिस की लाइब्रेरी की छानबीन करके ,कई उदाहरण दे -देकर सिद्ध किया गया था कि यह राष्ट्रीय संग्राम था और अंग्रेजो के राज से आज़ाद होने के लिए लडा गया था |लेकिन अत्याचारी सरकार ने इसे छपने ही नही दिया और अग्रिम रूप से जप्त कर लिया |इस तरह लोग सच्चे हालात पढने से वंचित रह गये |इस जंग कि असफलता के बाद जो जुलम और अत्याचार निर्दोष हिन्दुस्तानियों पर किया गया ,उसे लिखने की न तो हमारे में हिम्मत है और न ही किसी और में |हाँ ,यदि किसी को इस जुल्म ,अत्याचार और अन्याय का थोडा -सा नमूना देखना हो तो उन्हें मिस्त्र एडवर्ड थामसन की पुस्तक "तस्वीर का दूसरा पहलू" ( THE OTHER SIDE OF THE MEDAL) पढनी चाहिए ,जिसमे उसने सभ्य अंग्रेजो की करतूतों को उभारा है और जिसमे बताया गया है किकिस तरह नील हेव्लाक ,हडसन कपूर और लारेंस ने निर्दोष हिन्दुस्तानी स्त्री बच्चो तक पर ऐसे -ऐसे कहर ढाये थे कि सुनकर रोये खड़े हो जाते है और शरीर कापने लगता है |
इस जंग के 50 वर्ष बीतने पर विदेशो में बसे हिन्दुस्तानी नौजवान 10 मई के दिन को राष्ट्रीय त्यौहार बनाकर मनाने लगे |सबसे पहले ,जंहा तक पता चलता है यह त्यौहार इंग्लैंड में "अभिनव भारत "ने बैरिस्टर सावरकर के नेतृत्व में 1907 में मनाया |दरअसल 1907 में लन्दन में अंग्रेजो द्वारा 1857 की जीत कि ५० वी वर्षगाठ मनाई गयी |1857 की याद ताज़ा करने के लिए हिंदुस्तान और इंग्लैंड के प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबारों ने अपने -अपने विशेषांक निकले ,ड्रामे किये गये और लेक्चर दिए गये और हर तरह से इन कथित गद रियो को बुरी तरह से कोसा गया |इसके विरोध में सावरकर ने १८५७ के हिदुस्तानी नेताओं -नाना साहिब ,महारानी झाँसी ,तात्याटोपे ,कुवर सिंह ,मौलवी अहमद साहिब कि याद मानाने के लिए काम शुरू कर दिया ताकि राष्ट्रीय जंग के सच्चे -सच्चे हालात बताये जाए |
यह बड़ी बहादुरी का काम था और शुरू भी अंग्रेजी राजधानी में किया गया |आम अंग्रेज नाना साहिब और तात्याटोपे को शैतान के वर्ग में समझते थे |इसलिए लगभग सभी नेताओं ने भी इस आज़ादी कि जंग को मनाने वाले दिन में कोई हिस्सा न लिया | लेकिन सावरकर के साथ सभी नौजवान थे |हिन्दुस्तानी घर में एक बड़ी भरी यादगारी मीटिंग बुलाई गयी | छोटे -छोटे पैफ्लेट "ओ शहीदों " (OH !MARTYRS) नाम से इंग्लैंड और हिन्दुस्तान में बाटे गये |छात्रों ने आक्सफोर्ड ,कैम्बिर्ज़ और उच्च कोटि को कालेजो में छातियो पर बड़े -बड़े सुंदर -सुंदर बैज लगाये जिन पर लिखा था ,1857 के शहीदों कि इज्ज़त के लिए |
गलियों -बाजारों में और कालेजो में कई जगह झगड़े हो गये। दंड स्वरूप कई - कई विद्यार्थियों कई छात्रवृत्ति मारी गयी |कइयो ने इन्हें खुद छोड़ दिया |कइयो को उनके माँ बाप ने बुलवा लिया |इंगलिस्तान में राजनीतिक वायुमंडल बड़ा तेज़ हो गया और हिन्दुस्तानी सरकार बड़ी हैरानी बी बैचेन हो गयी |
इन हालात कई खबर जंहा भू पहुची ,विदेशो में वंहा -वंहा १० मई का दिन बड़ी सजधज से मनाया गया | फिर १० मई का दिन हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया गया |काफी समय बाद अभिनव भारत सोसायटी टूट गयी और इंग्लैंड में यह दिन मनाना बन्द हो गया |बाद में गदर पार्टी स्थापित हो गयी और उसने उसे हर वर्ष मनाना शुरू कर दिया |गदर पार्टी के स्थापित होने के दिन लेकर अब तक अमेरिका में यह दिन सजधज से मनाया जाता रहा |१० मई का दिन क्यों मनाया जाता है ?इसका कारण यह है कि १० मई के दिन ही मेरठ से असली जंग शुरू हुई थी |१० मई को मेरठ छावनी के ८५ वीरो ने चर्बी वाले कारतूस इस्तेमाल करने से इनकार कर दिया था |उनका कोर्ट मार्शल किया गया और प्रत्येक जवान को १० साल की सजा दी गयी |बाद में ११ सिपाहियों को कैद कम कर ५ साल कर दी गयी |लेकिन यह सारी कार्यवाही ही इस तरीके से की गयी की जिसमे हिन्दुस्तानी सिपाहियों के गर्व और मान को भरी चोट पहुची थी |
वह दृश्य बड़ा दर्दनाक था |देखने वालो की आँखों से टपटप आंसू गिरते थे |सारे के सारे बुत बने हुए थे |
वे 85 सिपाही जो उनके भाई थे ,सब दुखो -सुखो में शरीक थे ,उनके पैरो में बेड़िया डाली हुई थी |
उनका अपमान सहन करना मुश्किल था लेकिन कुछ बन नही सकता था |अलगे दिन "घुडसवार और पैदल सेना ने जाकर जेल तोड़ दी ,अपने साथियों को छुड़ा लिया,अफसरों के घरो को फूंक डाला |जिस यूरोपीय कॉप पकड़ सके उसे मार डाला और दिल्ली की ओर चढाई कर दी |गदर का आरम्भ इसी दिन हुआ और इसे 10 मई से गिना जाता हैं |
प्रस्तुति
सुनील दत्ता

1 टिप्पणी:

निर्मला कपिला ने कहा…

लेख बहुत अच्छा लगा। ऐसे आलेखों का प्रचार प्रसार अधिक होना चाहिये ताकि हमारी युवा पीढी जान सके कि उस समय के युवक कैसे सोचते थे। सुनील दत्त जी का धन्यवाद।