बुधवार, 11 मई 2011

इस देश में बेईमान मोव्किल्लों, वकीलों और जजों का गठजोड़ बन गया है - उच्चतम न्यायालय


माननीय उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक व्यवस्था में हो रहे काले कारनामो के यथार्थ को पहचाना है और उसने निचली अदालतों में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को वजन न देने का चलन बढ़ गया है, जिससे व्यथित होकर उच्चतम न्यायालय के जस्टिस मार्कंडेय काटजू व जस्टिस ज्ञान सुधा मिश्रा ने वकीलों को लताड़ते हुए कहा कि क्या पैसे के लिये कुछ भी कर दोगे। दोनों न्यायमूर्तियो ने वकीलों से कहा कि पैसे के लिये न भागे और न्यायालय के प्रति अपने कर्तव्यों पर भी ध्यान दें।
उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि जब कोई यह बताता है कि जज पैसा लेकर आदेश कर रहे हैं तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। भ्रष्ट जजों को न्यायपालिका से बाहर कर देना चाहिए यह लोग न्यायपालिका की बदनामी कर रहे हैं। माननीय उच्च न्यायालय ने किरायेदारी के विवाद लेकर दिए गए अंतिम आदेश को दिल्ली की अतिरिक्त जिला सत्र न्यायाधीश डॉक्टर अर्चना सिन्हा ने स्थगित कर दिया था। जिस पर उच्चतम न्यायालय ने उन पर अनुशासन की कार्यवाई करने के लिये दिल्ली उच्च न्यायालय को आदेशित किया था। उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि अधिवक्तागण पैसों के लालच में गलत सलाह भी देते हैं और उच्चतम न्यायालय के आदेशों की गलत व्याख्या भी करते हैं।
व्यवहार में यह भी देखने को मिलता है कि अधीनस्थ न्यायालयों में अधिकारीयों कि मीटिंग कर सख्त हिदायत दे दिया जाता है कि इस सम्बन्ध में आपको यह आदेश पारित करना है। जिससे मजिस्टेट या जजेस न्यायिक मष्तिस्क का प्रयोग करने में अपने आप को असमर्थ पाते हैं। वहीँ प्रभावशाली प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों के कारण न्यायिक अधिकारी मात्र अभियोजन एजेंट के रूप में कार्य करने लगते हैं जिससे न्याय प्रक्रिया बाधित होती हैं और न्याय विफल हो जाता है। फास्ट ट्रैक कोर्टों ने गंभीर अपराधिक मामलों में आँख मूँद कर सजाएं सुना कर उच्च न्यायालय व उच्चतम न्यायालय में अपील वादों की संख्या बढ़ा दी है जिससे न्यायिक व्यवस्था में लंबित वादों की संख्या में कई गुना बढ़ोत्तरी हुई है। आज जरूरत है कि न्यायपालिका में कुशल, निपुण, विधिवेत्ता तथा निष्पक्ष न्यायिक अधिकारीयों की है जिससे वाद का फैसला होने के बाद अपीलों व पुनरीक्षण की संख्या काम हो सके। उच्चतम न्यायालय की इस टिपण्णी में सचमुच यथार्थ है कि काफी संख्या में अधिवक्तागण अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ती के लिये गलत सलाह देकर न्यायपालिका में वादों की संख्या बढ़ा देते हैं। यदि अधिवक्तागण यह तय करें कि उनको सलाह की जो भी फीस लेनी हो ले लें लेकिन गलत सलाह नहीं देंगे।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

4 टिप्‍पणियां:

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

ज्ञानवर्धक तथा आम आदमी को जागरूक करने वाला लेख
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सद्भावी -डॉ० डंडा लखनवी

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

सुप्रीमकोर्ट के ऑब्जर्वेशन बिलकुल सही हैं।

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

चलो सुप्रीम कोर्ट को इसका पता अब चला है ? आमजन को तो इसका पता इस गठजोड़ के बनने की शुरुआत में चल गया था

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

Nice post.

दिल को जला रहा हूँ ज़माने के वास्ते
दुनिया से तीरगी को मिटाने के वास्ते

खा के गले पे तीर भी हंसना पड़ा मुझे
बस्ती में इंक़लाब को लाने के वास्ते

लो, फिर से आ गयी हैं ये नाज़ुक सी तितलियाँ
फूलों से खुशबुओं को चुराने के वास्ते

फिर से मेरे लहू की ज़ुरूरत पड़ी उसे
बुझते हुए चराग़ जलाने के वास्ते

कल रात उसने सारे खतों को जला दिया
मेरा ख़याल दिल से मिटाने के वास्ते

http://mushayera.blogspot.com/2011/05/gazal.html