शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार विरोध, विभ्रम और यथार्थ भाग-5

इस रूप में नागरिक समाज और उसके एक्टिविज्म की, जाहिर है, अपनी सीमाएँ और अंतर्विरोध होते हैं। वह जितना ही ज्यादा सीमाओं को लाँघने का उपक्रम करता है, उतना ही ज्यादा अंतर्विरोधों का शिकार होता जाता है। जब तक अलग-अलग मुद्दों पर अलग-अलग काम होता है, परेशानी खड़ी नहीं होती न आपस में, न सरकारों को। लेकिन किसी व्यापक मुद्दे पर एक साथ आने की बात आते ही नागरिक समाज एक्टिविज्म की सीमाएँ और अंतर्विरोध जल्दी ही उभर कर सामने आ जाते हैं। अगर अंदरखाने कुछ मीजान बना कर कोई अभियान शुरू कर दिया जाता है, तो उसमें तुरंत दरारें नजर आने लगती हैं। बहस आपस में ज्यादा होने लगती है और आंदोलन भटक जाता है। सरकारों को यह स्थिति माफिक आती है। वे मुद्दों को अपने ढंग से साधने की गुंजाइश निकाल लेती हैं। उस क्रम में नागरिक समाज एक्टिविस्ट भी सध जाते हैं। क्योंकि उन्हें आर-पार की राजनैतिक लड़ाई तो लड़नी नहीं होती है।  
नागरिक समाज के किसी अभियान और उससे होने वाले काम का मूल्यांकन अक्सर नागरिक समाज के परिप्रेक्ष्य मंे न किया जाकर, राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में किया जाने लगता है। उस प्रयास में नागरिक समाज के चरित्र की अंतर्भूत सीमाओं और अंतर्विरोधों पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। हजारे और उनके सहयोगियों द्वारा चलाए गए और नागरिक समाज द्वारा समर्थित भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के समर्थन और आलोचना की बहस उसके नागरिक समाजीय चरित्र को नजरअंदाज करके चल रही है। भारत का समूचा नागरिक समाज संवैधनिक मूल्यों -लोकतंत्र, स्वतंत्रता, संप्रभुता, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, समाजवाद - से बँधा नहीं है। नागरिक समाज में संवैधानिक मूल्यों को लेकर एका और ईमानदारी होती तो न नवसाम्राज्यवाद यहाँ पैर पसार पाता, न सांप्रदायिक दंगे होते। एक ही देश में एैयाशी और बदहाली के दो ध्रुवांत नहीं बनते।
                    नागरिक समाज में अंधराष्ट्रवाद, तानाशाही, सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद, जातिवाद, वंशवाद, अलगाव जैसी भावनाएँ/धारणाएँ पैठी हैं तो वे नागरिक अभियानों में उभर कर आएँगी ही। दूसरे, जैसा कि हमने ऊपर कहा, जब राजनैतिक विपक्ष अनुपस्थित होता है तो नागरिक समाज जाने-अनजाने राजनैतिक बयानबाजी करने लगता है। इस अभियान में भी यह देखा जा सकता है। केवल समर्थकों में ही नहीं, नेतृत्व में भी आप देख सकते हैं कि एक छोर पर संवैधानिक मूल्यों में आस्था रखने वाले शांति भूषण, संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण आदि हैं, तो दूसरे पर सब भ्रष्टाचारियों को फाँसी देने को उतावले बाबा रामदेव, जो राजनीति को भी ठीक कर देने का दावा ठोंकते हैं।  
आई0ए0सी0 के नुमांइदों में एक चेतन भगत नाम का लोकप्रिय लेखक बताया जाने वाला शख्स भी है। काफी पहले हमने ‘दैनिक भास्कर’ अखबार में उनका नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में अत्यंत सतही लेख देखा था। जाहिर है, लेख अंग्रेजी से अनुवाद करके छापा गया था। पूछने पर बताया गया कि वे बहुत चर्चित लेखक हैं। उन्होंने हजारे की राजनैतिक बयान को लेकर हुई फजीहत के बावजूद हाल में गुजरात चैंबर्स आॅफ काॅमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज के मंच से नरेंद्र मोदी की उनके सामने खुली चाटुकारी करते हुए उनसे राष्ट्रीय स्तर पर भूमिका निभाने की फरियाद की। उनके मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर अच्छे नेताओं का अभाव है। आई0ए0सी0 में शामिल संवैधनिक मूल्यों में निष्ठा वाले नागरिक समाज एक्टिविस्टों को यह सुनिश्चित करना होगा कि उनका जन लोकपाल कानून लाने का अभियान सांप्रदायिक फासीवाद समेत किसी भी तरह की तानाशाही का आसान वाहक न बन जाए। भीड़तंत्र, चाहे कुछ देर के लिए सही, तानाशाही की ही एक अभिव्यक्ति होता है और लंबे समय तक बना रह सकता है।
    लोकपाल में हजारे सहित ज्यादातर सदस्य और समर्थक, भ्रष्टाचारियों का नाश करने वाला एक ‘तानाशाह’ देख रहे हैं। भारत के मध्यवर्ग के मानस में कभी किसी तानाशाह के आने और सबको ठीक कर देने की बलवती इच्छा बैठी रहती है। यह सही है कि राजनैतिक विपक्ष और चेतना के अभाव में नागरिक समाज के अभियान प्रमुखता और ताकत प्राप्त करेंगे। उनका लक्ष्य भी यही बनता जा रहा है। वे वैकल्पिक राजनीति के प्रयासों के साथ जुड़ने को तैयार नहीं हैं। बल्कि विकल्पवादियों को अपने पीछे लगा कर चलना चाहते हैं। ऐसे में नवउदारवाद की तानाशाही ही चलते रहनी है, जिसका सांप्रदायिक फासीवाद से मूल विरोध नहीं है।
    टीम के अन्य सक्रिय सदस्य स्वामी अग्निवेश के बारे में हम पहले एक स्तंभ में जिक्र कर चुके हैं। दूत का काम करने वाले स्वामी अग्निवेश सरकारी देशभक्त हैं। वे आड़े समय सरकारों के काम आते हैं। जब गांधी की समाधि पर कुत्ता घुमाने के विरोध में कई वरिष्ठ सर्वोदयियों ने अमरीकी राष्ट्रपति जाॅर्ज बुश के साथ होने से मना कर दिया था, तो स्वामी जी ही सरकार के काम आए थे। अरविंद केजरीवाल जैसे लोगों की नागरिक समाज में भरमार है। एक मंच से किरण बेदी ने अरविंद केजरीवाल को छोटा गांधी कहा। शायद उनके दिमाग में रहा हो कि ‘बड़े गांधी’ ने अंग्रेजों से स्वराज माँगा था, केजरीवाल अपने नेताओं से माँग रहे हैं, तो गांधी से कुछ छोटे ही कहलाएँगे। हालाँकि ‘अंग्रेज अच्छे थे’ कहने के एवज में उन्हें गांधी से बड़ा भी माना जा सकता है! आपको याद होगा पिछले आम चुनाव में केजरीवाल की एन0जी0ओ0 ने ‘स्वराज अभियान’ के तहत पूरी दिल्ली को विशाल होर्डिंगों से पाट दिया था। सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह, अडवाणी जैसे बड़े नेताओं से होर्डिंगों पर लिख कर पूछा गया था कि क्या वे वोट के बदले स्वराज देंगे? सुना हेैं, अभियान के नाम पर एन0जी0ओ0 की झोली में काफी धन बरसा था। गांधी की वृद्धावस्था में गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। क्या लगातार उनका अपमान करना भी जरूरी है? ‘धर्म से लेकर राजनीति तक को गरीबों से शुरू करना चाहिए’-उसके इस अपराध की सजा और कितनी दी जानी है?
आई0ए0सी0 में बाजारवाद के दो बाबा रामदेव और रविशंकर भी शामिल हैं। दोनों की हविस का कोई अंत नहीं है। बाबा रामदेव अपने उगाहे धन को ट्रस्ट का धन बताते हैं। वे सीधे बाजारवाद की पैदाइश हैं तो उनका ट्रस्ट आदर्शवादी दौर के हजारे के ट्रस्ट से उतना बड़ा होना ही है कि वे  स्विटजरलैंड में जमीन और अमरीका में कंपनी खरीदें। कुछ महीने पहले हमने बाबा रामदेव से ‘जनसत्ता’ में पत्र लिख कर दो सवाल पूछे थे। उनके इस बयान पर कि धर्म गुरुओं को भी अपने धन का हिसाब देना चाहिए, हमने पूछा था, धर्मगुरुओं, जिन्हें धर्म का धन मिला है, के पास इतना धन क्यों होना चाहिए कि हिसाब देने की नौबत आए? उनके स्विस बैंकों में जमा देश का काला धन वापस लाने के अभियान पर हमने पूछा था, वे उद्योगपतियों, नौकरशाहों, नेताओं, दलालों, बिल्डरों आदि से जो धन लेते हैं, क्या वह सदाचार की कमाई होता है? उनका या उनके शिष्यों का जवाब अभी तक नहीं आया है।
    दूसरे श्री रविशंकर महाराज भी रामदेव की तरह मूलतः धर्म के धंधे में हैं, जो भारत में कभी मंदा नहीं पड़ता। उनकी माया का भी कोई पार नहीं है। इन  ट्रस्टबाजों ने एन0जी0ओ0 बाजों को भी पीछे छोड़ दिया है। पहले के बाबाओं को धर्म का धंधा करने के लिए यूरोप और अमरीका जाना पड़ता था। वे अब भी जाते हैं, लेकिन भारत में भी उन्हें एक विशाल मध्यवर्ग मिल गया है। इस मध्यवर्ग के पास धन और धन की निरंतर भूख है, लेकिन उसे खाने की भूख ठीक से नहीं लगती और नींद भी ठीक से नहीं आती। कल्पना कीजिए रामदेव और रविशंकर के बाद आने वाले बाबाओं का क्या वैभव होगा? धर्म के ध्ंाधे को भी कई बार आँच आ जाती है, इसलिए रामदेव उसे राजनीति के ध्ंाधे से जोड़ने में लगे हैं। अगर वे कामयाब होते हैं तो योगी आदित्यनाथ जैसों से भी ज्यादा सांप्रदायिक सिद्ध हो सकते हैं।

प्रेम सिंह
क्रमश: