रविवार, 10 जुलाई 2011

भ्रष्टाचार विरोध, विभ्रम और यथार्थ भाग-7

दरअसल, हजारे का अपनी भूमिका से ज्यादा बढ़-चढ़ कर बात करने से गांधीवादी होने का लिफाफा फटना ही था, सादगी के लिफाफे की तरह, जिसके भीतर एक दिन में करोड़ों का वारा-न्यारा करने वाले प्रोफेशनल, एन0जी0ओ0बाज और बाबा बैठे हों। इतिहास की विद्वान मृदुला मुखर्जी ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ (23 अप्रैल) के अपने लेख में हजारे को स्वतंत्रता आंदोलन के हवाले से गांधीवादी कसौटी पर अच्छी तरह ‘कस’ दिया है। लेकिन उनकी कमजोरी यही है कि वे मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को उस कसौटी पर कभी नहीं कसेंगी। जबकि वे हजारे से ज्यादा गांधीवादी होने का ढोंग करते हैं। तब वे अपने को बुद्धिजीवी बना लेंगी। अगर कहीं वाकई गांधी विचार की प्रेरणा से कुछ राजनैतिक काम हो रहा हो, तो उसकी तरफ उनका ध्यान नहीं जाएगा। तब वे प्रगतिशील बन जाएँगी, जो गांधी कभी नहीं हो सकते।
हजारे ने सोनिया गांधी को पत्र लिखा है कि भ्रष्ट ताकतें जन लोकपाल विधेयक के काम को पटरी से उतारना चाहती हैं, वे सुनिश्चित करें कि ऐसा न हो। वे अपने, मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के आगे कुछ भी नहीं देख पा रहे हैं। यह खुली सच्चाई भी नहीं कि जिन दिग्विजय सिंह और कपिल सिबल को भ्रष्ट ताकतें बता रहे हैं, उनकी मेंटर और कोई नहीं सोनिया गांधी ही हैं। क्या सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह सदाचारी हैं? काॅमनवैल्थ खेलों के भ्रष्टाचार का भाँडा जब अपने वजन से खेलों के पूर्व ही फूट गया तो मनमोहन सिंह ने शुंगलु कमेटी का गठन किया था। यह कहते हुए कि खेल हो जाने दो, फिर देखेंगे। शुंगलु कमेटी की रपट आई है तो उसमें फँसी दिल्ली की मुख्यमंत्री उसकी सिफारिशों की जाँच कराने पर तुल गई हैं। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी ने इस मामले में अभी तक जबान नहीं खोली है। जबकि 21 अप्रैल को ‘सिविल सोसायटी डे’ पर बड़े अफसरान के सामने मनमोहन सिंह ने भाषण किया कि देश के लोग अब भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं करने वाले हैं। यानी अफसरों का भ्रष्टाचार! हजारे को सोनिया का जवाब मिल गया है कि वे ईमानदारी की पक्षधर हैं, और दुष्प्रचार की राजनीति के खिलाफ। यह पत्र पाकर हजारे की खुशी का ठिकाना नहीं है। उधर युवराज अपने को ईमानदारी का ऐसा समर्पित सिपाही बता रहे हैं जो, अन्ना हजारों की तरह ऊपरी नहीं, सड़ चुकी व्यवस्था का अंदरूनी इलाज करने में जुटा है! मजेदारी देखिए, वे अन्ना हजारों की तरह हीरो बनना नहीं चाहते। घवन्यार्थ हुआ कि ‘इस देश में हम ही ईमानदार और हम ही हीरो हैं।’
हजारे को शिकायत है कि उनकी भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम को भ्रष्टाचार नहीं मिटाने देना चाहने वाली ताकतों द्वारा अन्य मुद्दों के साथ उलझाया जा रहा है। यह फिर उनकी लोकतंत्र-विरोधी मनोवृत्ति को दर्शाता है। लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार है। लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ है तो फिर मंच पर भारत माता से लेकर उसके सपूतों की तस्वीरें लगाने की क्या जरूरत थी? गांधी ने तो कभी तस्वीरें नहीं लगाईं। आप उनके सपनों का भारत बनाने के लिए तो अनशन पर नहीं बैठे थे। न ही आपके किए उस दिशा में कुछ हो सकता है। वह काम तो जब होगा राजनीति से ही होगा। तस्वीरें लगानी ही थीं तो उन लोगों की लगाईं गई होतीं जिन्होंने उपनिवेशवादी दौर में कायम की गई इस भ्रष्ट व्यवस्था का आजादी के बाद निरंतर विरोध किया। या जिन्होंने नवउदारवाद, जो भ्रष्टाचार की दानवी कोख सिद्ध हुआ है, का शुरू से सुचिंतित और सतत विरोध किया। क्या हजारे और उनकी टीम को एक भी नेता, विचारक या नागरिक ऐसा नहीं मिला? क्या उनकी भारतमाता ऐसी अनुर्वर है?
भारत माता की तस्वीर के वहाँ क्या मायने हैं? क्या वह धरती माता है, जिसका आँचल धूल भरा और मैला है? जो क्षत-विक्षत अपने करोड़ों बच्चों की पालना में जार-बेजार है? करोड़ों में खेलने वाले हर क्षेत्र के प्रोफेशनल, नौकरशाह, नेता, एन0जी0ओ0बाज किस भारत माता के सपूत हैं? आर0एस0एस0 की भारत माता का विरोध करने वालों से भी पूछा जाना चाहिए है कि उनकी अपनी भारत माता कौन-सी है? है भी या नहीं? अभियान के दौरान हजारे के भीतर बैठा सावरकर वाया ठाकरे बार-बार बाहर आया है। वही उनसे राज ठाकरे, नरेंद्र मोदी और उनके हमजोली नीतीश कुमार की प्रशंसा कराता है। ग्रामीण विकास एक बहाना है। गाँवों के विकास की चिंता होती तो वे उन लोगों का नाम लेते जिन्होंने किसानों-आदिवासियों को बचाने के संघर्ष में अपना जीवन खपा दिया, जिनमें से कई अब हमारे बीच नहीं हैं।

प्रेम सिंह
क्रमश:

4 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

करोड़ों में खेलने वाले हर क्षेत्र के प्रोफेशनल, नौकरशाह, नेता, एन0जी0ओ0बाज किस भारत माता के सपूत हैं?

आर0एस0एस0 की भारत माता का---

विरोध करने वालों से भी पूछा जाना चाहिए है कि उनकी अपनी भारत माता कौन-सी है? है भी या नहीं?

अलबेली प्रस्तुति |
प्रसन्न हुआ मानस ||
आभार |

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

बेचारे हजारे उतना ही काम कर रहे हैं जितनी उनमें बुद्धि है और कांग्रसी नेता और बीजेपी के नेता इनमें अपने अपने लक्ष्य देख रहे हैं। बीजेपी केवल देश का कल्याण करना चाहती है, कांग्रेस से भी बढ़िया तरीके से !!

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

लोगों को सच समझ नहीं आ सकता क्योंकि भेड़चाल की आदत इतनी जल्दी जायेगी नहीं.
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कल 12/07/2011 को आपकी एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Vijai Mathur ने कहा…

अन्ना हजारे के हजार घपलों का खुलासा होने के बाद भी उनके चाटुकार उन्हें आज भी अच्छा कह रहे हैं कोई समझना ही नहीं चाहता.