गुरुवार, 15 सितंबर 2011

कृषि भूमि सुधार से कृषि भूमि के विनाश तक

( यह राष्ट्रवादियो एवं वामपंथियों का कर्तव्य है कि वे कृषि भूमि अधिग्रहण को देश के आधुनिक विकास की जगह , खेती किसानी तथा ग्रामीणों एवं किसानो के विनाश का और फिर खाद्यान्न सुरक्षा के विनाश का नाम दे | भूमि अधिग्रहण विरोध को वे नीतियों के विरोध में तथा देश -दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के व्यापक विरोध में बदल दें | )
देश - प्रदेश में कृषि भूमि के बढ़ते अधिग्रहण के साथ किसानो एवं अन्य ग्रामवासियों का विरोध भी बढ़ता जा रहा है | यह विरोध एक स्वयं स्फूर्त , पर राष्ट्रव्यापी किसान आन्दोलन या ग्रामीण - आन्दोलन का रूप लेता जा रहा है | इन आंदोलनों का समर्थन किया जाना चाहिए |उन्हें अधिकाधिक संगठित किया जाना चाहिए |उन्हें रोकने व तोड़ने के हर प्रयास का विरोध होना चाहिए उसके अलावा उसे आगे बढाने और अगले चरण तक ले जाने का प्रयास भी होना चाहिए | क्योंकि कृषि भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आन्दोलन सौ फीसदी न्याय - संगत है | क्योंकि यह आन्दोलन किसानो व अन्य ग्रामवासियों द्वारा अपनी रोजी - रोटी को , अपने आवास - निवास को तथा अपने जीवन अस्तित्व को बहाने के लिए किया जा रहा विरोध व आन्दोलन है |क्योंकि यह आन्दोलन धनाढ्य एवं उच्च वर्गो के निजी स्वार्थी हितो के लिए किए जा रहे अधिग्रहण का विरोध कर रहा है तथा राष्ट्र के आधुनिक विकास के नाम पर खेती , किसानी के विनाश का विरोध कर रहा है | यह आन्दोलन देश की कुल आबादी के 60% से उपर के हितो का प्रतिनिधित्व करता है इसके साथ ही यह आन्दोलन देश के कामकरो की 50 % से अधिक आबादी के रोजी - रोजगार के हितो का भी प्रतिनिधित्व करता है |देश के खाद्यान्न जैसी सर्वाधिक बुनियादी जरुरतो की सुरक्षा का प्रतिनिधित्व करता है | फिर इस आन्दोलन का समर्थन इसलिए भी किया जाना चाहिए कि यह आम किसानो एवं ग्रामवासियों के जमीन का मालिक बने रहने के जनवादी अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है ...............राष्ट्र व समाज के शुभचिंतको , हमदर्दों तथा किसान - हिमायती , जन हिमायती हिस्सों द्वारा , देश के राष्ट्रवादियो एवं जनवादियो द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध किसानो के इस आन्दोलन का पुरजोर समर्थन व सहयोग जरुर किया जाना चाहिए |यह समर्थन व सहयोग विभिन्न पार्टियों ,दलों व संगठनों को इस आन्दोलन को अगुवा बनाकर नही किया जाना चाहिए |बल्कि भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आंदोलनरत ग्रामवासियों व किसानो को ही उसका अगुवा बनाकर किया जाए तो बेहतर होगा |उन्हें हर तरह से सहायता - सहयोग देकर किया जाना चाहिए |
इस संदर्भ में विभिन्न पार्टियों , दलों की आम समर्थको को यह बात याद रखनी चाहिए कि पिछले 10 - 15 सालो से सभी पार्टियों ने अपने - अपने केन्द्रीय व प्रांतीय शासन काल के दौरान कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढाने का ही काम किया है और वह भी देश - विदेश के धनाढ्य मालिको , कम्पनियों को हर तरह का लाभ व मालिकाना हक देने के लिए | विभिन्न पार्टियों व दलों के समर्थको समेत देश के जनसाधारण लोगो को यह बात भी याद रखनी होगी कि आज से 45 - 50 साल पहले सभी पार्टिया भूमि सुधार के जरिये आम किसानो को जमीन का मालिकाना अधिकार देने कि आश्यकताओ को उठाया , और बताया करती थी |उसके लिए योजनाओं , प्रोग्रामो को बनाने अपनाने पर भी सहमती व सहयोग प्रदान करती रही थी |उदाहरण ............कांग्रेस पार्टी द्वारा अन्य पार्टियों के सक्रिय समर्थन से लागू किया गया जमीदारी उन्मूलन भले ही आधे अधूरे रूप में लागू हुआ , पर इसके जरिये बहुतेरे काश्तकारों को भूस्वामी बनने का अवसर जरुर मिला |फिर उसी के साथ लागू किए गये भूमि - हदबंदी कानून ने भी भूमि सुधार के अंतर्गत आम काश्तकारों व भूमिहीनों को किसी हद तक जमीन का मालिकाना अधिकार पाने में सहायता प्रदान की |1960 के दशक में हरित क्रान्ति के नाम पर हुए कृषि के तकनीकी विकास ने छोटे भूमि मालिको को अपना उत्पादन बढाने तथा आर्थिक स्थिति को थोड़ा बहुत ठीक - ठाक करने में भी सहायता की |भूमि सुधार तथा कृषि विकास के साथ देश में खाद्यान्न के बढ़ते उत्पादन से देश की खाद्यान्न सुरक्षा में भी मजबूती आयी |इस भूमि सुधार को और तेज़ किए जाने को लेकर सोशलिस्टो द्वारा बड़े मालिकाने की जगह छोटी - छोटी जोतो के मालिको को बढावा देने की माँग भी उठायी जाती रही | इसके अलावा अन्य सभी पार्टियों से कही ज्यादा कम्युनिस्ट पार्टियों व संगठनों द्वारा काश्तकारों , बटाईदारो और भूमिहीनों को जमीन का मालिक बनाने और उसके लिए जमीदारी कानून को पूरी तरह से और सख्ती से लागू किए जाने , जमीदारो और बड़े भू- स्वामियों की जमीनों को काश्तकारों एवं भूमिहीनों में बाटने आदि की माँग उठायी जाती रही | इन मांगो के साथ वामपंथी पार्टिया व संगठन भूमिहीनों व अत्यंत छोटे किसानो तथा दस्तकारो को साथ लेकर आन्दोलन व संघर्ष के रास्ते पर सालो - साल चलती रही | 1975 - 80 के बाद के दौर में हर केन्द्रीय व प्रांतीय सरकार ने बड़े मालिको के मालिकाने को ज्यो का त्यों छोडकर गाव के भूमिहीनों , मजदूरों को ग्राम समाज की जमीनों के टुकडो का मालिक बनाने का काम शुरू किया |यह काम आज भी जारी है , कम से कम कागज में |इस सबके अलावा ऊसर , बंजर जैसी जमीनों को कृषि भूमि में बदलने के सुधार प्रोग्राम भी चलाए गये | इस सबके परिणाम स्वरूप कृषि भूमि के रकबे और उसके मालिको की कुल संख्या में तथा उत्पादकता में भी वृद्धि होती रही |लेकिन अब खासकर पिछले 15 सालो से इसकी उलटी प्रक्रिया चल रही है |कृषि भूमि का यहा तक कि दो - तीन फसल उत्पादन करने वाली जमीन का भी अधिग्रहण तेज़ी से बढ़ता जा रहा है | देश - प्रदेश में विकास के नाम पर हजारो एकड़ कृषि भूमि से किसानो व ग्रामवासियों को उजाड़ा जा रहा है | कृषि की जमीनों को धनाढ्य कम्पनियों , बिल्डरों डेवलपरो को सौपा जा रहा है | इस अन्याय के विरुद्ध आंदोलित ग्रामवासियों एवं किसानो के भूमि अधिग्रहण विरोध को महज ज्यादा मुआवजे या बेहतर सौदे के लिए किया गया आन्दोलन कहकर प्रचारित किया जा रहा है | उपरोक्त प्रचारों के साथ ग्रामीण व शहरी जनसाधारण के , मजदूरों , किसानो के एवं छोटे - मोटे कारोबारियों के रोजी -रोजगार के स्थायी अवसरों , संसाधनों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अधिग्रहण किया जा रहा है | देश के संसाधनों पर जनसाधारण के थोड़े - मोड़े और सीमित अधिकारों को भी खुलेआम काटा -घटाया जा रहा है |
85 - 90 के बाद देश दुनिया के धनाढ्य व उच्च हिस्सों को खुलेआम बढावा देकर जनसाधारण की आबादी के बड़े हिस्से को देश के बिक्री बाज़ार का प्रभावी हिस्सा तक माना बंद किया जा रहा है | उनकी बचत को घटाकर और घाटो को बढाकर क्रय शक्ति को निरंतर घटाया जा रहा है | जबकि 1950 के बाद से जमीदारी उन्मूलन तथा भूमि सुधार के जरिये उत्पादन बढाने तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों के आरक्षित अधिकारों आदि के जरिये आम किसानो एवं छोटे कारोबारियों की बचत को , क्रय शक्ति को बढाने का काम किया जाता रहा है |उन्हें बिक्री बाज़ार से जोड़ने और उसका अहम हिस्सा बनाने का भी काम किया जाता रहा है |आखिर कहा हैं वे लोग वे पार्टिया , दल व संगठन जो जमीनों को काश्तकारों , भूमिहीनों में बाटने के लिए अपनी रणनितिया , कार्यनीतिया तय किया करते थे | उसके लिए देश के पैमाने पर आन्दोलन की घोषणाये व प्रतिबद्धताये सुनाया करते थे | कंहा है वे लोग , जो सामन्तवाद के पूर्ण सफाए और किसानो के जनवाद के लिए कृषि - क्रान्ति का नारा लगाकर आन्दोलन व संघर्ष की रूपरेखाये तय किया करते थे ?क्या आज केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारों के द्वारा , देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों द्वारा , कृषि जमीन के अधिग्रहण और उस पर निरंतर बढाये जा रहे मालिकाने के विरुद्ध उन्हें आगे नही आना चाहिए ?क्या कृषि भूमि अधिग्रहण ग्रामवासियों व किसानो को भरपूर समर्थन व सहयोग देना , उनका सामाजिक , राजनैतिक कार्यभार नही हैं ?एकदम है !परन्तु ऐसा हो नही पा रहा है |क्योंकि अब कृषि भूमि का मालिकाना हडपने वाला गाव जमीदार या भूस्वामी नही है |बल्कि वह देश दुनिया की धनाढ्य एवं ताकतवर कम्पनिया है |विशाल पूंजी व तकनीक के मालिक देशी व विदेशी पूंजी वान वर्ग हैं |इन्ही के साथ जमीन के इस्तेमाल से अधिकाधिक मुनाफ़ा कमाने वाले करोडपति , अरबपति , बिल्डरों , डेवलपरो आदि का उच्च हिस्सा खड़ा है |फिर उन्हें हर तरह से छूटे , अधिकार व संरक्षण देने के लिए केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे और राज्य की पूरी मशीनरी भी इनके साथ खड़ी है |शायद इसलिए जमीदारो व बड़े भू- स्वामियों से जमीने छीनकर भूमिहीनों व अत्यंत छोटे किसानो को जमीनों का मालिकाना दिए जाने के समर्थक भी आज चुप हैं |निष्क्रिय है या केवल स्थानीय स्तर पर ही थोड़ा बहुत सक्रिय है |क्या वर्तमान दौर के भूमि अधिग्रहण के विरोधो में ग्रामीणों व किसानो के स्वत: स्फूर्त आंदोलनों , संघर्षो में सक्रिय भागीदारी निभाने तथा उसे देश प्रदेश स्तर पर संगठित करने और आगे बढाने के काम को वामपंथी संगठनों द्वारा भी वांक्षित महत्व नही मिल पा रहा है | जबकि राष्ट्रवादियो और सबसे बढ़ कर वामपंथियों का यह दायित्व था और आज भी है कि वे भूमि अधिग्रहण के विरोध में एक जुट होकर ग्रामीणों व किसानो के साथ खड़े हो |उसे जगह - जगह हो रहे विरोधो व आंदोलनों को एकताबद्ध करते हुए भूमि अधिग्रहण के विरोध के साथ - साथ उसे कम से कम उन विदेशी आर्थिक नीतियों और डंकल - प्रस्ताव के विरोध तक ले जाए || क्योंकि इन्ही नीतियों प्रस्तावों के अंतर्गत देश व दुनिया की धनाढ्य कम्पनियों और उनके सहयोगियों , सेवको के छुटो- अधिकारों में तथा मालिकाने में वृद्धिया की जा रही है | इसी के तहत उन्हें कृषि भूमि का भी मालिका ना अधिकार दिया जा रहा है |यह राष्ट्रवादियो एवं वामपंथियों का कर्तव्य है कि वे कृषि भूमि अधिग्रहण को देश के आधुनिक विकास की जगह खेती किसानी के तथा ग्रामीणों एवं किसानो के विनाश का और फिर खाद्यान्न सुरक्षा के विनाश का नाम दे | भूमि अधिग्रहण के विरोध को वे नीतियों के विरोध में तथा देश - दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के व्यापक विरोध में बदल दें |यह राष्ट्रवाद एवं जनवाद की माँग है |इस मुद्दे पर लोगो की चुप्पी या तटस्थता का या फिर मात्र आलोचना आदि का रुख - रवैया अपना राष्ट्र व समाज के साथ , राष्ट्रवादी एवं जनवादी उद्देश्यों के साथ धोखाधड़ी ही साबित होगा | आने वाला कल उन्हें कभी माफ़ नही करेगा |


सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

Vijai Mathur ने कहा…

ज्ञानवर्धक ही नहीं अनुकरणीय विचार हैं।

रजनी मल्होत्रा नैय्यर ने कहा…

लेख विचारोतेजक है और सहमती परक भी ,पर क्या जो सहमती चाहते हैं वो संभव है जबकि सभी जानते हैं इस व्यवस्था पर सहमती ऊपर से मिली हुई है जिसे बदलना एक टेढ़ी खीर है. एक हाथ गन्दा हो तो साफ़ भी हो, जब हर हाँथ में लगी हो गन्दगी तो .........

Arvind Pande Wardha ने कहा…

vichar ko zakzor diya apne
aap ka dhanywaad