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बुधवार, 16 अक्टूबर 2013

किसानो की यह जंग जारी रहेगी


बाराबंकी।  किसानो की 163 ग्राम पंचायतों की जमीन छीन कर उत्तर प्रदेश सरकार टाउनशिप बसाना चाहती है। बड़े-बड़े माल, स्विमिंग पूल, फाइव स्टार होटल बनाने का कार्यक्रम है। किसानो की आम की बाग़, लहलहाते केलों के झुण्ड, धान की फसलें, गेंहू के खेत, मेंथा की हरियाली की जगह किसानो की रोजी-रोटी छीन कर उनको भूखा मार देने की उक्त योजना के विरोध में ग्राम मुबारकपुर में आज से क्रमिक भूख हड़ताल प्रारंभ हो गई है।               
यह जानकारी देते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद् सदस्य डॉ उमेश चन्द्र वर्मा ने बताया कि आज क्रमिक भूख हड़ताल पर कांशीराम के नेतृत्व में महेश प्रसाद, राम विलास, मायाराम व भिखारी लाल 24 घंटे के लिए बैठे हैं। यह क्रमिक भूख हड़ताल 20 अक्टूबर तक चलेगी। 
          डॉ उमेश वर्मा ने आगे बताया कि 17 अक्टूबर से किसान सभा के नेतृत्व में विशुनपुर, बरौली जाटा, मसौली, मलूकपुर, जीयनपुर, मोहम्मदपुर बंकी, कोलागांव,  भगवंतनगर, अजगना, चंदनपुरवा, महुवामऊ, अलीपुर समेत अन्य कई गाँवों में क्रमिक भूख हड़ताल किसान प्रारभ करेंगे। किसानो की यह जंग भूमि अधिग्रहण के खिलाफ अंतिम निर्णय होने तक जारी रहेगी। किसान एक भी इंच जमीन अधिग्रहण नहीं करने देगा। 

 नीरज वर्मा 
मंत्री 
अखिल भारतीय किसान सभा बाराबंकी

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

भूमि अधिग्रहण विधेयक पर नई तैयारी






कृषि मंत्री शरद पवार की अगुवाई में अधिकार प्राप्त केन्द्रियो मंत्रियो का समूह 8 अक्तूबर से नए भूमि अधिग्रहण विधेयक की तैयारी में जुटा हुआ था | सूचनाओं के अनुसार 16 अक्तूबर को आपसी सहमती से उस विधेयक का मसौदा तय कर लिया गया | मसौदा तय करने के दौरान मुख्य मतभेद इस बात पर उभरा था कि अधिग्रहित की जाने वाली जमीनों का कितना हिस्सा निजी कम्पनिया व पब्लिक प्राइवेट पाटर्नरशिप ( पी . पी पी ) का प्रोजेक्ट किसानो से स्वंय खरीदे और कितना हिस्सा सरकार अलग से किसानो से लेकर अधिग्रहित करे | शुरूआती मसौदे में कुल अधिग्रहण का 80% कम्पनियों या पी पी पी प्रोजेक्ट को किसानो से खरीदना था | जबकि 20% जमीन को सरकार द्वारा अधिग्रहित किया जाना था | मतलब स्पष्ट है कि 80% किसानो की सहमती के बिना यह प्रक्रिया पूरी नही होनी थी | 
इसका विरोध निजी कम्पनियों द्वारा पहले से किया जा रहा था | बाद में मंत्रियो के समूह में भी इस 80% की सीमा को घटाने का दबाव बढने लगा | अब इसे 5% कम करके 75% कर दिया गया है | हालाकि 18 अक्तूबर के  दैनिक हिन्दुस्तान में इसे 66% किये जाने की सूचना दी है | अभी मंत्रियो के समूह का यह मसौदा केन्द्रीय मंत्री परिषद में और फिर संसद में पेश व पास होकर ही विधेयक का रूप लेगा | विधेयक के रूप में इसका स्वरूप कैसा होगा यह बाद की बात है | लेकिन अभी तक लिए गये निर्णय पर यह सवाल खड़ा होता है कि मंत्रियो के समूह द्वारा 80% को घटाकर 75% या 66% क्यों किया गया  ? उसे बढाकर 90% या 100% क्यों नही किया गया  ? 
जवाब मुश्किल नही है कि इसे कम करने के लिए तो हर तरह से दबाव डालने में सक्षम धनाढ्य कम्पनिया एकजुट होकर मंत्री समूह पर दबाव बनाने में लगी हुई थी | दुसरे यह कि मंत्री समूह में शामिल कृषि मंत्री व ग्रामीण विकास मंत्री तथा अन्य मंत्रीगण न ही स्वंय किसान व ग्रामीण है और न ही वे किसानो व ग्रामीणों के हितो के साथ खड़े ही रहे है | मतलब साफ़ है कि मंत्री समूह खुद भी भूमि अधिग्रहण पर किसानो को निर्णय लेने की छूट देने के लिए तैयार नही थे | इसीलिए वह किसानो  को और दबाकर भूमि अधिग्रहण के लिए मसौदा तैयार करने में जुटा भी हुआ था | 
इसी का परिणाम आया कि , अब सरकार 25% या 34% तक भूमि किसानो से बिना उनकी रजामंदी  के ले सकती है , बशर्ते कि निजी कम्पनिया या पी . पी . पी . प्रोजेक्ट 75% या 66% जमीन उनके मालिक किसानो से खरीद ले | कम्पनिया इस सीमा को और ज्यादा घटाने का प्रयास करेंगी और यह भी संभावना है कि अंतिम विधेयक में यह सीमा घट  भी जाय | कयोंकि कम्पनियों के साथ सभी प्रचार माध्यमी हिस्से देश के औद्योगिक विकास के नाम पर भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को तेज एवं सरल बनाने के लिए लगातार दबाव डालते व बढाते जा रहे है | जबकि आम किसान इसे लेकर न तो व्यापक तौर पर सोच रहा है और ना ही सचेत है और न ही संगठित हो रहा है | भूमि अधिग्रहण मुद्दे पर किसानो या किसान संगठनों द्वारा संगठित रूप से अपना कोई मसौदा न पेश करना भी सरकार को धनाढ्य कम्पनियों के पक्ष में निर्णय देने के लिए छूट व आधार दे रहा है | 
वैसे सरकारों की पिछले 20--- 25  सालो से घोषित पक्षधरता उद्योग -- वाणिज्य के मालिको के ही साथ रही है | अब उनकी यह पक्षधरता किसानो की जमीन छीन कर ( अधिग्रहित कर ) उद्योगपतियों , बिल्डरों , डेवलेपरो
को सौपे जाने के रूप में सामने आती जा रही है | इसीलिए भी भूमि अधिग्रहण के मसौदे पर केवल संसद को ही नही , बल्कि किसानो को भी अपनी खेती किसानी के हितो के अनुसार निर्णय लेना है और उसे मानने के लिए सरकार पर दबाव भी डालना है | 
अगर किसी क्षेत्र के किसान महज अपनी और अपने गाँव की जमीन के अधिग्रहण का विरोध करने तक सीमित रहेंगे , निजी कम्पनियों के हित में पुरे देश में जारी किये गए अधिग्रहण कानून का व्यापक विरोध नही करेंगे , भूमि अधिग्रहण के लिए सभी किसानो की रजामंदी की शर्त नही लगायेंगे तो जमीन से उनके अधिकार के काटने -- छटने की यह प्रक्रिया रुकने वाली नही है | ये पूंजी के दलाल और सत्ता के काले लोग उनकी जमीन को एक दिन सम्पूर्ण रूप से लील; लेंगे | 



-सुनील दत्ता

शुक्रवार, 16 मार्च 2012

इज्जतदार जिंदगी की चाहत-2


विस्थापन से रोजी का एक स्थायी संकट पैदा होता है क्योंकि विस्थापन मनुष्य को उन परिस्थितियों से दूर करता है जिनमें वह अपने ज्ञान का इस्तेमाल करके अपनी रोजी चला रहा होता है। इसके अलावा एक सामाजिक संकट भी पैदा होता है क्योंकि वह या तो अपने समुदाय से अलग कर दिया जाता है या फिर पूरा समुदाय ही विस्थापित हो जाता है। यानी विस्थापन के बेहद दूरगामी आर्थिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं दार्शनिक नतीजे होते हैं। गरीब होने के चलते उसे कोई सक्षम नया ज्ञान हासिल करने का मौका नहीं मिलता है और वह सस्ती मजदूरी के काम करने के लिए मजबूर हो जाता है। विस्थापन से मुकाबला केवल जिनका विस्थापन होता है वे ही कर लें, संभव नही है। इस मुकाबले का दारोमदार पूरे लोकविद्याधर समाज पर है और यह उनकी सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा, बराबरी और इज़्ज़त की लड़ाई का हिस्सा बनना होगा। वाराणसी में हाल ही में सम्पन्न लोकविद्या जन आन्दोलन के अधिवेशन में इस सिलसिले में दो माँगें उभर कर आईं। पहली यह कि लोकविद्या के आधार पर जीवनयापन का अधिकार होना चाहिए तथा इसे एक मौलिक संवैधानिक अधिकार बनाया जाना चाहिए। दूसरी यह कि इस देश के हर बालिग को पक्की नौकरी मिलनी चाहिए, जिसे जो आता है उसके बल पर यह नौकरी मिले और इस नौकरी में सरकारी नौकरी के बराबर की तनख्व़ाह मिले। यह लोकविद्या के आधार पर ऐसी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की माँग है जिसके बगैर जि़न्दगी में केवल अभाव और बेइज्जती का ही समाना करना पड़ता है। इसके लिए लोकविद्याधर समाज का एक ज्ञान आन्दोलन खड़ा करना होगा, सार्वजनिक दुनिया में यह दावा पेश करना होगा कि किसान, कारीगर, आदिवासी, छोटे-छोटे दुकानदार और महिलाएँ जो ज्ञान रखते हैं वह विश्वविद्यालय के ज्ञान से किसी भी अर्थ में कम नही है, इसलिए अपने ज्ञान के बल पर लोकविद्याधर समाज को भी वे सब हक और मौके मिलने चाहिए जो आधुनिक पढ़े-लिखे समाज को प्राप्त हैं। इन समाजों का चारों तरफ हो रहा विस्थापन हमें यह कहता नज़र आता है कि लोकविद्याधर समाज के सारे अंग एक साझा ज्ञान आन्दोलन के कगार पर खड़े हैं, जो इस नये दर्शन के आधार पर सबके लिए बराबरी और इज़्ज़त की दुनिया की एक तस्वीर पेश करता है।
-सुनील सहस्र बुद्धे

गुरुवार, 15 मार्च 2012

इज्जतदार जिंदगी की चाहत-1




विस्थापन पर इस चर्चा के मार्फत हम आप लोगों का ध्यान एक ऐसे नजरिए की ओर खींचना चाहते हैं जो अभी बहुत चर्चा में तो नहीं है लेकिन जिसमें जनहित के बदलाव की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। यह लोकविद्या का नजरिया है। यानी उन लोगों का अपने ज्ञान पर आधारित नजरिया जो कालेज और विश्वविद्यालय नहीं गए।
ध्यान देने की बात है कि ये वही लोग हैं जो बड़े पैमाने पर अपने काम से, अपने रहने की जगहों से बेदखल किए जा रहे हैं। ये किसान हंै, कारीगर हैं, आदिवासी हैं और पटरी के दुकानदार हैं। कोई भी विस्थापन की खबर उठाकर देख लीजिए इन्हीं में से किसी न किसी समुदाय के लोग विस्थापित नजर आएँगे। किसानों की जमीनों का अधिग्रहण, आदिवासियों का अपने गाँवों-जमीनों-जंगलों से खदेड़ा जाना, पटरी के दुकानों पर बुल्डोजर चलाना, स्थानीय उद्योग-सेवा-मनोरंजन के आधुनिकीकरण से कारीगरों का काम छीना जाना, शहरों की गरीब बस्तियों का उजाड़ा जाना यही आज की सबसे बड़ी असलियत है। इनके परिवारों की महिलाएँ शायद इन हमलों से होने वाले उजाड़ की सबसे बड़ी भुक्तभोगी हैं। ये वही लोग हैं, जो कभी कालेज या विश्वविद्यालय नहीं गए और जो अपनी जिंदगी और कारोबार अपने ज्ञान के बल पर चलाते हैं। इन्हीं के ज्ञान को लोकविद्या कहते हैं और इसी लोकविद्या के नजरिए में इन सबके बीच वह एकता बनाने की हैसियत हो सकती है जो एक ऐसे बदलाव का आगाज करे जिसमें ये लोग भी एक बराबर की इज्जतदार जिंदगी के हकदार होंगे।
दुनिया कैसी होनी चाहिए, विकास का अर्थ क्या है, रोजगार के मौके कैसे तैयार होते हैं, इन सबके ऊपर सार्वजनिक दुनिया में जो बहस चलती है उस पर विश्वविद्यालयों में जो पढ़ाया-लिखाया जाता है, वही काबिज होता है। अखबारों में जो लिखा जाता है, किताबों के मार्फत जो समझाया जाता है, टेलीविजन और रेडियो से जो प्रचार किया जाता है, बुद्धिजीवी जो माहौल बनाते हैं, अर्थशास्त्री जो तर्क देतेे हैं और अब राजनैतिक पार्टियों के नेता जो कहते हैं, सभी कुछ उस ज्ञान, समझ और जानकारी पर आधारित होता है जो उन्हें विश्वविद्यालय में मिलती है। जाहिर है इस पूरी बहस में इस देश के 80 फीसदी लोग, जो किसान, कारीगर, आदिवासी और छोटा-मोटा धंधा करने वाले परिवारों से आते हैं, कहीं भी शामिल नहीं हैं। जो बहस में ही शामिल नहीं है, जिसे अपनी बात कहने का ही कोई मौका नहीं है, उसके भले की कोई बात होगी इसकी कोई उम्मीद भी नहीं हो सकती। ये लोग विश्वविद्यालय नहीं गए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि इनके पास कोई ज्ञान नहीं है और ये समाज, दुनिया, प्रकृति के बारे में कुछ समझते-जानते नहीं हैं। अगर ये अज्ञानी हैं तो इनकी जिंदगी कौन चलाता है? खेती, कारीगरी, जंगलों की जानकारी, छोटी पूँजी से धंधों का प्रबंधन, बच्चों का लालन-पालन और घर की व्यवस्थाएँ, इन सब के सबसे बड़े जानकार यही लोग हैं। इन सब लोगों को अज्ञानी अथवा नासमझ करार देना पूँजीवाद का सबसे बड़ा षड्यंत्र है। विस्थापन की सच्चाई विश्वविद्यालय में बैठकर नहीं दिखाई देती, न संसद, न टेलीविजन के केंद्र और न औद्योगिक इमारतों से ही दिखाई देती है। विस्थापन के खिलाफ संघर्षों में शामिल साथी भी इनके प्रभाव के चलते गुमराह होते रहते हैं। भूमि अधिग्रहण के जवाब में कृषि भूमि अधिगृहीत न की जाए या 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में बुनियादी संशोधन किए जाएँ, ऐसे सुझाव कुछ तात्कालिक महत्व तो रख सकते हैं, लेकिन किसानों की दुनिया में कोई बुनियादी बदलाव आए, उनके लिए बराबरी और इज्जत की दुनिया की ओर बढ़ने के रास्ते खुलें, इसकी जमीन शायद ही तैयार कर पाते हैं। कारीगरों के हित में बड़े मशीनीकरण का विरोध किया जाना और गरीबोें की बस्तियों व पटरी के धंधों को कानूनी संरक्षण, आज की स्थिति बरकरार रखने तक सीमित बातें हैं। ये बातंे तो ठीक हैं लेकिन इनके आधार पर विस्थापित हो रहे समुदाय अपनी-अपनी लड़ाइयाँ लड़ सकेंगे ऐसा शायद तब तक न हो पाए जब तक वह सोच सामने नहीं आती जो सभी विस्थापित समुदायों के बीच एका का आधार तैयार करती हो।
सभी विस्थापित समुदायों के बीच एका का आधार लोकविद्या विचार में है। लोेकविद्या के नजरिए से देखें तो ये सारे समाज एक लोकविद्याधर समाज बनाते हुए दिखाई देते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह अनुभव होता ही है कि जब वे बस्तियों या गाँवों में विभिन्न विषयों पर चर्चा कर रहे होते हैं, तब सामना एक अलग नजरिए से होता है, सोचने और समझने के अलग तरीके से होता है। अगर हम हावी होकर अपनी बात थोपने का काम न करें और उनकी बात समझने की कोशिश करें, तो सोच की एक अलग दुनिया से सामना जरूर होगा। लोकविद्याधर समाज का सोचने या काम करने का तरीका उन्हें अपनी विरासत से मिला होता ह,ै जिसमें अपने अनुभव से, अपनी जरूरत से और अपनी तर्क बुद्धि के बल पर ये इजाफा करते रहते हैं। उस सोच में शासन, बाजार और
आधुनिक उद्योगों की प्रतिकूलताओं के बावजूद समाज में रहने की क्षमता विकसित करते रहते हैं। इन्हीं सोचों, क्षमताओं और विवेक के पुलिंदे को लोकविद्या कहते हैं। आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोकविद्या के आधार पर पूँजीवादी व्यवस्थाओं से मुकाबले का सामाजिक-राजनैतिक विचार कैसे तैयार हो। चूँकि विस्थापन सारे लोकविद्याधर समाज का होता है और केवल लोकविद्याधर समाज का होता है, इसलिए विस्थापन से मुकाबला पूरे लोकविद्याधर समाज की एकता की माँग करता है। किसान, कारीगर, छोटे-छोटे दुकानदार, आदिवासी और इनके घरों की महिलाएँ, इन सभी का नजरिया लोकविद्या का नजरिया है, इनकी आपसी एकता लोकविद्या की राजनीति का आधार देती है।
-सुनील सहस्र बुद्धे
क्रमश:

रविवार, 6 नवंबर 2011

नया भूमि अधिग्रहण विधयेक और उसके मसौदे में संशोधन

 ( क्या किसानो के हित में , या किसानो के विरोध में )

इस अन्याय का प्रतिकार भूमि अधिग्रहण का मार सहने वाले किसानो और उससे ग्रामीणों को ही करना होगा | उन्हें भूमि अधिग्रहण और उसके मसौदा को , उसमे किये जाते रहे संशोधनों को स्वंय अपनी चर्चा का तथा विरोध का विषय बनाना होगा
नया भूमि अधिग्रहण विधेयक लोकसभा में पेश किया जा चुका है | इसका मसौदा 29 जुलाई को जारी किया गया था | 5 सितम्बर के समाचार पत्रों में इस मसौदे का वह संशोधित रूप प्रकाशित हुआ , जिसे संसद में पास करवा कर कानून का रूप दिया जाना है | यही कानून , भूमि अधिग्रहण के 1894 के कानून की जगह लेगा | संसद में बहस के बाद यह कानून के रूप में कैसे सामने आता है , यह बाद की बात है | पर दिलचस्प बात यह है कि 29 जुलाई को देशव्यापी राय मशविरे के लिए जारी मसौदे में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण बदलाव कर दिये गये है | इस बदलाव के लिए सरकार को किसने सलाह दी ? क्या किसानो ने ?एकदम नही | किसानो या किसान संगठनों कि राय तो कही चर्चा तक में नही आई | लेकिन उद्योगपतियों के संगठनों और प्रचार माध्यमी जगत के दिग्गजों कि राय जरुर आती रही | इस संदर्भ में समाचार पत्रों में सूचनाये भी प्रकाशित होती रही | बेहतर है कि किसी भी नतीजे पर पहुचने से पहले मसौदे में दिये गये बदलाव को मोटे तौर पर देख लिया जाए 
1 . 29 जुलाई को जारी किये गये मसौदे में यह कहा गया था कि , खेती योग्य और सिंचित जमीन का अधिग्रहण नही किया जाएगा |लेकिन उद्योगपतियों के संगठनों और उनके समर्थको के खुले दबाव के बाद इसके अधिग्रहण को हरी झंडी दे दी गयी है | बड़े उद्योगपतियों के संगठन "पिक्की " द्वारा मसौदे पर सुझाव के रूप में यह बयान समाचार पत्र में प्रकाशित भी हुआ है | हाँ , इस सुझाव में सांत्वना के तौर पर ग्रामीण विकास मंत्री ने विधेयक में यह प्राविधान जोड़ दिया है कि ( लेकिन कितने दिन बाद , यह अनिश्चित है ) उस जिले में उतनी कृषि भूमि का सिंचित भूमि में विकास कर दिया जाएगा |
2--- जुलाई के मसौदे में ग्रामीण इलाको कि जमीन का मुआवजा बाज़ार दर से 6 गुना ज्यादा दिये जाने का प्रस्ताव किया गया था | अब अधिग्रहण के बाद मुआवजे कि रकम अदा करने वाली कम्पनियों , डेवलपरो के दबाव में उसे घटाकर 4 गुना कर दिया गया है | 
3--- तीसरा और अत्यंत महत्वपूर्ण बदलाव - मसौदे में यह प्रस्तावित था कि 5 साल तक अधिग्रहित भूमि का घोषित उद्देश्य के लिए न इस्तेमाल किये जा सकने कि स्थिति में वह जमीन किसानो एवं ग्रामवासियों को लौटा दी जायेगी | लेकिन अब नये संशोधन के अनुसार अब वह जमीन इस्तेमाल न किये जाने के वावजूद जमीन के मालिक किसानो को बिलकुल लौटाई नही जायेगी | अब वह भूमि राज्य भूमि प्राधिकरण के कब्जे में चली जायेगी | कुछ समाचार पत्रों में यह सुचना भी आई थी कि 5 वर्ष कि मियाद को संशोधित करके 10 वर्ष कर दिया जाना है | अर्थात 10 साल तक अधिग्रहित जमीन का इस्तेमाल न होने पर वह राज्य भूमि प्राधिकरण के कब्जे में चली जायेगी | 
इसके अलावा मसौदे के कई अन्य सुझावों में बदलाव किये गये है | जिन्हें हम कानून के रूप में आने के बाद प्रस्तुत करेंगे और उस पर चर्चा भी करेंगे | लेकिन अभी तक मसौदे में किये गये उपरोक्त संशोधनों से यह बात समझना कतइ मुश्किल नही है कि , ये संशोधन किसानो द्वारा नही , बल्कि बड़े उद्योगपतियों , व्यापारियों द्वारा कराए गये है | कयोंकि भूमि अधिग्रहण से सम्बन्धित मसौदे व विधेयक को किसानो को बताने और उनकी राय जान्ने का तो कोई प्रयास ही नही किया गया | 29 जुलाई को पेश किये गये मसौदे का कोई सरकुलर ग्राम सभाओं तक को नही भेजा गया | फिर 26 जुलाई को जारी किये गये मसौदे के केवल एक माह बाद उसे विधेयक या कानून का रूप देने में यह बात स्पष्ट है कि इस मसौदे पर कृषि - भूमि के मालिक से कोई राय नही ली जानी थी | इनकी जगह भूमि अधिग्रहण के घोर समर्थक भूमि लोलुप कम्पनियों के प्रमुखों व डेवलपरो आदि जैसे गैर किसान , धनाढ्य वर्गो की ही राय ली जाने वाली थी | कयोंकि वे ही सत्ता सरकार से अपने हितो में नीतियों , मसौदो , विधेयको को बनाने व लागू करने - करवाने के लिए सत्ता सरकार के इर्द - गिर्द मडराते रहते है | सरकारे भी इन्ही की सुनती है |इनसे ही राय मशविरा करती है | साफ़ बात है कि यह मसौदा भी उन्ही के लिए जारी किया गया था , न कि किसानो तथा अन्य ग्रामीण हिस्सों के लिए | क्या यह कृषि भूमि पर किसानो व अन्य ग्रामवासियों से जुड़े अहम मुद्दे पर उकी अनदेखी करने का अन्याय नही है ? एकदम है | लेकिन इसे कहेगा कौन ? केन्द्रीय सरकार में बैठी पार्टियों ने तो अन्याय किया ही है , लेकिन विरोधी पार्टियों ने भी सरकार पर उस मसौदे के बारे में किसानो से राय मशविरा लेने की कोई बात नही करके उसी अन्याय का साथ दिया है | ज्यादातर प्रचार माध्यमि बौद्धिक हिस्सों ने भी इसी अन्याय का साथ दिया है | इसलिए अब इस अन्याय का प्रतिकार भूमि अधिग्रहण का मार सहने वाले किसानो और उससे ग्रामीणों को ही करना होगा | उन्हें भूमि अधिग्रहण और उसके मसौदो को , उसमे किये जाते रहे संशोधनों को स्वंय अपनी चर्चा का तथा विरोध का विषय बनाना होगा | यह विरोध संगठित रूप और व्यापक रूप में , गाँव स्तर से लेकर देश स्तर पर किये जाने की आवश्यकता हैं | इसके लिए उन्हें अपनी किसान समितियों और महा समितियों को भी जरुर खड़ा करना होगा | ताकि इसके जरिये वे किसान विरोधी नीतियों के विरोध के साथ कृषि विकास , कृषि सुरक्षा की मांग खड़ी कर सके | उसके लिए सरकारों पर बराबर दबाव डाल सकें | हम कब सचेत होंगे जब हमसे सब कुछ छीन जाएगा ?


सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

पंजाब में भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आंदोलनरत किसानो पर पुलिसिया कहर


23 अगस्त को पंजाब के मंसा जिले के गोविन्दपुरा में डिप्टी कमिश्नर के आफिस के सामने भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हुए किसानो पर पुलिस ने लाठिया बरसाई | इसके फलस्वरूप दो दर्जन किसान घायल हो गये | पंजाब के गोविन्दपुरा , सिरसिबाला, ज्लेबरा , और बरेटा गाँव में किसानो कि बेहद उपजाऊ भूमि का अधिग्रहण किया जाना है | यह अधिग्रहण एक प्राइवेट कम्पनी द्वारा 1320 मेगावाट बिजली के थर्मल पावर हाउस के लिए किया जाना है | इस परियोजना के लिए 880 एकड़ जमीन का अधिग्रहण होना है | महत्त्वपूर्ण बात यह है कि वहा के किसान और उनके समर्थन में उतरे कई संगठन पिछले 4 महीने से इस अधिग्रहण का विरोध करते रहे थे | लेकिन प्रचार माध्यमो में इसकी खबर नही आई या बहुत कम आई | वह एक उलेख्य्नीय खबर तभी बन पायी जब दो दर्जन किसान डिप्टी कमिश्नर के आफिस के सामने 22 अगस्त से लगातार चार दिनों तक धरने पर बैठे रहे | इन्ही किसानो को वह से हटाने के लिए पुलिस द्वारा लाठी चार्ज किया गया | यह लाठी चार्ज एकदम सुब्ह के समय किया गया , जिस समय ज्यादातर किसान धरना स्थल पर अभी सो रहे थे | ऊपेर से यह प्रचार भी किया गया कि 880 एकड़ कि अधिग्रहित जमीन के ज्यादातर मालिक मुआवजा ले चुके है | केवल 166 एकड़ जमीन के मालिक किसानो द्वारा ही यह विरोध हो रहा है | क्योंकि वे ज्यादा मुआवजे कि माँग कर रहे है |थोड़ा बेहतर मुआवजा मिलने पर वे भी शांत हो जायेंगे | हो सकता है यही हो | लेकिन एक निजी कम्पनी और उसके लाभ के लिए पंजाब जैसे क्षेत्र कि बेहद उपजाऊ जमीनों को किसानो से छीना जाना उचित है ? एकदम नही | लेकिन हो क्या रहा है | एक कम्पनी के निजी मालिकाने व लाभ को बढाने के लिए कई गाँवों के निजी मालिको यानी किसानो की उपजाऊ जमीन का मालिकाना हक छीना जा रहा है | साफ़ बात है की भूमि अधिग्रहण के रूप में बढ़ता निजीकरण व्यापक जनहित में किया जा रहा अधिग्रहण नही है |बल्कि व्यापक जनहित - किसान हित के विरुद्ध किया जाने वाला अधिग्रहण व निजीकरण है | इसका विरोध करना जनहित में किसानो के हित में एकदम न्याय संगत है |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

किसानो का बलिदान लेता हुआ एक और अधिग्रहण


(महाराष्ट्र के मावल के आंदोलनरत किसानो पर गोलीबारी )

9 अगस्त को महाराष्ट्र में पुणे के निकट मावल में पुलिस की गोली से चार किसान मारे गये | भागते किसानो पर दो पुलिस के दरोगाओ द्वारा दौडाते हुए उन पर गोली चलाने और सिपाहियों द्वारा तोड़ - फोड़ करने की खबरे समाचार -पत्रों में आई है | उस घटना के चित्रों को महाराष्ट्र विधानसभा में प्रदर्शित भी किया गया था | आखिर किसानो को गोलियों का शिकार क्यों होना पडा ? कयोकि 'पावना बाँध ' से पिपरी चीचवाड़ा म्युनिसिपल कापोरेशन के लिए पानी की सप्लाई की पाइप लाइनों के लिए इस मावल गाँव की जमीन अधिग्रहण किया जाना था | सच्चाई यह है कि पुणे - मुम्बई मार्ग पर पिपरी - चीचवाड़ा टाउनशिप के लिए विकास प्राधिकरण के जरिये हजारो एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है | इस इलाके के भूमि अधिग्रहण का मामला वैसे तो पुराना है पर अब वह राजमार्ग के विस्तार और टाउनशिप के विकास के नाम पर पिछले कई सालो से बढ़ता जा रहा है | 1957 में किसानो की जमीन का अधिग्रहण पावना बाँध के लिए हुआ था और अब वह अधिग्रहण राजमार्ग व उसके इर्द - गिर्द टाउनशिप के विस्तार के लिए तथा उसे पानी कई सप्लाई के लिए किया जा रहा है | अगर 1957 में उस बाँध के जरिये एक सार्वजनिक उद्देश्य को पूरा किया जाना था , तो आज के निजीकरण के दौर में उसका उद्देश्य बिल्डरों , डेवलपरो तथा आई ० टी ० कम्पनियों को टाउनशिप के विकास के जरिये भारी लाभ दिलाना है | बताया जाता है की यह परियोजना देश के केन्द्रीय मंत्री शरद पवार के भतीजे और महाराष्ट्र सरकार के उप - मुख्य मंत्री अजित पवार के सपनो की परियोजना है | महाराष्ट्र में कांग्रेस पार्टी और राष्ट्र वादी कांग्रेस पार्टी की सत्ता - सरकार है | इसके मुख्य मंत्री भी कांग्रेस पार्टी के ही है | उत्तर प्रदेश में भट्टा पारसौल में किसानो पर गोली चलाने का विरोध कर रही कांग्रेस पार्टी मावल में वैसी ही घटना को अंजाम देने के बाद अब उसकी जांच करवा रही है , वह भी बड़े दबाव के बाद | घटना में पुलसिया कारवाई की तो इस गोली काण्ड के लिए मुख्यत:वहा के किसानो द्वारा किये गये उग्र प्रदर्शन को ही जिम्मेवार बता रही है |................... फिर महाराष्ट्र के जैतपुरा से लेकर होते - बढ़ते भूमि अधिग्रहण पर किसानो के विरोध प्रदर्शन और सरकार द्वारा उसके बलपूर्वक दमन पर वहा के नामी - गिरामी स्वंय - सेवक संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी उसका उल्लेखनीय व कारगर विरोध नही किया | जबकि भूमि अधिग्रहण का मुद्दा आम किसानो की जीविका और देश के खाद्यानो उत्पादन से जुड़ा मुद्दा है | भ्रष्टाचार के मुद्दे से कही ज्यादा बुनियादी मुद्दा है | विरोधी पार्टियों व प्रचार माध्यमो के लिए तो ऐसी खबरे तब प्रमुख बनती है जब किसानो की लाशें गिर जाए , घर जला दिये जाए।
फिर उनका वह विरोध भी कम्पनियों डेवलपरो के निजी लाभों के लिए किये जा रहे अधिग्रहण के विरोध के नाम पर नही बल्कि बेहतर मुआवजे और किसानो की पुनर्स्थापना के लिए विरोधो - समझौतों के रूप में ही प्रचारित कर दिया जाता है।
इसलिए अब किसानो का तथा खाद्यान्नो की महगाई झेल रहे जनसाधारण का दायित्व है कि , वह सत्ता - सरकारों द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आन्दोलित किसानो के दमन के विरोध के साथ - साथ वर्तमान दौर में निजी लाभों के लिए बनाये जा रहे 'सेज व टाउनशिप ' आदि के लिए किये जा रहे अधिग्रहण का विरोध होना चाहिए | धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों को कृषि भूमि जमीन मालिक बनने कि छुट दिये जाने कि नीतियों , विधेयको , कानूनों का जबर्दस्त तरीके से विरोध करना होगा तब शायद हम अपनी जमीने बचा सके।

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

कृषि भूमि सुधार से कृषि भूमि के विनाश तक

( यह राष्ट्रवादियो एवं वामपंथियों का कर्तव्य है कि वे कृषि भूमि अधिग्रहण को देश के आधुनिक विकास की जगह , खेती किसानी तथा ग्रामीणों एवं किसानो के विनाश का और फिर खाद्यान्न सुरक्षा के विनाश का नाम दे | भूमि अधिग्रहण विरोध को वे नीतियों के विरोध में तथा देश -दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के व्यापक विरोध में बदल दें | )
देश - प्रदेश में कृषि भूमि के बढ़ते अधिग्रहण के साथ किसानो एवं अन्य ग्रामवासियों का विरोध भी बढ़ता जा रहा है | यह विरोध एक स्वयं स्फूर्त , पर राष्ट्रव्यापी किसान आन्दोलन या ग्रामीण - आन्दोलन का रूप लेता जा रहा है | इन आंदोलनों का समर्थन किया जाना चाहिए |उन्हें अधिकाधिक संगठित किया जाना चाहिए |उन्हें रोकने व तोड़ने के हर प्रयास का विरोध होना चाहिए उसके अलावा उसे आगे बढाने और अगले चरण तक ले जाने का प्रयास भी होना चाहिए | क्योंकि कृषि भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आन्दोलन सौ फीसदी न्याय - संगत है | क्योंकि यह आन्दोलन किसानो व अन्य ग्रामवासियों द्वारा अपनी रोजी - रोटी को , अपने आवास - निवास को तथा अपने जीवन अस्तित्व को बहाने के लिए किया जा रहा विरोध व आन्दोलन है |क्योंकि यह आन्दोलन धनाढ्य एवं उच्च वर्गो के निजी स्वार्थी हितो के लिए किए जा रहे अधिग्रहण का विरोध कर रहा है तथा राष्ट्र के आधुनिक विकास के नाम पर खेती , किसानी के विनाश का विरोध कर रहा है | यह आन्दोलन देश की कुल आबादी के 60% से उपर के हितो का प्रतिनिधित्व करता है इसके साथ ही यह आन्दोलन देश के कामकरो की 50 % से अधिक आबादी के रोजी - रोजगार के हितो का भी प्रतिनिधित्व करता है |देश के खाद्यान्न जैसी सर्वाधिक बुनियादी जरुरतो की सुरक्षा का प्रतिनिधित्व करता है | फिर इस आन्दोलन का समर्थन इसलिए भी किया जाना चाहिए कि यह आम किसानो एवं ग्रामवासियों के जमीन का मालिक बने रहने के जनवादी अधिकार का प्रतिनिधित्व करता है ...............राष्ट्र व समाज के शुभचिंतको , हमदर्दों तथा किसान - हिमायती , जन हिमायती हिस्सों द्वारा , देश के राष्ट्रवादियो एवं जनवादियो द्वारा भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध किसानो के इस आन्दोलन का पुरजोर समर्थन व सहयोग जरुर किया जाना चाहिए |यह समर्थन व सहयोग विभिन्न पार्टियों ,दलों व संगठनों को इस आन्दोलन को अगुवा बनाकर नही किया जाना चाहिए |बल्कि भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आंदोलनरत ग्रामवासियों व किसानो को ही उसका अगुवा बनाकर किया जाए तो बेहतर होगा |उन्हें हर तरह से सहायता - सहयोग देकर किया जाना चाहिए |
इस संदर्भ में विभिन्न पार्टियों , दलों की आम समर्थको को यह बात याद रखनी चाहिए कि पिछले 10 - 15 सालो से सभी पार्टियों ने अपने - अपने केन्द्रीय व प्रांतीय शासन काल के दौरान कृषि योग्य भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया को आगे बढाने का ही काम किया है और वह भी देश - विदेश के धनाढ्य मालिको , कम्पनियों को हर तरह का लाभ व मालिकाना हक देने के लिए | विभिन्न पार्टियों व दलों के समर्थको समेत देश के जनसाधारण लोगो को यह बात भी याद रखनी होगी कि आज से 45 - 50 साल पहले सभी पार्टिया भूमि सुधार के जरिये आम किसानो को जमीन का मालिकाना अधिकार देने कि आश्यकताओ को उठाया , और बताया करती थी |उसके लिए योजनाओं , प्रोग्रामो को बनाने अपनाने पर भी सहमती व सहयोग प्रदान करती रही थी |उदाहरण ............कांग्रेस पार्टी द्वारा अन्य पार्टियों के सक्रिय समर्थन से लागू किया गया जमीदारी उन्मूलन भले ही आधे अधूरे रूप में लागू हुआ , पर इसके जरिये बहुतेरे काश्तकारों को भूस्वामी बनने का अवसर जरुर मिला |फिर उसी के साथ लागू किए गये भूमि - हदबंदी कानून ने भी भूमि सुधार के अंतर्गत आम काश्तकारों व भूमिहीनों को किसी हद तक जमीन का मालिकाना अधिकार पाने में सहायता प्रदान की |1960 के दशक में हरित क्रान्ति के नाम पर हुए कृषि के तकनीकी विकास ने छोटे भूमि मालिको को अपना उत्पादन बढाने तथा आर्थिक स्थिति को थोड़ा बहुत ठीक - ठाक करने में भी सहायता की |भूमि सुधार तथा कृषि विकास के साथ देश में खाद्यान्न के बढ़ते उत्पादन से देश की खाद्यान्न सुरक्षा में भी मजबूती आयी |इस भूमि सुधार को और तेज़ किए जाने को लेकर सोशलिस्टो द्वारा बड़े मालिकाने की जगह छोटी - छोटी जोतो के मालिको को बढावा देने की माँग भी उठायी जाती रही | इसके अलावा अन्य सभी पार्टियों से कही ज्यादा कम्युनिस्ट पार्टियों व संगठनों द्वारा काश्तकारों , बटाईदारो और भूमिहीनों को जमीन का मालिक बनाने और उसके लिए जमीदारी कानून को पूरी तरह से और सख्ती से लागू किए जाने , जमीदारो और बड़े भू- स्वामियों की जमीनों को काश्तकारों एवं भूमिहीनों में बाटने आदि की माँग उठायी जाती रही | इन मांगो के साथ वामपंथी पार्टिया व संगठन भूमिहीनों व अत्यंत छोटे किसानो तथा दस्तकारो को साथ लेकर आन्दोलन व संघर्ष के रास्ते पर सालो - साल चलती रही | 1975 - 80 के बाद के दौर में हर केन्द्रीय व प्रांतीय सरकार ने बड़े मालिको के मालिकाने को ज्यो का त्यों छोडकर गाव के भूमिहीनों , मजदूरों को ग्राम समाज की जमीनों के टुकडो का मालिक बनाने का काम शुरू किया |यह काम आज भी जारी है , कम से कम कागज में |इस सबके अलावा ऊसर , बंजर जैसी जमीनों को कृषि भूमि में बदलने के सुधार प्रोग्राम भी चलाए गये | इस सबके परिणाम स्वरूप कृषि भूमि के रकबे और उसके मालिको की कुल संख्या में तथा उत्पादकता में भी वृद्धि होती रही |लेकिन अब खासकर पिछले 15 सालो से इसकी उलटी प्रक्रिया चल रही है |कृषि भूमि का यहा तक कि दो - तीन फसल उत्पादन करने वाली जमीन का भी अधिग्रहण तेज़ी से बढ़ता जा रहा है | देश - प्रदेश में विकास के नाम पर हजारो एकड़ कृषि भूमि से किसानो व ग्रामवासियों को उजाड़ा जा रहा है | कृषि की जमीनों को धनाढ्य कम्पनियों , बिल्डरों डेवलपरो को सौपा जा रहा है | इस अन्याय के विरुद्ध आंदोलित ग्रामवासियों एवं किसानो के भूमि अधिग्रहण विरोध को महज ज्यादा मुआवजे या बेहतर सौदे के लिए किया गया आन्दोलन कहकर प्रचारित किया जा रहा है | उपरोक्त प्रचारों के साथ ग्रामीण व शहरी जनसाधारण के , मजदूरों , किसानो के एवं छोटे - मोटे कारोबारियों के रोजी -रोजगार के स्थायी अवसरों , संसाधनों का प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष अधिग्रहण किया जा रहा है | देश के संसाधनों पर जनसाधारण के थोड़े - मोड़े और सीमित अधिकारों को भी खुलेआम काटा -घटाया जा रहा है |
85 - 90 के बाद देश दुनिया के धनाढ्य व उच्च हिस्सों को खुलेआम बढावा देकर जनसाधारण की आबादी के बड़े हिस्से को देश के बिक्री बाज़ार का प्रभावी हिस्सा तक माना बंद किया जा रहा है | उनकी बचत को घटाकर और घाटो को बढाकर क्रय शक्ति को निरंतर घटाया जा रहा है | जबकि 1950 के बाद से जमीदारी उन्मूलन तथा भूमि सुधार के जरिये उत्पादन बढाने तथा लघु एवं कुटीर उद्योगों के आरक्षित अधिकारों आदि के जरिये आम किसानो एवं छोटे कारोबारियों की बचत को , क्रय शक्ति को बढाने का काम किया जाता रहा है |उन्हें बिक्री बाज़ार से जोड़ने और उसका अहम हिस्सा बनाने का भी काम किया जाता रहा है |आखिर कहा हैं वे लोग वे पार्टिया , दल व संगठन जो जमीनों को काश्तकारों , भूमिहीनों में बाटने के लिए अपनी रणनितिया , कार्यनीतिया तय किया करते थे | उसके लिए देश के पैमाने पर आन्दोलन की घोषणाये व प्रतिबद्धताये सुनाया करते थे | कंहा है वे लोग , जो सामन्तवाद के पूर्ण सफाए और किसानो के जनवाद के लिए कृषि - क्रान्ति का नारा लगाकर आन्दोलन व संघर्ष की रूपरेखाये तय किया करते थे ?क्या आज केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारों के द्वारा , देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों द्वारा , कृषि जमीन के अधिग्रहण और उस पर निरंतर बढाये जा रहे मालिकाने के विरुद्ध उन्हें आगे नही आना चाहिए ?क्या कृषि भूमि अधिग्रहण ग्रामवासियों व किसानो को भरपूर समर्थन व सहयोग देना , उनका सामाजिक , राजनैतिक कार्यभार नही हैं ?एकदम है !परन्तु ऐसा हो नही पा रहा है |क्योंकि अब कृषि भूमि का मालिकाना हडपने वाला गाव जमीदार या भूस्वामी नही है |बल्कि वह देश दुनिया की धनाढ्य एवं ताकतवर कम्पनिया है |विशाल पूंजी व तकनीक के मालिक देशी व विदेशी पूंजी वान वर्ग हैं |इन्ही के साथ जमीन के इस्तेमाल से अधिकाधिक मुनाफ़ा कमाने वाले करोडपति , अरबपति , बिल्डरों , डेवलपरो आदि का उच्च हिस्सा खड़ा है |फिर उन्हें हर तरह से छूटे , अधिकार व संरक्षण देने के लिए केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे और राज्य की पूरी मशीनरी भी इनके साथ खड़ी है |शायद इसलिए जमीदारो व बड़े भू- स्वामियों से जमीने छीनकर भूमिहीनों व अत्यंत छोटे किसानो को जमीनों का मालिकाना दिए जाने के समर्थक भी आज चुप हैं |निष्क्रिय है या केवल स्थानीय स्तर पर ही थोड़ा बहुत सक्रिय है |क्या वर्तमान दौर के भूमि अधिग्रहण के विरोधो में ग्रामीणों व किसानो के स्वत: स्फूर्त आंदोलनों , संघर्षो में सक्रिय भागीदारी निभाने तथा उसे देश प्रदेश स्तर पर संगठित करने और आगे बढाने के काम को वामपंथी संगठनों द्वारा भी वांक्षित महत्व नही मिल पा रहा है | जबकि राष्ट्रवादियो और सबसे बढ़ कर वामपंथियों का यह दायित्व था और आज भी है कि वे भूमि अधिग्रहण के विरोध में एक जुट होकर ग्रामीणों व किसानो के साथ खड़े हो |उसे जगह - जगह हो रहे विरोधो व आंदोलनों को एकताबद्ध करते हुए भूमि अधिग्रहण के विरोध के साथ - साथ उसे कम से कम उन विदेशी आर्थिक नीतियों और डंकल - प्रस्ताव के विरोध तक ले जाए || क्योंकि इन्ही नीतियों प्रस्तावों के अंतर्गत देश व दुनिया की धनाढ्य कम्पनियों और उनके सहयोगियों , सेवको के छुटो- अधिकारों में तथा मालिकाने में वृद्धिया की जा रही है | इसी के तहत उन्हें कृषि भूमि का भी मालिका ना अधिकार दिया जा रहा है |यह राष्ट्रवादियो एवं वामपंथियों का कर्तव्य है कि वे कृषि भूमि अधिग्रहण को देश के आधुनिक विकास की जगह खेती किसानी के तथा ग्रामीणों एवं किसानो के विनाश का और फिर खाद्यान्न सुरक्षा के विनाश का नाम दे | भूमि अधिग्रहण के विरोध को वे नीतियों के विरोध में तथा देश - दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के व्यापक विरोध में बदल दें |यह राष्ट्रवाद एवं जनवाद की माँग है |इस मुद्दे पर लोगो की चुप्पी या तटस्थता का या फिर मात्र आलोचना आदि का रुख - रवैया अपना राष्ट्र व समाज के साथ , राष्ट्रवादी एवं जनवादी उद्देश्यों के साथ धोखाधड़ी ही साबित होगा | आने वाला कल उन्हें कभी माफ़ नही करेगा |


सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

बुधवार, 14 सितंबर 2011

भूमि अधिग्रहण का नया मसौदा -अधिग्रहण को बढाने का , न की रोकने का

(आम किसानो व अन्य ग्रामवासियों को इन मसौदो व नये भूमि विधेयक के झांसे में आने की जगह भूमि अधिग्रहण का निरन्तर विरोध जारी रखना चाहिए | उसे अपने विरोध को वैश्वीकरणवादी नीतियों तथा डंकल प्रस्ताव के विरोध के रूप में और ज्यादा व्यापक कर देना चाहिए |)
कृषि भूमि अधिग्रहण को लेकर बढ़ते विवाद एवं संघर्ष के फलस्वरूप केंद्र सरकार ने 29 जुलाई को भूमि अधिग्रहण के नये विधेयक का मसौदा सार्वजनिक कर दिया है |इसमें भूमि अधिग्रहण के साथ - साथ पुनर्वास एवं पुनरस्थापना का भी मसौदा पेश किया गया है| हिन्दी दैनिक "बिजनेस स्टैंडर्ड " (30 जुलाई )और हिन्दी दैनिक " हिन्दुस्तान (30 जुलाई ) के अंक में छपे भूमि - अधिग्रहण के इस मसौदे में बताया गया है कि (1 )80% किसानो के राज़ी होने पर ही भूमि का अधिग्रहण किया जाएगा ( 2 ) 5 वर्ष तक इस्तेमाल नही होने पर भूमि वापस किसानो को दे दी जायेगी ( 3 ) किसान द्वारा अधिग्रहित जमीन के विवाद में किसी भी स्तर पर किसान हस्तक्षेप की माँग कर सकते है ( 4) सार्वजनिक निजी भागीदारी के तहत किसानो के लिए पुनर्वास एवं पुनर्स्थापना की व्यवस्था भी अवश्य करना होगा :(5) विधेयक के नये मसौदे के अनुसार सरकार अब निजी कम्पनियों के लिए या निजी उद्देश्यों के लिए जमीन का अधिग्रहण नही कर सकती :(6 ) कई फसले उगाने वाली जमीन का अधिग्रहण सार्वजनिक उद्देश्य के लिए भी नही किया जाएगा : ( 7 ) इस मसौदे के अनुसार सरकार को बाँध निर्माण जैसे सार्वजनिक कामो के लिए 80% किसानो की रजामंदी अनिवार्य नही रहेगी ( 8 ) निजी कम्पनियों के निजी इस्तेमाल के लिए अब सरकार भूमि अधिग्रहण नही करेगी | यदि कम्पनिया 100 एकड़ या इससे अधिक भूमि का अधिग्रहण करती है तो उन्हें पुनर्वास पैकेज अपनी तरफ से देना होगा | पुनर्वास व पुनर्स्थापना के लिए मसौदे में यह कहा गया है की (1) जमीन की कीमत शहरी इलाके में बाज़ार रेट से दो गुनी और ग्रामीण इलाके में बाज़ार रेट से 6 गुनी ज्यादा भुगतान की जायेगी ( 2 ) प्रत्येक परिवार को 20 साल तक 3000 रूपये महीने के हिसाब से भुगतान किया जाएगा (3) अधिग्रहण में मकान खोने वालो को नये मकान देने होंगे (4) विकसित जमीन को 20 % हिस्सा अधिग्रहण के भुक्तभोगी किसानो को दिया जाएगा (5) प्रत्येक परिवार को मिलेगा दो लाख रूपये मुआवजा या किसी एक सदस्य को नौकरी | नये भूमि अधिग्रहण मसौदे में आपातकालीन भूमि अधिग्रहण पर रोक लगा दी गयी है | विशेष परिस्थिति में सेना सुरक्षा या फिर प्राकृतिक आपदाओं के लिए ही जमीन का आपातकालीन अधिग्रहण किया जाएगा | अभी यह मसौदा है |इसलिए इस पर चर्चा तभी ज्यादा व सार्थक रहेगी , जब यह सुधारों , संशोधनों के बाद संसद से पास होकर विधेयक के रूप में हमारे सामने आ जाए |फिलहाल इन तमाम मसौदो से यह बात साफ़ झलक रही है कि सरकार शहरीकरण , औधोगिकरण एवं बुनियादी ढाचे के विकास के नाम पर जमीन के अधिग्रहण को रोकने का नही , बल्कि उसे बढावा देने का काम करने जा रही है | सरकार के इस मसौदे की मंशा एकदम साफ़ है कि अधिग्रहण तो हो पर विवाद कम से कम हो | किसानो को बेहतर मुआवजे तथा पुनर्वास व पुनर्स्थापना के सुझावों , लालचो से सहमत कराया जाए | यह सरकार द्वारा किसानो व ग्रामीणों के हितो की रक्षा की चिंता से उपजा मसौदा नही है , बल्कि भूमि अधिग्रहण को लेकर पूरे देश में और इस समय उत्तर प्रदेश में किसानो व अन्य ग्रामवासियों के बढ़ते संघर्ष के फलस्वरूप बना मसौदा है | फिर इस मसौदे के पीछे अगले वर्ष उत्तर प्रदेश में होने वाले विधान सभा चुनाव का थोड़ा दबाव जरुर है | अब तक लागू होते रहे भूमि अधिग्रहण कानून और अब उसके नये मसौदे से भी ये बात साफ़ है कि चाहे वर्तमान कांग्रेस की सरकार हो या फिर भाजपा या किसी अन्य पार्टी या मोर्चे की सरकार हो , चाहे वह केंद्र की सरकार हो या फिर प्रांत की सरकार हो , वह कृषि भूमि अधिग्रहण पर अंकुश लगाने वाली नही है | बल्कि उसे वह मुआवजे और पुनर्वास के लालचो के साथ पुलसिया दमनात्मक कारवाइयो के साथ ही आगे बढाने वाली है , जैसा की आज तक होता आ रहा है ,
क्योंकि धनाढ्य कम्पनियों , बिल्डरों , डेवलपरो को निजी वादी मालिकाना बढाने की उदारवादी एवं निजी छूटे देने के बाद उन्हें देश के हर संसाधन का अधिकाधिक मालिकाना अधिकार चाहिए ही | पिछले 20 सालो से लागू हो रही इन्ही नीतियों के तहत पैसे - पूंजी के धनाढ्य मालिको को यह अधिकार नीतिगत रूप से बढाया जा रहा है | इसके फलस्वरूप ये हिस्से एक के बाद दूसरे क्षेत्र में अपना मालिकाना अधिकार बढाते जा रहे है | स्वभावतया कृषि भूमि पर उनका मालिकाना अधिकार बढाने में भी सरकारे उनका साथ नही छोड़ सकती | अत : चाहे कैसा भी किसान हिमायती दिखने वाला मसौदा क्यों ना आ जाए , पर उसके जरिये व किसानो से जमीन का मालिकाना छुड़ाने , छिनने से बाज़ भी नही आ सकती |
जंहा तक मसौदे में निजी कम्पनियों के हितो के लिए सरकार द्वारा अधिग्रहण न करने का मामला है , तो उसके निजी हितो , स्वार्थो को कहना बताना जितना आसान है , उतना ही आसान उसके जरिये सार्वजनिक हितो को दिखलाना भी है | क्योंकि उद्पादन विनिमय जैसी आर्थिक क्रियाये चाहे सार्वजनिक क्षेत्र की हो या निजी क्षेत्र की , वह सामाजिक आर्थिक क्रियायो को ही परिलक्षित करती है |यह बात दूसरी है की निजी क्षेत्र से प्रत्यक्ष: और सार्वजनिक क्षेत्र से भी अप्रत्यक्ष: परन्तु सबसे ज्यादा लाभ उठाने वाली निजी कम्पनिया ही होती है |अत: निजी कम्पनियों द्वारा लाभ के लिए किए जा रहे अधिग्रहण को भी अंतत: निजी मालिकाने में सार्वजनिक हित के लिए किया जाने वाला अधिग्रहण साबित कर दिया जाना है | फिर इस संदर्भ में अगली व महत्वपूर्ण बात यह है कि पिछले 20 सालो के पूरे दौर में सरकार सार्वजनिक क्षेत्रो के अपने मालिकाने को बड़े धनाढ्य मालिको को मुकम्मल सौपती जा रही है | अत:कृषि भूमि का सरकार द्वारा सार्वजनिक हित के नाम पर किया जा रहा अधिग्रहण भी क्या कल धनाढ्य कम्पनियों के निजी मालिकाने में नही किया जाएगा ? एकदम किया जाएगा | क्योंकि निजीकरण वादी नीति का मतलब ही है की सार्वजनिक क्षेत्र का मालिकाना निजी हाथो में सौप दिया जाना चाहिए ताकि वे अपने दक्ष एवं कुशल प्रबन्धन से उसे अधिकाधिक लाभकारी ( जाहिर सी बात है अपने लिए ) बना दे |इसलिए इस दौर में सार्वजनिक हित के नाम पर शहरीकरण औधोगिकरण और बुनियादी ढाचे के विकास में उपर से थोड़ा बहुत सार्वजनिक हित भले ही दिखाई पड़ जाए परन्तु उसके भीतर धनाढ्य कम्पनियों का हित व मालिकाना अधिकार ही छुपा हुआ है |अत: आम किसानो व अन्य ग्रामवासियों को इस मसौदो व नये भूमि विधेयक के झासे में आने की जगह भूमि अधिग्रहण का निरंतर विरोध जारी रखना चाहिए | उसे अपने विरोध को वैश्वीकरण वादी नीतियों तथा डंकल प्रस्ताव के विरोध के रूप में और ज्यादा गहरा व व्यापक कर देना चाहिए | जागो साथियो जब हमारी जमीने ही हमारे पास नही होंगी तो हम क्या करेंगे सोचो ?
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

सोमवार, 13 जून 2011

भूमि - अधिग्रहण कानून के संशोधन में आखिर अडचन कंहा हैं ?

अधिग्रहीत जमीनों का मालिकाना ले रही कम्पनियों के मुँह से ही उनकी अडचन सुन लीजिए

कृषि भूमि अधिग्रहण को लेकर उठते विवादों ,संघर्षो का एक प्रमुख कारण ,मौजूदा भूमि अधिग्रहण कानून में बताया जाता रहा है |इस कानून को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा 1894 में बनाया व लागू किया गया था| भूमि अधिग्रहण के झगड़ो -विवादों को हल करने के लिए इसी कानून को सुधार कर नया कानून बनाने की बात की जा रही है| इस सन्दर्भ में पहली बात तो यह है कि 1894 के कानून में सुधार का कई वर्षो से शोर मच रहा है ,इसके बावजूद सुधार नही हो पा रहा है तो क्यों ? आखिर अडचन कंहा हैं ? 2007 से ही इस कानून को सुधारने ,बदलने का मसौदा बनता रहा है| उसके बारे में चर्चाये भी होती रही है|
उदाहरण स्वरूप .............................

इस सुधार की यह चर्चा आती रही हैं कि, सेज ,टाउनशिप आदि के लिए आवश्यक जमीनों के 70 % से लेकर 90 % तक के हिस्सों को कम्पनियों को किसानो से सीधे खरीद लेना चाहिए| उसमे सरकार भूमिका नही निभायेगी| बाकी 30 % या 10 % को सरकार अधिग्रहण के जरिये उन्हें मुहैया करा देगी| हालांकि अरबपति-खरबपति कम्पनियों को ,किसानो की जमीन खरीदकर उसका मालिकाना अधिकार लेना या पाना कंही से उचित नही हैं| क्योंकि कृषि भूमि का मामला किसानो व अन्य ग्रामवासियों की जीविका से जीवन से जुड़ा मामला है राष्ट्र की खाद्यान्न सुरक्षा से जुदा मामला हैं |इस सन्दर्भ में यह दिलचस्प बात भी ध्यान में रखनी चाहिए कि सरकारों ने हरिजनों कि जमीन को बड़ी व मध्यम जातियों द्वारा खरीदने पर रोक लगाई हुई हैं| वह भी इस लिए कि बड़ी जातिया उन्हें खरीद कर हरिजनों को पुन: साधनहीन बना देंगी| जो बात हरिजनों के अधिकार क़ी सुरक्षा के रूप में सरकार स्वयं कहती हैं ,उसे वह सभी किसानो क़ी जीविका क़ी सुरक्षा के रूप में कैसे नकार सकती है ? उसे खरीदने क़ी छूट विशालकाय कम्पनियों को कैसे दे सकती हैं ? दूसरी बात जब सरकार ने ऐसे सुधार का मन बना लिया था तो ,उसमे अडचन कंहा से आ गयी ? क्या उसमे किसानो ने या राजनितिक पार्टियों ने अडचन डाल दी ? नही| उसमे प्रमुख अडचन अधिग्रहण के लिए लालायित कम्पनियों ने डाली है |इसकी पुष्टि आप उन्ही के ब्यान से कर लीजिये |18 मई के दैनिक जागरण में देश के सबसे बड़े उद्योगों के संगठन सी0 आई0 आई0 ने कहा कि" कारपोरेट जगत अपने बूते भूमि अधिग्रहण नही कर सकता | यह उन पर अतिरिक्त दबाव डाल देगा |... कम्पनियों द्वारा 90 % अधिग्रहण न हो पाने पर पूरी योजना पर सवालिया निशान लग जाएगा |इससे न सिर्फ औधोगिक कारण ही बल्कि आर्थिक विकास दरप्रभावित होगा | सुन लीजिये ! ए वही कारपोरेट घराने है ,जो सार्वजनिक कार्यो के प्रति ,खेती -किसानी के प्रति ,सरकारी शिक्षा ,सिचाई के इंतजाम के प्रति ,सरकारी चिकित्सा आदि के प्रति सरकार कि भूमिकाओं को काटने ,घटाने कि हिदायत देते रहे है और सरकार उन्हें मानती भी रही है |जनसाधारण के हितो के लिए आवश्यक कामो से अपना हाथ भी खिचती रही है |लेकिन अब वही कारपोरेट घराने स्वयं आगे बढ़ कर जमीन का सौदा करने को भी तौयार नही है |वे चाहते है कि सरकार अपने शासकीय व कानूनी अधिकार से किसानो को दबाकर जमीन अधिग्रहण कर दे ताकि वह उसे कम से कम रेट पर प्राप्त कर उसका स्वछ्न्दता पूर्वक उपयोग , उपभोग करे |सरकारे और राजनितिक पार्टिया ,राष्ट्र के आर्थिक विकास के नाम पर कारपोरेट घराने के इस व एनी सुझाव को आडा- तिरछा करके मान भी लेंगे |कानून में सुधार भी हो जाएगा और कम्पनी हित में अधिग्रहण चलता भी रहेगा |
कयोंकि यह मामला कानून का है ही नही |बल्कि उन नीतियों सुधारों का है ,जिसके अंतर्गत पुराने भूमि अधिग्रहण के कानून को हटाकर या संशोधित कर नया कानून लागू किया जाना है |सभी जानते है की पिछले २० सालो से लागू की जा रही उदारीकरण विश्विक्र्ण तथा निजीकरण नीतियों सुधारों के तहत देश दुनिया की धनाड्य औधिगिक वणिज्य एवं वित्तीय कम्पनियों को खुली छुट दी जा रही है |
इन नीतियों ,सुधारों के अंतर्गत देश की केन्द्रीय व प्रांतीय सरकारे देश -प्रदेश के संसाधनों को , सावर्जनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों को इन विशालकाय कम्पनियों को सौपती जा रही है |कृषि भूमि का भी अधिकाधिक अधिग्रहण कर वे उसे कम्पनियों को सेज टाउनशिप आदि के निर्माण के नाम पर सौपती आ रही हैं | उन्ही के हिदायतों सुझाव के अनुसार 6 से 8 लेन की सडको के निर्माण के लिए भी सरकारे भूमि का अधिग्रहण बढाती जा रही है | यह सब राष्ट्र के आधुनिक एवं तीव्र विकास के नाम पर किया जा रहा है | सरकारों द्वारा भूमि अधिग्रहण पहले भी किया जाता रहा है |पर वह अंधाधुंध अधिग्रहण से भिन्न था | वह मुख्यत: सावर्जनिक उद्देश्यों कार्यो के लिए किया जाने वाला अधिग्रहण था |जबकि वर्मान दौर का अधिग्रहण धनाड्य कम्पनियों , डेवलपरो , बिल्डरों आदि के निजी लाभ की आवश्यकताओ के अनुसार किया जा रहा है |उसके लिए गावो को ग्रामवासियों को उजाड़ा जा रहा है |कृषि उत्पादन के क्षेत्र को तेज़ी से घटाया जा रहा है |थोड़े से धनाड्य हिस्से के निजी स्वार्थ के लिए व्यापक ग्रामवासियों की , किसानो का तथा अधिकाधिक खाद्यान्न उत्पादन की सार्वजनिक हित की उपेक्षा की जा रही है |उसे काटा घटाया जा रहा है| कोई समझ सकता है की , निजी वादी , वैश्वीकरण नीतियों सुधारो को लागू करते हुए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया रुकने या कम होने वाली नही है |इसलिए कानूनों में सुधारों बदलाव का हो हल्ला मचाकर किसानो ग्रामवासियों और अन्य जनसाधरण लोगो को फंसाया व भरमाया जा सकता है , पर उनकी भूमि का अधिग्रहण रुकने वाला नही है| अत: अब निजी हितो स्वार्थो में किये जा रहे कृषि भूमि अधिग्रहण के विरोध के साथ -साथ देश में लागू होते रहे , वैश्वीकरण नीतियों ,सुधारों के विरोध में किसानो एवं अन्य ग्राम वासियों को ही खड़ा हो ना होगा| इसके लिए उनको संगठित रूप में आना होगा |

सुनील दत्ता
09415370672

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध आंदोलनों को संगठित किया जाना जरूरी है


वर्तमान दौर का भूमि अधिग्रहण मुख्यत: निजी क्षेत्र कि व्यापारिक एवं वाणिज्यिक कम्पनियों के लिए किया व बढ़ाया जा रहा है | किसान को जमीन से ,ग्रामीणों को गावं से उजाड़ा व् विस्थापित किया जा रहा है |कम्पनियों को मालिकाने के साथ स्थापित किया जा रहा है |कम्पनियों के स्वार्थ पूर्ति के लिए कृषि भूमि को हडपने की यह नीति डलहौजी की ह्ड्पो नीति से भी ज्यादा गम्भीर खतरनाक एवं व्यापक है।
कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल के सिंगुर और नंदी ग्राम के किसानो की भूमि का अधिग्रहण ,देशव्यापी चर्चा का विषय बना हुआ था |पश्चिम बंगाल की सरकार सिंगूर में टाटा मोटर्स के लिए तथा नंदी ग्राम में एक इंडोनेशिया कम्पनी के लिए कृषि भूमि अधिग्रहण कर रही थी | उसे बंगाल के आधुनिक औद्योगिक विकास के लिए आवश्यक बता रही थी |उस अधिग्रहण का व्यापक विरोध हुआ |इसी फलस्वरूप टाटा साहब को अपनी लखटकिया कार का कारखाना गुजरात ले जाना पड़ा |
औद्योगिक एवं व्यापारिक कम्पनियों के हितो में कृषि भूमि का वर्तमान दौर में अधिग्रहण देश के हर प्रान्त में हर क्षेत्र में किया जा रहा है |देश की केन्द्रीय व् प्रांतीय सरकारे पिछले १०-१५ सालो से अधिग्रहण की प्रक्रिया को तेजी के साथ आगे बढाती जा रही है |सत्ता -सरकार में आती जाती रहने वाली सभी राजनीतिक पार्टिया यह काम करती रही है |यह बात दूसरी है की सत्ता से बाहर होने के बाद वे भूमि अधिग्रहण का विरोध कर रहे किसानो का साथ देती दिखाई पड़ जाती है |लेकिन असलियत यह है कि वे भूमि अधिग्रहण का विरोध नही करती बल्कि अधिग्रहण के लिए ज्यादा मुआवजा न देने के लिए सत्तासीन पार्टी के विरोध की राजनीति करती है |फिर सत्ता -सरकार में आने पर अधिग्रहण की उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में लग जाती है |
वतमान दौर में भूमि अधिग्रहण को देश के आधुनिक एवं औद्योगिक विकास के लिए तथा सशक्त रास्ट्र के निर्माण के लिए आवश्यक बताया जा रहा है |देश में बुनियादी ढाचे के विकास के नाम पर ,४ ,६ , ८ लेन की सडको के लिए भूमि अधिग्रहण किया जा रहा है |फिर इस सडको के किनारे व्यापारिक प्रतिष्ठानों .आधुनिक आवासों तथा मनोरंजन स्थलों आदि से सुसज्जित टाउनशिप के निर्माण के लिए भी कृषि भूमि का अधिग्रहण किया जा रहा है |इसके अलवा विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (सेज ) के लिए कृषि भूमि का अधिग्रहण तो १० - १५ साल पहले से ही किया जा रहा है |बताने की जरूरत नही कि,टाउनशिप और विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र के लिए किया जाने वाला अधिग्रहण घोषित और एकदम नग्न रूप में कम्पनियों के हित में किया जा रहा अधिग्रहण है |
इसके अलावा अधिग्रहीत भूमि पर बन रही एक्सप्रेस वे नाम की सडको के निर्माण का ठेका भी बड़ी कम्पनियों के पास ही है |
फिर उन सडको का प्रमुखता से इस्तेमाल भी भारी एवं तेज गति के वाहनों के मालिक व् सेवक ही कर रहे है |फुटपाथियो ,स्किल स्वरों आदि के लिए उसका इस्तेमाल कर पाने की गुंजाइश ही बहुत कम है साफ़ बात है कि सडक निर्माण से लेकर उसके इस्तेमाल तक का सबसे बड़ा लाभ कम्पनियों को ही मिलना है और मिल भी रहा है |
देश के आधुनिक विकास के लिए जमीनों का अधिग्रहण पहले भी किया जाता रहा है |लेकिन २०-२५ साल पहले के भूमि अधिग्रहण में न तो आज जैसी तेजी थी और न ही उसे इतने व्यापक स्तर पर चलाया और बढाया ही जा रहा था फिर उस दौर में गैर कृषिक कार्यो के लिए कृषि भूमि का अधि ग्रहण कम से कम किये जाने की नीति भी आमतौर पर अपनाई व लागू की जा रही थी |इसके अलावा उस दौर के भूमि अधिग्रहण और वर्तमान दौर के भूमि अधिग्रहण में एक और भी प्रमुख अन्तरहै |वह यह कि सरकारों द्वारा पहले का भूमि अधिग्रहण मुख्यत: सार्वजनिक कार्यो के लिए ,प्रत्यक्ष रूप में नजर आने वाले जनहित व जनसेवा के कार्यो के लिए किया जा रहा था |परन्तु १९८५ -९० के बाद यह अधिग्रहण मुख्यत:निजी क्षेत्र के औद्योगिक ,व्यापारिक ,कम्पनियों के लिए किया जा रहा है उन्ही के दिशा -निदेश के अनुसार बुनियादी ढाचे का कई लेन कई सडको आदि का विकास विस्तार किया जा रहा है |यह बात दूसरी है कई देशी व विदेशी कम्पनियों के निजी हितो ,स्वार्थो को भी अब सत्ता -सरकार से लेकर प्रचार माध्यमो तक में रास्ट्रीय -हित सावर्जनिक -हित कहा जाने लगा है |इसी तरह से किसानो द्वारा अधिग्रहण का विरोध भी बताया व् प्रचारित किया जा रहा है |जमीने बचाने के लिए किये जा रहे उनके न्याय संगत विरोध व् आन्दोलन को मुख्यत: ज्यादा मुआवजे के लिए किया जा रहा प्रचारित कर उसे कमजोर करने और तोड़ने का प्रयास भी किया जा रहा है
इन्ही प्रचारों के साथ वर्तमान दौर के भूमि अधिग्रहण को बढ़ाया जा रहा है |किसानो को जमीनों ,ग्रामवासियों को गाँवो से उजाड़ा व् विस्थापित किया जा रहा है |देशी -विदेशी औद्योगिक ,व्यापारिक एवं वाणिज्यिक कम्पनियों को जमीन का मालिकाना देने के साथ स्थापित किया जा रहा है |उनके सेवको को आधुनिक साधनों -सुविधाओ के साथ आवासित किया जा रहा है |उसके लिए सरकारे उन्हें हर तरह की छूटे -सुविधाए दी जा रही है |
कम्पनी हित में कृषि भूमि के बढ़ते अधिग्रहण का दूसरा व अहम पहलू यह भी है की बढ़ते अधिग्रहण के साथ अराजक रूप से बढ़ते शहरीकरण के साथ कृषि भूमि के रकबे में हो रही कमी को उपेक्षित किया जा रहा है |सरकारों द्वारा खाद्यान्नों के उत्पादन वृद्धि दर में आ रही कमी की स्वीकारोक्ति तथा खाद्यान्नों की बढती महंगाई के बावजूद यह उपेक्षा की व बढाई जा रही है |
औद्योगिक एवं व्यापारिक कम्पनियों के बढ़ते लाभों के चलते खेती के बढ़ते रहे संकटो के साथ अब उद्योग व्यापर के बड़े मालिको के स्वार्थपूर्ति के लिए कृषि भूमि को हडपने की नीति अपनाई व लागु की जा रही है |वर्तमान दौर की यह' भूमि हड्पो नीति 'डलहौजी नीति से कंही ज्यादा खतरनाक एवं व्यापक है |यह केवल किसानो का ग्रामवासियों का विस्थापन ही नही बल्कि राष्ट्र की आम जनता को खाद्यान्नों के अभाव में महगाई में और ज्यादा फंसाना भी हैं ,उन्हें भुखमरी झेलने के लिए मजबूर करना भी है|
लिहाज़ा कम्पनी कम्पनी हित में चलाये बढाये जा रहे कृषि भूमि के अधिग्रहण का विरोध किये जाने की आवश्यकता है |
देश -प्रदेश में जगह -जगह किसानो के अधिग्रहण के विरोध व आन्दोलन को समर्थन देने की आवश्यकता है |सभी क्षेत्र के ग्रामीणों व किसानो द्वारा कम्पनियों के हित में किए जा रहे अधिग्रहण के विरोध के लिए आगे आने की आवश्यकता है देश के खाद्यान्न उत्पादन के रकबे के अधिग्रहण के विरोध के लिए खाद्यान्नों की महगाई झेल रहे कृषक हिस्सों को भी आगे आने की आवश्यकता है |
उन वैश्वीकरण नीतियों ,सम्बन्धो के विरोध की आवश्यकता है ,जिसके अंतर्गत किसानो व कृषि क्षेत्र के संकटो को तेजी से बढ़ते जाने के साथ अब कृषि भूमि के हडप लेने की प्रक्रिया को भी बढ़ाया जा रहा है |
भूमि अधिग्रहण के लिए इस तर्क का सहारा लेना कत्तई गलत है कि सरकार ही जमीन की वास्तविक मालिक है |इसलिए वह इसका अधिग्रहण जब चाहे कर सकती है |
यह कहना सरकारों द्वारा व्यापक किसानो ,ग्रामीणों ,की उपेक्षा को गावं व जमीन से अन्यायपूर्ण बेदखली को न्याय संगत ठहराना है |अधिग्रहीत भूमि का कम्पनियों को किया जा रहा अन्यायपूर्ण हस्तांतरण को उचित ठहराना है |
सही बात तो यह है कि भूमि अधिग्रहण का मौजूदा दौर और उस पर गढ़े जाने वाले उपरोक्त तर्क भी इसबात की पुष्टि करते है ,देश की सत्ता सरकारे भले ही अपने आप को जनतान्त्रिक सरकारे कहती है ,लेकिन उनका असली काम कम्पनी राज व सरकारे करती है , लेकिन उनका असली काम क्म्पब्नी राज व सरकार का ही है इसका सबूत उन तमाम कानूनों में ,भूमि अधिग्रहण कानून (१८९४ )में भी देखा जा सकता है ,जिसे ब्रिटिश सत्ता के काल में बने कानूनों का वर्तमान राज व सरकार द्वारा संचालन ,उसके स्वतंत्र राज व जनतान्त्रिक राज होने का नही ,अपितु कम्पनी राज होने का सबूत है |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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