गुरुवार, 15 मार्च 2012

इज्जतदार जिंदगी की चाहत-1




विस्थापन पर इस चर्चा के मार्फत हम आप लोगों का ध्यान एक ऐसे नजरिए की ओर खींचना चाहते हैं जो अभी बहुत चर्चा में तो नहीं है लेकिन जिसमें जनहित के बदलाव की अपार संभावनाएँ छिपी हैं। यह लोकविद्या का नजरिया है। यानी उन लोगों का अपने ज्ञान पर आधारित नजरिया जो कालेज और विश्वविद्यालय नहीं गए।
ध्यान देने की बात है कि ये वही लोग हैं जो बड़े पैमाने पर अपने काम से, अपने रहने की जगहों से बेदखल किए जा रहे हैं। ये किसान हंै, कारीगर हैं, आदिवासी हैं और पटरी के दुकानदार हैं। कोई भी विस्थापन की खबर उठाकर देख लीजिए इन्हीं में से किसी न किसी समुदाय के लोग विस्थापित नजर आएँगे। किसानों की जमीनों का अधिग्रहण, आदिवासियों का अपने गाँवों-जमीनों-जंगलों से खदेड़ा जाना, पटरी के दुकानों पर बुल्डोजर चलाना, स्थानीय उद्योग-सेवा-मनोरंजन के आधुनिकीकरण से कारीगरों का काम छीना जाना, शहरों की गरीब बस्तियों का उजाड़ा जाना यही आज की सबसे बड़ी असलियत है। इनके परिवारों की महिलाएँ शायद इन हमलों से होने वाले उजाड़ की सबसे बड़ी भुक्तभोगी हैं। ये वही लोग हैं, जो कभी कालेज या विश्वविद्यालय नहीं गए और जो अपनी जिंदगी और कारोबार अपने ज्ञान के बल पर चलाते हैं। इन्हीं के ज्ञान को लोकविद्या कहते हैं और इसी लोकविद्या के नजरिए में इन सबके बीच वह एकता बनाने की हैसियत हो सकती है जो एक ऐसे बदलाव का आगाज करे जिसमें ये लोग भी एक बराबर की इज्जतदार जिंदगी के हकदार होंगे।
दुनिया कैसी होनी चाहिए, विकास का अर्थ क्या है, रोजगार के मौके कैसे तैयार होते हैं, इन सबके ऊपर सार्वजनिक दुनिया में जो बहस चलती है उस पर विश्वविद्यालयों में जो पढ़ाया-लिखाया जाता है, वही काबिज होता है। अखबारों में जो लिखा जाता है, किताबों के मार्फत जो समझाया जाता है, टेलीविजन और रेडियो से जो प्रचार किया जाता है, बुद्धिजीवी जो माहौल बनाते हैं, अर्थशास्त्री जो तर्क देतेे हैं और अब राजनैतिक पार्टियों के नेता जो कहते हैं, सभी कुछ उस ज्ञान, समझ और जानकारी पर आधारित होता है जो उन्हें विश्वविद्यालय में मिलती है। जाहिर है इस पूरी बहस में इस देश के 80 फीसदी लोग, जो किसान, कारीगर, आदिवासी और छोटा-मोटा धंधा करने वाले परिवारों से आते हैं, कहीं भी शामिल नहीं हैं। जो बहस में ही शामिल नहीं है, जिसे अपनी बात कहने का ही कोई मौका नहीं है, उसके भले की कोई बात होगी इसकी कोई उम्मीद भी नहीं हो सकती। ये लोग विश्वविद्यालय नहीं गए हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि इनके पास कोई ज्ञान नहीं है और ये समाज, दुनिया, प्रकृति के बारे में कुछ समझते-जानते नहीं हैं। अगर ये अज्ञानी हैं तो इनकी जिंदगी कौन चलाता है? खेती, कारीगरी, जंगलों की जानकारी, छोटी पूँजी से धंधों का प्रबंधन, बच्चों का लालन-पालन और घर की व्यवस्थाएँ, इन सब के सबसे बड़े जानकार यही लोग हैं। इन सब लोगों को अज्ञानी अथवा नासमझ करार देना पूँजीवाद का सबसे बड़ा षड्यंत्र है। विस्थापन की सच्चाई विश्वविद्यालय में बैठकर नहीं दिखाई देती, न संसद, न टेलीविजन के केंद्र और न औद्योगिक इमारतों से ही दिखाई देती है। विस्थापन के खिलाफ संघर्षों में शामिल साथी भी इनके प्रभाव के चलते गुमराह होते रहते हैं। भूमि अधिग्रहण के जवाब में कृषि भूमि अधिगृहीत न की जाए या 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून में बुनियादी संशोधन किए जाएँ, ऐसे सुझाव कुछ तात्कालिक महत्व तो रख सकते हैं, लेकिन किसानों की दुनिया में कोई बुनियादी बदलाव आए, उनके लिए बराबरी और इज्जत की दुनिया की ओर बढ़ने के रास्ते खुलें, इसकी जमीन शायद ही तैयार कर पाते हैं। कारीगरों के हित में बड़े मशीनीकरण का विरोध किया जाना और गरीबोें की बस्तियों व पटरी के धंधों को कानूनी संरक्षण, आज की स्थिति बरकरार रखने तक सीमित बातें हैं। ये बातंे तो ठीक हैं लेकिन इनके आधार पर विस्थापित हो रहे समुदाय अपनी-अपनी लड़ाइयाँ लड़ सकेंगे ऐसा शायद तब तक न हो पाए जब तक वह सोच सामने नहीं आती जो सभी विस्थापित समुदायों के बीच एका का आधार तैयार करती हो।
सभी विस्थापित समुदायों के बीच एका का आधार लोकविद्या विचार में है। लोेकविद्या के नजरिए से देखें तो ये सारे समाज एक लोकविद्याधर समाज बनाते हुए दिखाई देते हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं को यह अनुभव होता ही है कि जब वे बस्तियों या गाँवों में विभिन्न विषयों पर चर्चा कर रहे होते हैं, तब सामना एक अलग नजरिए से होता है, सोचने और समझने के अलग तरीके से होता है। अगर हम हावी होकर अपनी बात थोपने का काम न करें और उनकी बात समझने की कोशिश करें, तो सोच की एक अलग दुनिया से सामना जरूर होगा। लोकविद्याधर समाज का सोचने या काम करने का तरीका उन्हें अपनी विरासत से मिला होता ह,ै जिसमें अपने अनुभव से, अपनी जरूरत से और अपनी तर्क बुद्धि के बल पर ये इजाफा करते रहते हैं। उस सोच में शासन, बाजार और
आधुनिक उद्योगों की प्रतिकूलताओं के बावजूद समाज में रहने की क्षमता विकसित करते रहते हैं। इन्हीं सोचों, क्षमताओं और विवेक के पुलिंदे को लोकविद्या कहते हैं। आज की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि लोकविद्या के आधार पर पूँजीवादी व्यवस्थाओं से मुकाबले का सामाजिक-राजनैतिक विचार कैसे तैयार हो। चूँकि विस्थापन सारे लोकविद्याधर समाज का होता है और केवल लोकविद्याधर समाज का होता है, इसलिए विस्थापन से मुकाबला पूरे लोकविद्याधर समाज की एकता की माँग करता है। किसान, कारीगर, छोटे-छोटे दुकानदार, आदिवासी और इनके घरों की महिलाएँ, इन सभी का नजरिया लोकविद्या का नजरिया है, इनकी आपसी एकता लोकविद्या की राजनीति का आधार देती है।
-सुनील सहस्र बुद्धे
क्रमश:

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