गुरुवार, 22 सितंबर 2011

खाद्यान्नों की महगाई और अनाज भण्डारण की बदहाली

खाद्यान्नो की महगाई निरन्तर बढती जा रही है | थोक मूल्य के रूप में यह वृद्धि लगभग 10 % हो गयी है जबकि उपभोक्ता के लिए यह वृद्धि 24 % से भी अधिक है | थोक मूल्य और उपभोक्ता मूल्य वृद्धि की दर में यह भारी अन्तर खाद्यान्नो के बिक्री बाज़ार में की जा रही भारी लूट का भी सूचक है | निश्चित रूप से हर सप्ताह , महीने वर्ष की ये वृद्धिया देश की आबादी की वृद्धि दर से कही ज्यादा है | इसलिए बढती आबादी के चलते बढती माँग से होने वाली महंगाई वृद्धि के पुराने तर्क को महंगाई की इस वृद्धि ने झूठा और खोखला साबित कर दिया है | उसी तरह से कम उत्पादन के चलते बढती महंगाई का तर्क भी फिलहाल वर्तमान महंगाई वृद्धि पर लागू नही होता | क्योंकि पिछले साल खरीफ और इस साल रबी की फस में रिकार्ड पैदावार हुई है | इसके फलस्वरूप देश के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में कृषि क्षेत्र में हुई भारी वृद्धि का बड़ा योगदान भी रहा है | लेकिन इस वृद्धि के वावजूद खाद्यान्नो की महंगाई पिछले डेढ़ सालो से लगातार बढती रही है | निश्चित रूप से इसका एक बड़ा कारण , खाद्यान्नो के बढते निर्यात के साथ उनका खाध्य पदार्थो के रूप में अर्थात बिस्कुट , पावरोटी , दालमोट , नमकीन , चिप्स , मैगी और अन्य तमाम तरह के पैकेट एवं डब्बा बन्द खाने के रूप में बढ़ाया जा रहा इस्तेमाल है | बाज़ार में खुले या छिपे वायदा कारोबार से लेकर उसकी बढती , , काला बाजारी के चलते भी यह महंगाई बढती रही है | इसके अलावा खाद्यान्नो की महंगाई का एक कारण , बढ़ते उत्पादन के वावजूद उसके रख - रखाव उसके भण्डारण की बदहाली भी हैं | सरकार भण्डारण की क्षमता को बढाने के लिए निजी उद्यमियों को छूटे सहायता दे रही है | पर सरकारी गोदामों की हालत बद से बदतर करती जा रही है |सरकारी गोदामों की छते फर्श टूट रहे है | इसके वावजूद सरकार तो उन्हें ठीक करवा रही है और ही अपने भंडारण की क्षमता ही बढ़ा रही है | हिन्दी दैनिक बिजनेस स्टैंडर्ड के 20 जुलाई के अंक में भारतीय खाध्य निगम तथा राज्य सरकार की विभिन्न एजेंसियों की कुल भण्डारण क्षमता लगभग 370 लाख तन बताया गया है | यह क्षमता पिछले 10 सालो से ज्यो की त्यों पड़ी हुई है | सरकारों ने उसे बढाने का कोई प्रयास तक नही किया | उसकी जगह भारतीय खाध्य निगम निजी गोदामों को किराए पर लेकर भण्डारण में थोड़ी वृद्धि करता रहा है | परन्तु खुद भारतीय खाध्य निगम की अपनी क्षमता में पिछले 10 सालो में नाम मात्र की वृद्धि हुई है | उदाहरण - 2000 में इसके अपने गोदामों की भण्डारण क्षमता 1485 लाख तन थी जो 10 सालो में मामूली वृद्धि के साथ 2010 में 154.7 लाख तन ही हो पायी | केन्द्रीय राज्य सरकारे अपनी भण्डारण क्षमता बढाने का प्रयास करने की जगह नाबार्ड के सहयोग से निजी भण्डारण क्षेत्रो को प्रोत्साहित कर रही है | इससे राष्ट्रीय स्तर की कई भण्डारण कम्पनिया खड़ी हो गयी है | इसमें " नेशनल बल्क हैंडलिंग कापोरेशन ", "नेशनल कोलेटरल मैनेजमेंट सर्विसेज ", " अदानी एग्रोलाजिस्तिक और रूचि इन्फास्त्रेक्चर आदि शामिल है | अब कुल भण्डारण में सरकारी भण्डारण की क्षमता 41 % ही है , जबकि 59 % क्षमता निजी उद्यमियों , सहकारी समितियों और बड़े किसानो के मालिकाने की है |
स्वाभाविक तौर पर निजी क्षमता कि इस वृद्धि का लाभ आमतौर पर निजी क्षेत्र के बड़े किसान आढतीये , व्यापारी आदि ही ज्यादा उठाएंगे | खासकर काला बाजारी जमाखोरी के लिए | फिर इस निजी भंडारण को बढावा देने में भी सरकारी धन छूटो का ही अधिकाधिक इस्तेमाल हुआ है | लेकि निजी मालिकाने में इस वृद्धि के वावजूद अभी तक कुल भण्डारण क्षमता 910 लाख टन हो पायी है | फलस्वरूप देश में पैदा होने वाले कुल अनाज का 20 % से 30 % तक भण्डारण क्षमता के अभाव कमियों , खामियों के चलते खुले आसमान के नीचे फसल रखने के कारण बर्बाद होता रहा है | भण्डारण क्षमता में वृद्धि करके कम से कम 15 से 20 % तक अनाज की सुरक्षा की जा सकती है | इसको खाद्यान्नो की कमी या चढती महंगाई के दौर में खासकर खेती के आफ सीजन में निकाल कर महंगाई नियंत्रित किया जा सकता है | यह सलाह तो कोई भी दे सकता है , लेकिन सरकार उसको सुनने वाली नही है | क्योंकि बढती महंगाई देश के धनाढ्य उच्च हिस्से को यहा तक की ठीक - ठाक कमाई कर रहे मध्यम वर्गीय लोगो को भी परेशान नही कर रही है | उल्टे अनाज के आढतियो , व्यापारियों एवं पैकेट तथा डब्बा बन्द भोज्य प्रदार्थों के कारोबारियों के हाथ में ज्यादा मुनाफ़ा कमाने का स्रोत भी दे रही है | सरकारे भी उन्ही का साथ दे रही है खुलेआम दे रही है | सरकारों को कम्पनियों का घाटो या कम लाभ की चिन्ताए तो है पर जनसाधारण की बढती समस्याओं की कोई चिन्ता नही है | इसी का सबूत है की पार्टिया सरकारों ने पिछले 15 - 20 सालो से महंगाई , बेकारी जैसी समस्याओं के समाधान करना तो दूर की बात उसे अपना प्रमुख चुनावी मुद्दा तक बनाना बंद कर दिया है | इसलिए वर्तमान दौर की सस्ता सरकारों से से आप अनाज भण्डारण को ठीक करने महंगाई घटाने की कोई उम्मीद नही कर सकते , आये दिन सरकार अपने बजटीय घाटे को दिखा कर देश की जनता पर कर का बोझ बढाती जा रही है

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

मौत ही सस्ती हुई, हर जीन्स महँगा बिक रहा -
हर एक बन्दे को इधर अब भा रहा है राक्षस |

ताज की हलचल से आया था कलेजा मुँह तलक-
अब जेल में भी मस्त गाने गा रहा है राक्षस ||

नोट-बुरी लगे तो मिटा दें ||

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

इन दुष्टों ने सब कुछ लुटेरों के हाथ में सौंप दिया है। जानकारी देता लेख।

Arvind Pande Wardha ने कहा…

shayad mere vichar se en sab karan k saath jab se moul,supar bajar aaye hai.unka haath es mahngai badhane me hai.aaj wo sijan me saste me lakho tan anaj stock karke unsijan me mahnge me bechte hai.tohi unka etna staaf+ dusra kharcha niklega.our jo sansad me baithe hai.wohi un compniyo me partnar hai.to janta ko lutne ko koi rok hi nahi hai.