गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय भाग 2

यह भी सर्वविदित है कि सरकारी तंत्र एवं उनकी सूचनाओं में उनकी वास्तविक परिस्थितियों को कम करके दिखाया गया है। भारतीय योजना आयोग के द्वारा गठित विशेषज्ञों की एक समिति ने निम्नलिखित शब्दों का प्रयोग किया हैः कि अपनी गलत हवस को पूरा करने के लिए शिकार करना एवं दूसरे के जीवन को मारकर अपना जीवन यापन करना, साथ ही साथ समिति ने यह भी कहा है कि मानवों के लिए अनुपयुक्त परिस्थितियों में आदिवासी जीवन यापन कर रहे हैं। इन आदिवासियों को भौतिक संसाधनों से वंचित किया गया एवं उनके सम्मान पर कुठाराघात किया गया। दुःखदायी बात यह है कि भारत सरकार द्वारा समयसमय पर दी गई इस प्रकार की सूचनाओं के प्रति अत्यन्त उदासीन रवैय्या अपनाया गया। उपर्युक्त टिप्पणी के साथ ही हमारी आख्या भारत में व्याप्त सामाजिक आर्थिक ढांचे के सम्बन्ध में समाप्त हुई। इन परिस्थितियों के कारण ही नक्सली आन्दोलन एवं हिंसा के दूसरे स्वरूप जैसे शान्त पूर्वक ंग से विरोध करने, अधिकार की मान्यता अक्सर अधिकारियों के द्वारा स्वीकार की जाती हैं वरन इसके साथ ही अहिंसक आंदोलन को भी उनके द्वारा बुरी तरीके से दबा दिया जाता है। इसमें आश्चर्य का विषय असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं है बल्कि राज्य के द्वारा इन आन्दोलनों से उचित निष्कर्ष न निकाल पाने की विफलता है। सरकारी तौर पर नीतियों एवं अभिलेखों में इस बात को स्वीकार किया जाता है कि उग्रवाद एवं गरीबी में सीधा सम्बन्ध है तथा आदिवासियों एवं वनों में गू़ सम्बन्ध व्याप्त है। विस्थापन के कारण आदिवासियों ने काफी कष्ट भोगे हैं। सरकार ने उनमें व्याप्त असंतोष को केवल वनों में कानून एवं व्यवस्था के समस्या के रूप में स्वीकार किया है। अतएव यह आवश्यक है कि हम इस दृष्टिकोण में परिवर्तन लाएँ एवं नीतियों तथा उनके क्रियान्वयन में समरूपता स्थापित करें। यदि सभी के लिए समानता, न्याय एवं सम्मान उपलब्ध है, तो समाज में शांति एवं व्यवस्था की स्थापना होगी एवं राष्ट्र प्रगति के मार्ग की ओर अग्रसर होगा।
8.इस परामर्श की ओर ध्यान देने के बजाए, जिसमें हमारे संविधान की आत्मा का समावेश है, बारम्बार राज्य ने बल एवं हिंसा का प्रयोग किया है। छत्तीसग़ की सरकार की ओर से दान्तेवाड़ा एवं उसके पड़ोसी जिलों के प्रति जो रवैय्या अख्तियार किया गया है वह इस तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा करता है कि माओवादी और नक्सलवादी हिंसा के खिलाफ सरकार ने जो अंधाधुंध हिंसा का मार्ग अपना रखा है उससे न तो समस्या का समाधान हुआ है और न ही भविष्य में होगा।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि इन आन्दोलनों को केवल असंतोष कहना या उन्हें कानून व्यवस्था की समस्या के रूप में देखना तर्कसंगत नहीं है। साथ ही साथ इसका बल के साथ दमन करना अक़्ल से परे है। यहाँ पर यह आवश्यक है कि हम उन असंतोषों एवं आन्दोलनों को सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक पृष्ठभूमि में देखें एवं इनकी व्याख्या लोगों के जीवन का अधिकार, जीविकोपार्जन का अधिकार एवं सम्मान जनक अस्तित्व के रूप में करें। राज्य को स्वयं यह एहसास होना चाहिए कि वह प्रजातांत्रिक, मानवीय अधिकारों एवं उद्देश्यों के प्रति कटिबद्ध है जिनका वर्णन भारतीय संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकारों एवं राज के नीति निर्देशक तत्वों में किया गया है। राज्य को कठोर रूप से कानून के शासन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करना होगा। राज्य को केवल शासक के रूप में अपनी भूमिका को प्रदर्शित नहीं करना चाहिए। सरकार के लिए यह एहसास करना आवश्यक है कि असहमति या असंतोष की अभिव्यक्ति प्रजातंत्र की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। असंतोष का अधिकार अधिकतर जनता के लिए एक आखिरी मार्ग है जिसके द्वारा वे सरकार पर दबाव डाल सकते हैं एवं सरकार को अपने वादों को पूरा करने के लिए बाध्य कर सकते हैं। उससे समस्या का समाधान नहीं हो रहा है बल्कि हिंसा एवं जवाबी हिंसा, राज्य के खिलाफ विद्रोह एवं सरकार द्वारा दमन का जो चक्र है वह चलता ही रहेगा। यह भी सत्य है कि हिंसा एवं जवाबी हिंसा का चक्र लगभग एक दशक से चल रहा है। इससे यह भी स्पष्ट है कि भारतीय योजना आयोग की विशेषज्ञ समिति ने जो तरीका सुझाया था वह बिल्कुल सही था।
9.चूँकि समस्या की जड़ कहीं और है, अतएव उसका समाधान भी अन्यत्र है। स्वार्थपरता एवं लोभ की अनियंत्रित संस्कृति जिसको आधुनिक नव उदार अर्थवाद की नीति ने प्रारम्भ किया है एवं ब़ती हुई उपभोक्तावाद जो आर्थिक विकास का झूठा वादा करती है वह ऐसी सामाजिक एवं आर्थिक विषम परिस्थितियों को जन्म देती है जैसा कि छत्तीसग़ एवं भारत के अन्य राज्यों में विद्यमान है। इसकी भी सूचना प्राप्त हुई है कि पूँजीवादी वर्ग तेजी से विस्तृत होते हुए शहरी मध्यम वर्ग में अपनी उत्पादक क्षमता को ब़ाना चाहते हैं। इसका सीधा तात्पर्य है कि पूँजीवादी वर्ग को
अधिक भूमि, अधिक निर्माण एवं अधिक व्यापार चाहिए। भूमि अधिग्रहण एवं विस्थापन का स्वाभाविक रूप से शिकार किसान एवं आदिवासी वर्ग है। ब़ी हुई खनन गति विधियों के कारण वन क्षेत्रों पर अतिक्रमण ब़ता है। परिवहन एवं यातायातविकास के लिए अधिक इस्पात, सीमेंट और ऊर्जा की आवश्यकता है। भारत वर्ष के पूर्वी राज्यों में सार्वजनिक उपक्रमों का अभाव है एवं आय में निर्धन एवं संसाधनों में समृद्धिशाली पूर्वी राज्य मल्टीनेशनल कम्पनियों को खनन एवं भूमि के अधिकार प्रदान कर रहे हैं। अधिकतर खनिज पदार्थ उन क्षेत्रों में मौजूद हैं जहाँ कि निर्धन आदिवासी निवास करते हैं। भारत के पूर्वी राज्य छत्तीसग़ में भारत की लौह खनिज की 23 प्रतिशत मात्रा एवं पर्याप्त मात्रा में कोयला मौजूद है। इस राज्य में टाटा स्टील एवं आरसलर मित्तल, डी0 वियर्स, कन्सालीडेटेड माइन्स, बी0एच0पी0 विलियन एवं रीयोबिन्टों नामक मल्टीनेशनल बहुसंख्यक कम्पनियों से अरबों एवं खरबों रूपयों के मसौदों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। दूसरे राज्यों में भी बड़े व्यापारिक घरानों एवं एफ0डी0आई0 के साथ इसी तरह के आर्थिक समझौते किए गए हैं। खनन जत्थों, निर्माण कार्य में लगे मजदूरों एवं ट्रकों की निरन्तर कतारों के कारण जंगल में आदिवासियों के रहन सहन को गंभीर आघात पहुँचा है जहाँ कि वे आदिकाल से निवास कर रहे थे।
10।नवउदारवादी विकास के समर्थकों के द्वारा यह तर्क दिया जाता है कि जब तक प्राकृतिक संसाधनों का त्वरित दोहन करके विकास की गति तेज नहीं की जाती है तब तक राष्ट्र न तो विश्व स्तर पर, अन्य देशों की बराबरी कर पाएगा, और न ही राष्ट्र उस धन को संचित कर पाएगा जो गरीबी, निरक्षता, भूख एवं गंदगी जैसी विशाल समस्याओं से निपटने के लिए आवश्यक है। इस प्रकार का दोहन जिस प्रकार से हो रहा है, क्या वह पर्यावरण एवं वर्तमान सामाजिक संरचना के द्वारा जारी रखा जा सकता है अथवा नहीं। इस विषय पर परिचर्चा बारम्बार होती रही है। किसी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले ही इस विषय को दफन किया जाता रहा है। न तो योजना के निर्माण कर्ताओं के द्वारा और न ही भारत वर्ष के बुद्धिजीवियों के द्वारा, जो सदैव ही विस्थापित एवं दलित वर्ग की इस अमानवीय दुर्दशा के प्रति संवेदन शून्य रहे, इन सवालों के स्पष्ट उत्तर प्रदान किए गए। वे इस ऐतिहासिक तथ्य की अवहेलना करते हैं जो यह दावा करता है कि विकास का सिद्घांत जो व्यापक रूप से प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन और लूट पर आधारित होता है, उसकी परिणति राज्य की विफलता के रूप में होती है। इस प्रकार की व्यवस्था में असंख्य लोग निराशा एवं असीम कष्टमय जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य हो जाते हैं।

क्रमश:
अनुवादक : मो0 एहरार

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