शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय भाग 3


बुद्धिजीवियों, विचारकों ने विस्तार पूर्वक इस पर परिचर्चा की हैं कि वे देश और क्षेत्र जो प्राकृतिक संसाधनों में बहुत समृद्धिशाली होते हैं, अक्सर तो उनका कार्य सबसे खराब प्रतीत होता है जब मानवीय विकास की पृष्ठभूमि में उनको देखा जाता है। उन देशों की तुलना में जो राष्ट्र खेतिहर वस्तुओं का निर्यात करते हैं अथवा समाज के सभी वर्गों के विकास में विश्वास रखते हैं उन राष्ट्रों एवं क्षेत्रों में निर्धनता की दर बहुत ब़ी होती है एवं खराब स्वास्थ्य सेवाएँ, शिशु व्यापक कुपोषण, ब़ी हुई बालक मृत्युदर, घटी हुई जीवन की आशादर एवं शिक्षा की खराब दशा पाई जाती है।
12.पूँजीवाद का शिकारी स्वरूप, जिसको राज्य संवैधानिक मूल्यों एवं सिद्घांतों की अवहेलना करते हुए ब़ावा देता है और समर्थन प्रदान करता है, शोषण वादी उद्योगों के रूप में पोषण पाता है। भारत वर्ष में भी सामाजिक अशांति की ब़ती हुई घटनाओं के पीछे प्राकृतिक संसाधनों का विवेकहीन दोहन, संसाधनों को वरदान के स्थान पर अभिशाप सिद्ध कर रहा हैं। तेलों में समृद्धिशाली राष्ट्रों की भाँति भारत वर्ष में भी मानव विकास की दर बहुत धीमी है। यह तर्क कि विकास का यह स्वरूप आवश्यक है एवं इसके परिणाम अवश्यंभावी, तर्कसंगत नहीं है। संविधान में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि राज्य नियमित एवं संगठित रूप से सभी नागरिकों के मध्य में भाईचारे की भावना का इस प्रकार विकास करेगा कि प्रत्येक नागरिक की गरिमा अक्षुण्य रहे, उसको पोषण प्राप्त हो एवं वह विकसित हो। राज्य के नीति निर्देशक तत्व, यद्यपि कि न्यायालय के द्वारा उनको लागू नहीं किया जा सकता फिर भी देश को चलाने में उनकी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। राज्य के नीति निर्देशक तत्व, राज्यों को यह स्पष्ट रूप से निर्देशित करते हैं कि वे राष्ट्र के भौतिक संसाधनों का प्रयोग सभी के कल्याण के लिए करें। राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि इन संसाधनों का उपयोग केवल धनी एवं शक्तिशाली वर्ग के लिए न हो जिससे दलित एवं शोषित वर्ग का शोषण हो। सम्पूर्ण सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक, न्याय प्रत्येक व्यक्ति को प्रदान करना हमारे संविधान का मूल उद्देश्य है। इस प्रकार का वादा, चाहे वह स्वरूप एवं सन्दर्भ में कितना ही कम क्यों न हो, ऐसी नीतियों को अनदेखा नहीं कर सकता जो जानबूझकर जनसंख्या के बड़े वर्ग को कष्टों के सागर में प्रक्षेपित कर रहा है।
13.पूँजीवादी वर्ग के द्वारा संसाधनों के त्वरित दोहन की नीति, जिसमें कि धन का असमान वितरण है एवं पर्यावरण के नियमों को जानबूझकर अनदेखा किया जाता है, शासन चलाने की नीतियों एवं नीति निर्देशक तत्वों का स्पष्ट उल्लंघन है। जब इस प्रकार का कार्य वृहत स्तर पर होता है, तो इससे कानून के समक्ष समानता एवं समान सुरक्षा के नियम का उल्लंघन होता है, जैसा कि इस संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 में स्पष्ट रूप से कहा गया है। पूँजीपति वर्ग के द्वारा दोहन की नीति के कारण, कुछ स्थानों पर इसे खनन माफिया भी कहा जाता है, और कुछ इसे राज्य के गुर्गें भी सुरक्षा देते हैं, इससे राज्य की नैतिक शक्ति क्षीण होती है। तथा संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 21 का भी हनन होता है। जैसा कि योजना आयोग की विशेषज्ञ समिति के द्वारा बारम्बार कहा गया है कि माओवादी एवं नक्सलवादी समस्या को बदलती हुई परिस्थितियों में केवल कानून व्यवस्था की सामान्य समस्या के रूप में न देखा जाए। हिंसा के दमन के लिए हिंसा के मार्ग को अपनाने से केवल राज्य के विरुद्ध अधिक विरोध की भावना एवं अधिक हिंसात्मक प्रदर्शन का जन्म होगा। कुछ विद्वानों ने यह स्पष्ट रूप से कहा है कि भारत में राजनैतिक हिंसा की विविधता की जटिलताएँ न केवल देश के आर्थिक ाँचे में निहित हैं बल्कि वे सामाजिक संरचना में भी विद्यमान हैं।
सामंतवादी सामाजिक संरचना, नवीन वाणिज्यिक सम्बंध, नए समझौते, राजनैतिक वर्गों एवं नौकरशाही के मध्य साठगाँठ, सार्वजनिक यातायात एवं परिवहन की कमी के कारण जनसंख्या का यह वर्ग क्रांतिकारी राजनीति की ओर उन्मुख हो चुका है। दशकों तक भारत गणराज्य विकास प्रोजेक्टों के कारण विस्थापित हुए लोगों को वैकल्पिक जीविका प्रदान करने में असमर्थ रहा। 1951 एवं 1990 के मध्य में 85 लाख लोग विकास योजनाओं के कारण विस्थापित हुए।
विस्थापित हुए लोगों में केवल 25 प्रतिशत को पुनर्वासित किया गया। यद्यपि कोई निश्चित आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं तथापि माओवादी उग्रवादियों की बड़ी संख्या इन्हीं दलितों एवं आदिवासियों में से है। यदि इन दो वर्गों के प्रति की गई यातनाओं का
अध्ययन किया जाए तो इससे यह बात स्पष्ट होती है कि नक्सलियों की दर में ब़ोत्तरी एवं प्रताड़ना के भौगोलिक परिक्षेत्रों में काफी समानता है। भारतीय अर्थव्यवस्था की उदारवाद, बाजार प्रधान एवं वैश्वीकरण की ब़ती हुई प्रवृत्ति के कारण अधिक से अधिक आदिवासियों का झुकाव माओवाद की ओर हो रहा है।
14.इस सम्पूर्ण प्रकरण की सबसे खतरनाक प्रवृत्ति एवं जिसके कारण राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को खतरा उत्पन्न हो रहा है यह है कि राज्य इस सम्पूर्ण प्रकरण पर गलत निष्कर्ष निकाल रहा है जैसा कि योजना आयोग की विशेषज्ञ समिति पहले भी कह चुकी है। समस्या का सामाजिक और आर्थिक पहलू देखने के बजाए भारत की वर्तमान सरकार यह प्रचार और प्रसार कर रही है कि आर्थिक विकास की नीति को तेज करना इस समस्या का इकलौता मार्ग है एवं निर्धन एवं दलित वर्ग की भूमि के रूप में जो क्षति हुई है वह आवश्यक थी। मशहूर अर्थशास्त्री अमित भादुरी ने टिप्पणी की है कि ॔॔यदि हम
मध्यवर्गीय वर्ग से परे हटकर देखें एवं मुख्य धारा से जुड़े भारत के उस पार झाँके तो, वहाँ की तस्वीर उतनी अच्छी एवं आकर्षक नहीं है। यदि आप विशेषाधिकार प्राप्त अल्पसंख्यक वर्ग के उस पार कदम रखें जो कि वैश्वीकरण, उदारवाद एवं व्यक्तिगतवाद की नीतियों का लाभ प्राप्त कर रहा है तो यह सच्चाई सामने आएगी कि परिस्थिति उससे प्रतिकूल है जैसा कि साबित करने की कोशिश की जा रही है। केन्द्रीय गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार कुल 607 जिलों में से 120 से लेकर 160 जिले नक्सलवादियों से भरे हुए हैं। निराश और भूमि से बेदखल किसान इनका समर्थन करते हैं और अब यह आंदोलन भारत गणराज्य के 1/4 हिस्से तक फैल चुका है। फिर भी सरकार उस क्रोध और निराशा के कारणों पर विचार नहीं करती जो इस प्रकार के आन्दोलनों को पोषण प्रदान करते हैं बल्कि सरकार इस सम्पूर्ण प्रकरण को कानून व्यवस्था की समस्या के रूप में एवं एक खतरे के रूप में देख रही है। इसका दमन राज्य के द्वारा की गई हिंसा से किया जा रहा है। जब सरकार इन गरीबों के प्रतिरोध को हिंसा के द्वारा प्रभावी रूप से कुचल देती है, तब वह अपनी पीठ थपथपाती है। यदि केवल उच्च विकास की दर को
ध्यान में रखा गया तो इन गरीब लोगों की संख्या ब़ती जाएगी एवं वे वैश्विक बाजार के निर्मम तर्क के सामने पूरी तरह असहाय, कुपोषित अशिक्षित एवं अप्रशिक्षित रहेंगे। यह एक अन्यायपूर्ण प्रक्रिया है। उच्च विकास की दर जो इस प्रकार प्राप्त की जाती है, वह न केवल धन के वितरण के प्रश्न की उपेक्षा करती है, बल्कि उसकी वास्तविकता उससे भी भयावह है। विकास के नाम पर यह गरीबों के खिलाफ एक प्रकार की पाश्विक हिंसा है। यह विकास का आतंकवाद है। विकास के नाम पर राज्य के द्वारा गरीबों के प्रति यह एक प्रकार की हिंसा है। इससे केवल कुछ विशिष्ट वर्गों अर्थात कारपोरेट, कुलीन तंत्र को लाभ पहुँचता है जिस पर कि अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व बैंक एवं स्वार्थी राजनैतिक वर्ग सहमति प्रदान कर देता है। शिक्षाविदों एवं मीडिया के लोगों ने इस विकास रूपी उग्रवाद को विकास के चिह्न के रूप में चित्रित करने में राजनैतिक नेताओं का साथ दिया है।
15.एक अन्य खतरनाक पहलू जो हमारे नीति निर्धारकों के द्वारा प्रारम्भ करा दिया गया है वह यह है कि वे संवैधानिक मूल्यों की पूरी तरह से उपेक्षा कर रहे हैं। एक तरफ तो राज्य निजी प्रतिष्ठानों को आर्थिक सहायता दे रहा है एवं उसे टैक्स में छूट प्रदान कर रहा है तो दूसरी ओर गरीब लोगों के लिए सामाजिक कल्याण योजनाओं का पूरा लाभ न पहुँचा पाने की असमर्थता का कारण आर्थिक संसाधनों की कमी बता रहा है। राज्य गरीब वर्गों के नौजवानों को हथियार प्रदान कर रहा है ताकि वह गरीबों के मध्य क्रोध एवं असंतोष का मुकाबला कर सके।
16.धनी वर्ग के लिए कर छूट एवं गरीब नौजवानों के लिए बन्दूकें, ताकि वे आपस में ही लड़ते रहें, समाज के ठेकेदारों एवं राज्य के उच्च आर्थिक निर्धारको, के लिए यह एक नया मन्त्र प्रतीत हो रहा है। यह उस राष्ट्र के विकास का एक वृहत परिदृश्य है जिसने अपने आपको एक सम्प्रभु धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी एवं प्रजातंत्रात्मक गण राज्य के रूप में गठित किया है। परिणामस्वरूप प्रश्न यह उठता है कि क्या हमारे नीति निर्धारक एवं वर्तमान शासक किसी भी प्रकार उस संवैधानिक विवेक, मूल्यों एवं परिसीमाओं से प्रेरित हो रहे हैं जो किसी राज्य के अपने नागरिकों की गरिमा को अक्षुण्य रखने के कर्तव्य से
सम्बंधित है।
17.उच्च नीति निर्धारण कर्ताओं ने यह बात विस्मृत कर दी हैं कि समाज एक जंगल नहीं है जहाँ कि अचानक लगी हुई आग को एक अन्य आग लगाकर बुझाया जा सके। मानव सूखे घास के तिनके की भाँति नहीं है। एक विवेकशील प्राणी के रूप में उसमें एक स्वतंत्र इच्छा होती है। यदि किसी मानव समूह को हथियारों से लैस किया जाता है तो इसकी संभावना प्रबल है कि वह समूह अपने ही नागरिकों एवं राज्य के विरोध में खड़ा हो सकता है और अक्सर उसके विरोध में खड़ा हुआ है। वर्तमान इतिहास ऐसे दृष्टान्तों से परिपूर्ण हैं जहाँ कि सशस्त्र नागरिक समूह राज्य के संरक्षण एवं समर्थन में स्वयं अपने समाज एवं राज्य के लिए खतरा उत्पन्न हुए हैं।
18.ऐसी गलत नीतियाँ जो हमारे नीति निर्धारकों के द्वारा थोपी जा रही हैं वे हमारे संविधान की आत्मा एवं आवश्यकताओं के प्रतिकूल हैं जो यह माँग करती है कि लोगों के द्वारा प्रदत्त की हुई शक्ति जो राज्य में निहित है वह सभी लोगों, चाहे धनी हों या निर्धन, के कल्याण के लिए प्रयोग की जाए एवं समूहों में भाईचारे की भावना को विकसित करते हुए प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा को अक्षुण्य रखा जाए। न तो संविधान की धारा 14 और न धारा 21 में दूरदूर उल्लिखित है जिससे कि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि राज्य इस प्रकार की नीतियों का
निर्धारण करें। इसके विपरीत संविधान की आत्मा इस प्रकार की नीतियों से आवश्यक रूप से विक्षिप्त एवं धूमिल होती है। जनसंख्या के निर्धन वर्ग के नौजवानों को इस प्रकार से पुस्तकों के स्थान पर बन्दूकें प्रदान करना, ताकि वे जंगलों में हो रही लूट, डकैती और हत्या को रोक सकें, राष्ट्र को विनाश के मार्ग पर ले जाने का कार्य प्रशस्त करता हैं। यहाँ पर यह कहना आवश्यक है कि इस अदालत को हस्तक्षेप करना पड़ा और छत्तीसग़ सरकार को आदेशित करना पड़ा कि वह सुरक्षा बलों से स्कूल एवं हास्टलों को खाली कराए। इस आदेश के बावजूद भी बहुत से स्कूलों एवं हास्टलों में अब भी सुरक्षा बलों का डेरा है। जीवन एवं समाज का पतन इस हद तक हो चुका है। आँकड़े अपने में आप स्वयं दृष्टांत हैं।
19.हाल के कुछ दशकों में आधुनिक राष्ट्र राज्यों की विफलता पर प्रकाश डालते हुए हारवर्ड विश्वविद्यालय के कैनेडी स्कूल के प्रो0 राबर्ट आई राटवर्ग ने टिप्पणी की है कि ॔॔राष्ट्र अथवा राज्य का अस्तित्व इसलिए है कि वे अपनी निर्धारित सीमा के अन्तर्गत रह रहे नागरिकों को जनहित की वस्तुएँ उपलब्ध कराएँ। परन्तु अक्सर राज्य व्यक्तियों एवं लोगों का प्रयोग राष्ट्र के मकसद एवं लाभ के लिए नहीं करते बल्कि वे इसका प्रयोग सैन्य बलों को ब़ाने एवं आन्तरिक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक वास्तविकताओं से निपटने के लिए करते हैं। अधिकतर राज्य इस कार्य में या तो सफल रहते हैं या विफल हो जाते हैं। राज्यों के कार्य के आधार पर, उस स्तर पर जहाँ तक वे लोगों को जनहित की सामग्री उपलब्ध करा पाते हैं, उनको असफल, कमजोर या सशक्त राज्य का दर्जा दिया जाता है। जनहित की वस्तुओं का एक वर्गीकरण है। उन वस्तुओं या कार्यों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सुरक्षा है, विशेष रूप से मानव सुरक्षा। व्यक्ति, विशेष परिस्थितियों में, अपनी सुरक्षा के लिए स्वयं प्रयास कर सकते हैं अथवा लोगों के समूह उन सेवाओं एवं वस्तुओं का क्रय करने के लिए आपस में एकत्रित हो सकते हैं जिसके कारण उनकी सुरक्षा की भावना में ब़ोत्तरी हो सकती है। सामान्यतः एवं परम्परागत रूप से व्यक्ति अथवा समूह द्वारा की गई व्यक्तिगत सुरक्षा व्यवस्था राज्य की सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था का बदल नही हो सकती है। राज्य का मुख्य कार्य जनता की सुरक्षा करना है, सीमा के उस पार के आक्रमणों एवं घुसपैठ को रोकना है, राष्ट्र या समाज पर हमलों के खतरे को समाप्त करना है, एवं नागरिकों के आपसी झगड़े को, जो राज्य के विरुद्ध हो अथवा एक समूह के दूसरे समूह के प्रति हो, बिना हथियार एवं शारीरिक बल के सुलझाना है।

क्रमश:
अनुवादक : मो0 एहरार

1 टिप्पणी:

Bhushan ने कहा…

बहुत बढ़िया जानकारी दी गई है. एक सुझाव है कि जिन आलेखों का यह अनुवाद है उनके लिंक्स साथ में दे दिए जाते तो बेहतर होता. सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को भी लिंक किया जा सकता है.