शनिवार, 8 अक्तूबर 2011

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय भाग 4


२०. राज्य का प्रमुख कार्य अपने सभी नागरिकों को, उनके गौरव को नुकसान पहुँचाए बिना, सुरक्षा प्रदान करना है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि राज्य ऐसे कार्यों को करें जिससे कि असंतोष, अशांति उत्पन्न न हो एवं प्राकृतिक संसाधनों का वितरण एवं उसका लाभ सभी को प्राप्त हो। राज्य के नीति निर्देशक तत्व में यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है। हमारा संविधान यह कहता है कि जब तक हम सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय की व्यवस्था न कर लें तब तक हम अपने नागरिकों के लिए मानवीय गौरव को प्राप्त नहीं कर सकेंगे एवं तब तक न तो हम ऐसी स्थिति में आएँगे जिससे कि हम विभिन्न समूहों में भ्रातृत्व की भावना का विकास कर सकें। ऐसी राजनीति जो इस मौलिक तथ्य को चुनौती प्रदान करता है राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता के लिए विनाशकारी है। ऐसी सामाजिक और आर्थिक नीतियों का क्रियान्वयन करना जिससे कि निर्धन वर्ग में असंतोष की भावना जागृत हो तथा हिंसक राजनीति का जन्म हो, हमारे संविधान द्वारा उसे प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस प्रकार की नीतियों के कारण विषम परिस्थितियों का उत्पन्न होना एवं इसके पश्चात सामाजिक आर्थिक अशांति एवं हिंसा की समस्याओं से निपटने के लिए संसाधनों की कमी का बहाना करना, अपने
संवैधानिक उत्तरदायित्वों को पूरा न करने के समान है। यह दावा करना कि संसाधनों की कमी के कारण राज्य अपने नागरिकों के लिए प्रशिक्षित औपचारिक पुलिस एवं सुरक्षा बलों के माध्यम से सुरक्षा प्रदान करने में असफल है राज्य द्वारा ऐसा कहना अपने राज्य के मूल कार्य को अनदेखा करना है। ऐसी नीतियों का पालन करना जिसके द्वारा निर्धन वर्ग के अर्धसाक्षर नौजवानों को बन्दूकें प्रदान करना ताकि वे जनसंख्या के एक विशिष्ट वर्ग के असंतोष को नियंत्रित कर सकें ऐसा करना आत्महत्या के लिए गोलियाँ देने के समान है जो समाज में विघटन और विनाश के मार्ग को प्रशस्त करेगा। हमारे नौजवान हमारा सबसे मूल्यवान संसाधन हैं जिनको कि हम बेहतर कल के लिए बेहतर पोषण प्रदान करते हैं। हमारे देश में व्याप्त असमानताओं के कारण इस प्रकारकी नीति विकास का मार्ग अवरुद्ध करेगी।
21.उपर्युक्त तथ्यों के प्रकाश में हमें उन विषयों का परीक्षण करना है जिनके ऊपर विचार विमर्श किया गया है तथा उसी के आधार पर हम उचित आदेश पारित करते हैं। हमने विस्तार पूर्वक सीनियर वकील श्री अशोक देसाई जो कि वादी की ओर से हैं एवं विद्वान वरिष्ठ वकील हरीश, एन0 सालवे एवं एन0 कृष्णमनी जो कि छत्तीसग़ राज्य की ओर से हैं, के तर्कों को सुना है। हमने भारत के सालीसीटर जनरल श्री गोपाल सुब्रह्मण्यम जो भारत गणराज्य की ओर से वकील हैं, के तर्कों को भी सुना है।
वर्तमान मामले का संक्षिप्त इतिहासः वर्तमान रिट याचिका सन 2007 में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनामिक्स की समाजशास्त्र की प्रोफेसर डॉ0 नंदिनी सुन्दर एवं मशहूर इतिहासकार डॉ0 रामचंद्र गुहा एवं भारत सरकार के पूर्व सचिव एवं आदिवासी कल्याण आन्ध्र प्रदेश सरकार के भूतपूर्व कमिश्नर के द्वारा दायर की गई। वादियों ने दावा किया है कि छत्तीसग़ राज्य में दांतेवाड़े जिला एवं उसके पड़ोसी क्षेत्रों के लोगों के
मानवाधिकारों का हनन माओवादी एवं नक्सलवादी सशस्त्र विद्रोह के कारण एवं छत्तीसग़ राज्य के द्वारा जवाबी कार्यवाही के कारण हो रहा है। इस सम्बन्ध में यह भी दावा किया गया है कि छत्तीसग़ राज्य सलवाजुडूम नामक एक संगठन की
गतिविधियों, जो कि वास्तव में एक सशस्त्र नागरिक संगठन है, को ब़ावा दे रही हैं, उक्त के कारण समाज में संघर्ष उत्पन्न हो गया है एवं मानवाधिकारों का हनन बड़े पैमाने पर हो रहा है।
23.यह अदालत पहले भी अनेक आदेश इस सम्बन्ध में पारित कर चुकी है। अदालत पहले ही इसको स्पष्ट कर चुकी है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के द्वारा एक जाँच समिति का गठन किया जाए एवं वादी के द्वारा जो गंभीर आरोप लगाए गए हैं उसकी जाँच कराई जाए। दिनांक 25.08.2008 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। इस अदालत ने छत्तीसग़ राज्य को उसकी संस्तुतियों पर विचार विमर्श करने का निर्देश दिया। अदालत ने तब यह भी निर्देशित किया कि जो व्यक्ति भी हिंसा की घटनाओं में मारे गए हैं एवं जिनकी एफ0आई0आर0 दर्ज नहीं हुई है उनकी एफ0आई0आर0 तुरन्त दर्ज करा दी जाए। छत्तीसग़ की सरकार को यह भी निर्देश दिया गया कि एक व्यक्ति के मृत शरीर पाए जाने पर उसकी मैजिस्ट्रेट स्तर से जाँच कराई जाए। अपने 18.02.2010 के आदेश में इस अदालत ने कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है कि लगभग 2000 विशेष पुलिस अधिकारी राज्य के द्वारा नियुक्ति किए गए है ताकि वे नियमित पुलिस बल के अलावा स्वयं भी कानून व्यवस्था पर नज़र बनाए रखें। हम यह भी स्पष्ट करते हैं कि विशेष पुलिस अधिकारियों की नियुक्ति कानून के अनुरूप हो। अदालत ने यह भी विशेष रूप से टिप्पणी की थी परन्तु सरकार द्वारा इसे नकारा गया है कि प्राइवेट नागरिकों को हथियार उपलब्ध कराए गए है।
सुनवाई के दौरान अनेक आरोप लगाए गए, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निष्कर्षों पर बल दिया गया और कुछ को चुनौती दी गई। तीन बिन्दुओं पर हमने खास तौर पर विचार विमर्श किया है। इन बिन्दुओं का सम्बन्ध निम्नलिखित से हैः
कछत्तीसग़ के विभिन्न जिलों के स्कूलों और हास्टलों में सुरक्षा बलों द्वारा डेरा डालना जिसमें कि विद्यार्थियों की उचित शिक्षा में बाधा पहुँची है।
खविशेष पुलिस अधिकारियों के रोजगार पर जिनको कि कोया कमांडोज भी कहा जाता है, उनका प्रशिक्षण, पुलिस अधिकारी (एस0पी0ओ0) के रूप में उनका स्तर एवं यह तथ्य कि उनको भिन्न प्रकार के हथियार उपलब्ध कराए गए तथा इन एस0पी0ओ0 के द्वारा की गई हिंसा का आरोप।
गस्वामी अग्निवेश के द्वारा यह आरोप कि मारपल्ली, टाडमेटला एवं टिम्मा पुरम में मार्च 2011 को गाँव में 300 घर जला दिए गए, उनकी औरतों का बलात्कार हुआ तथा तीन व्यक्ति मार दिए गए। स्वामी अग्निवेश ने यह भी आरोप लगाया कि जब वे समाज के कुछ लोगों के साथ इन गाँवों में सहायता उपलब्ध कराने तथा घटनाओं का आखों देखा हाल प्राप्त करने के लिए गए तो सलवा जुडूम के सदस्यों ने उन पर आक्रमण किया। हालाँकि छत्तीसग़ के मुख्यमंत्री न यह आश्वासन दिया था कि उनको पूरी सुरक्षा प्रदान की जाएगी। परन्तु सुरक्षा बलों की उपस्थिति में उन पर आक्रमण किया गया और सुरक्षा बलों ने कुछ नहीं किया। प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी अग्निवेश एक मशहूर सामाजिक कार्यकर्ता हैं जो सामाजिक संघर्षों को शांतिपूर्ण ंग से हल करने में विश्वास रखते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि स्वामी अग्निवेश ने उन पुलिस अधिकारियों के छुटकारे की भी बात की थी जो माओवादी संगठनों द्वारा अपह्रत कर लिए गए थे। छत्तीसग़ के मुख्यमंत्री ने इस बात के लिए उनकी सराहना की थी।
25.जहाँ तक स्कूलों और हास्टलों पर सुरक्षा बलों के कब्जे का प्रश्न है, छत्तीसग़ सरकार ने स्पष्ट रूप से इंकार किया है कि कोई भी स्कूल या अस्पताल आश्रम या आँगनबाड़ी सुरक्षा बलों के कब्जे में है। वास्तव में इन सभी स्थानों से सुरक्षा बलों को खाली करवा लिया गया है। फिर भी इस मामले की सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई है कि पिछले हलफनामें में जो आँकड़े पेश किए गए थे वे गलत थे एवं अब भी बहुत से विद्यालय और हास्टल सुरक्षा बलों के कब्जे में हैं। इस अदालत के हस्तक्षेप और निर्देश के बाद छत्तीसग़ राज्य ने विद्यालयों एवं हास्टलों को सुरक्षा बलों के कब्जे से मुक्त कराने की प्रक्रिया प्रारम्भ की। यह प्रक्रिया वास्तव में अब भी चल रही है। हमें छत्तीसग़ सरकार के उस रवैय्ये के ऊपर संदेह है जिसके अनुसार इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में उनका आचरण रहा। उनका पूर्व का हलफनामा जो इस अदालत में पेश किया गया कि समस्त अस्पताल, आश्रम एवं आँगनबाड़ी केन्द्र और अन्य संस्थाए खाली करा लिए गए हैं, इस अदालत ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सिफारिशों के दूसरे पहलुओं के सम्बन्ध में आदेश पारित किया था। अदालत ने सुरक्षा बलों के द्वारा अनुगृहीत शैक्षिक संस्थाओं या दूसरे सार्वजनिक स्थानों के सम्बन्ध में आदेश पारित नहीं किया था। छत्तीसग़ सरकार के द्वारा एक दूसरा हलफनामा दाखिल किया गया है, जिसके द्वारा राज्य सरकार ने कोर्ट के आदेशों के अनुपालन के लिए अतिरिक्त समय की माँग की है। यह इसलिए है कि बड़ी संख्या में स्कूल और हास्टल अब भी सुरक्षा बलों के कब्जे में हैं। हम इस मामले की सुनवाई अलग से करेंगे।
26.दो मामले काविशेष पुलिस
अधिकारियों की नियुक्ति एवं स्वामी अग्निवेश के द्वारा कथित घटनाओं के सम्बन्ध में हम यहाँ विचार विमर्श करेंगे।
27.यहाँ पर यह भी कहना आवश्यक है कि छत्तीसग़ एवं देश के अन्य दूसरे राज्यों में जारी सशस्त्र जन विद्रोह को वादी तथा प्रतिवादी दोनों के द्वारा माओवादी एवं नक्सलवादी गतिविधियों की संज्ञा दी गई है। ऐसी शब्दावलियों को आपस में अदल बदलकर, राज्य एवं नागरिकों के समूहों के खिलाफ विभिन्न समूहों का सशस्त्र विद्रोह की संज्ञा दी गई है।
इस आदेश में हम माओवादी गतिविधियाँ एवं नक्सलवादी गतिविधियाँ कहकर एक दूसरे के लिए प्रयोग करेंगे।


क्रमश:
अनुवादक : मो0 एहरार

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