गुरुवार, 20 अक्तूबर 2011

माओवाद, आधुनिकतावाद और हिंसाचार


आधुनिकतावाद के दो प्रमुख बाईप्रोडक्ट हैं- सामाजिक हिंसा और माओवाद। आधुनिकतावाद की खूबी है कि उसने हिंसा को सहज, स्वाभाविक और अपरिहार्य बनाया है, फलतः हिंसा के प्रति घृणा के बजाए उपेक्षा का भाव पैदा हुआ है। हिंसा के हम अभ्यस्त होते चले गए हैं। घरेलू हिंसा से लेकर वर्गीय हिंसा तक के व्यापक फलक को देखें तो पाएँगे कि
आधुनिकतावाद की आँधी में विकास कम और हिंसा का विस्तार ज्यादा हुआ है। इसमें मीडिया हिंसाचार से लेकर माओवादी हिंसाचार तक का बड़ा दायरा आता है।
आधुनिकतावाद महज कला की समस्या नहीं है बल्कि यह सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक हिंसा से भी जुड़ा फिनोमिना है। यह संयोग की बात है कि भारत में जिस समय आधुनिकतावाद संकटग्रस्त था ठीक उसी समय नक्सलबाड़ी आंदोलन पैदा हुआ। भारत में जिन दिनों दंगे, किसानों की कर्जों के कारण आत्महत्या, औरतों की दहेज-हत्या, घरेलू हिंसा आदि की सबसे ज्यादा खबरें आई हैं ठीक उसी दौर में माओवादी संगठनों की हिंसाचार की खबरें भी आई हैं।
विचारधारात्मक सच यह है कि माओवादी विचारधारा बुर्जुआजी के अधूरे सपनों को दिखाती है और उनको ही पूरा करने पर जोर देती है। बुर्जुआ समाज में जिस तरह अन्य प्रतिवादी विचारधाराएँ सक्रिय हैं वैसे ही माओवाद भी सक्रिय है। मसलन अविकसित आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में वे काम करते हैं और वहीं पर विकास के सवालों को बार-बार विभिन्न रूपों में उठाते हैं। कभी विस्फोट करके, कभी हथियार बंद जंग करके, कभी मुक्तांचलों का निर्माण करके और कभी हड़ताल करके।
माओवादियों की माँगें व्यवहार में बुर्जुआ विकास से जुड़ी हैं। क्रांति की बातें करते हुए वे अधूरे विकास के सवालों पर रोशनी डालते हैं। सामान्यतौर पर अपने को माक्र्सवाद का असली वारिस कहते हैं। उल्लेखनीय है कि आधुनिककाल में दो विचारधाराओं माक्र्सवाद और उदारतावाद का जन्म हुआ और दोनों ही मुक्तिकामी विचारधारा का दावा करती हैं। दोनों का लक्ष्य है आधुनिक समाज और आधुनिक मनुष्य का निर्माण करना। जिन समाजों में बुर्जुआ सभ्यता, संस्कृति, आचार-व्यवहार, जीवनशैली और सामाजिक विकास नहीं हुआ है उनमें माक्र्सवाद के मानने वाले विभिन्न राजनैतिक गुटों का पहला लक्ष्य होता है असमानताओं को कम करना। अविकसित क्षेत्रों में विकास और समानता की माँग मूलतः बुर्जुआ माँग है। भूमिसुधार, शिक्षा, स्थानीय जनजातियों के हितों का संरक्षण, सड़क, पानी, बिजली आदि माँगें मूलतः बुर्जुआ माँगें हैं।
आमतौर पर माओवादी वर्चस्व और विकास के सवालों को उठाते हैं, खासकर गाँवों में सामन्तों, जमींदारों और सूदखोरों के वर्चस्व के सवालों को उठाते हैं और उनसे मुक्ति की माँग करते हैं। वे किसानों, आदिवासियों के हितों के सवालों को उठाते हैं और शहरों में मध्य वर्ग, उच्च मध्य वर्ग से जुड़े रहते हैं। यह सच है आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में विकास नहीं हुआ है।
अधूरे विकास की जगह पूर्ण विकास की माँग, अधूरी आजादी की जगह पूरी आजादी की माँग, पूँजीवादी उत्पादन संबंधों में व्याप्त असमानता की समाप्ति की माँग मूलतः बुर्जुआ फ्रेमवर्क से आगे निकलने नहीं देती।
माओवादियों की भाषा, क्रांति, प्रतिवाद, समाजवाद, वर्गसंघर्ष, वर्गीय अन्तर्विरोध, आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र के हनन, पुलिस उत्पीड़न, हत्या बलात्कार आदि घटनाओं से भरी होती हैं। इस तरह की भाषा और इन घटनाओं से जुड़ी विचारधारा के प्रचार से बुर्जुआ व्यवस्था के विकास में मदद मिलती है। खासकर उन इलाकों में जहाँ पूँजीपति वर्ग पहुँचा ही नहीं है वहाँ पर माक्र्सवाद से प्रभावित विभिन्न राजनैतिक दल, जिनमें माओवादी भी शामिल हैं, लोकतंत्र के विकास के बुनियादी कामों में दिलचस्पी लेते हैं।
जिस तरह का माओवादी संगठनों के जनाधार का विकास नव्य-उदारतावाद के दौर में हुआ है वैसा विकास पहले नहीं हुआ। सन् 1990 के बाद वे जितने आक्रामक बने हैं इतने आक्रामक वे पहले कभी नहीं थे। माओवादी हों या वामदल हों, इन सबकी शक्ति में इजाफा इस बात पर निर्भर करता है कि बुर्जुआ समाज का किस गति से विकास होता है।
कुछ लोग यह सोचते हैं कि क्रांतिकारी आंदोलन का विकास क्रांति के भावों और विचारों के कारण होता है, लेकिन वस्तुस्थिति यह नहीं है। क्रांति की
विचारधारा मूलतः लोकतंत्र का बायनरी अपोजीशन है। यानी बुर्जुआजी का बायनरी अपोजीशन है। मजदूरवर्ग, बुर्जुआजी अपना विकास करेगा तो उसके अपोजीशन का भी विकास होगा। उस अपोजीशन को संगठित करने वाली ताकतों का भी विकास होगा। यही वजह है कि अभी तक मजदूर वर्ग की माँगें मूलतः बुर्जुआ माँगें ही रही हैं। वे अपनी माँगों के संघर्ष के जरिए बुर्जुआ वातावरण का विकास करते हैं।
मसलन माओवादियों के आदिवासी और पिछड़े हुए इलाकों में सांगठनिक विस्तार को ही गंभीरता से देखें तो पाएँगे कि इनमें से अधिकांश इलाकों में वे तब ही गए हैं जब वहाँ किसी न किसी प्रकल्प के लिए जमीन ली गई, बाँध बनाया गया, कारखाना लगाया गया या अन्य किसी काम के लिए आदिवासियों को बेदखल किया गया। आदिवासियों की बेदखली के पहले माओवादी इन इलाकों में नजर नहीं आते। आदिवासी इलाकों में बेदखली के खिलाफ उनकी माँगें क्या हैं? वे सारी माँगें आदिवासी इलाकों के विकास से जुड़ी हैं। इनमें भी वे आदिवासियों को उनकी जमीन पर अधिकार दिलाने या उनका मालिकाना हक बरकरार रखने पर ज्यादा जोर देते हैं।
यानी वे ‘सचेतना’ की बजाय ‘संरचना’ (जमीन) को बचाने पर ज्यादा जोर देते हैं। फलतः ‘सचेतना’ के बजाय ‘संरचना’ पर ज्यादा वजन पड़ रहा है। बुर्जुआजी का जोर भी ‘संरचना’ को हासिल करने पर है और माओवादियों का भी जमीन को बचाने पर मूल जोर है। वे आदिवासी और ग्रामीण समाज में पूर्व सामंती, सामंती मूल्यों और सामाजिक शक्तियों के खिलाफ इसके
आधार पर कोई विकल्प पैदा नहीं कर सकते। आदिवासियों और किसानों को नए मूल्यों और नई सामाजिक संरचनाओं में रूपान्तरित करने का उनके पास कोई विकल्प नहीं है। पुराने वर्गों या शोषक वर्गों से मुक्ति का उनके पास एक ही रास्ता है हत्या और हिंसा। यह शत्रु को खत्म करने का प्राचीन मार्ग है। वर्ग शत्रु को जमीनी और मूल्यों की जंग में परास्त करने के बजाए हिंसा के जरिए खत्म करने की पद्धति अंततः उन्हें सामंती और पूर्व-सामंती वर्गों के खिलाफ संघर्ष से विमुख करती है। इस तरह की हिंसा से माओवादियों को तत्काल मदद तो मिलती है लेकिन दीर्घकालिक तौर पर यह पद्धति उनके लिए मददगार साबित नहीं हुई है।

क्रमश:
जगदीश्वर चतुर्वेदी