सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

भ्रष्टाचार विरोध का प्रहसन पटाक्षोप की ओर-1


निकसत राग हजूरे का
जिस तरह बा़ के बाद उतरती गंगा/तट पर तज आती विकृत शव अध्खाया/वैसे ही तट पर तज अश्वत्थामा को/इतिहासों ने खुद नया मोड़ अपनाया।’ ;धर्मवीर भारती, अंध युग’
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मीडिया और टीम अन्ना के भरसक प्रयासों के बावजूद, अब समाप्ती की ओर है। आंदोलन का बहुरूपिया और मिश्रित चरित्रा भी स्वयमेव उद्घाटित हो चुका है। लोगों को भ्रमित करने के लिए जबानी जमाखर्च का दौर अलबत्ता अभी चल रहा है। लेकिन कब तक? किसी व्यक्ति अथवा संगठन के प्राध्किरवादी और भ्रष्ट आचरण को हमेशा के लिए लोकतंत्रा और सदाचार नहीं बताए रहा जा सकता। अगर कोई बेहतर सपना और उसे पफलीभूत करने की सच्ची निष्ठा न हो, भ्रष्ट राजनीति और सरकार की भत्र्सना ज्यादा दिन ाल बनी नहीं रह सकती। यह सही है कि ज्यादातर चैनलों और अखबारों ने अन्ना हजारे और उनके आंदोलन की ॔विश्वसनीयता’ बनाए रखने के लिए अभी भी कमर कसी हुई है। लेकिन ॔काली करतूत’ करने वाली कांग्रेस सरकार को आगे करके अन्ना हजारे और उनकी टीम के सदस्यों को सापफसपफेद दिखाने की कवायद ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है। आंदोलन के अंतर्विरोधें और समस्याओं को ंकने के लिए सरकार और कांग्रेस को कोसने का ॔मंत्रा’ असर खोता जा रहा है।
इस आंदोलन को खड़ा करने और चलाने में यह सच्चाई कि ॔जनता भ्रष्टाचार से परेशान है’ कापफी काम आई है। लेकिन सच्चाई झूठ का कितने दिन साथ दे सकती है! मीडिया की कितनी ही ताकत और समर्थन हो, मानव विवेक बहुत दिनों तक कुंद करके नहीं रखा जा सकता। वर्गविशेष के स्वाथोर्ं की पूर्ति करने वाली व्यवस्था देर तक चल सकती है, उसके समर्थन का आंदोलन नहीं। क्योंकि आंदोलन के साथ जुड़ा व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। शासक वर्ग के साथ नाभिनाल ब( नागरिक समाज और सरकार के बीच के आपसी संघर्ष में दोनों की स्वार्थसि( भले ही होती हो, उसे जनता और सरकार के बीच का संघर्ष देर तक बताए नहीं रखा जा सकता।
आंदोलन में उत्साह से शामिल होने वाले नागरिकों में बहुतों का मोहभंग होने लगा है। टीम के प्रमुख सदस्यों में आपसी झगड़े ब़ गए हैं। कुछ प्रमुख सदस्य टीम से बाहर निकल गए हैं। पिछले छहसात महीनों से टीम में प्रमुखता पाने के अभिलाषी कुछ प्रमुख समर्थक अपने ठिकानों पर वापस लौटने लगे हैं। उनमें कई के ठिकाने कांग्रेस में या कांग्रेसियों के साथ हैं। उनमें कई कहने लगे हैं कि उनका आंदोलन को अंध समर्थन कभी नहीं था। राजनीति को कोसने और ॔लोकशक्ति’ के जाग उठने के कोरस में शामिल होने वाले अब खुद राजनेताओं की तरह पैंतरे ले रहे हैं। आंदोलन के अवसान पर जो बहस और बयानबाजी हो रही, उसे दयनीय ही कहा जा सकता है।
अन्ना हजारे के कुछ उग्र समर्थकों यानी उग्र राष्ट्रवादियों ने टीम के प्रमुख सदस्य प्रशांत भूषण पर उनके चैंबर में घुस कर शारीरिक हमला कर दिया। उनका यह कृत्य नितांत निंदनीय है। हालांकि यह भी देखना चाहिए कि छोटी पिटाई, मसलन शराबियों को पेड़ से बांध कर सबक सिखाने वाली, स्वीकृत होगी तो बड़ी पिटाई का रास्ता भी खुला रहेगा। यह रास्ता अंततः उन हथियारों तक जाता है, जिनके प्रहार से मानवता ही खत्म हो जा सकती है। अरविंद केजरीवाल को कुछ अन्ना समर्थक गद्दार बता रहे हैं, जो अन्ना और आंदोलन पर अपना कब्जा जमाना चाहता है। उन्हें कौन समझाए कि जो ध्न और दिमाग लगाएगा, आंदोलन पर कब्जा भी उसी का रहेगा। अन्ना हजारे कई बार कह चुके हैं कि वे प्रशांत भूषण और केजरीवाल के बीच अहम के टकराव को जल्दी ही ठीक कर देंगे। लेकिन ठीक होने के बजाय हालात बेहूदा होते गए हैं।
आंदोलन के मापर्फत होने वाली कारपोरेट क्रांति की सच्चाई जल्दी ही सामने आने लगी थी। उसका प्राध्किरवादी और सांप्रदायिक चरित्रा जंतरमंतर पर ही अच्छी तरह प्रकट हो चुका था। लेकिन उसके साथ जुटे अनुभवी जनांदोलनकारियों, पत्राकारों और सरोकारध्र्मी सिविल सोसायटी एक्टिविश्टों ने अपने आंखें, कान और मुंह बंद कर लिए। शायद यह सोच कर कि मीडिया उनके साथ है तो आंदोलन के चरित्रा की सच्चाई जनता तक नहीं पहुंच पाएगी। उससे पहले ही मीडिया की लहरों पर सवार टीम अन्ना और उसके साथ लटक कर वे खुद जनता तक जा पहुंचेंगे और उसे आंदोलन के पक्ष में लामबंद कर लेंगे। इस प्रकल्पना में इतना और जोड़ दें ... जो कसर बाकी रहेगी, उसे संघ संप्रदाय अपने नेटवर्क और अडवाणी अपनी रथयात्रा से पूरा कर देंगे। अंतिम परिणति में आंदोलन का बेनेट भाजपा के हाथ में होगा। ... वही हुआ है। अगर जनता लामबंद हो भी जाती या आगे हो जाए, जैसा कि अरविंद केजरीवाल का दावा है कि कांग्रेस उनके खिलापफ कीचड़ उछालने का गंदा खेल बंद नहीं करती तो अगली बार आंदोलन को दस गुना समर्थन होगा, तब भी जनता को कुछ नहीं मिलना है।
पूरे आंदोलन में आरएसएस की जो भी भूमिका रही हो, खास समाजवादियों ने टीम अन्ना का अड़ कर साथ दिया है। मजेदारी देखिए, अन्ना हजारे का कभी समाजवादी विचारकों, विचारधरा, किसी आंदोलन अथवा कार्यक्रम से दूर का भी संबंध नहीं रहा है। लेकिन खास समाजवादियों ने उन्हें अपना आदमी और उनके रास्ते को अपना रास्ता बताते हुए आंदोलन में अंधी छलांग लगा दी। जब सरकार ने अन्ना और उनकी टीम के ॔गड़े मुर्दे उखाड़ने’ का ॔घटिया’ अभियान चलाया तो सरकार को सबसे ज्यादा इन समाजवादियों ने ही ध्कि्कारा। उन्होंने टीम अन्ना की सेवा और बचाव में यह कहते हुए मोर्चा सम्हाल लिया कि आंदोलन उनकी विरासत का हिस्सा और उसे आगे ब़ाने वाला है। जेपी की वृ( विध्वाएं अन्ना की चूड़ियां पहन कर नवविवाहिताओं के से उमांह में आ गइरं। नएनए देवर, ननद और भौजाइयों का भरापूरा कुनबा मिला तो भाग्य पर बलिहारी जाने लगीं। गांधीवादियों का भी उनके साथ सहज घरोपा हो गया। लोहिया देर तक बचे रहे, लेकिन उन्हें भी खींच लिया गया और कहा गया कि अन्नावादी ही असली लोहियावादी हैं। पटाक्षेप की तरपफ ब़ता यह आंदोलन खास समाजवादियों की दयनीय परिणति को भी दर्शा गया है।
भ्रष्टाचार की खिलापफत और सख्त लोकपाल कानून बनाने की वकालत माक्र्सवादियों ने भी की, लेकिन वे जल्दी सम्हल गए और गांधीवादियों और समाजवादियों की तरह आंदोलन के बहाव में नहीं आए। भ्रष्टाचार और मंहगाई के खिलापफ उन्होंने टीम अन्ना और भाजपा से अलग अपने कार्यक्रम आयोजित किए। हमने पहले लेख की शुरुआत लोहिया के एक कथन से की थी कि भारत में राजनीतिक मानस का निर्माण नहीं हो पाया है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से कई सबक निकलते हैं। उनमें एक है, असहमति के जो भी बिंदु हों, भारत में राजनीतिक मानस का निर्माण सबसे से ज्यादा माक्र्सवादी समूहों में हुआ है।
अब इस आंदोलन पर कुछ कहने के लिए बचा नहीं है। लेकिन पिछले तीन लेख पॄने वाले कई पाठकों का कहना है कि उन्हें आंदोलन की समीक्षा की समापन किश्त का इंतजार है। उनके आग्रह पर हम यह लेख लिख रहे हैं। हम अपने कुछ मित्राों और अग्रजों के आभारी हैं जिन्होंने पहले लेख से हमारी समीक्षा को पॄा और मिल कर बातचीत में या पफोन पर अपनी राय व्यक्त की। यह जिक्र हम इसलिए कर रहे हैं कि जैसा माहौल था, उसमें प्रोपफेसर अनिल सदगोपाल, प्रोपफेसर रणधीर सिंह, प्रोपफेसर रूपरेखा वर्मा, आनंद स्वरूप वर्मा, विनोद अग्निहोत्राी, प्रोपफेसर हरीश शर्मा, कामरेड बलदेव सिहाग सरीखे साथियों का साथ संबल की तरह था। वरना ज्यादातर साथी हमारी ॔अतिवादी’ और ॔शु(तावादी’ समीक्षा पर खपफा हो गए। उन्होंने अप्रत्यक्ष वार भी किए। यह जताते हुए कि आंदोलन का हमारा विश्लेषण जल्दी ही गलत सि( होगा और बड़े आंदोलन से बड़ा मकसद अपने आप सामने निकल कर आ जाएगा।
आम तौर पर नेताओं पर ॔निकटदर्शी’ होने का आरोप लगाया जाता है। लेकिन नेताओं के निंदक भी दूरदर्शिता का परिचय नहीं दे पाए। अश्वत्थामा युध्षि्ठिर के अ(र्सत्य का शिकार होता है। अगर अश्वत्थामा को अनेक अ(र्सत्यों से छली जाने वाली भारतीय जनता का प्रतीक मानें तो आंदोलन के उतार के बाद वह विकृत अध्खाए शव की तरह पड़ी नजर आएगी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारी ॔दूसरी आजादी’ और ॔क्रांति’ की घोषणा ऊंचे स्वर में कर रहे थे ॔अश्वत्थामा हतोहता’, और ॔नवउदारवादी’ केवल मन में बोल कर रह जाते थे ॔नरो वा कुंजरो वा’! यह प्रतीकार्थ चाहें तो पूंजीवादी व्यवस्था के पूरी दुनिया में पफैले जाल और कारनामों पर भी लागू कर सकते हैं।
स्पष्ट है कि यह प्रतिक्रांति है, जिसमें मेहनतकश जनता के साथ विश्वासघात करने में शासक वर्ग, मीडिया और नागरिक समाज एक टीम बन गए हैं। टीम अन्ना आंदोलन की परिकल्पना और संचालन करने वाली बीज हस्तियों और इंडिया अगेंस्ट करप्शन ;आईएसीद्ध में शामिल महानुभावों तक सीमित नहीं है। सभी समर्थक मनमोहन से लेकर अडवाणी तक टीम अन्ना में शामिल हैं। मनमोहन सिंह का यह कहना स्वाभाविक है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने अपना उद्देश्य पूरा कर दिया है। यानी, जैसा कि मनमोहन सिंह खुद चाहते हैं, देश में भ्रष्टाचार रहित नवउदारवादी व्यवस्था चलानी है तो लोकपाल कानून बनाना होगा। अडवाणी भी वही काम करने निकले हैं। एक साक्षात्कार में अन्ना से पूछा गया कि उनकी टीम के प्रमुख सदस्य प्रशांत भूषण नवउदारवाद के और अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के विरोधी हैं। अन्ना ने सवाल करने वाले को कहा कि वे दोनों को इस बाबत समझाएंगे। हमने पहले लेख में बताया था कि अन्ना हजारे विश्व बैंक का ईनाम पा चुके हैं। मनमोहन सिंह विश्व बैंक के आदमी हैं। दोनों नवउदारवादी हैं। पफर्क के तौर पर यही कहा जा सकता है कि मनमोहन सिंह जहां औपचारिक रूप से नवउदारवादी हैं, अन्ना हजारे की हैसियत अनौपचारिक है। बहरहाल, इस साज का कोई भी तार कहीं से खींच लीजिए, कोई भी खूंटी मरोड़ लीजिए राग एक ही निकलना है। आप चाहें तो इसे राग हजारे भी कह सकते हैं।

प्रेम सिंह
क्रमश:

1 टिप्पणी:

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

काफी अशुद्धियाँ दिखती हैं…पढ़ने में परेशानी हुई…वैसे अच्छा है…अन्ना के नकली आन्दोलन का हश्र तो होना ही ऐसा था…