बुधवार, 23 नवंबर 2011

गंगा उदास हैं .........................बदहवास हैं


गंगा की बात मत करो गंगा उदास है , वह जूझ रही खुद से और बदहवास हैं ,
न रंग हैं , न रूप हैं , न वो मिठास हैं ,गंगा-जली हैं , जल नही गंगा के पास है |

-कैलाश गौतम

अच्युत चरण तरंगिणी, नवसिरा मारुतिमाल | गंगा माँ हैं वह सब जग की तारणहार हैं | यह गंगा ही हैं जिसमे डुबकी लगाते ही मानव त्रिदेव की श्रेणी में आ जाता हैं , जब सिरपर से गंगाजलधार गिरती है तो वह शिव होता हैं , जब गंगाजल अंजुली में भरता हैं तो वह ब्रम्हा होता हैं और यही जलधार जब चरणों से होके गुजरती है तो वह विष्णु होता हैं | गंगा जिसकी महिमा का बखान करने में समस्त पृथ्वी का कागज़ और जल को स्याही बना दे तो भी कम हैं , वही गंगा जिसके माहात्म्य को बताते हुए सैकड़ो ग्रन्थ लिखे गये आज हमारी आस्था तो वही रही पर गंगा -गंगा न रही | गंगा आज कराह रही हैं | उसका अमृत तुल्य पानी आज रोगों की खान बन गया हैं |न तो उसमे हिमालय के खनिज तत्व नजर आ रहे हैं न ही उसका पानी रोगों के कीटाणुओं को नष्ट कर पा रहा | इसके अलावा आचमन या पीने लायक तो क्या इसका पानी आज नहाने लायक भी नही रह गया है | गंगा आज देश में बहने वाले तमाम छोटे बड़े नालो को मिलाकर एक बड़ा नाला बन कर रह गयी हैं लेकिन गंगा में डुबकी लगाकर पाप धोने की हमारी आस्था बरकरार हैं | बात गंगा की आई है तो एक नजर इस पर भी डाले की गंगा को किसने क्या माना और गंगा से क्या पाया | प्रख्यात इतिहास लेखक अब्दुल फजल ने अपने पुस्तक ' आईने- अकबरी ' में लिखा है कि बादशाह अकबर पीने के लिए गंगा जल ही प्रयोग में लाते थे | इस जल को वह अमृत कहते थे | काशी सुरसरी के इस जल में हिमालय क्षेत्र कि जड़ी - बूटी , ब्राम्ही , रत्न , ज्योति , अष्टवर्ग के अतिरिक्त शिलाजीत जैसे खनिज मिलते हैं | इसलिए हर प्रकार के सम्प्रदाय व धर्म के लोगो के बिना किसी भेदभाव के इसकी उपयोगिता , महत्ता को स्वीकार किया हैं | इब्न -बतूता ने लिखा है कि - मुहम्मद तुगलक भी इस जल को पिता था | वाराणसी ( काशी ) में जांच के दौरान पाया गया कि इस जल में एक विशेष प्रकार के "प्रोटेक्टिव कोलाइड "मिलते है जो अन्य नदियों में कम पाए जाते है | इसलिए हिमालय विजेता एडमंड हिलेरी ने गंगासागर से गंगोत्री तक के धरती से सागर तक अभियान कि देवप्रयाग में समाप्ति पर गंगा को 'तपस्विनी ' संज्ञा दी थी | उसके अनुसार गंगाजल मात्र साधारण जल नही हैं | इतिहासकार ' शारदा रानी ' ने मंगोलिया यात्रा का वर्णन करते हुए लिखा हैं कि वहा के निवासियों ने उन्हें गंगा देश से आई महिला कह कर साष्टांग प्रणाम किया | विश्वविख्यात जल विज्ञानी डॉ हेनफेन ने गंगा जल को विश्व का सर्वश्रेठ जल घोषित किया है |इसमें विभिन्न रोगों के कीटाणुऔ को नाश करने की अदभुत क्षमता हैं | एक बार परीक्षण के रूप में उन्होंने काशी के निकट 'अस्सी नाले ' का जल निकाला , उन्होंने पाया कि इसमें हैजे के असख्य कीटाणु है |उन्होंने उस पानी में गंगाजल मिलाकर लगभग 6 घंटे रखा और पाया कि इसमें हैजे के सभी कीटाणु समाप्त हो गये हैं |फ्रांस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ हैरेंन ने गंगाजल पर वर्षो अनुसन्धान करके अपने प्रयोगों को विवरण शोध पत्रों के रूप में प्रस्तुत किया |उन्होंने आंत्रशोथ व हैजे से मरे अज्ञात लोगो के शवो को गंगाजल में ऐसे स्थान पर डाल दिया जहा कीटाणु तेज़ी से पनप सकते थे |डॉ हैरेज को आश्चर्य कि कुछ दिनों बाद इन शवो से आंत्रशोथ व हैजे के ही नही अन्य कीटाणु भी गायब हो गये हैं | उन्होंने गंगाजल से 'वैक्टीरियोफ्ज ' नामक एक घटक निकाला जिसमे औषधीय गुण हैं | इंग्लैण्ड के जाने माने चिकित्सक सीई नेल्सन ने गंगाजल पर अन्वेषण करते हुए लिखा है कि इस जल में सड़ने वाले वैकटिरिया ही नही होते हैं |उन्होंने महर्षि - चरक को उद्घृत करते हुए लिखा है कि गंगाजल सही मायने में पथ्य हैं |
रुसी वैज्ञानिकों ने काशी व हरिद्वार में स्नान के उपरान्त सन 1950 में कहा था कि उन्हें स्नान के उपरान्त ही ज्ञात हो पाया कि भारतीय गंगा को इतना पवित्र क्यों मानते हैं ?गंगाजल कि पाच्कता के बारे में ओरियन्टल इंस्टीटयूट में हस्तलिखित आलेख रहे हैं |
कनाडा के मैक्लीन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ एम् सी हेमिल्टन ने गंगा कि शक्ति को स्वीकारते हुए कहा कि वे जानते किकहा कि वे नही जानते कि इस जल में अपूर्व गुण कहा से और कैसे आये ? सही तो यह है कि चमत्कृत हेमिल्टन वस्तुत:समझ ही नही पाए कि गंगा कि गुणवत्ता को किस तरह प्रकट किया जाए ?आयुर्वेदाचार्य गणनाथ सेन , विदेशी यात्री वर्नियर , अंग्रेज सेना के कैप्टन मुर आदि सभी ने गंगा पर शोध करके यही निष्कर्ष दिया कि यह नदी अपूर्व हैं |
भारतीय वांग्मय में काशी के बारे में बताया गया है कि जो व्यक्ति गंगा तट पर मन्दिर अथवा सीढ़ी का उद्धार करता है वह शिव लोक में वास करता हुआ अक्षय सुरक्षा प्राप्त करता है | इसके तट पर गौ , भूमि और स्वर्ण दान करने से पुण्य मिलता हैं | गंगा तट पर वास करने वाले विश्वनाथ कि कृपा से ब्रम्हज्ञान को प्राप्त करता हैं | इनके तट पर श्राद्ध करने से पितरो का उद्धार होता है तथा यहा की मिट्टी धारण करना , सूर्य की किरणों को धारण करने के लिए समान होता है |गंगा के अब न तो वह तट हैं न , वह गंगाजल है | गंगा की पीड़ा को जो समझ रहे हैं वह जरुर बदहवास और परेशान है | इस कड़ी में द्वारिका व ज्योतिषपीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती तथा कांची काम कोटिपीठाधीश्वर स्वामी जयेंद्र सरस्वती का नाम महत्त्वपूर्ण है जिन्होंने अलग - अलग अपने - अपने तरीके से गंगाजल के स्वच्छ व अविरल प्रवाह को लेकर जनमानस को उद्वेलित करने की शुरुआत की हैं | ये लड़ाई आसान नही हैं इसके लिए भगीरथ तप और प्रयास की आज फिर जरूरत हैं यदि हमें गंगा को पाना हैं | वैज्ञानिक आकड़ो पर गौर करे तो गंगाजल में बीओडी से लेकर फिक्व्ल क्वालिफार्म की मात्रा सामान्य रह गयी हैं | इसलिए पीने की बात तो दूर अब उसे आचमन लायक भी नही समझा जा रहा हैं | इसके लिए सभी धर्मो , वर्ग , सम्प्रदायों के लोगो को संकल्प लेना होगा लेकिन यह भी स्पष्ट है की थोथे नारों और बयानबाजी से गंगा का गौरव फिर से नही लौटाया जा सकता है || वह गौरव जिसका वर्जिल व दांते जैसे महान पश्चिमी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं में उल्लेख्य किया हैं | सिकन्दर महान जिसके सम्मोहन में बंध गया था | अमेरिका को खोजने वाला कोलम्बस जिसकी तलाश में भटकते हुए मार्ग खो बैठा था | हमे आज एक बार फिर गंगा का वही गौरव लौटाने का संकल्प लेने की जरूरत हैं |
प्रस्तुती
सुनील दत्ता
पत्रकार
साभार -राष्ट्रीय सहारा

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