मंगलवार, 22 नवंबर 2011

निर्यात में वृद्धि के वावजूद निर्यातको को सरकारी छूट

रूपये के गिरते मूल्य से और निर्यात प्रोत्साहन की छूटो , रियातो , पैकेजों से भी निर्यात के वृद्धि - विकास के नाम पर आम आदमी के लिए तो अभाव व महगाई का ही "विकास ' होना है और यही पहले से भी होता रहा है |
निर्यातक खुश हैं , बेहद खुश है और ज्यादा ख़ुशी की माँग कर रहे हैं |सरकार भी उनकी ख़ुशी में खुश है और उनकी मागो को बिना किसी किन्तु -परन्तु के साथ स्वीकार भी कर रही हैं | अन्य पिछड़े व विकासशील देशो की तरह ही इस देश से भी कृषिगत उपभोग के सामानों का ( चावल , चीनी , चाय , फल ,सब्जियों गोश्त, आदि का ) रुई - सूत से लेकर सिले - सिलाए कपड़ो का खासकर सूती व ऊनी कपड़ो का चमड़े व चमड़े के सामानों का हस्त शिल्प से निर्मित विभिन्न उपयोगी व सजावटी सामानों वआदि का और अब साधारण स्तर के इंजीयरिंग सामानों , रसायनों तथा फार्मा उत्पादों ( दवाओं )का भी निर्यात अमेरिका व यूरोपीय देशो से लेकर दुनिया के अन्य देशो में भी किया जा रहा है |निर्यातको को अभी हाल में 10 - 10 लाख टन गेंहू व गैर बासमती चावल के निर्यात की छूट का तोहफा दिया गया | उससे पहले पिछले दो साल से इसके निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा हुआ था | उसी के साथ पिछले एक साल से प्याज पर लगे प्रतिबन्ध को हटाकर उसकी छूट दे दी गयी है | रुई व सूत पर लगे प्रतिबन्ध को भी हटाकर निर्यात और निर्यातको की छूटो को और ज्यादा बढाया गया है | इन छूटो के अलावा डालर के मुकाबले रूपये के गिरते मूल्य ने तो निर्यातको की निर्यात बढाने का सुअवसर पहले ही प्रदान कर दिया है | रूपये की कीमत डालर के मुकाबले गिर रही है | इसे सुनकर राष्ट्र के आम ल्लोगो को कुछ न कुछ चिन्ता अफ़सोस जरुर होता है | पर हमारे निर्यातको और उनके समर्थको की बाछे खिल जाती है |क्योंकि अब देश में उत्पादित माल रूपये में महंगा लेकिन डालर में सस्ता हो जाता है | अर्थात देशवासियों के लिए महंगा पर विदेशियों के लिए सस्ता हो जाता हैं | विदेशो में उसकी माँग बढ़ जाती है |फलत:निर्यातको का कारोबार , व्यापार और मुनाफ़ा तेज़ी से बढने लग जाता है जैसा की इस समय बढ़ भी रहा है | हालाकि देश के आम लोगो के लिए रूपये के गिरते मूल्य के कारण तेल , पेट्रोल से लेकर हर सामान महंगा होने लगता है | जैसा की पिछले कई महीनों से भी हो रहा है | दिलचस्प बात यह है की पहले रूपये के मूल्य को गिराने यानी अवमूल्यन करने का काम अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष संस्थाओं के दबाव के चलते ही होता था , लेकिन वैश्वीकरणवादी नीतियों के तहत रूपये को विदेशी मुद्रा के मुकाबले नीचे उपर होने के लिए खुला छोड़ दिया गया हैं |उसके मूल्य को स्थिर रखने के सरकारी नियंत्रण का परित्याग कर दिया गया है | साफ़ बात है कि अब देश की सरकारों ने नीतिगत रूप से उसके अवमूल्यन की पूरी छूट दे दी हैं | देश के निर्यातक पहले भी रूपये के अवमूल्यन से खुश होते थे और अब तो खुश ही खुश है | डालर के मुकाबले तेज़ी से गिरते रूपये ने निर्यात में कई गुना वृद्धि कर दी है | आज डालर कि कीमत 52 रूपये पहुच गयी है | फिर कई वस्तुओं के निर्यात पर लगे प्रतिबन्ध को हटाए जाने से निर्यात को प्रोत्साहन मिला हैं | आकड़ो के हिसाब से अगस्त माह के निर्यात में ४४.2% कि वृद्धि हुई है | लेकिन निर्यातको के संघ ने इस वृद्धि पर ख़ुशी जाहिर करते हुए चिन्ता भी जताई है | उसका कहना है कि पिछले जुलाई - अगस्त में यह वृद्धि 82 % तक थी | उसके मुकाबले यह वृद्धि दर कम है | इसी के साथ उन्होंने यह भी चिंता व्यक्त की है की आने वाले दिनों में अमेरिका व यूरोपीय देशो में बढ़ रही आर्थिक मंदी निर्यात की वृद्धि दर को और घटा सकती है | इसीलिए भविष्य में निर्यात वृद्धि दर में संभवित कमी को आगे करके उन्होंने वर्तमान वृद्धि के वावजूद सरकार से निर्यातको के लिए प्रोत्साहन पॅकेज की माँग की है , ताकि निर्यातको पर इसका प्रतिकूल प्रभाव न पड़े | उनका कारोबार और मुनाफ़ा बढ़ता रहे | निर्यातको की यह माँग केन्द्रीय सरकार के वाणिज्य और उद्योग विभाग की अंतरात्मा को झकझोर गयी और उन्होंने 2014 तक सालाना 500 अरब डालर के निर्यात लक्ष्य को हासिल करने के नाम पर कई ढंग के निर्यात रियायतों की घोसना कर दी | उन्होंने 50 किस्म के मालो के लिए खासकर इंजीनियरिंग , रसायन , और फार्मा उद्योग के मालो के लिए विशेष बोनस लाभ दीये जाने की घोषणा की है | इसके अलावा उन्होंने विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर 2% की दर से एक अन्य तरह की कर छूट की घोषणा भी की है | निर्यात को बढाने के पीछे यह तर्क पहले से दिया जाता रहा है कि निर्यात और उसमे वृद्धि से देश कि अर्थव्यवस्था मजबूत होती है | क्योंकि उसके जरिये अधिकाधिक मुद्रा प्राप्ति में मदद मिलती है | फिर उससे देश के लिए आवश्यक विदेशी माल , मशीन तथा तेल - पेट्रोल आदि के आयात की अदायगी तथा अन्य विदेशी देनदारी को चुकता करने का काम पूरा किया जाता है | अत:देश के विकास के लिए निर्यात का बढना और लगातार बढना जरूरी हैं | निर्यात के लिए दीये जाने वाले ये तर्क एक हद तक ठीक है | लेकिन इसके ठीक विपरीत इसी तर्क को आगे करके देश के बड़े व्यापारियों और निर्यातको को अधिकाधिक लाभ पहुचाने के लिए अंधा धुंध बढाये जा रहे निर्यात के परिणाम स्वरूप देश में उत्पादित आम उपभोग के माल सामान विदेशियों के लिए सस्ते व सुलभ हो जाते है | पर देशवासियों के लिए उन वस्तुओं की उपलब्धता में भारी कमी आ जाती हैं | पिछले 1 - 2 सालो से तेज़ी से बढ़ते निर्यात और उसी तेज़ी से बढती मंहगाई उसी का सबूत है | अब रूपये के गिरते मूल्य से और निर्यात प्रोत्साहन की छूटो , रियायतों , पैकेजों से भी निर्यात के वृद्धि - विकास के नाम पर आम आदमी के लिए तो अभाव व मंहगाई का ही विकास होना है और हो रहा है | इसके वावजूद मंहगाई वृद्धि पर चिन्ता जताती रही वर्तमान सरकार और पूर्ववर्ती सरकारे भी निर्यातको को निर्यात वृद्धि के लिए छूटे देती रही है | फिर ये छूटे भी उस समय दे रही है , जब अन्तराष्ट्रीय माँग के अनुसार निर्यात अपने आप बढ़ रहा है | यह है सत्ता सरकारों का दोहरा व परस्पर विरोधी चरित्र निर्यातको के समर्थन व आम जनता के विरोध में | यह काम पहले भी होता रहा है | लेकिन पिछले २० सालो से सरकारों का यह दोहरा चरित्र व आचरण एकदम नगे रूप में सामने आ रहा है | जहा तक निर्यात से लोगो को रोजगार और किसानो - दस्तकारो को अपने उत्पादों के बेहतर मूल्य मिलने या पाने का मामला है तो वह मूल्य उनको देश में भी मिल सकता है | लेकिन बिडम्बना यह है कि देश के बाज़ार को तो विदेश से आयातित मालो से पाटा जा रहा है | तमाम मालो , सामानों के देशी उत्पादकों से देश का अपना बाज़ार छीना जा रहा है | राष्ट्र के तमाम उत्पादकों को रोजगार से बेरोजगार किया जा रहा है | लिहाजा निर्यात के नाम पर आम लोगो के रोजगार वृद्धि कीऔर बेहतर मूल्य पाने के तर्क न केवल सतही हैं बल्कि झूठे भी हैं | वास्तविकता यह है कि निर्यात के जरिये देश का अधिकाधिक माल सामान विदेशियों को देने के साथ देश के बाज़ार में विदेशियों कि घुसपैठ बढ़ाई जा रही है | देश के जनसाधारण से उनके उत्पादन का बाज़ार और उनके राष्ट्रीय उत्पादन के उपभोग का अधिकार छीना जा रहा है | मुझे याद आ रहा है मोहम्मद तारिक नय्यर कि कुछ पक्तियाँ ...............
हमारा देश करप्शन की कू में चलता है,
जुर्म हर रोज़ नया एक निकलता है।
पुलिस गरीब को जेलों में डाल देती है,
मुजरिमे वक्त तो हाकिम के साथ चलता है।।

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हर तरफ दहशत है सन्नाटा है,
जुबान के नाम पे कौम को बांटा है।
अपनी अना के खातिर हसने मुद्दत से,
मासूमों को, कमजोरों को काटा है।।

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तुम्हें तो राज हमारे सरों से मिलता है,
हमारे वोट हमारे जरों से मिलता है।
किसान कहके हिकारत से देखने वाले,
तुम्हें अनाज हमारे घरों से मिलता है।।

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तुम्हारे अज़्म में नफरत की बू आती है,
नज़्म व नसक से दूर वहशत की बू आती है।
हाकिमे शहर तेरी तलवार की फलयों से,
किसी मज़लूम के खून की बू आती है।।

- मो0 तारिक नय्यर

सुनील दत्ता
पत्रकार

09415370672

3 टिप्‍पणियां:

Arvind Pande Wardha ने कहा…

kitna kadvaa sach

ekdam sahi dard par haath rakh diya aapne
Dhanywad

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बहुत उंदर आलेख...
और तारिक जी की पंक्तियाँ तो खामोश कर देती हैं...

सादर...