बुधवार, 21 दिसंबर 2011

देश के 75 प्रतिशत आवाम को जीने का कोई हक नही धनाढ्य वर्ग नही चाहता कि ये अपनी जिन्दगी को जिए

प्रचारित घाटे का हो -हल्ला पर वास्तविक घाटे पर चुप्पी

( देश की सत्ता - सरकारे तथा देश के धनाढ्य व उच्च वर्गीय हिस्से देश की बहुसख्यक जनता के वास्तविक संकट को राष्ट्रीय संकट व जन - संकट मानते ही नही | सच्चाई तो यह है कि वे देश कि 60 - 70 प्रतिशत जनता को देश में जीवित रहने के काबिल ही नही मानते )

कई यूरोपीय देशो और अमेरिका के कर्ज़ - संकट का हो - हल्ला मच रहा है | सम्मलेन पर सम्मलेन हो रहे है |अन्तराष्ट्रीय स्तर पर उसके समाधान के रास्ते तलाशे जा रहे है | वहा के संकटों के विश्वव्यापी फैलाव - बढ़ाव पर भी दुश्चिंताए प्रकट की जा रही है | इस देश में उसके उपर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंताए - चर्चाये चल रही है | इन संकटों के फलस्वरूप देश से विदेशो को होने वाले निर्यात वृद्धि दर में घटाव के आंकड़ो के साथ भविष्य में और ज्यादा घटाव की आशंकाएं जताई जा रही है |उदाहरण ----जुलाई माह के निर्यात में 80% की वृद्धि को अक्तूबर में घटकर 35% की वृद्धि रह जाने पर खासी हाय तौबा मची हुई है | फिर विदेशो से देश में होने वाले आयात के स्थिर रहने या बढ़ते रहने और निर्यात की वृद्धि दर में गिरावट आने के फलस्वरूप देश के विदेशी व्यापार घाटो के तेज़ी से बढने के आंकड़े भी सुनाये जा रहे है | वैश्विक आर्थिक संकट के फलस्वरूप घटे निर्यात और बढ़ते विदेशी व्यापार घाटे के साथ घटे विदेशी निवेश आदि देश के आर्थिक विकास की दर में कमी आने की आशंकाएं जताई जा रही हैं| बताया यह जा रहा है कि बढ़ते वैश्विक आर्थिक संकट के फलस्वरूप पहले से अनुमानित 8.5% की आर्थिक वृद्धि दर अब 7.5% तक या उससे भी नीचे जा सकती है | अभी तीन साल पहले विश्वव्यापी वित्तीय संकट का रोना रोया जा रहा था | एक तरफ तो यह कहा जा रहा था कि इस वैश्विक संकट का देश में बहुत कम प्रभाव पड़ा है और दूसरी तरफ देश की धनाढ्य कम्पनियों को , निर्यातको , आयातकों को लाखो करोड़ो का पैकेज दिया जा रहा था | यह पॅकेज नाम मात्र के घटाव के साथ पिछले 3 - 4 सालो से दिया जाता रहा है | अब नये वैश्विक संकट के नाम पर यानी पहले के वित्तीय संकट का हो - हल्ला मचाकर देश के धनाढ्य हिस्सों के "घाटे " कि या संभावित घाटे की आशकाए बताई जा रही है | फिर उसकी भरपाई के लिए भी सरकारी छूटे , सहायताए मांगी जा रही है |सरकार उनकी मांगो को ध्यान से सुन रही है और उसकी आपूर्ति के लिए तैयारी भी कर रही है | जबकि यह प्रचारित और संभावित घाटा भी ज्यादा से ज्यादा उनके लाभ दर में कमी या उसमे संभावित कमी से ज्यादा कुछ नही हैं | यह घाटा उनके जीवन का घाटा तो कदापि नही है | इस बहुप्रचारित व संभावित घाटो के वावजूद धनाढ्य व उच्च हिस्सों के उच्च स्तरीय रहन - सहन, सुख - सुविधा तथा ऐश- आराम के साथ करोड़ो - करोड़ के खेल तमाशो आदि में न तो तीन साल पहले कमी आई और न अब नजर आ रही है | फिर भी उनके घाटो का प्रचार लगातार जारी है | सरकार को उसकी घहरी चिनाये भी है |धनाढ्य हिस्से सरकारों के सिर आँखों पर है | न केवल उनके प्रचारित संभावित घाटो कि आपूर्ति के लिए सरकारे तत्परता से खड़ी रही है , बल्कि उनके लाभों - पूंजियो , सम्पतियो , आमदनियो आदि में बेतहाशा वृद्धि के लिए नीतिगत एवं योजनागत छूटे व अधिकार देती और बढाती आ रही हैं। जनता से वसूले गये जाते रहे टैक्सों से भरे जाते रहे सरकारी खजाने का मुँह उनके लिए हमेशा खुला रहा है |खासकर पिछले 20 -25 सालो से लागू विदेशी आर्थिक नीतियों एवं डंकल प्रस्ताव के बाद से तो यह काम एकदम नग्न रूप में किया जाता रहा है |देश की सत्ता - सरकारे न केवल देश के धनाढ्यो के वृद्धि दर में घटाव की आपूर्ति के लिए तत्पर है , बल्कि यूनान व इटली जैसे यूरोपीय देशो के कर्ज़ संकट को टालने के लिए भी पूरा जोर लगा रही है | चूँकि देशी कम्पनियों व आयातकों , निर्यातको के कारोबार अमेरिका व यूरोप से मिलते रहे वित्तीय व तकनीकी सहायताओ तथा वहा के बाजारों से जुड़े हुए है इसलिए भी वे और देश की सत्ता - सरकारे विदेशो के संकटों के समाधान में अपना सहयोग देने के लिए हमेशा ही तत्पर खड़े हैं |.............पर देश के जनसाधारण के संकटों के लिए क्या हो रहा है ?उसको आमतौर पर संकट कहना ही बन्द कर दिया गया है |न कही किसानो में बढती आत्महत्याओं पर चिंता है और न ही आम मजदूरों , किसानो दस्तकारो , दुकानदारों , छोटे कारोबारियों व साधारण पढ़े - लिखे नवयुवको के रोजगार आदि की चिन्ता हैं |न ही बढती महगाई के संकटों पर किसी हद तक लगाम लगाने की चिन्ता है और न ही जनसाधारण के किसी हद तक स्थाई संसाधनों आदि के कटने - घटने पर कोई चिन्ता , चर्चा हैं | उल्टे बढती जनसमस्याओ के संदर्भ में कभी - कभार की खबरों के अलावा देश की आम जनता को गरीबी व भुखमरी के संकटों से उपर उठते हुए दिखाया व प्रचारित किया जाता रहा है |जबकि दर हकीकत बढती महगाई , बेकारी आदि की समस्याओं से देश की 75% आबादी का जीवन संकटों से घिरता जा रहा है | खाने - पीने , रहने - सहने की दिकत्तो , संकटों के साथ शिक्षा व स्वास्थ्य की न्यून स्तर की उपलब्धि हासिल करने में भी जनसाधारण का व्यापक हिस्सा अक्षम व अशक्त होता जा रहा है | टी0 वी0 पर हो रहे करोड़ो - करोड़ के खेल - तमाशे को तथा उच्च वर्गीय घरो - परिवारों की हरामखोरी - फैशनबाजी आदि से सुसज्जित सीरियलों , फिल्मो को दिखाकर ही आम लोगो को , खासकर नई पीढ़ी के लोगो को खुशफहमी पालने की सीख दी जा रही हैं | लेकिन जीवन की बुनियादी आवश्यकताओ की आपूर्ति में बढती जा रही कमी कटौती में ऐसीखुशफहमियो का कोई आधार नही खड़ा हो पा रहा है , न ही उसकी कोई उम्मीद नजर आ रही है कि देश की सत्ता - सरकारे तथा देश के धनाढ्य व उच्च वर्गीय हिस्से देश की बहुसख्यक जनता के इस वास्तविक संकट को राष्ट्रीय -संकट व जन - संकट मानते ही नही | सच्चाई तो यह है की देश की 60- 70 प्रतिशत जनता को देश में जीवित रहने के काबिल ही नही मानते |क्योंकि उच्च तकनिकी के अंधाधुंध आयात और अंधाधुंध इस्तेमाल के आगे अब उनको साधारण श्रम की और जनसाधारण के रूप में मौजूद बाज़ार की पहले जैसी जरूरत नही हैं |क्योंकि आम जन अपनी कमजोर क्रय शक्ति के कारण देश - विदेश की धनाढ्य कम्पनियों के टिकाऊ और ज्यादा लाभ देने वाले मालो , सामानों की बिक्री बढाने वाले बाज़ार नही बन सकता |इसलिए अब मुख्यत:धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के लिए काम करती रही सत्ता - सरकार की जनसाधारण के प्रति मुख्य चिन्ता पार्टियों और सत्ता - सरकारों के प्रति चुनावी व गैर चुनावी समर्थन की ही रह गयी है | यह उन्हें विभिन्न रूपों में खासकर धर्म , जाति, इलाका , भाषा आदि के नाम - नारों और वैसे ही छोटे - मोटे पर बहुप्रचारित छूटो सहूलियतो आदि के जरिये मिलता भी रहा है | इसीलिए भी वे देश के व्यापक जन की समस्याओं , संकटों की उपेक्षा करके उसे निरन्तर बढाते हुए देश - दुनिया के धनाढ्य वर्गो के बहुप्रचारित संकटों को टालने के काम में जी जान से लगी हुई है |लेकिन तब इन सत्ता सरकारों को जनसाधारण की जनतांत्रिक सत्ता - सरकारे नही बल्कि धनाढ्य व उच्च हिस्से की जनतांत्रिक सत्ता - सरकारे कहना , समझना ही उचित हैं | उन्हें जन - साधारण की बुनियादी समस्याओं की अनदेखी करने वाली सत्ता - सरकार कहना व मानना कही से अनुचित नही है एक दम उचित हैं |

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए
फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

नीरज की यह लाइने हमें लड़ने का संबल देती है

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

2 टिप्‍पणियां:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

'देश के 75 प्रतिशत आवाम को जीने का कोई हक नही धनाढ्य वर्ग नही चाहता कि ये अपनी जिन्दगी को जिए'

Aisa nahi hai .

Dhanwan sab ek jaise nahi hain aur Gareeb bhi aibdari men kuchh kam nahi hain .

Kaun sa aib hai jo Gareeb nahi karte.

Bachchon ki fees ka paisa sharab men uda dete hain bahut se Gareeb log .

Bahut se ameero ko Qatl karke bhag jate hain unke naukar .

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

बातें सही हैं। धार्मिक या दान और चंदे वाले लोग भला सहमत कैसे हो सकते हैं।