शनिवार, 21 जनवरी 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी कम्पनियों के आगमन के माने मतलब- प्रचारित और वास्तविकता

3 दिसम्बर के दैनिक जागरण में कृषि क्षेत्र के ज्ञाता लेखक देविन्दार शर्मा ने खुदराव्यापार में विदेशी कम्पनियों को छूट दीये जाने के बारे में किए जाते रहे प्रचारों के जबाब में कुछ तथ्यों आकंड़ो को पेश किया है | उसे हम यहा आपके समक्ष अपनी संक्षिप्त विवेचना के साथ रख रहे है आप के सामने |
बहुतेरे ब्रांडो में विदेशी कम्पनियों को खुली छूट देने के बारे में एक बड़ा तर्क रोजगार वृद्धि का दीया जाता रहा है |बताया जा रहा है कि इसके जरिये 2020 तक एक करोड़ रोजगार पैदा होंगे | इस दावे को साबित करने के लिए कोई तथ्य या सबूत प्रस्तुत नही किया गया है |लेकिन इस दावे को झूठा साबित करने के लिए तथ्यगत सबूत जरुर मौजूद है | वह यह है कि अमेरिका के रिटेल कारोबार में वालमार्ट का वर्चस्व है |इसका कुल कारोबार लगभग 400 अरब डालर (लगभग २० लाख करोड़ रूपये का है )इसमें महज 21 लाख लोगो को रोजगार मिला हुआ है | दिलचस्प बात यह है कि भारत का कुल रिटेल कारोबार भी लगभग 20 लाख करोड़ रुपया है |इसमें लगभग 4।40 करोड़ लोगो को रोजगार मिला हुआ है |आप इस आकडे से भी अंदाजा लगा सकते है कि वालमार्ट जैसी कम्पनियों के आने के बाद करोड़ो लोगो को रोजगार मिलेगा या करोड़ो लोगो का रोजगार छीन जाएगा | इसका दुसरा तथ्यगत सबूत यह भी है कि 'इंग्लैण्ड में दो बड़ी रिटेल कम्पनिया टेस्को और सेन्सबरी है |इन दोनों ने पिछले दो वर्षो में 24000 लोगो को रोजगार देने का वादा किया था |लेकिन इन दो सालो में इन्होने ओहले से काम कर रहे 850 लोगो को काम से हटा दीया है | खुदरा व्यापार में विदेशी कम्पनियों को पूरी छूट दीये जाने के बारे में दुसरा प्रचार यह है कि इससे किसानो कि आय में 30 प्रतिशत कि वृद्धि हो जायेगी , क्योंकि अब बीच के कई बिचौलिए और किसानो के मालो कई घटतौली जैसी ठगी , बेईमानी खत्म हो जायेगी | आंकड़ो की गवाही इसके एकदम विपरीत तथ्य पेश करती है |विदेशी रिटेल कम्पनियों के अपने ही देशो - अमेरिका , फ्रांस व अन्य यूरोपीय देशो में खुदरा व्यापार में वालमार्ट व अन्य दिग्गज कम्पनियों के विस्तार के साथ उनकी आमदनियो में 30 से 40 प्रतिशत तक की गिरावट आई है | अगर अमेरिका व यूरोपीय देशो की सरकारे किसानो को भारी सब्सिडी न दे तो कृषि व लाभ कमाते किसानो का घाटा खाना और गिरना एकदम निश्चित है | दुसरा तथ्य यह भी है कि 1950 से पहले खुदरा व्यापार कि महा भीमकाय कम्पनियों के प्रादुर्भाव और विस्तार से पहले वहा के किसानो को कई बिचौलियों की मौजूदगी के वावजूद 70 प्रतिशत तक बचत हो जाती थी | लेकिन इन कम्पनियों के बधाव - फैलाव के बाद 2005 में उनकी बचत घटकर 4 प्रतिशत हो गयी है |फिर इन कम्पनियों के आगमन से बिचौलिए भी कम नही हुए है उलटे बढ़ गये है | पुराने आढतियो व्यापारियों की जगह पर 'गुणवत्ता नियंत्रक एजेंसी ' 'मानकीकरण एजेंसी ' 'प्रोसेसर व पैकेजिग ' इनके सलाहकारों आदि जैसे नये किस्म के बिचौलिए खड़े हो गये है |ये नये बिचौलिए किसानो की आमदनी में से ही हिस्सा बाटते है | इसके सबूत के रूप में सूचना यह भी है कि सुपर मार्केटो में मिल रहे कम दामो के विरोध में ही स्कार्टलैंड में और कई दूसरे देशो में किसान ' फेयर डील फ़ूड ' जैसे संगठन बनाने के लिए मजबूर हुए है | विदेशी कम्पनियों को खुदरा व्यापार में पूरी छूट के साथ केन्द्रीय मंत्री परिषद व सरकार ने यह भी निर्णय भी सुनाया कि विदेशी रिटेल कम्पनिया छोटे व मध्यम उद्योगों से अपने व्यापार के 30 प्रतिशत मालो - सामानों कि खरीदारी करेगी |सच्चाई यह है कि विश्व व्यापार संगठन के समझौते के तहत किसी भी बड़े रिटेलर को किसी भी जगह से सामान खरीदने के लिए बाध्य नही किया जा सकता |विश्व व्यापार संगठन की धाराओं को आगे करके ये रिटेलर विदेशी मालो , सामानों के अधिकाधिक निर्यात से बाज़ार पाट देंगे |जिसका कुपरिणाम यहा के छोटे व मध्यम दर्जे के उद्योगों के उत्पादन व बाज़ार - व्यापार पर पढ़ना एकदम तय है | यह प्रभाव विदेशी सस्ते लुभावने मालो के बढ़ते आयात के रूप में पड़ भी रहा है | खुदरा व्यापार में दिदेशी कम्पनियों के आगमन के संदर्भ में एक और बड़ा प्रचार यह भी है की उपभोक्ताओं को इससे उच्च गुणवत्ता वाले माल - सामान उचित मूल्य पर और सही नाप - तौल के साथ उपलब्ध होंगे |इस संदर्भ में यह तथ्य भुला नही जाना चाहिए कि इस देश के ज्यादातर उपभोक्ता सुपर मार्केट के ट्राली मार्का खरीदार नही है | बल्कि सुबह शाम के फुटकर खरीदार है |फिर आम उपभोक्ताओं का बहुत बड़ा हिस्सा आपसी संबंधो विश्वासों के आधार पर चलते रहे मौके - बेमौके उधारी खरीदारों का भी है |
इनके लिए 'उच्च गुणवत्ता उचित मूल्य व नाप तौल वाले ' बहुप्रचारित सुपर मार्केट में जाना और खरीदारी करना लगभग असम्भव है | अत:फुटकर दुकानदारी में भीमकाय कम्पनियों के आगमन से तमाम फुटकर दुकानदारों के टूटने के साथ नीचेके एक बड़े उपभोक्ता समुदाय पर भी संकट का आना और बढना तय है |फिर देर - सबेर ऐसे सुपर मार्केट के मालो - सामानों के मूल्य भी उनके बड़े एकाधिकारी मालिको द्वारा तय किया जाने वाला है एकाधिकारी मूल्य बन जाना है | बाज़ार में उनकी स्थिति के मजबूत होते ही उपभोक्ता को कम्पनियों द्वारा तय किया गया यही एकाधिकारी मूल्य चुकाना पडेगा | ये सारे तथ्य केवल विदेशी रिटेल कम्पनियों के बारे में ही सच नही है , बल्कि देश की बड़ी रिटेल कम्पनियों के बारे में भी सच है | इन सबके वावजूद इन देशी - विदेशी कम्पनियों तथा उनके पैरोकार बने धनाढ्य किसानो और बेहतर व उच्च स्तरीय उपभोक्ताओं के वास्तविक स्वार्थो , हितो , लाभों व सुविधाओं को छिपाया जा रहा है |उसकी जगह खुदरा बाज़ार से आम किसानो , बेरोजगारों , छोटे व्यापारियों , छोटे उद्यमियों ,और आम उपभोक्ताओं के बारे में झूठे व भ्रामक लाभों , सुविधाओं को पाते हुए प्रस्तुत किया जा रहा है | ताकि इस क्षेत्र में आ रही बड़ी देशी - विदेशी कम्पनियों के लिए इन प्रचारों के जरिये व्यापक जनसाधारण से समर्थन लिया जा सके |उनके विरोध को खड़ा होने से पहले पहले ही विखंडित किया और दबाया जा सके | यही चाल है देश के बड़े लोगो की।











सुनील दत्ता
पत्रकार

3 टिप्‍पणियां:

अरूण साथी ने कहा…

विचारनीय एवं गंभीर आलेख

अरूण साथी ने कहा…

विचारनीय एवं गंभीर आलेख

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!