गुरुवार, 19 जनवरी 2012

पूँजीवादी व्यवस्था को मुख्य खतरा वामपंथ से है: कामरेड अशोक-2

प्रश्न: उत्तर भारत, खासकर उत्तर प्रदेश की राजनीति को आपने बहुत पास से देखा है। क्या वजह है कि हिंदी क्षेत्र में वामपंथी आंदोलन कभी कोई खास असर नहीं छोड़ पाया। या यों कहें जो कुछ हासिल भी था वह भी हाथ से निकल गया। ऐसा क्यों?

उत्तर: नहीं, मैं ऐसा नहीं मानता। विधानसभाओं में प्रतिनिधत्व को ही किसी आंदोलन या राजनैतिक दल के योगदान का बैरोमीटर नहीं समझना चाहिए। उत्तर भारत और खासकर उत्तर प्रदेश की परिस्थितियाँ देश के दूसरे हिस्सों मसलन बंगाल, केरल, त्रिपुरा, तमिलनाडु आदि से भिन्न हैं। हिंदी पट्टी का यह ऐसा क्षेत्र है जहाँ शुरुआत से ही सामाजिक सुधारों, भूमि सुधारों और जनवादी प्रगतिशील आंदोलनों की रफ्तार धीमी रही। सामंती व्यवस्था और नई औद्यौगिक पूँजीवादी व्यवस्था के बीच का सफर धीमा रहा। यानी यहाँ एक ऐसा समाज बड़े पैमाने पर आज भी कायम है जिसमें आधुनिकता और विकास के ऊपर से दिखने वाले रंगीन पैबंद तो लगा दिए गए लेकिन आर्थिक सामाजिक व्यवस्था सड़ी-गली रही। कम्युनिस्ट पार्टियों ने आजादी के पहले से ही इसके खिलाफ कई बड़ी लड़ाइयाँ लड़ीं और सफलताएँ भी हासिल कीं। विधानसभा में भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का सशक्त प्रतिनिधित्व दशकों तक रहा। कौन भूल सकता है 1989 में सांप्रदायिक राजनीति के चरम उफान के दौर में भी फैजाबाद से कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी द्वारा लोकसभा चुनाव जीतना। कहने का तात्पर्य यह है कि वामपंथ के प्रति लोगों को भरोसा रहा है। हालाँकि सांप्रदायिक और जातिवादी राजनीति का उभार इतना जबर्दस्त रहा कि की बीते दो दशकों में वामपंथी आंदोलन कुछ शिथिल हुआ। शायद हम लोग आम जनता को राजनैतिक-वैचारिक रूप से उतना संगठित नहीं कर पाए, जितना जरूरी था। बावजूद इसके गोविंद बल्लभ पंत से लेकर मायावती के दौर तक कम्युनिस्ट पार्टीं मजबूती से जनता के बीच काम कर रही है तथा वर्ग संघर्ष के आधार पर गरीबों, किसानों को संगठित करने के लिए संकल्पित है। यकीन मानिए कि वक्त बदल रहा है, जातिगत और साम्प्रदायिक उभार अब थम रहा है। जनता को एहसास हो रहा है कि इस तरह की राजनीति ने उसका नुकसान ही किया है। वैचारिक संघर्ष लगातार तीखा हो रहा है।

प्रश्न: आपने राजनीति में जातिगत उभार का जिक्र किया। मायावती और उनकी बहुजन समाज पार्टी ने सिर्फ बेहद कम समय में जबर्दस्त सफलता हासिल की, बल्कि दलित आंदोलन को भी एक दिशा दी है। कम्युनिस्ट पार्टी बसपा के योगदान और भविष्य को किस रूप में देखती है?

उत्तर: बहुजन समाज पार्टी दलित चेतना के विकास का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन बसपा की वजह से दलितों को कुछ ठोस हासिल हुआ हो, मैं ऐसा नहीं मानता। जातिगत भेदभाव के खिलाफ दलितों को लामबंद कर लेने, उन्हें एक मजबूत वोटबैंक में बदल देने और उन्हें उनकी राजनैतिक ताकत का एहसास दिला देने भर से जातिगत भेदभाव, असमानता खत्म नहीं होगी। बसपा का कोई भी दस्तावेज या उनका नेता क्या यह बताएगा कि दलितों के आर्थिक सशक्तिकरण, शैक्षणिक विकास के लिए उनके पास क्या नीति है। हमें यह समझना होगा कि हजारों साल से कायम जाति व्यवस्था के मूल में है आर्थिक असमानता, जिसे गाँवों के भीतर जमीन के असमान बँटवारे के रूप में भी देखा जा सकता है। मायावती के तीन कार्यकालों में कितने दलित किसानों को जमीनें मिलीं ताकि वह अपना और परिवार के पेट पालने के लिए उच्च जातियों पर निर्भर न रहें। हमें यह समझना होगा कि मायावती जैसी नेता और बसपा जैसे राजनैतिक दल अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए दलित चेतना के उभार के लिए तो प्रयत्नशील रहेंगे लेकिन जातिवाद खत्म हो जाए ऐसा कभी नहीं चाहेंगे। इसलिए दलित महापुरुषों के नाम पर पार्क और स्मारक तो बनेंगे, लेकिन आर्थिक-सामाजिक भेदभाव खत्म करने के लिए ठोस बुनियादी काम कभी नहीं होंगे। कम्युनिस्ट पार्टी ने 70 के दशक में देश में भूमि आंदोलन चलाया था। तब लगभग 10 लाख एकड़ जमीन गरीब काश्तकारों में बाँटी गई थी, जिनमें सबसे ज्यादा दलित थे। मायावती के तीन बार के शासन में कितने दलितों को जमीन मिली, उनकी शिक्षा के लिए कौन सा बड़ा काम हुआ। दलित समाज भी अब इन बातों को समझ रहा है। दलित आंदोलन के भीतर ही मायावती-बसपा की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। 2012 के विधानसभा चुनाव के परिणाम चैंकाने वाले होंगे।

प्रश्न: ऐसे दौर में जब हर प्रमुख राजनैतिक दल के नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे हैं, वाम दलों का दामन साफ नजर आता है, फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर सकते हैं तो वामदल क्यों नहीं?

उत्तर: हमने अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का स्वागत किया था, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ हम लोग तो अपने गठन के वक्त 1925 से ही लड़ रहे हैं। हम ऐसे जनआंदोलनों का समर्थन करते हैं, पर यह भी मानते हैं कि खाली लोकपाल के गठन से ही देश में भ्रष्टाचार खत्म नहीं हो जाएगा।
अन्ना के आंदोलन की सफलता यह है कि उसने दिखा दिया कि देश की जनता में भ्रष्टाचार, खासकर राजनैतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ कितना जबर्दस्त आक्रोश है। पर हमें यह समझना होगा कि देश से भ्रष्टाचार तब तक खत्म नहीं होगा जब तक जनविरोधी आर्थिक-राजनैतिक नीतियों के विरुद्ध संघर्ष नहीं तेज होगा। लेफ्ट पार्टियों को बड़ी तेजी के साथ जनता के इस आक्रोश को सही दिशा देनी होगी। हम लोग यह प्रयास कर रहे हैं। लोगों का नजरिया बदल रहा है। कम्युनिस्ट पार्टियों के कार्यक्रमों में यह बदलाव दिखेगा।

प्रश्न: किसी भी तरह के गठबंधन से अलग 2012 के यूपी विधानसभा चुनाव में वाममोर्चे की स्वतंत्र पहल को क्या कार्यक्रम के इसी बदलाव की एक कड़ी के रूप में देखा जाए?

उत्तर: लोग इसे किसी भी नजरिए से देखें, वे स्वतंत्र हैं। पर वाम मोर्चे के सभी दलों-भाकपा, माकपा, फारवर्ड ब्लाक और आर0एस0पी0 का यह स्पष्ट मत है कि हमें बुर्जुआ राजनैतिक दलों में से किसी से भी कोई चुनावी तालमेल नहीं करना है। ये दल जनता का विश्वास खो चुके हैं। इसीलिए वामदल मिलकर के और बड़ी मजबूती के साथ इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में १०० से ज्यादा प्रत्याशी उतारेंगे। हम एक मजबूत विकल्प के रूप में जनता के समक्ष जाना चाहते हैं। हमें भरोसा है कि हमारी यह पहल कामयाब होगी। पूँजीवाद, जातिवाद परस्त राजनैतिक दलों से जिस जनता का मोहभंग हुआ है वह निश्चित ही हमें एक बेहतर विकल्प के रूप में देखेगी।

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