बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

चुनाव में पूंजीपतियों के रुपयों का प्रयोग सबसे पहले कांग्रेस ने शुरू किया

मध्य प्रदेश से कम्युनिस्ट सांसद होमी दाजी को चुनाव जीतने देने के लिये बिरला जी ने जमकर रुपया कांग्रेसी उम्मीदवार के ऊपर खर्च किया था बिरला जी ने टेबल पर गुस्से में मुट्ठी ठोककर कहा कि मै देखता हूँ अब दाजी कैसे संसद में आता हैदाजी को लोकसभा चुनाव जीतने देने के लिये पूंजीपतियों की पैसों की पोटलियाँ खुल गयींउसके पहले तक चुनाव में पैसों का ऐसा दखल नहीं होता थादाजी के सामने कांग्रेस की तरफ से प्रकाश चन्द्र सेठी थेउन्होंने दोनों हाथों से बिरला का पैसा बांटाचुनाव के समय, जब हम गाँवों में प्रचार के लिये जाते थे तो गाँव की भोली-भाली, अनपढ़ महिलाएं कहती थी कि पंजे वाले लोग हमें एक-एक साडी, एक-एक शराब की बोतल और 10 किलो गेंहू दे गए हैं
संसद में होमी दाजी ने कहा था कि मेरे प्रदेश का नाम मध्य प्रदेश से बदल कर सरकार बिरला प्रदेश क्यों नहीं रख देती ?
मुख्यमंत्री का बेटा, वित्तमंत्री का बेटा, मुख्य सचिव का बेटा, मुख्य सचिव की पत्नी का भाई, सचिव का भाई-ये सब बिरला के कर्मचारी हैंऔर ये सब किसी तकनीकी पद के लिये नहीं नियुक्त किये गए हैंये सब उनके जन संपर्क अधिकारी (पी.आर.) हैं जिनका एक मात्र काम मध्य प्रदेश के सचिवालय के चक्कर लगाना और कंपनी के लिये लाइसेंस और लीज हासिल करना है
यह तथ्य हैं कि मतदाताओं की खरीद फरोख्त का कार्य सबसे पहले कांग्रेस ने ही प्रारंभ किया था और उसके बाद जैसे-जैसे देश का विकास हुआ। उद्योगपति बढे उन्होंने अपने हितों के लिये विभिन्न राजनितिक दलों को खरीद कर चुनाव लड़ाने लगे।
लाल रंग से लिखे गए वाक्य पेरिन दाजी द्वारा लिखित तथा विनीत तिवारी द्वारा सम्पादित "यादों की रौशनी में" से साभार लिये गए हैं

सुमन
लो क सं घ र्ष !

2 टिप्‍पणियां:

Vivek Rastogi ने कहा…

शुरूआत किसी ने भी की हो, परंतु आजकल तो सब यही करते हैं।

saahitya ने कहा…

sach he kaha hai