बुधवार, 18 अप्रैल 2012

महान क्रांतिकारी महावीर सिंह-2


साडर्स की हत्या के बाद महावीर सिंह फिर अस्वस्थ रहने लगे लाहौर का पानी उनके स्वास्थ्य के लिए अनुकूल नही पड़ रहा था उधर लाहौर का वातावरण भी काफी गरम था सुखदेव ने उन्हें संयुक्त प्रांत ;उत्तर . प्रदेश वापस जाने की सलाह दी आगरा का पता उनके पास नही था इसलिए वे कानपुर चले गये और चार दिन सिसोदिया जी के पास छात्रावास में रहे फिर इलाज के लिए अपने गाँव पिता जी के पास चले गये आज एक गाँव तो कल दूसरे गाँव आज एक सम्बन्धी के यहा तो कल किसी दूसरे सम्बन्धी या मित्र के यहा इस प्रकार रोज जगह बदलकर पिताजी से इलाज करवाने में लग गये कि जल्द .से .जल्द स्वस्थ होकर मोर्चे पर वापस जा सके सन 1929 में दिल्ली असेम्बली भवन में भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त द्वारा बम फेके जाने के बाद लोगो की गिरफ्तारिया शुरू हो गयी और अधिकाशक्रांतिकारी पकडकर लाहौर पहुचा दिए गये महावीर सिंह भी पकडे गये पुलिस या जेलवालो से किसी ।न किसी बात पर आये दिन क्रान्तिकारियो का झगड़ा हो जाता था उस समय वे लोग मोटे। तगड़े साथियो को चुन लेते थे और सबका गुस्सा उन पर उतारते इस प्रकार हर मारपीट में भगत सिंहकिशोरी लाल एमहावीर सिंह एजयदेव कपूर एगया प्रसाद आदि कुछ मोटे ।तगड़े साथियो को बाकी के हिस्से की मार खानी पड़ती थी जेल में क्रान्तिकारियो द्वारा अन्याय के विरुद्ध 13 जुलाई ए1929 से आमरण अनशन शुरू किया गया दस दिनों तक तो जेल अधिकारियों ने कोई विशेष कार्यवाही नही की उनका अनुमान था कि यह बीस ।बीस बाईस ।बाईस साल के छोकरे अधिक दिनों तक बगैर खाए नही रह सकेंगे लेकिन जब दस दिन हो गये और एक ।एक कर साथी बिस्तरों पर पड़ने लगे तो उन्हें चिंता हुई सरकार ने अनशनकारियो कि देखभाल के लिए डाक्टरों का एक बोर्ड नियुक्त कर दिया था अनशन के ग्यारहवे दिन से बोर्ड के डाक्टरों ने बलपूर्वक दूध पिलाना आरम्भ कर दिया महावीर सिंह कुश्ती भी करते थे और गले से भी लड़ते थे जेल अधिकारी को पहलवानों के साथ अपनी कोठरी की तरफ आते देख वे जंगला रोकर खड़े हो जातेएक तरफ आठ .दस पहलवान और दूसरी तरफ अनशन के कमजोर महावीर सिंह पांच .दस मिनट की धक्का .मुक्की के बाद दरवाजा खुलता तो काबू करने की कुश्ती आरम्भ हो जाती एक दिन जेल के दो अधिकारी को आपस में बात करते सुना कि 63 दिनों के अनशन में एक दिन भी ऐसा नही गया जिस दिन महावीर सिंह को काबू करने में आधे घंटे से कम समय लगा हो डाक्टर के साथ भी ऐसी ही बीतती थी महावीर सिंह ने शत्रु की अदालत को मान्यता देने से इनकार कर दिया था लाहौर षड्यंत्र केस केअभियुक्तों के प्रचार से घबड़ाकर केस को जल्द .से जल्द समाप्त कर देने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने 1930 के आरम्भ में एक अध्यादेश जारी किया जिसका नाम था लाहौर षड्यंत्र केस आध्यादेशइसे 1930 का तीसरा अध्यादेश भी कहा गया था द्यआध्यादेश के अनुसार लाहौर हाईकोर्ट के तीन जजों का एक ट्रिब्यूनल नियुक्त कर मजिस्ट्रेट की अदालत से केस उठाकर नयी अदालत को सुपुर्द कर दिया गयानयी अदालत को यह भी अधिकार था कि उसकी निगाह में जब भी अभियुक्त दोषी प्रमाणित हो जाए एतो बाकी गवाहों की गवाहिया लिए बगैर वही पर केस की सुनवाई समाप्त कर वह अपना निर्णय दे सकती थी इस अदालत के विरुद्ध कही भी अपील नही हो सकती थी अदालती सुनवाई के दौरान महावीर सिंह तथा चार अन्य साथियो ने ;कुंदन लाल बटुकेश्वर दत्तगयाप्रसाद और जितेन्द्रनाथ सान्याल एक बयान द्वारा अपने उद्देश्य की व्याख्या करते हुए कहा की वे शत्रु की अदालत से किसी प्रकार के न्याय की आशा नही करते है यह कहकर उन्होंने अदालत को मान्यता देने और उसकी कार्यवाही में भाग लेने से इनकार कर दिया था
महावीर सिंह तथा उनके साथियो का यह बयान लाहौर षड्यंत्र केस के अभियुक्तों की उस समय की राजनितिक एवं सैद्दानतिक समझ पर अच्छा प्रकाश डालता है बयान के कुछ अंश इस प्रकार थे
हमारा यह दृढ विश्वास है की साम्राज्यवाद लुटने .खसोटने के उद्देश्य से संगठित किए गये एक विस्तृत षड्यंत्र को छोडकर और कुछ नही है साम्राज्वाद मनुष्य द्वारा मनुष्य का तथा एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र को धोखा देकर शोषण करने की नीति के विकास की अंतिम अवस्था है साम्राज्यवादी अपने लूट .खसोट के मंसूबो को आगे बढाने की गरज से केवल अपनी अदालतों द्वारा ही राजनीतिक हत्याये नही करते वरन युद्ध के रूप में कत्ले .आम विनाश तथा अन्य कितने वीभत्स एवं भयानक कार्यो का संगठन करते है द्यऐसे लोगो को जो उनकी लूट .खसोट की माँगों को पूरा करते है या उनके तबाह करने वाले घृणित मंसूबो का विरोध करते है गोली से उड़ा देने में वे जरा भी नही हिचकिचाते न्याय तथा शान्ति का रक्षक होने के बहाने वे शान्ति का गला घोटते है अशांति की सृष्टि करते हैबेगुनाहों की जाने लेते है और सभी प्रकार के जुल्मो को प्रोत्साहन देते है
हमारा यह विश्वास है कि मनुष्य होने के नाते हर व्यक्ति आजादी का हक़दार है एउसे कोई दुसरा व्यक्ति दबाकर नही रख सकता हर मनुष्य को अपनी मेहनत का फल पाने का पूरा अधिकार है और हर राष्ट्र अपने साधनों का पूरा मालिक है यदि कोई सरकार उन्हें उनके इन प्रारम्भिक अधिकारों से वंचित रखती है तो लोगो का अधिकार है .नही उनका कर्तव्य है की ऐसी सरकार को उलट दे उसे मिटा दे चूँकि ब्रिटिश सरकार इन वसूलो से जिन के लिए हम खड़े हुए है बिलकुल परे है इसलिए हमारा दृढ विश्वास है कि क्रान्ति के द्वारा मौजूदा हुकूमत को समाप्त करने के लिए सभी कोशिशे तथा सभी उपाय न्याय संगत है हम परिवर्तन चाहते है .सामाजिक राजनितिक तथा आर्थिक सभी क्षेत्रो में आमूल परिवर्तन हम मौजूदा समाज को जड़ से उखाडकर उसके स्थान पर एक ऐसे समाज की स्थापना करना चाहते है कि जिसमे मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण असम्भव हो जाए और हर व्यक्ति को हर क्षेत्र में पूरी आजादी हासिल हो जाए हम महसूस करते है की जब तक समाज का पूरा ढाचा ही नही बदला जाता और उसकी जगह पर समाजवादी समाज की स्थापना नही हो जाती तब तक दुनिया महाविनाश के खतरे से बाहर नही है.
क्रमश:
- सुनील दत्ता .
पत्रकार

1 टिप्पणी:

udaya veer singh ने कहा…

विचारशील रचना आभार जी /