
.पेट की इस आग को इज़्हार तक लेकर चलो।
इस हक़ीक़त को ज़रा सरकार तक लेकर चलो।
मुफ़लिसी भी, भूख भी, बीमारियाँ भी इसमें हैं,
अब तो इस रूदाद को व्यवहार तक लेकर चलो।
डूबना तो है सफ़ीना, क्यों न ज़ल्दी हो ये काम
तुम सफ़ीने को ज़रा मँझधार तक लेकर चलो।
बँट गए क्यों दिल हमारे, तज़्किरा बेकार है
क्यूँ न इस अहसास को आधार तक लेकर चलो।
हाँ, इसी धरती पर छाएँगी अभी हरियालियाँ
हौसला बरसात की बौछार तक लेकर चलो।
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4 टिप्पणियां:
मतला ही क्या हर शेर लाजवाब है। बधाई
अदम साहब की याद करा दी इस लाजवाब मतले ने ... भरपूर गजल ...
कल 25/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
Bahut khoobsurat gazal hai.. bahut hi arthpurn evam srthak sandesh
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