बुधवार, 13 जून 2012

भिखमंगा बनाने वाला अर्थशास्त्री ?

1930 के दशक में आर्थिक संकटों को दूर करने के लिए अपनाई गयी राजकीय कार्य प्रणाली के विपरीत आज के दौर में सभी राष्ट्रों की सत्ता -- सरकारे लोगो को ज्यादा से ज्यादा रोजगार देने में कल्याणकारी भूमिका की जगह धनाढ्य वर्गो के लिए ही कल्याणकारी भूमिका निभाती जा रही है | खासकर भारत जैसे देशो में तो हुक्मरान हिस्से एकदम नग्न रूप में और पूरी निर्दयता के साथ जनसाधारण के रोजी -- रोजगार के अवसरों को काटने घटाने में लगे हुए है


2008 से पूरे विश्व में फैलते रहे आर्थिक संकट पर चर्चा चलती रही है | इस समय यूरोपीय देशो के बढ़ते आर्थिक संकटों ने वहा के राजनितिक माहौल को गरमादिया है | खबरों के अनुसार वहा इसी आधार पर सरकारों के गिरने बनने का सिलसिला शुरू हो गया है | उदाहरण ... फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति सरकोजी चुनाव हार गये है | उसकी जगह वामपंथी उम्मीदवार चुनाव में विजयी हुए है | उनके चुनाव प्रचार का प्रमुख मुद्दा
फ्रांस के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों पर टैक्स वृद्धि के जरिये लोगो को राहत पहुचाने तथा जनविरोधी आर्थिक नीतियों को बदलने का था | संभवत: इसी आधार पर उन्हें वोट की निर्णायक बढत हासिल भी हुई है | हालाकि फ्रांस अभी उस तरह के आर्थिक मंदी में नही है जितना की यूरोप के कई देश है | जिनमे मुख्यत: इटली , स्पेन , बेल्जियम , आयरलैंड , ग्रीस,स्लोवाकिया , नीदरलैंड शामिल है | इनके अलावा ब्रिटेन , डेनमार्क एवं चेक गणराज्य भी मंदी के गिरफ्त में आते जा रहे है | इस मंदी के फलस्वरूप इन देशो में बेरोजगारी में वृद्धि दर के आंकड़े तेजी से बढ़ते जा रहे है | राज्य के राजस्व घाटे बढ़ते जा रहे है | औद्यगिक उत्पादन व बाजार में गिरावट आती जा रही है | खबरों के अनुसार 2008 में अमेरिका से उठा वित्तीय संकट अब यूरोप में नए आयामों के साथ बढ़ रहा है | हालाकि इसका असर बड़ी औद्यगिक वाणिज्य एवं वित्तीय कम्पनियों पर व्यापक रूप में पड़ता नजर नही आ रहा है | उनके लाभों , मुनाफो पूंजियो परीसम्पत्तियों में अभी व्यापक एवं उल्लेख्यनीय गिरावट की चर्चा भी सुनाई नही पद रही है | इसके वावजूद आर्थिक मंदी के नाम पर इन धनाढ्य कम्पनियों को 2008 से ही टैक्स आदि में छूटो के साथ विभिन्न देशो की सरकारों द्वारा '' बेल आउट पॅकेज '' या ''प्रोत्साहन पॅकेज'' दिया जाता रहा है |

हमारे देश में इन्हें लाखो करोड़ का पॅकेज प्रतिवर्ष दिया गया है और संभवत:आगे भी दिया जाएगा | जबकि 2008 से 2011 तक में यह दावा बराबर किया जाता रहा की यह देश वैश्विक वित्तीय संकट से बहुत कम प्रभावित हुआ है
अब इस देश के निर्यात और निर्यात्न्मुख अर्थव्यवस्था के मन्दी के तरफ बढ़ते रहने के बारे में चर्चाये गरम है | खबरों के अनुसार आर्थिक संकट के कारण यूरोपीय देशो को होने वाला निर्यात कम होता जा रहा है | क्योंकि आर्थिक संकट के चलते अब विदेशी माँग व बाजार में गिरावट या पहले की तुलना में वृद्धि दर में गिरावट आती जा रही है | इसी के साथ देश की व्यापक जनता में बढ़ते संकटों के चलते घरेलू माँग व घरेलू बाजार में गिरावट हो रही है | यह गिरावट खासकर टिकाऊ था उच्च स्तरीय उपभोग के मालो सामानों में आ रही है | फलस्वरूप देश के औद्योगिक उत्पादन वृद्धि दर में भी गिरावट जा रही है और राजकोषीय घाटा बढ़ता जा रहा है | आर्थिक विकास वृद्धि अब पहले से 9 % से घटकर लगभग 7 .5 % तक पहुच गया है | फिर आम जनता में बढती महगाई खासकर आम उपभोग के गैर टिकाऊ सामानों की महगाई , टूटते रोजी -- रोजगार और बढती बेकारी बेरोजगारी के संकट तो पिछले 20 सालो से तेजी से बढ़ते रहे है | अब इसकी रफ़्तार और तेज हो गयी है | यही स्थिति जनहित के शिक्षा स्वास्थ्य जैसी सेवाओं की भी है |
बढ़ते संकट के नाम पर धनाढ्य वर्ग को पिछले 3 -- 4 सालो में टैक्स आदि में छूटो के साथ प्रोत्साहन पॅकेज दिए जाते रहे है | जबकि प्रोत्साहन व छूट का पॅकेज पाने वाली धनाढ्य कम्पनिया शायद अभी जाहिरा तौर पर संकट या घाटे में नही बल्कि लाभ में है | उनमे तिमाही छमाही के प्रदर्शित होने वाले आंकड़ो से भी उनके बढ़ते लाभों पूंजियो परीसम्पत्तियों की पुष्टि होती रहती है | उनकी जगह स्पष्ट रूप से जीविका के संकटों में घिरते जा रहे जनसाधारण के आवश्यक छूटो को भी बुरी तरह के काटा -- घटाया जा रहा है | यह काम अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे विकसित देशो से लेकर भारत जैसे विकासशील देशो तक में डंके की चोट पर किया जा रहा है | आर्थिक संकट के नाम पर किया जा रहा है |
इसी तरह से आर्थिक संकट घटाने के नाम पर सरकारी खर्च घटाने की चर्चाये तो खूब होती रही है | पर उसे घटाने की जगह उसे हर तरह से बढाया जाता रहा है | राजनेताओं , नौकरशाहों से लेकर औसत कर्मचारियों के सरकारी वेतनों भत्तो एवं सुविधाओं में बिन कहे बढ़ोत्तरी की जाती रही है | हां खर्चे घटाने के नाम पर अंधाधुंध तकनिकी आयात के साथ छटनी को बढावा देने तथा मजदूरों कर्मचारियों की सरकारी भर्ती पर रोक लगाने का काम किया जाता रहा है | यह है आर्थिक मंदी को दूर करने की मौजूदा प्रणाली | यह प्रणाली 1930 के दशक की विश्व व्यापी आर्थिक मन्दी को यूरोपीय देशो से दूर करने की प्रणाली से एकदम अलग है , बल्कि उल्टी दिशा में है | 1930 के दशक की मंदी के लिए अर्थशास्त्री कीन्स के सुझाव अनुसार राज्य और सरकार को लोक कल्याणकारी राज्य की भूमिका में खड़े हो कर मजदूरों एवं अन्य जनसाधारण हिस्सों में रोजगार को बढावा देना था | उसकी क्रय शक्ति को बढाना था , ताकि बाजार व विनिमय को और फिर उत्पादन , पुनरुत्थान को बढावा दिया जा सके | यूरोपीय देशो के राज्यों ने इस सलाह अनुसार कार्य प्रणाली भी अपनाई | हां उस संकट का सर्वाधिक बोझ ढोते रहे भारत जैसे औपनिवेशिक देशो में वह कार्य -- प्रणाली नही अपनाई गयी | यहा के लोगो को अपने पिछड़ेपन और फिर ब्रिटिश साम्राज्यवादी संकटों का बोझ ढोते हुए जीने मरने के लिए छोड़ दिया गया | यूरोपीय देशो में उस दौर में संकटों को दूर करने के लिए अपनाई गयी राजकीय कार्य प्रणाली के विपरीत आज के दौर में सभी राष्ट्रों की सरकारे लोगो को ज्यादा से ज्यादा रोजगार देने की कल्याणकारी भूमिका की जगह धनाढ्य वर्गो के लिए कल्याणकारी भूमिका निभाती जा रही है | खासकर भारत जैसे देशो के हुक्मरान हिस्से एकदम नग्न रूप में और पूरी निर्दयता के साथ जनसाधारण के रोजी रोजगार के अवसरों को काटने -- घटाने में तुला हुआ है | धनाढ्य कम्पनियों को आर्थिक संकट के नाम पर और ज्यादा चडाने -- बढाने में लगे हुए है | इसी का सबूत यह है की वे जनसाधारण को संकटग्रस्त करती रही तथा धनाढ्य वर्गो को चढाती बढाती रही नीतियों को सर्वसम्मती से मोर्चाबद्ध सहयोग से आगे बढाने में लगे हुए है |
साफ़ बात है की मौजूदा दौर के बहुप्रचारित संकट का वास्तविक उद्देश्य जनसाधारण को संकटों से किसी हद तक उबारना नही है बल्कि उसे और अधिक संकटों में धकेलना है |मरने व बर्बाद होने के लिए बाध्य कर देना है | यह काम एकदम सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है | इसलिए देश के जन साधारण को देश के हुक्मरानों से महगाई बेकारी जैसे संकटों से उबारने के किसी वास्तविक स्थायी एवं दूरगामी प्रयास की उम्मीद एकदम छोड़ देनी चाहिए | अब उसके संकटों के वास्तविक समाधान की शुरुआत तभी शुरू होगी जब देश -- दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च तबको पर उनके लाभों , आमदनियो पर अंकुश लगे | यह काम संगठित जन आन्दोलन के बगैर होने वाला नही है | फ्रांस के नए राष्ट्रपति को बहुमत इसलिए मिला है की उन्होंने वहा के धनाढ्य वर्गो पर टैक्सों को बढाकर लोगो में रोजगार को बढावा देने का वादा किया है | हालाकि इस दौर की वैश्वीकरणवादी , बाजारवादी व्यवस्था में सत्ताधारी वामपंथियो ने भी यह काम नही किया है | उम्मीद है की फ्रांस में भी यह काम होगा नही |
अब आप भिखमंगा बनाने वाला अर्थशास्त्री को पहचानने का कष्ट करें।
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

अजय कुमार झा ने कहा…

सटीक विश्लेषण सुमन जी ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सार्थक प्रस्तुति!

khalid khan ने कहा…

bahut hi vevstit likhe.sundar