सोमवार, 25 जून 2012

डालर के मुकाबले रूपये का गिरता मूल्य






रूपये के गिरते मूल्य का लाभ डालर में विदेशी कम्पनियों , देशी निर्यातकोके साथ राष्ट्रीयअन्तराष्ट्रीय कारोबार में लगी दिग्गज कम्पनियों को पहले से मिलता रहा है | इसलिए उसकी चिंता न तो विदेशियों को है और न ही देश के धनाढ्य हिस्सों व हुक्मरानों को



16 मई की खबरों के अनुसार डालर के मुकाबले रूपये के मूल्य में 67 पैसे की गिरावट हो गयी है | इस गिरावट के पश्चात एक डालर की कीमत 54 .46 रूपये हो गयी है | थोड़ा रुक -- रुक कर रूपये के मूल्य में यह गिरावट पिछले कई महीनों से चलती जा रही है | इसकी खबरे भी यदा -- कडा आती रही है | पर शासकीय व प्रचार माध्यमि हलको में इस गिरावट पर कोई गंभीर चिंता चर्चा नही की जाती रही है | इसके ठीक विपरीत लगभग डेढ़ वर्ष पहल डालर के मुकाबले रूपये का मूल्य चढ़ रहा था | हालाकि यह मामला कुछ दिनों का ही था , पर उस
बीच शासकीय व प्रचार माध्यमि क्षेत्रो में इसे लेकर चिंताए चर्चाये चलने लगी थी | खासकर डालर के मुकाबले रूपये की उस मजबूती से देश विदेशो को होने वाले निर्यात में कमी आने की आशंकाओं को लेकर इसी के साथ निर्यात में कमी से विदेशी व्यापार में बढने वाले घाटो पर भी चिंताए चेचाये की जाने लगी थी | फिर जैसे ही डालर के मुकाबले रूपये का मूल्य गिरना शुरू हुआ वे सारी चिंताए चर्चाये गायब हो गयी |
इधर कुछ महीनों से रूपये के गिरते मूल्य पर नही बल्कि गिरते मूल्य के वावजूद निर्यात न बढ़ पाने पर चिंताए चर्चाये की जाती रही है | घटते निर्यात के प्रमुख कारणों पर खासकर यूरोपीय देशो तथा अमेरिका में बढ़ते आर्थिक मंदी से घटती माँग पर चर्चाये की जाती रही |यह है डालर के मुकाबले रूपये के गिरते मूल्य पर देश की सत्ता सरकारों से लेकर उच्च स्तरीय अर्थशास्त्रीय व प्रचार माध्यमि स्थितिया | उन्हें रूपये के चदते मूल्य पर कही ज्यादा चिंता है , क्योंकि उससे देश के उत्पादों का दाम रूपये के मुकाबले कमजोर होते डालर में बढ़ जाता है | विदेशियों के लिए वह अन्य देशो से हो रहे निर्यात के मुकाबले महगा हो जाता है | फलत: देश से होने वाले निर्यात में कमी आ जाती है | अंधाधुंध बढ़ते आयात के मुकाबले घटते निर्यात से विदेशी व्यापार में घाटा बढने लग जाता है | निर्यातको के लाभ दर में कमी आ जाती है | दरअसल यही चिंता चर्चा का प्रमुख कारण बन जाता है | देश के हुक्मरानों और अर्थशास्त्रियो विद्वानों का ''एकहि साधे सब सधे '' की तर्ज पर यह मानना है की अगर निर्यात बढ़ता रहे तो देश हर तरह से के विदेशी देनदारियो को पूरा करने में सफल रहेगा | उनकी इस अवधारणा के फलस्वरूप यह प्रचारित होता रहता है की बढ़ते आयात और उसके लिए बढती विदेशी कर्जो की अदायगियो पर चिंता मत करिये | निर्यात बढाने की चिंता करिये | इसका
स्वाभाविक मतलब निकल कर आटा है की डालर के मुकाबले रूपये की कमजोरी की नही बल्कि मजबूती की चिंता करिये , ताकि विदेशियों के लिए इस देश का निर्यात अन्य देशो के मुकाबले सस्ता बना रहे | विदेशो में देश के मालो -- सामानों की माँग बढती रहे |डालर के मुकाबले रूपये का मूल्य घटाने अर्थात रूपये का
अवमूल्यन करने का काम पहले से किया जाता रहा है | हां पहले यह काम अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दबावों निर्देशों के साथ किया जाता रहा है | लेकिन पिछले 15 सालो से देश की मुद्रा नीति में बदलाव के जरिये किया जा
रहा है और लगभग निरंतर किया जा रहा है | हालाकि रूपये के मूल्य में वर्तमान गिरावट तात्कालिक कारण यूरोपीय क्षेत्र के घटते निर्यात से कम विदेशी मुद्रा की आमद तथा विदेशी निवेशको द्वारा देश की आर्थिक साख घटने से कम निवेश घटाने आदि को गिनाया बताया जा रहा है | पर इसका वास्तविक कारण बढ़ते विदेशी संबंधो के साथ रूपये के मूल्य नियंत्रण को तिलांजली देना ही प्रमुख रहा है |
1998 से पहले देश के मूल्य पर नियंत्रण लागू था | देश की मुद्रा यानी रूपये के मूल्य पर उसके अन्य डालर समेत दूसरे विदेशी मुद्राओं के मूल्य -- संतुलन पर सरकार का प्रभावी नियंत्रण रहता था | इसके लिए विदेशी मुद्रा नियंत्रणकारी क़ानून लागू किए जाते रहे थे | 1998 के बाद उस नियंत्रण को हटाकर इसे विदेशी मुद्रा प्रबन्धन अधिनियम में बदल दिया गया | इन बदलाव के जरिये डालर व अन्य अन्तराष्ट्रीय मुद्राओं की तुलना में रूपये को राष्ट्रीय नियंत्रण से मुक्त करके अन्तराष्ट्री बाजार में परिवर्तनीय बनाने का काम चरणबद्ध रूप में आगे बढाया जाता रहा है | यह रूपये को सरकारी नियंत्रण से
मुक्त करना नही था जैसा की प्रचार किया जाता रहा है | बल्कि यह अन्तराष्ट्रीय प्रभुत्व हासिल किए डालर , पौंड मार्क जैसी मुद्राओं के मुकाबले कही कमजोर स्थिति वाले रूपये को बाजार में गिरने के लिए छोड़ देना था व है
| जो काम पहले मुख्यत:अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्देशों के जरिये किया जाता रहा था | अब वही काम वर्तमान दौर की विश्वकृत हो रही बाजार व्यवस्था के जरिये किया जा रहा है | वैश्वीकरणवादी नीतियों के अंतर्गत
किया जा रहा है | सवाल है की देश की मुद्रा यानी रूपये से राष्ट्रीय नियंत्रण कानून को हटाया क्यों गया वैश्वीकरण के अंतर्गत निरंतर बढती छूटो अधिकारों के साथ विदेशी व देशी कम्पनियों के लिए अंधाधुंध बढ़ते आयात व निर्यात के लिए रूपये पर तथा विदेशी मुद्रा के परवाह पर लगा रहा नियंत्रण बाधा बनने लगा था |विदेशी पूंजी तकनीक तथा वाणिज्य व्यापार के साथ बढ़ते विदेशी प्रभुत्व में खासकर अमेरिकी प्रभुत्व में उसकी मुद्रा का प्रभुत्व स्थापित किया जाना उनके लिए आवश्यक हो गया था | इसीलिए उदारीकरणवादी , वैश्वीकरणवादी था निजीकरणवादी नीतियों के दूसरे चरण में मुद्रा नियंत्रण की इस बाधा को भी हटा दिया गया ताकि विदेशी कम्पनियों और देश की भी बड़ी औद्यगिक वाणिज्य व वित्तीय कम्पनियों के परस्पर एकजुटता में उनके राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय छूटो अधिकारों में उनके बढ़ते लें -- देन वाणिज्य -- व्यापार में बेरोक -- टोक वृद्धि की जा सके |
रूपये के गिरते मूल्य का लाभ डालर में विदेशी कम्पनियों , देशी निर्यातको के साथ राष्ट्री -- अन्तराष्ट्रीय कारोबार में लगी दिग्गज कम्पनियों को पहले से मिलता रहा है | साथ ही इसका लाभ देश -- विदेश में भारी कमाई करने वाले उच्च स्तरीय फिल्मकारों , खिलाडियों तथा अन्य उच्च तबको की कमाई में भारी वृद्धि के रूप में होता रहा है | जहा तक रूपये के गिरते मूल्य से डालर में कर्जो व देनदारियो के बढने आयातित सामानों के रूपये में मूल्य बढने के फलस्वरूप बढ़ते व्यापार घाटे का है , तो उसकी चिंता न तो विदेशियों को है और न ही देश के धनाढ्य हिस्सों व हुक्मरानों को | क्योंकि इसकी अदायगी समूचे देश को करनी है न की विदेशी कर्ज व आयात का लाभ उठाने वाले वर्ग को |
राष्ट्र पर कर्जो व देनदारियो को सबसे ज्यादा चुकाने के साथ रूपये के गिरते मूल्य का घाटा भी देश के जनसाधारण को , आम नागरिको को ही उठाना है | उन्हें अब अन्य कारणों से बढती महगाई के बोझ के साथ रूपये के गिरते मूल्य के चलते भी बढती महगाई का बोझ उठाना है | क्योंकि उसे रूपये में ही मजदूरी पानी है , रूपये में ही आमदनी करनी है और फिर रूपये में ही खर्च करनी है |उसके रूपये की कीमत गिर रही है या कहिये गिराई जा रही है | डालर वालो की कीमत चडाई जा रही है | डालर वालो का बाजार पर प्रभुत्व बढाया जा रहा है रूपये केवल रूपये वालो को उसके प्रभुत्व में जीने मरने के लिए छोड़ा जा रहा है | यह केवल रूपये की ही गिरावट नही है बल्कि रूपये की कमाई करने और खर्च करने वाले बहुसंख्यक जनसाधारण की गिरावट का द्योतक है | अत: देश की मुद्रा पर राष्ट्रीय नियंत्रण स्थापित किए जाने की माँग के साथ विदेशी मुद्रा को विदेशी आयात निर्यात को विदेशी कम्पनियों के साथ -- गाठ को अंधाधुंध छूट देने के विरोध का काम भी देश के जनसाधारण को ही करना होगा
सुनील दत्ता
पत्रकार
09451370672

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