शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

‘‘स्तालिन युग’’: अन्ना लुर्डस्ट्रांग

आज जब पूंजीवादी अर्थव्यवस्था गंभीर संकट में है और आर्थिक संकट का समाधान नहीं हो पा रहा हैसमाजवादी अर्थ तंत्र के विशेषज्ञ जोजेफ स्तालिन ने अपनी अंतिम रचना में समाजवादी अर्थतंत्र के समस्यायों के निदान के सम्बन्ध में चर्चा की थीइस पुस्तक को जोसेफ स्तालिन के मरने के बाद पुन: प्रकाशित नहीं होने दिया गया थाइस पुस्तक का अनुवाद श्री सत्य नारायण ठाकुर ने किया है जिसके कुछ अंश: यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैंआप के सुझाव विचार सादर आमंत्रित हैं
-सुमन
लो क सं घ र्ष !
अंतिम सार्वजनिक कृति

अक्टूबर 1952 में उन्नीसवीं पार्टी कांग्रेस के लिए लिखी पचास पृष्ठों की रिपोर्ट स्तालिन की अंतिम सार्वजनिक कृति है। सन् 1939में हुई पिछली पार्टी कांग्रेस के बाद से तेरह वर्षों का अंतर पड़ गया था। उस बीच सोवियत संघ लगभग बर्बाद होकर पुनः निर्मित हो चुका था। ‘‘यह कांगे्रस इस ऊँचे आत्मविश्वास की पृष्ठ भूमि के हुई कि भविष्य में सोवियत गुट किसी भी संकट का मुकाबला कर सकता है और किसी भी परीक्षा में खरा उतर सकता है’’ - हैरिसन सैलाबेरी के न्यूयार्क टाइम्स में लिखा- ‘‘मुख्य राजनैतिक रिपोर्ट पेश करने का काम इस बार स्तालिन की जगह मालेन्कोव ने किया। सोवियत जनता ने इसका यह अर्थ लगाया कि स्तालिन अब अपना काम छोड़ने की तैयारी कर रहा है तथा मालेन्कोव को उत्तराधिकारी बनने के लिए तैयार कर रहा है।
स्तालिन के स्वयं ‘‘सोवियत संघ में समाजवाद की आर्थिक समस्याएँ’’ शीर्षक रिपोर्ट प्रस्तुत की। उसमें दुनिया की परिस्थिति का और उसके संभावित विकास का सैद्धांतिक विश्लेषण किया गया है। उसमें स्तालिन ने फिर कहा कि दूसरे विश्व युद्ध का आर्थिक परिणाम यह है कि ‘‘एक ही मिला जुला विश्व युद्ध व्यापी बाजार छिन्न-भिन्न हो गया है’’ तथा उसकी जगह पर ‘‘दो समानांतर और परस्पर विरोधी विश्व बाजार बन गए हैं।’’ पश्चिमी देशों द्वारा लगाई गई नाकेबंदी से मजबूर होकर सोवियत गुट ने अपने अर्थतंत्र को मजबूत कर लिया है, उसकी कमियां पूरी कर दी है और अब ‘‘अपना एक अलग विश्व बाजार बना लिया है।’’ सोवियत गुट के साथ व्यापार करने से इंकार करके पूँजीवादी जगत ने अपना ही बाजार सीमित कर लिया है। भविष्य में वह और भी सीमित होगा जिससे पूँजीवादी जगत के अंदरूनी विरोध और भी तीव्र होंगे। सोवियत संघ ‘‘पूँजीपतियों पर हमला नहीं करेगा पर इसे वे जानते हैं’’- स्तालिन ने कहा यह बात उसने पहले भी कही थी, किन्तु पहली बार उसने यह भविष्यवाणी की थी कि पूँजीवादी राष्ट्र ‘‘सोवियत संघ पर हमला करने से डरेंगे, क्योंकि इससे पूँजीवाद के ही नष्ट हो जाने का खतरा है।’’
अतः उसने निष्कर्ष निकाला कि पूँजीवादी जगत और सोवियत संघ जगत में युद्ध की अपेक्षा पूँजीवादी राष्ट्रों में आपस में ही युद्ध की संभावना ज्यादा है।
जबकि वासिंगटन में मकार्थीनुमा चरमवादी शीतयुद्ध अभी जोरों पर था, उस समय की गई यह भविष्यवाणी बहुत लोगों को उटपटांग कल्पना मालूम पड़ी। किन्तु स्तालिन ने उस सैनिक जिस की परिस्थिति का आभास किया था, जो आगे चलकर जिनेवा के चार बड़ों के शिखर सम्मेलन को जन्म देने वाली थी।
एशिया में तटस्थ राष्ट्रों के गुट के उदय तथा उस पर चीन के प्रभाव के स्तालिन ने भविष्य में होने वाले बांडुंग सम्मेलन का आभास देख किया था।
लेनिन ने अपने वसीयतनामे में विभिन्न पार्टी नेताओं केचरित्र का विश्लेषण किया था, जिसे वह अपने साथियों के लिए छोड़ गए। स्तालिन ने अपने वसीयतनामे में दुनिया के विभिन्न राष्ट्रों के चरित्र का विश्लेषण किया।

-अन्ना लुर्डस्ट्रांग
क्रमश:
अनुवादक- सत्य नारायण ठाकुर

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