सोमवार, 27 अगस्त 2012

कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नजर :ए . के हंगल

इतना '' सन्नाटा '' क्यों है , भाई

तू ज़िंदा है तो जिन्दगी की जीत पे यकीन कर ,
अगर कही है स्वर्ग तो उतर ला जमीन पर
ये गम के और चार दिन
सितम और चार दिन
ये दिन भी जायेंगे गुजर 
गुजर गये हजार दिन

कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नजर .....................जिन्दगी के रंगमंच में एक अजीब सी सकशियत  थे ए . के .हंगल जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन भारतीय  रंगमंच को दिशा देने में लगा दिया | थियेटर की दुनिया के बेताज बादशाह को फिल्मो में अभिनय करना कुछ ख़ास पसंद नही था  |
ए . के हंगल ने फिल्मो में काम करके अभिनय को एक  नया आयाम दिया | रंगमंच से जुड़े होने के कारण हंगल के अभिनय में एक सहजता थी < जिसकी वजह से वह हर किरदार में ढल जाया करते थे | फिल्म शोले का वह संवाद '' इतना सन्नाटा क्यों है भाई " फिल्म शोले में हंगल का किरदार बहुत बड़ा नही था , लेकिन नेत्रहीन बूढ़े के रूप में अपने पोते को खोने की आशंका से उनकी लरजती आवाज और बेचारगी के एहसास में बोला गया एक संवाद ''इतना सन्नाटा क्यों है भाई '' जैसे उन्हें एक नई पहचान दे गयी | अपनी आत्म कथा ''द लाइफ एंड टाइम आफ ए . के हंगल '' में उन्होंने इस बात का जिक्र किया है की किस तरह वह न चाहते हुए भी फ़िल्मी दुनिया में आये और लगातार '' भले आदमी '' के किरदार से निजात पाने की कोशिश करते रहे , जिसमे उन्हें ज्यादा सफलता नही मिल पाई | हंगल ने लिखा है , '' मेरी फिल्मो में कैरियर बनाने की कोई इच्छा नही थी और मैं अपने थियेटर की दुनिया में खुश था | हालात कुछ ऐसे बने जिन्होंने मुझे फिल्मो में धकेल दिया हालाकि इसे लेकर मुझे कोई अफ़सोस नही है | मैं उस अन्जान सी दुनिया में पूरी तरह घुल मिल गया , जिसे लोग '' शो बिजनेस ' कहते है यहाँ कई साल गुजारने के वावजूद मुझे लगता है की मैं यह के लिए बेगाना हूँ | देश की स्वतंत्रता संग्राम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने वाले अवतार किशन हंगल का जन्म 1 फरवरी 1917 को पाकिस्तान के सियालकोट में हुआ था | उनका बचपन पेशावर में गुजरा था | पेशावर में उन्होंने रंगमंच में कई बड़ी भूमिकाये निभाई | उनके पिता का नाम पंडित हरी किशन हंगल था | हंगल को अपना भविष्य दर्जी के काम में बनाने का फैसला किया था उन्हें परिवार के सदस्यों के विरोध का सामना करना पडा था | उनके पिता खासतौर पर इसके खिलाफ थे |
पेशावर में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे अवतार विनीत किशन हंगल कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य रहे | उन्होंने यूनियन गतिविधियों में खूब भाग लिया और गिरफ्तार भी हुए | पाकिस्तान की जेल में दो साल गुजारने के बाद 1949 में वह मुंबई आ गये |  उस समय उनकी उम्र 21 साल थी और जेब में जमा पूंजी के नाम पर 20 रूपये थे | हंगल इन्डियन पीपुल थियेटर एसोसिएसन से जुड़ गये और शुरू में बलराज साहनी और कैफ़ी आजमी जैसी शख्सियतो के साथ मंच साझा किया |हंगल ने 1966 में जब वे 50 वर्ष की उम्र में थे तब उन्होंने'' तीसरी'' कसम से अपनी फ़िल्मी जीवन की शुरुआत की | इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुडकर नही देखा एक से बढकर एक किरदार निभाकर अपने अभिनय का लोहा मनवाया | श्री हंगल उस समय मुंबई में थे जब उन्हें दर्जी बनने का शौक जगा था | उस समय उन्होंने अभिनय की दुनिया की ओर रुख नही किया था | वह इंग्लैण्ड से प्रशिक्षित एक दर्जी से प्रशिक्ष्ण लेना चाहते थे लेकिन उनकी फ़ीस 500 रूपये थी | पांच सौ रूपये  उस जमाने में बहुत बड़ी रकम थी | उन्होंने फ़ीस की रकम जुटाने के लिए अपने पिता से मदद मांगी लेकिन स्वाभाविक था उन्होंने कोई जबाब नही दिया | इसके बाद जब श्री हंगल ने उन्हें कभी घर वापस न आने की धमकी दी तो पिता ने मजबूरन उन्हें फ़ीस के पैसे भेजे | श्री हंगल के मुताबिक़ इसके बाद उन्होंने टेलरिंग सीखी और सु जमाने में चार सौ रूपये कमाने लगे | हालाकि इस काम के लिए उन्हें घर से बगावत करनी पड़ी | फ़िल्मी दुनिया के इस बुजुर्ग अभिनेता  को 1993 में राजनितिक विवाद का कारण भी बनना पडा | दरअसल उन्होंने अपने जन्मस्थान की यात्रा करने के लिए पाकिस्तान का वीजा माँगा | उन्हें मुंबई स्थित पाकिस्तान वाणिज्य दूतावास से पाकिस्तानी दिवस समारोह में भाग लेने का निमंत्रण मिला और उन्होंने इसमें भाग लेकर शिव सेना के गुस्से को निमंत्रण दे डाला | शिवसेना प्रमुख ने उन्हें देशद्रोही तक कह डाला | इतने पुतले फुकने गये और इनकी फिल्मो के बहिष्कार की बात कही गयी 2006 में हिन्दी सिनेमा में उनके योगदान के लिए पद्म विभुष्ण से सम्मानित किया गया | हालाकि अंतिम दिनों में हंगल ने मुफलिसी में दिन काट रहे थे |     आज के वर्तमान समाज में जो सच्चा कलाकार , कवि , चित्रकार होता है जो टा उम्र अपने उसूलो पे चलता है किसी से बिना समझौता किए उन सारे लोगो को अपनी जिन्दगी की आखरी शाम मुफलिसी में ही काटना होता है >...........................हंगल जैसे महान कलाकार की कमी सबसे ज्यादा इप्टा को खलेगी क्योंकि हंगल जैसे बडो की सरपरस्ती में इप्टा का तेवर आज के समय में निखर व तेजधार दार हथियार बन के आ रहा था | शत शत नमन ऐसे महान कलाकार को .....
..सुनील दत्ता
पत्रकार            

1 टिप्पणी:

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

एक भली सी विचारपूर्ण मुद्रा में अपना किरदार निभाने वाले हंगल चले गए प्रदीप कुमार की तरह इनका चेहरा हमेशा कुछ खता था जैसे खाब देखते देखते बोल रहें हों ऐसा होता था भावों का उफान .श्रृद्धांजलि इस किरदार को ,सहज सच्चे इंसान को . .कृपया यहाँ भी पधारें -

सोमवार, 27 अगस्त 2012
अतिशय रीढ़ वक्रता (Scoliosis) का भी समाधान है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली में
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