मंगलवार, 6 नवंबर 2012

मलाला को नोबेल

पाकिस्तान कई तरह की मुसीबतों से घिरा हुआ है और ये सभी उसकी पैदा की हुई नहीं हैं। तेल की राजनीति, अमरीकी साम्राज्यवादियों के कुत्सित खेल और मुल्ला-मिलिट्री काम्प्लेक्स की कारगुजारियों के कारण पाकिस्तान मुसीबतों से घिर गया है। इस समय सारी दुनिया नन्हीं-सी मलाला युसुफजाई (आयु 14 वर्ष) को अपनी जिंदगी के लिए लड़ते देख रही है। मलाला पर तालिबान के लड़ाकों ने दो गोलियाँ दागीं (अक्टूबर 2012)। उसका अपराध यह था कि तालिबान के आदेशों के खिलाफ, वह न सिर्फ स्वयं शिक्षा ग्रहण करना चाहती थी वरन उसने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा था कि वह सभी लड़कियों की शिक्षा की पक्षधर है। तलिबान ने स्वात घाटी पर कब्जा जमाने के बाद वहां स्थित लड़कियों के स्कूल बंद करवा दिए थे और महिलाओं का सार्वजनिक स्थलों में प्रवेश प्रतिबंधित कर दिया था। यद्यपि पाकिस्तान ने स्वात घाटी पर पुनः कब्जा कर लिया है तथापि इलाके में अब भी तालिबान का काफी प्रभाव है।
जब मलाला 12 साल की थी, तब उसने बी. बी. सी. उर्दू के लिए अपनी डायरी लिखना शुरू की और बाद में, ‘न्यूयार्क टाईम्स‘ ने उस पर केंद्रित एक फिल्म भी बनाई, जिसका शीर्षक था ‘ए क्लास डिस्मिस्ड‘। वह तालिबानी कट्टरता के खिलाफ विद्रोह की प्रतीक बन गयी थी। यही कारण है कि तालिबानियों ने उस पर कातिलाना हमला किया और अब वह इंग्लैंड के एक अस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रही है। अन्य कट्टरवादी धार्मिक संगठनों की तरह, तालिबान भी दमनकारी, पितृसत्तात्मक मूल्यों के झंडाबरदार हैं। तालिबान का मानना है कि महिलाओं को केवल बच्चों की देखभाल और खाना पकाने तक स्वयं को सीमित रखना चाहिए। उन्हें मुल्लाओं के आदेशों का पूरी निष्ठा से पालन करना चाहिए और सामाजिक जीवन से दूर रहना चाहिए। पुरातन सामंती समाज और आधुनिक प्रजातांत्रिक समाज में मुख्य अंतर यही है कि जाति, वर्ग और लैंगिक असमानताओं को प्रजातांत्रिक व्यवस्था में उचित नहीं माना जाता। यह तथ्य इस बात से भी स्पष्ट है कि जिन देशों में भी प्रजातांत्रिक क्रांति हुई, वहां राजाओं और सामंतों के साथ-साथ जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच को भी उखाड़ फेंका गया।
साम्राज्यवादी देशों के उपनिवेशों में आधुनिक शिक्षा व औद्योगिकरण से समाज में बदलाव आए, समाजसुधार आंदोलन उभरे और आमजन, शनैः-शनैः पुराने, घिसेपिटे मूल्यों के चंगुल से निकलने लगे। परंतु स्वतंत्रता के बाद भी कई पूर्व उपनिवेशों में राजाओं, जमींदारों और सामंती-दकियानूसी मूल्यों के अन्य पैरोकारों का प्रभाव बना रहा। एक ओर पढ़े-लिखों, उद्योगपतियों और कामगारों का नया वर्ग उभरा तो दूसरी ओर समाज के अस्त होते सामंती वर्ग का अस्तित्व भी बना रहा। इस अस्त होते वर्ग ने अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए धर्म के चोले में अपने मूल्य और सामाजिक संव्यवहार के नियम लादने की कोशिश जारी रखी। वे धर्म के नाम पर राजनीति करने लगे और इसे ही हम साम्प्रदायिकता का नाम देते हैं। दरअसल, यह नए कलेवर में पुरातन सामंती मूल्यों को, धर्म के रास्ते, समाज पर लादने का षड़यंत्र है। अगर हम भारतीय उपमहाद्वीप की बात करें तो यहां समाज के दमित वर्गों-महिलाओं और नीची जातियों-को समाज में बराबरी का दर्जा हासिल करने के लिए बहुत लंबा और कठिन संघर्ष करना पड़ा। भारत में स्वतंत्रता के 60 साल बाद भी यह संघर्ष जारी है। पाकिस्तान में तो परिवर्तन की गति बहुत धीमी रही है व जियाउल हक-मौलाना मदूदी के राज में इस प्रक्रिया की दिशा ही पलट गई थी। मुजाहिदीन-तालिबान-अल्कायदा के उदय से हालात और बिगड़े। इन प्रतिगामी शक्तियों को अमेरिका और सऊदी अरब ने समर्थन और सहयोग दिया। मुजाहिदीन और तालिबान को प्रशिक्षण देने के लिए इस्लाम के वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया गया। इस्लाम का यह संस्करण, महिलाओं और समाज के अन्य पिछड़े वर्गों को दोयम दर्जा देने में विश्वास रखता है।
भारत में भी कुछ हद तक ऐसा ही हुआ। जहां पश्चिम एशिया में इस्लाम के नाम पर कट्टरवादिता उभरी वहीं भारत में भी हिन्दुत्व के नाम पर साम्प्रदायिकता का उदय हुआ। हिन्दू धर्म का यह साम्प्रदायिक संस्करण भी महिलाओं को आजादी देने के खिलाफ है और जातिगत ढांचे को बनाए रखना चाहता है। 19वीं सदी में भारत की महिलाओं को भी लगभग वही भोगना पड़ा था जो मलाला आज भोग रही है। जब सावित्री बाई फुले ने देश में लड़कियों का पहला स्कूल खोला तो उन्हें समाज के परंपरागत तबके की निंदा और जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा। जिस तरह मलाला को अपनी किताबें अपने शाल के अंदर छिपानी पड़ती थीं उसी तरह बंगाल की रास सुंदरी देवी को भी पढ़ने की अपनी इच्छा को सबसे छुपाकर रखना पड़ता था। उस समय महिलाओं के लिए छपे हुए पृष्ठ को छूना भी पाप माना जाता था। अपनी आत्मकथा ‘आमार जीवन‘ में उन्होंने उन समस्याओं और चुनौतियों का विवरण दिया है, जिनका सामना उन्हें पढ़ाई करने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिए करना पड़ा। उन्होंने लिखा है कि जब उनके घर के पुरूष काम पर चले जाते थे तब वे पुराने अखबारों से पढ़ना सीखने की कोशश करती थीं। लड़कियों को पढ़ने से रोकने के लिए तरह-तरह की अफवाहें फैलाई जाती थीं। शिक्षा प्राप्त करने के लिए पंडिता रमाबाई, आनंदी गोपाल और अन्यों ने भी उतना ही विकट संघर्ष किया जितना कि मलाला को करना पड़ रहा है। आज भी हमारे देश में महिलाओं का साक्षरता प्रतिशत, पुरूषों से काफी कम है।
बीसवीं सदी की शुरूआत में, जब अमेरिका में सामाजिक बदलाव का दौर शुरू हुआ और वर्गीय और लैंगिक असमानता को समाज के जागरूक तबके द्वारा चुनौती दी जाने लगी, तब दकियानूसी ईसाई समूह इसके विरोध में उठ खड़े हुए। उन्होंने दस पुस्तिकाओं का एक सेट प्रकाशित किया जिसका शीर्षक था फंडामेंटल्स। इन पुस्तकों में यह दावा किया गया कि ईसाई धर्म, महिलाओं और श्रमिकों को अधिकारसंपन्न बनाने की मनाही करता है। किताबों के इसी सेट के शीर्षक से ही अंग्रेजी शब्द फंडामेंटिलज्म (कट्टरवाद) का जन्म हुआ। पिछले तीन दशकों में पूरी दुनिया में कट्टरवादी स्वर तेजी से उभरे हैं। साम्राज्यवादी ताकतें पश्चिम एशिया में कट्टरवादी तत्वों को बढ़ावा दे रही हैं। जर्मनी में जब हिटलर ने नस्लीय श्रेष्ठता के नाम पर प्रजातंत्र को पलीता लगाया था तब उसने भी यही कहा था कि महिलाओं का जीवन रसोईघर, चर्च और बच्चों के आसपास घूमना चाहिए। इसी तरह की बातें, चाशनी में लपेटकर, भारत में प्रसारित हो रहे टेलीविजन सीरियलों के जरिए समाज में फैलाई जा रही हैं। बरसों तक चले "सास भी कभी बहू थी" व इसी प्रकार के अन्य सीरियल, महिलाओं को पुरूषों की अधीनता सहर्ष स्वीकार करने की प्रेरणा देते हैं। इन सीरियलों के अलावा, देश में कुकरमुत्तों की तरह उग आए बाबा और गुरू भी दबी जुबान से इन्हीं पुरातनपंथी नियमों व मूल्यों की वकालत करते हैं। इन बाबाओं को श्रद्धाभाव से देखा जाता है और उनकी कही बातों को करोड़ों लोग गंभीरता से लेते हैं।
पाकिस्तान आज कई तरह की समस्याओं से जूझ रहा है। अमेरिका ने पहले तालिबान-अल्कायदा के भस्मासुर को जन्म दिया व पाला-पोसा और अब वह ड्रोन हमलों से इन्हीं तालिबानियों को खत्म करना चाहता है। अमेरिका द्वारा दुनिया के इस हिस्से में फैलाए गए तालिबानी कैंसर का इलाज ड्रोन हमलों से होने वाला नहीं है। यह सुःखद है कि पाकिस्तानी समाज का एक बड़ा हिस्सा, मलाला की महत्वाकांक्षाओं को उचित मानता है और इस तथ्य से भी वाकिफ है कि उसकी उम्र की दूसरी लड़कियों की भी ऐसी ही इच्छाएं और सपने होंगे। स्वात घाटी के अधिकतर अभिभावक चाहते हैं कि उनकी लड़कियां पढ़ें-लिखें और ज्ञान की रोशनी पाएं। कई इस्लामिक विद्वान यह जोर देकर कह रहे हैं कि पैगम्बर साहब महिलाओं और पुरूषों, दोनों के लिए शिक्षा और ज्ञान प्राप्ति के पक्ष में थे वहीं कुछ अन्य, मलाला पर कायराना हमले को उचित ठहरा रहे हैं। पाकिस्तान में मलाला के समर्थन में विशाल रैलियां निकाली गईं जिनमें यह नारा प्रमुखता से लगाया गया कि ‘बंदूकों वाले डरते हैं, एक नन्हीं लड़की से‘। पाकिस्तानी समाज का जागरूक तबका यह भी समझता है कि उसके देश की समस्याओं की जड़ें सऊदी अरब से लेकर सीआईए और मिलिट्री-मुल्ला काम्पलेक्स तक फैली हुई हैं।
मलाला ने पाकिस्तानी समाज को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। प्रश्न यह है कि वह वहां से किस दिशा में बढ़ना चाहेगा। जो बीत चुका उसे बदला नहीं जा सकता परंतु तालिबान और उसके जैसे विचार रखने वाले अन्य संगठनों के विरूद्ध पाकिस्तान की प्रजातांत्रिक ताकतों को करो या मरो के संघर्ष के लिए कमर कसनी होगी। तालिबान अगर बचे रहेंगे तो वे घुन की तरह प्रजातंत्र और उदारवाद को नष्ट कर देंगे। संपूर्ण इच्छाशक्ति, फौलादी इरादे और अनवरत प्रयासों के जरिए तालिबान, तालिबानी विचारधारा और तालिबानी मानसिकता से लड़ना जरूरी है। तालिबानियों की जगह केवल इतिहास के कूड़ेदान में है और उन्हें जल्द से जल्द उनके नियत स्थान पर पहुंचा दिया जाना चाहिए। भारतीय उपमहाद्वीप के समस्त देशों को साम्राज्यवादी देशों की दादागिरी के खिलाफ और प्रजातंत्र और स्वतंत्रता के पक्ष में, कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहिए। इस क्षेत्र के सभी देशों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके यहां प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत हों और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली ताकतों को कड़ी शिकस्त दी जाए। और कुछ नहीं, तो कम से कम मलाला की खातिर हम सबको यह करना चाहिए।

-राम पुनियानी





कोई टिप्पणी नहीं: