मंगलवार, 27 नवंबर 2012

सरकार बना रही महंगी शादी पर सस्ता कानून


   

 देश की आधी आबादी लंबे समय से अपना हक मांग रही है। वह आधी जमीन और आधा आसमान की बात करती हैं। लेकिन चारों तरफ उन्हें पुरुष वर्चसव वादी समाज से टकरा कर ही आगे बढ़ना पड़ रहा है। घर-परिवार,समाज,बाजार और राजनीति हर क्षेत्र में उसे दोयम दर्जे के व्यवहार का सामना करना पड़ता है। आधुनिक युग में वह पुरुष की सहचरी की भूमिका से मुक्त होना चाहती है। लेकिन सदियों से रूढ़ियों,परंपराओं और दकियानूसी विचारों के जकड़न में जकड़ी है। धार्मिक और सामाजिक रीति रिवाज भी उसके खिलाफ है। पुरुष वर्चस्व वाले समाज में वह हर जगह पुरुषों को चुनौती दे रही है। फिर भी चारों तरफ बंधनों में बंधी महिलाओं की स्थििति में सुधार नहीं हो रहा है। आज भी हमारे समाज में लड़कियों के पैदा होने पर अगर दुख नहीं होता तो आमतौर पर खुशी भी नहीं मनाई जाती है। कन्या भ्रूण हत्या से देश के कई राज्यों में लिंगानुापत बिगड़ रहा है। महिला आरक्षण विधेयक संसद के अंदर पास होने की प्रतीक्षा में दम तोड़ रहा है। लेकिन इस समय देश के अंदर महिला  एवं बाल विकास मंत्रालय के दो प्रस्ताव चर्चा में है। ऐसे प्रस्ताव जो कभी भी कानून का शक्ल अख्तियार कर सकता है। उसके अनुसार अब पूरे देश में हर धर्म और क्षेत्र के लोगों को महंगी शादी से तौबा करना होगा। मंत्रालय का दूसरा प्रस्ताव यह है कि जल्द ही देश में पतियों को अपने वेतन का एक निश्चित हिस्सा पत्नियों के अकाउंट में डालना होगा। लेकिन जिस तरह से आनन-फानन में सरकार प्रस्ताव लाने जा रही है और उसे कानूनी शक्ल देने की बात कर रही है। वह उसकी मंशा पर प्रश्नवाचक चिंह बन कर खड़ा हो गया है। यह देश को शादी में फिजूलखर्ची की चलन से मुक्त करने का अभियान कम आत्मप्रचार ज्यादा लगता है। देश भर में हर धर्म और क्षेत्र में महंगी शादी को रोकने के लिए इतनी जल्दबाजी में कानून बनाया जा रहा है। जिसमें समाज के किसी तबके से सीधे संवाद करने की जहमत नहीं उठाई गयी। जबकि जरूरी यह था कि समाज के विभिन्न धार्मिक,सामाजिक नेताओं के साथ ही आर्थिक  और सामाजिक वर्गों से  व्यापक चर्चा  करके आम सहमति बनाई जाती। धार्मिक नेताओं और महिला अधिकार संगठनों से बातचीत करके कोई व्यवहारिक,ठोस,कारगर और सवर्मान्य कानून बनाया जाता। दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने इस मसले पर राज्यों से सहमति या उनका विचार जानने की कोशिश नहीं की।  जबकि सारे राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी इस कानून पर राय जानना आवश्यक है। कानून व्यवस्था राज्य का मामला है। किसी भी कानून पर राज्यों की सहमति न लेने पर भारत जैसे विशाल देश में इसके जमीनी स्तर पर लागू होने में संदेह है। कानून बनाने के पहले महंगी और दहेज वाली शादियों की खामियों और उससे समाज और विकास पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का लेखा जोखा प्रस्तुत नहीं किया गया। दहेज को हमारे समाज में प्रतिष्ठा का प्रश्न भी बना दिया गया है।  समाज में लंबे समय से महंगी और लाखों,करोड़ों दहेज देकर शादियां होती रही है। समाज का एक वर्ग  शादी व्याह के अवसर पर करोडाÞें रुपये फंूक कर अपने ऐश्वर्य और धन का प्रदर्शन करने का आदी हो गया है। जबकि समाज के बहुत बड़े हिस्से के लिए लड़कियों की शादी एक आपदा के समान है। जिसे वह किसी तरह से निपटाना चाहता है। अमीरों की शादी में लाखों-करोड़ों खर्च करने की देखा-देखी मध्यमवर्गीय परिवारों में भी ज्यादा खर्च करने का दबाव बना रहता है। इसी वजह से ज्यादातर परिवार लड़कियों की पढ़ाई और उच्च शिक्षा की अनदेखी कर शादी के लिए पैसा जोड़ना शुरू कर देते हैं।
एक आंकड़े के मुताबिक देश में शादी -ब्याह के लिए बुक होने वाले बारातघर,आतिशबाजी और जरूरी संसाधनों का व्यवसाय दस हजार करोड़ रुपये सालाना है। इस कानून के बनने से क्या यह वर्ग हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा। देश में कानून व्यवस्था पालन कराने की जो मशीनरी है। वह किस तरह से काम करती है किसी से छिपा नहीं है। देश में रात दस बजे के बाद किसी भी सार्वजनिक,धार्मिक आयोजनों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर कानूनन रोक है। लेकिन इसका कितना पालन होता है। यह बात सबको पता है।
1990 में अल्ट्रासाउंड के  मेडिकल ट्रीटमेंट में आने के बाद देश में कन्या भ्रूण हत्या का शुरू हुआ सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रही है। जिसके कारण लगातार महिला-पुरूष अनुपात की दर बिगड़ती जा रही है। कुछ समय पहले महिला अधिकार संगठन यह कहते थे कि महिलाओं को जन्म के साथ ही भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। लेकिन वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति ने अब कन्याओं को गर्भ में ही पहचान करके नष्ट करने का अविष्कार कर दिया है। अल्ट्रासाउंड आने के बाद गर्भ में  कन्या भ्रूण को पहचान कर हत्या का दस्तूर बनता जा रहा है। देश में इसके खिलाफ सख्त कानून बना है। लेकिन इस कानून के उल्लंघन के मामले में अब तक एक भी दोषियों को सजा नहीं हुई है। एक आकड़े  के अनुसार  भारत में  लिंग निर्धारण का मेडिकल व्यवसाय  एक हजार करोड़ रुपये का है। सिनेमा और टीबी धारावाहिकों में जहां सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ  फिल्म और धारावाहिक बनते हैं। वहीं पर महंगी शादियों को महिमा मंडित करने वाले फिल्मों की भी कमी नहीं है। ऐसे में समाज की जड़ता को तोड़ने के लिए एक कानून ही काफी नहीं   है।


महिलाओं के प्रति हिंसा व्यवस्थागत या कानूनी खामी एक कारण है। यह हिंसा हमारे सामाजिक ढांचे और गैर-बराबरी की सोच में निहित है। हमने महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग मानक तय किए हैं। महिलाओं के साथ भेदभाव का यह प्रवृति मुख्य रूप से हमारे सामाजिक और आर्थिक  कारणों पर ज्यादा निर्भर करता है। प्रतिदिन हजारों की संख्या में  नववधुओं को दहेज की आग में जलना या फांसी के फंदे पर लटकना पड़ रहा है। कारण साफ है। दहेज कम मिलने की वजह से ससुराल में विवाहिताओं को मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। ससुराल की इस प्रताड़ना को सहकर जिंदा रहने की जगह महिलाएं मौत को गले लगाना बेहतर समझती है। दहेज हत्या और कन्या भ्रूण हत्या हमारे समाज में स्त्री शिक्षा में कमी और महंगी होती जा रही शादियों की वजह से है। यह बात सही है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री कृष्णा तीरथ महंगी शादियों को रोकने के खिलाफ कानून पर कहती हैं 'सरकार ऐसा कानून लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत सभी धर्मों और तबके के लोगों के लिए शादी-ब्याह के खर्च को सीमित करना होगा। इसमें शादी के बाद दूल्हा- दुल्हन के बेहद करीबी रिश्तेदारों को चाय-नाश्ता देने पर ही पैसा खर्च करने का प्रावधान होगा।' उन्होंने कहाकि भारतीय समाज में बेटी पैदा होने पर मां-बाप दहेज और शादी के लिए पैसा जोड़ने या कर्ज लेने जैसे बोझ के डर की वजह से ही भ्रूण-हत्या जैसा कदम उठाते हैं। इससे समाज में लिंग अनुपात में खासी कमी देखी जा सकती है। अगर नया कानून लागू होता है तो देश में कन्याओं के प्रति नजरिए में खासा बदलाव होगा। मंत्रालय के इस कानून में एक प्रस्ताव ऐसा भी है। जिसके कानून का रूप लेने के बाद पूरे देश में शादी के आयोजन दिन के उजाले में और चाय-नाश्ते में ही संपन्न करना होगा।
 लेकिन  सदियों से रात में शादी का आयोजन करने वाला समाज क्या इस कानून को लागू होने के बाद,इसे मामने को तैयार होगा।  इस पर आशंका के बादल मंडरा रहे है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे किसी काम से अगर  जनहित को नुकसान नहीं हो रहा है। सरकार का कोई कानून हमारे व्यापक मौलिक अधिकारों  में हस्तक्षेप करता है। तो इस पर अदालत का डंडा भी चल सकता है। इस कानून में इसकी अनुगंूज भी निहित है।

ऐसा भी नहीं है कि हमारे देश के राजनीतिज्ञों ने महंगी शादियों की तरफ से आंख बंद किए  रहे। बल्कि समय-समय पर ऐसे कानून बनाएं गए। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कायर्काल के दौरान शादी में सिर्फ पांच सदस्यों के जाने और सिर्फ 15 लोगों तक को ही खाना खिलाने का प्रयोग किया गया था। कुछ समय तक इसका पालन भी हुआ, लेकिन धीरे-धीरे खत्म हो गया। कांग्रेसी नेता संजय गांधी ने इमरजेंसी के दौरान पांच सूत्रीय कार्यक्रम में शादी के दौरान चाय-पकौड़े के रिवाज को भी तवज्जो दी थी। इसके तहत किसी भी शादी में सिर्फ चाय-पकौड़े ही दिए जाने का प्रावधान था। लेकिन समय के साथ ही यह भी बंद हो गया। बहुभाषी, बहुधार्मिक और महिला विरोधी रीति रिवाजों वाले देश में अगर सबने बिना किसी दुराग्रह के इस कानून को लागू होने में साथ दिया तो यह कानून देश के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। धार्मिक दृष्टिकोणों और वैचारिक पूर्वाग्रहों को त्यागकर इस कदम का स्वागत करते हैं तो आधी आबादी के अधिकारों के लिए यह रामबाण साबित होगा।
जो सतीप्रथा निरोधक कानून के बाद महिलाओं की स्थिति  के लिए अखिल भारतीय स्तर पर कानून का रूप लेगा। लेकिन व्यवहार में यह लागू हो पाएंगा। इसमें आशंका है। देश के अंदर महिला कानूनों को जमीन पर लागू होने का रिकॉर्ड पहले से ही बहुत अच्छा नहीं है। ऐसे में   कानून की किताबों में एक और कानून की संख्या बढ़ने से महिलाओं की स्थिति में कितना परिवर्तन हो सकेगा। यह तो समय ही बताएगा।
-प्रदीप सिंह।

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