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शनिवार, 13 अप्रैल 2013

मी लार्ड! हमें न्याय चाहिए


किसी की अवमानना मकसद नहीं है। अगर होती है, तो ये उसके अपने कर्म हैं, जिसका जिम्मेदार किसी और को नहीं ठहराया जा सकता। सवाल उठते हैं, तो उठाना भी जरूरी है। लगभग चार महीने पहले वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट ने ‘रूल ऑफ लॉ इंडेक्स 2012’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें 97 देशों की सूची में भारत को 78वां स्थान मिला है। जबकि हमारा पड़ोसी देश श्रीलंका को हमसे बेहतर बताया गया है जबकि वहां की स्थिति को भी हम अच्छी नहीं कह सकते। रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रशासनिक एजेंसियाँ बेहतर प्रदर्शन नहीं करती और न्यायिक प्रणाली की गति अत्यधिक धीमी है। इसकी मुख्य वजह अदालत की कार्यवाही में होने वाली देरी है। हाल में आई एक रिपोर्ट में जिक्र था कि देश की अदालतों में 3 करोड़ मुकदमें 15 साल या उससे ज्यादा समय से लम्बित हैं।
संविधान बनाने वाले हमारे बुजुर्गों ने लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए संविधान में तीन स्तम्भ कायम किये जिसमें एक महत्वपूर्ण स्तम्भ ‘न्यायपालिका’ है। न्यायपालिका भारतीय लोकतंत्र का एक ऐसा स्तम्भ है, जिसकी ओर कहीं और से न्याय न मिलने पर जनता ताकती है। पुरानी कहावत है कि समय से न्याय न मिलने का मतलब न्याय देने से मुकरना है और आज देश की पूरी न्यायपालिका नीचे से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक देश की जनता को न्याय देने से मुकर रही है। पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दौर में शासक वर्गों को न्याय प्रणाली पर खर्च करना फिजूलखर्ची लग सकती है और अहलूवालिया एवं थरूर जैसे बददिमाग राजनीतिज्ञ न्यायपालिका को गैरजरूरी भी करार दे सकते हैं। ऐसे दौर में भारतीय न्यायपालिका की जिम्मेदारियां और बढ़ जाती हैं और उसे प्रोएक्टिव तरीके से न्याय मुहैया कराने की ओर बढ़ना चाहिए।
उत्तर प्रदेश में आतंकवाद के नाम पर बेगुनाह मुसलमान युवकों को बिना मुकदमा चलाये जेल में रखने का जिक्र गाहे-बेगाहे हुआ करता है और इस मामले में गठित निमेष आयोग की रिपोर्ट में वर्णित कतिपय अन्य बातों का भी जिक्र होता है। ऐसे वाकये भी हैं जिसमें एक व्यक्ति को पिछले 10 सालों से विभिन्न जिलों में एक के बाद एक मुकदमें ठोके जा रहे हैं और वे लम्बे समय से जेलों में हैं। जिन मुकदमों में फैसला हो चुका है, उसमें वे बरी कर दिये गये हैं। चूंकि प्रदेश सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया है, इसलिए उसके निष्कर्षों की अधिकारिक जानकारी नहीं हो सकती परन्तु बार-बार ऐसे नौजवानों की रिहाई की मांग उठती है और सत्तासीन सपा के नेतागण उस पर वायदे करते भी दिखाई देते हैं। अगर न्यायपालिका अपने कर्तव्यों को निभा रही होती तो क्या ऐसी नौबत नहीं आती?
दण्ड प्रक्रिया संहिता के प्राविधानों के अनुसार किसी भी नागरिक को गिरफ्तार करने के 24 घंटों के अन्दर पुलिस को उसे न्यायालय के सामने पेश करना होता है। न्यायिक अभिरक्षा में किसी को जेल भेजने के 90 दिनों के अन्दर अदालत में आरोप पत्र न दाखिल होने पर उस व्यक्ति को जेल में नहीं रखा जा सकता। जिला न्यायाधीश, मुख्य न्यायिक/मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट जेलों का मुआईना करने के लिए अधिकृत होते हैं। जेलों के मुआइनों का मतलब जेल अधीक्षक के सामने बैठ कर चाय-नाश्ता करना नहीं होता। यह देखना होता है कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि कोई व्यक्ति बिना आरोपपत्र के 90 दिनों से ज्यादा जेल में है अथवा कोई कैदी अपने अपराध के लिए नियत सजा से अधिक समय से बिना सजा पाये ही जेल में है। यह निरीक्षण अमूमन वार्षिक और मासिक आधार पर किये जाते हैं। इस व्यवस्था के विपरीत जब देश की विभिन्न जेलों में तमाम कैदी अनाधिकृत रूप से बन्द हों, तो इसे किसकी लापरवाही कहा जायेगा?
दिल्ली में एक बालक के साथ एक पुलिस कांस्टेबल द्वारा किये यौन अनाचार को पांच साल से अधिक हो चुके हैं। मामला अभी लम्बित है। उस बेचारे को गाहे-बगाहे बिहार से दिल्ली गवाही देने के लिए आना पड़ता है और बिना किसी कार्यवाही के वह वापस लौट जाता है। उस बालक की पीड़ा को समझने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है और कौन उसे इस पीड़ा से निजात दिला सकता है।
दिल्ली में ही एक 12 वर्ष की बालिका का पहले अपहरण और फिर उसके साथ बलात्कार होता है। उसे बेहद दर्दनाक स्थिति में पाया गया था। इस मामले को भी पांच साल हो रहे होंगे। मामला अदालत में अभी भी लम्बित है।
दिल्ली कोई अपवाद नहीं है। देश के हर कोने में इस तरह के मामले मिल जायेंगे। सत्र न्यायालयों में गवाही का काम शुरू होने पर लगातार चलता था। अब ऐसा देखा जा रहा है कि एक-एक या दो गवाहियां ही एक बार में होती हैं और फिर उसके बाद लम्बी तारीख लगा दी जाती है।
आज कल एक चुटकुला बहुत प्रचलित है। कहा जाता है कि अगर आप 40-45 साल की उम्र पार कर चुके हैं, कोई भी अपराध कीजिए, आपको इस जिन्दगी में सजा भुगतनी नहीं पड़ेगी। दस-बारह साल मुकदमा निचली अदालत में चलेगा, फिर 20 साल उच्च न्यायालय में और उसके बाद जब तक अपील की सुनवाई का वक्त सर्वोच्च न्यायालय में मुकर्रर होगा, आप गत हो चुके होंगे।
दीवानी मामलों में और श्रम मामलों में तो स्थिति और भी खराब है। अमूमन देखा जाता है कि गांवों में दबंग लोग गरीबों की परिसम्पत्तियों पर लाठी-गोली के बल पर कब्जा कर लेते हैं। पहली बात, अगर आप गरीब हैं तो मुकदमा का खर्च बर्दाश्त कर मुकदमा लड़ नहीं सकते और किसी तरह आपने अगर ऐसी जहमत उठा भी ली तो कई पीढ़ियां पार हो चुकी होंगी। श्रम कानूनों का उल्लंघन आम हो चुका है और न्यायालयों में बढ़ते मामलों की सुनवाई नहीं हो रही है। सरकार को तो निवेशकों की चिन्ता है, वह कोई कार्यवाही क्यों करेगी?
न्यायपालिका के लोग दलील दे सकते हैं कि मुकदमें बढ़ते जा रहे हैं, न्यायधीशों की संख्या बहुत कम है। संसाधन नहीं हैं। सरकार न्यायिक सुधार करना नहीं चाहती। आदि-आदि। यह बात भी ठीक है, पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के दौर में सरकार का यह रवैया हो सकता है लेकिन भारतीय संविधान न्यायपालिका को ऐसी मुरव्वत नहीं देता। याद आता है न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर, चंद्राचूड और पी.एन. भगवती का कार्यकाल जब सर्वोच्च न्यायालय में वकीलों को मोटी फीस न दे सकने वाले भी एक पोस्ट कार्ड लिख कर न्याय पा जाते थे। मिनटों में बड़े से बड़े मुद्दों पर खुली अदालत में निर्णय हो जाता था।
उदाहरण के तौर पर गाजीपुर जिला सहकारी बैंक ने सन 1957 में एक ड्राईवर रामेश्वर राय को बर्खास्त कर दिया था, वह श्रम न्यायालय से जीत गया तो बैंक ने उच्च न्यायालय में और उसके बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपीलें कीं। बैंक की आखिरी अपील 1962 में सर्वोच्च न्यायालय ने खारिज कर दी थी। 1962 से 1984 तक रामेश्वर राय बहाली और तनख्वाह के लिए दर-दर की ठोकरें खाता रहा। फिर आया वह वक्त जिसका जिक्र ऊपर किया गया है। उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव, श्रम सचिव, श्रमायुक्त तथा वाराणसी के सहायक श्रमायुक्त तथा गाजीपुर के जिलाधिकारी को सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे निर्देश जारी किये थे कि आदेश के 30 दिनों के अन्दर रामेश्वर राय न केवल बहाल हो गया था बल्कि उसे अपने पूरी पिछली मजदूरी का भी भुगतान मिल गया था।
यह उल्लेख जरूरी होगा कि अगर रामेश्वर राय सर्वोच्च न्यायालय में उस वक्त एक याचिका दाखिल भी करना चाहता तो उसे मिलने वाला पूरा एरियर पहले कहीं से कर्ज लेकर एडवोकेट को देना होता। फैसला जब आता तो मय ब्याज के इस पैसे को वह साहूकार को अदा नहीं कर सकता था। 27 साल की बेरोजगारी का दंश बहुत कष्टकर होता है। वह अपने परिवार के साथ दाने-दाने को मोहताज़ था। जब वह बहाल हुआ था, उसे सेवानिवृत्त होने में कुछ ही समय बचा था। आज का जमाना होता तो वह बिना न्याय पाये मर ही जाता।
विशेष परिस्थितियों में न्यायपालिका को कानून बनाने का भी अधिकार प्राप्त है और इस अधिकार का प्रयोग भारतीय न्यायपालिका ने किया भी है।
मी लार्ड! आप समर्थ हैं, लेकिन करेंगे तो तब जब करना चाहेंगे और आपके चाहने की प्रतीक्षा हिन्दुस्तान के तमाम दबे-कुचले पीड़ित नागरिक कर रहे हैं। उन्हें त्वरित न्याय चाहिए, जिसे आप उपलब्ध करा सकते हैं। कह नहीं सकते कि यह प्रतीक्षा कितनी लम्बी होगी.......
- प्रदीप तिवारी

मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

नारी सुरक्षा का मामला

  1. नारी सुरक्षा का मामला --- मुद्दा ( प्रदेश सरकार द्वारा वूमन पावर लाइन
  2. 1090 के संदर्भ में )
औरतो को सामाजिक जीवन में  सुरक्षा प्रदान किये जाने का पहले का दृष्टिकोण अब नारी देह और सौन्दर्य के प्रति फूहड़ व आक्रामक भोगवादी दृष्टिकोण में बदलता जा रहा है | ऐसी ही मनोवृत्तियो एवं प्रवित्तियो को बढावा दिया जा रहा है | नारी असुरक्षा को लेकर राजनितिक एवं प्रचार माध्यमी हिस्सों में भारी चिंताए व्यक्त की जाती रही है | लडकियों और महिलाओं पर किये जाते रहे हमलो दुर्व्यवहारो बद से बदतर छेडखानियो के विरुद्ध नारी सुरक्षा की गुहार लगाईं जाती  रही है उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री जी ने भी इस गुहार को सुनते हुए वूमन पावर लाइन 1090 के नाम से एक पुलिस सेवा की शुरुआत की है | इस सेवा के अंतर्गत किसी अवांछनीय मोबाइल काल अथवा एस एम् एस आदि के जरिये प्रताड़ित की जा रही कोई लड़की या महिला पुलिस को 1090 का नम्बर डायल करके सूचित कर सकती है | उसकी फोन काल को महिला पुलिस द्वारा रिसीव किया जाएगा | उसे अपनी परेशानी बताने के लिए पुलिस स्टेशन जाने की जरूरत नही होगी | उसकी पहचान भी गोपनीय रखी जायेगी | पुलिस उसकी सहायता के लिए उसके सम्पर्क में तब तक रहेगी जब तक कि समस्या का निराकरण न हो जाए |
इसी तरह से छेड़खानी और बलात्कार जैसे अपराधो के लिए कानून और ज्यादा सख्त करने की भी मांग उठती रही है | इस दिशा में कुछ कानूनी प्रयास भी किये जाते रहे है | ऐसे शासकीय व कानूनी सुधार औरतो को कितनी सुरक्षा देते रहे है और दे सकते है इसका अंदाजा सभी को है | लेकिन यहाँ पर हमारी चर्चा का यह प्रमुख विषय नही है | हमारी चर्चा का प्रमुख मुद्दा नारियो के प्रति समाज में बढ़ रही भारी असुरक्षा के बुनियादी कारण , कारक और उसके आधार है | कयोंकि नारी असुरक्षा या नारियो के प्रति किये जाते रहे दुर्व्यवहारो की जड़ शासन -- प्रशासन व कानून की कमियों -- खामियों में नही बल्कि समाज में है |
इसे कोई भी देख सकता है | कि वर्तमान दौर के आधुनिक समाज में नारी असुरक्षा नए रूपों में बढती जा रही है | इसीलिए वर्तमान समाज में चंद शोहदों , गुंडों या अपराधियों का नही रह गया है , बल्कि वह ख़ास व आम समाज का अर्थात पूरे समाज का मामला बन गया है |
आधुनिक समाज में नारियो की असुरक्षा का मामला वस्तुत: नारियो के प्रति समाज के खासकर पुरुष समाज के दृष्टिकोण एवं व्यवहार का मामला है | खासकर यह मामला नारियो के प्रति बढ़ते जा रहे आधुनिकतावादी -- भोगवादी दृष्टिकोण के अनुसार बढती या बढाई जाती रही मनोवृत्तियो एवं व्यवहारों का मामला है |
इन दृष्टिकोणों एवं मनोवृत्तियो के रहते नारी सुरक्षा का समुचित समाधान नही किया जा सकता | इसीलिए समाज में  खासकर समाज में नारियो की असुरक्षा को बढाने वाले दृष्टिकोणों व्यवहारों एवं प्रवित्तियो को जानने . समझने के साथ उसके समाधान का सामाजिक स्तर पर प्रयास जरुर किया जाना चाहिए | इस प्रयास के साथ ही कोई शासकीय -- प्रशासकीय तथा कानूनी प्रयास सफल हो सकते है | अन्यथा केवल या मुख्यत: किये जा रहे शासकीय , प्रशासकीय व कानूनी प्रयास व पद्दतिया सफल नही हो सकती | उसे ही अपना कर इस असुरक्षा को कदापि रोका नही जा सकता |
जहा तक औरतो के प्रति समाज में व्यापत प्रचलित दृष्टिकोण का प्रश्न है , उसमे पहली बात तो यह है कि औरतो को पुरुष के अधीन रहकर उनकी अनुगामी बने रहने का दृष्टिकोण सदियों से बना रहा है और बहुत हद आज भी है | यह दृष्टिकोण न केवल पुरुष समाज का रहा है , बल्कि नारियो का भी रहा है | यहाँ हम इसके आर्थिक , सामाजिक कारणों पर कोई चर्चा नही कर रहे है | इसी के साथ दूसरी प्रमुख बात यह है कि नारियो के प्रति पुरुष समाज का दृष्टिकोण पहले से ही  किसी हद तक भोगवादी रहा है | हालाकि पिछड़े समाजो में यह दृष्टिकोण आज से कही कम था | उस समय का भोगवादी दृष्टिकोण संकुचित दायरे में ही था और आम तौर पर घर परिवार से बाहर था | फिर यह दृष्टिकोण उस समय के राजाओं , सामन्तो एवं अन्य धनाढ्य  हिस्सों में ही व्याप्त था | आम समाज में खासकर करकर  समाज में तो यह दृष्टिकोण बहुत कम था या कहिये न के बराबर था | बाजार के आधार पर खड़े होते रहे आधुनिक जनतांत्रिक समाज ने नारियो को बहुत सारे सामाजिक अधिकारों को देकर उन्हें पुरातन तथा मध्ययुगीन कठोर बन्धनों से मुक्त होने का पथ प्रशस्त किया | आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने से लेकर हर क्षेत्र में पुरुषो की तरह आगे बढने , विभिन्न पेशो को अपनाने , धन संम्पत्ति का मालिक बनने से लेकर पद प्रतिष्ठा पाने का भी पथ प्रशस्त किया |
सदियों से पारिवारिक सीमाओं और पहचानो के साथ बंधे नारी जीवन को आगे बढाकर उसे नए सामाजिक कामो संबंधो से जुडी पहचानो को पाने का द्वार खोल दिया | अब केवल फला की लड़की फला की पत्नी या फला की माँ ही नही रह गयी , अपितु सामाजिक जीवन में अध्यापक , डाक्टर वकील वैज्ञानिक , कर्मचारी , अधिकारी व राजनेता की पहचान भी पाने लगी |
लेकिन इसी के साथ पैसे -- पूंजी खरीद बिक्री के इस आधुनिक समाज में खासकर उसके वर्तमान विश्व व्यापी दौर ने नारी की दैहिक सुन्दरता और उसके प्रदर्शन को भी वाणिज्य -- व्यापार का हिस्सा बना दिया | नारी के अंग प्रदर्शन या अर्धनग्नता को आधुनिकता व प्रगतिशीलता का नाम देकर उसका बाजारवादी , प्रचारवादी , भोगवादी इस्तेमाल भी शुरू कर दिया | इसने नारी की माँ के रूप में पहचान को मन समाज की सृजनकर्ता और पालनकर्ता की महान पहचान और भूमिका को अपने बाजारवादी , भोगवादी इस्तेमाली दृष्टिकोण से दबा भी दिया | फिर इसने नारी शरीर और उसकी सुन्दरता के भोगवादी प्रचार के जरिये सामाजिक पहचानो को भी दबा देने का काम किया , जो आज भी जारी है | मध्ययुगीन समाज में धनाढ्य वर्गो , सामन्तो , राजाओं के नारियो के प्रति उस समय भोगवादी दृष्टिकोण को आधुनिक फैशनबाजी माडलिंग बाजी मालो -- सामानों के बाजार वादी प्रचारवादी हथकण्डो से उसे आम समाज में फैला व बढा दिया गया | उसे आधुनिक समाज का नया भोगवादी या उपभोक्तावादी रूप प्रदान कर दिया | मालो -- सामानों के प्रचारों से लेकर फिल्मो , टी . वी  सीरियल पात्र -- पत्रिकाओं में नारी के शारीरिक सौन्दर्य और अर्धनग्नता का यह इस्तेमाल बखूबी देखा जा सकता है | आपने भी ध्यान दिया होगा कि किन्ही ख़ास मौको पर उच्च व संभ्रान्त परिवारों का पुरुष समाज की वेश भूषा तो कुछ ठीक -- ठाक सी रहती है , लेकिन औरते कम से कम कपड़ो में या यो कहे कि नग्नता को कम या ज्यादा उभारने वाले पहनावे में ही सजी -- धजी नजर आती है | यह बताने की जरूरत नही है कि माडलों , फिल्मो और टी . वी सीरियल से लेकर तरह -- तरह के प्रचारों में प्रदर्शित की जा रही यही नारी आम समाज की अनुकरणीय नारी बनती जा रही है | यह अनुकरण या कहिये अंधानुकरण आम समाज की लडकियों और औरतो में बढ़ता जा रहा है | सुन्दर से सुन्दर दिखने -- दिखाने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है और वह भी बाजारी हथकंडो के जरिये | व्यूटी पार्लर से लेकर तमाम तरह के आधुनिक प्रसाधन सामग्री के जरिये |
सुन्दर दिखने -- दिखाने के प्रदर्शनों आयोजनों के जरिये लडकियों एवं महिलाओं के दिमाग में भी पुरुष की तरह उन्मुक्त होकर जीवन जीने का पाठ पढ़ाया बढाया जा रहा है | लेकिन नारी देह और सुन्दरता के प्रति बढाया जा रहा यही चलन तथा उपभोक्तावादी दृष्टिकोण आम समाज में भी नारियो के प्रति भोगवादी दृष्टिकोण को ही बढावा दे रहा है | साथ ही यह चलन व दृष्टिकोण नारी के बुनियादी चारित्रिक गुणों , विशेषताओं को खासकर उसके समाज की जननी होने के महान प्राकृतिक व चारित्रिक गुण को धूमिल व विखंडित करती जा रही है |
वस्तुत: आधुनिक बाजारवादी व्यवस्था का यह चलन व दृष्टिकोण अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे पश्चिमी साम्राज्यी देशो से भारत जैसे पिछड़े देशो में आता व बढ़ता जा रहा है | यह बढाव खासकर पिछले 20 सालो से वैश्वीकरणवादी  अन्तरराष्ट्रीय नीतियों को लागू किये जाने तथा विदेशी पूंजी , तकनीक व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अधिकाधिक घुसपैठ के साथ तेज होता रहा है | फिर यह बढाव देश के महानगरो से लेकर शहरों कस्बो से होता हुआ गाँवों -- देहातो तक के इलाको में फैलता व बढ़ता जा रहा है | समाज में औरतो को सामाजिक जीवन में सुरक्षा प्रदान किये जाने का दृष्टिकोण  अब  नारी देह और सौन्दर्य के प्रति फूहड़ व आक्रामक भोगवादी दृष्टिकोण में बदलता जा रहा है | ऐसी ही मनोवृत्तियो एवं प्रवित्तियो को बढावा दिया जा रहा है | आधुनिक समाज में बढ़ता जा रहा यही चलन नारी असुरक्षा का प्रमुख कारक व कारण बन गया है | इसे बदलने व हटाने का कोई प्रयास किये बिना नारी सुरक्षा का कोई शासकीय व कानूनी उपाय सफल नही हो सकता | अत: यह आवश्यक है कि लडकियों व  औरतो में आधुनिक व न्यायसंगत स्वतंत्रता को बढावा देने के अर्थात उनमे आधुनिक शिक्षा -- दीक्षा तथा आम समाज  के विभिन्न कामो व पेशो में जाने को बढावा देने के साथ उनमे बढाये जा रहे अर्धनग्न या देह प्रदर्शन व सौन्दर्य प्रदर्शन पर रोक लगाई जानी चाहिए | नि;सन्देह , ऐसी रोक पुरुष समाज पर भी जरुर लगनी चाहिए | इसे बढावा देने वाले नाच -- गानों , फिल्मो पर भी रोक लगनी चाहिए | आम समाज में उसकी निंदा आलोचना होनी चाहिए | उसका विरोध किया जाना चाहिए | लेकिन यह काम देश के धनाढ्य हिस्से व सत्ता -- सरकारे करने वाली नही है | कयोंकि ये हिस्से ही अपनी बाजारवादी गतिविधियों तथा उपभोक्तावादी सांस्कृतिक नीतियों छूटो से इसे बढावा देते जा रहे है | उच्च स्तरीय सांस्कृतिक एवं प्रचार माध्यमी कलाकार समाज में उसे बढावा देने वाले अग्रदूत बने हुए है | इसीलिए ये हिस्से नारी सुरक्षा का काम भी करने वाले नही है | यह काम देश के जन साधारण को ही करना होगा | स्वंय संगठित रूप से अपने दृष्टिकोण व मनोवृत्तियो को बदलना होगा | बाजारवादी , भोगवादी चलन व दृष्टिकोण के विरुद्ध उसकी अभिव्यक्तियों के विरुद्ध संघर्ष करना होगा |
-सुनील दत्ता 
पत्रकार

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

सरकार बना रही महंगी शादी पर सस्ता कानून


   

 देश की आधी आबादी लंबे समय से अपना हक मांग रही है। वह आधी जमीन और आधा आसमान की बात करती हैं। लेकिन चारों तरफ उन्हें पुरुष वर्चसव वादी समाज से टकरा कर ही आगे बढ़ना पड़ रहा है। घर-परिवार,समाज,बाजार और राजनीति हर क्षेत्र में उसे दोयम दर्जे के व्यवहार का सामना करना पड़ता है। आधुनिक युग में वह पुरुष की सहचरी की भूमिका से मुक्त होना चाहती है। लेकिन सदियों से रूढ़ियों,परंपराओं और दकियानूसी विचारों के जकड़न में जकड़ी है। धार्मिक और सामाजिक रीति रिवाज भी उसके खिलाफ है। पुरुष वर्चस्व वाले समाज में वह हर जगह पुरुषों को चुनौती दे रही है। फिर भी चारों तरफ बंधनों में बंधी महिलाओं की स्थििति में सुधार नहीं हो रहा है। आज भी हमारे समाज में लड़कियों के पैदा होने पर अगर दुख नहीं होता तो आमतौर पर खुशी भी नहीं मनाई जाती है। कन्या भ्रूण हत्या से देश के कई राज्यों में लिंगानुापत बिगड़ रहा है। महिला आरक्षण विधेयक संसद के अंदर पास होने की प्रतीक्षा में दम तोड़ रहा है। लेकिन इस समय देश के अंदर महिला  एवं बाल विकास मंत्रालय के दो प्रस्ताव चर्चा में है। ऐसे प्रस्ताव जो कभी भी कानून का शक्ल अख्तियार कर सकता है। उसके अनुसार अब पूरे देश में हर धर्म और क्षेत्र के लोगों को महंगी शादी से तौबा करना होगा। मंत्रालय का दूसरा प्रस्ताव यह है कि जल्द ही देश में पतियों को अपने वेतन का एक निश्चित हिस्सा पत्नियों के अकाउंट में डालना होगा। लेकिन जिस तरह से आनन-फानन में सरकार प्रस्ताव लाने जा रही है और उसे कानूनी शक्ल देने की बात कर रही है। वह उसकी मंशा पर प्रश्नवाचक चिंह बन कर खड़ा हो गया है। यह देश को शादी में फिजूलखर्ची की चलन से मुक्त करने का अभियान कम आत्मप्रचार ज्यादा लगता है। देश भर में हर धर्म और क्षेत्र में महंगी शादी को रोकने के लिए इतनी जल्दबाजी में कानून बनाया जा रहा है। जिसमें समाज के किसी तबके से सीधे संवाद करने की जहमत नहीं उठाई गयी। जबकि जरूरी यह था कि समाज के विभिन्न धार्मिक,सामाजिक नेताओं के साथ ही आर्थिक  और सामाजिक वर्गों से  व्यापक चर्चा  करके आम सहमति बनाई जाती। धार्मिक नेताओं और महिला अधिकार संगठनों से बातचीत करके कोई व्यवहारिक,ठोस,कारगर और सवर्मान्य कानून बनाया जाता। दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने इस मसले पर राज्यों से सहमति या उनका विचार जानने की कोशिश नहीं की।  जबकि सारे राज्यों के मुख्यमंत्रियों का भी इस कानून पर राय जानना आवश्यक है। कानून व्यवस्था राज्य का मामला है। किसी भी कानून पर राज्यों की सहमति न लेने पर भारत जैसे विशाल देश में इसके जमीनी स्तर पर लागू होने में संदेह है। कानून बनाने के पहले महंगी और दहेज वाली शादियों की खामियों और उससे समाज और विकास पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का लेखा जोखा प्रस्तुत नहीं किया गया। दहेज को हमारे समाज में प्रतिष्ठा का प्रश्न भी बना दिया गया है।  समाज में लंबे समय से महंगी और लाखों,करोड़ों दहेज देकर शादियां होती रही है। समाज का एक वर्ग  शादी व्याह के अवसर पर करोडाÞें रुपये फंूक कर अपने ऐश्वर्य और धन का प्रदर्शन करने का आदी हो गया है। जबकि समाज के बहुत बड़े हिस्से के लिए लड़कियों की शादी एक आपदा के समान है। जिसे वह किसी तरह से निपटाना चाहता है। अमीरों की शादी में लाखों-करोड़ों खर्च करने की देखा-देखी मध्यमवर्गीय परिवारों में भी ज्यादा खर्च करने का दबाव बना रहता है। इसी वजह से ज्यादातर परिवार लड़कियों की पढ़ाई और उच्च शिक्षा की अनदेखी कर शादी के लिए पैसा जोड़ना शुरू कर देते हैं।
एक आंकड़े के मुताबिक देश में शादी -ब्याह के लिए बुक होने वाले बारातघर,आतिशबाजी और जरूरी संसाधनों का व्यवसाय दस हजार करोड़ रुपये सालाना है। इस कानून के बनने से क्या यह वर्ग हाथ पर हाथ धरे बैठा रहेगा। देश में कानून व्यवस्था पालन कराने की जो मशीनरी है। वह किस तरह से काम करती है किसी से छिपा नहीं है। देश में रात दस बजे के बाद किसी भी सार्वजनिक,धार्मिक आयोजनों में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर कानूनन रोक है। लेकिन इसका कितना पालन होता है। यह बात सबको पता है।
1990 में अल्ट्रासाउंड के  मेडिकल ट्रीटमेंट में आने के बाद देश में कन्या भ्रूण हत्या का शुरू हुआ सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रही है। जिसके कारण लगातार महिला-पुरूष अनुपात की दर बिगड़ती जा रही है। कुछ समय पहले महिला अधिकार संगठन यह कहते थे कि महिलाओं को जन्म के साथ ही भेदभाव का शिकार होना पड़ता है। लेकिन वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति ने अब कन्याओं को गर्भ में ही पहचान करके नष्ट करने का अविष्कार कर दिया है। अल्ट्रासाउंड आने के बाद गर्भ में  कन्या भ्रूण को पहचान कर हत्या का दस्तूर बनता जा रहा है। देश में इसके खिलाफ सख्त कानून बना है। लेकिन इस कानून के उल्लंघन के मामले में अब तक एक भी दोषियों को सजा नहीं हुई है। एक आकड़े  के अनुसार  भारत में  लिंग निर्धारण का मेडिकल व्यवसाय  एक हजार करोड़ रुपये का है। सिनेमा और टीबी धारावाहिकों में जहां सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ  फिल्म और धारावाहिक बनते हैं। वहीं पर महंगी शादियों को महिमा मंडित करने वाले फिल्मों की भी कमी नहीं है। ऐसे में समाज की जड़ता को तोड़ने के लिए एक कानून ही काफी नहीं   है।


महिलाओं के प्रति हिंसा व्यवस्थागत या कानूनी खामी एक कारण है। यह हिंसा हमारे सामाजिक ढांचे और गैर-बराबरी की सोच में निहित है। हमने महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग मानक तय किए हैं। महिलाओं के साथ भेदभाव का यह प्रवृति मुख्य रूप से हमारे सामाजिक और आर्थिक  कारणों पर ज्यादा निर्भर करता है। प्रतिदिन हजारों की संख्या में  नववधुओं को दहेज की आग में जलना या फांसी के फंदे पर लटकना पड़ रहा है। कारण साफ है। दहेज कम मिलने की वजह से ससुराल में विवाहिताओं को मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। ससुराल की इस प्रताड़ना को सहकर जिंदा रहने की जगह महिलाएं मौत को गले लगाना बेहतर समझती है। दहेज हत्या और कन्या भ्रूण हत्या हमारे समाज में स्त्री शिक्षा में कमी और महंगी होती जा रही शादियों की वजह से है। यह बात सही है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास राज्यमंत्री कृष्णा तीरथ महंगी शादियों को रोकने के खिलाफ कानून पर कहती हैं 'सरकार ऐसा कानून लाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत सभी धर्मों और तबके के लोगों के लिए शादी-ब्याह के खर्च को सीमित करना होगा। इसमें शादी के बाद दूल्हा- दुल्हन के बेहद करीबी रिश्तेदारों को चाय-नाश्ता देने पर ही पैसा खर्च करने का प्रावधान होगा।' उन्होंने कहाकि भारतीय समाज में बेटी पैदा होने पर मां-बाप दहेज और शादी के लिए पैसा जोड़ने या कर्ज लेने जैसे बोझ के डर की वजह से ही भ्रूण-हत्या जैसा कदम उठाते हैं। इससे समाज में लिंग अनुपात में खासी कमी देखी जा सकती है। अगर नया कानून लागू होता है तो देश में कन्याओं के प्रति नजरिए में खासा बदलाव होगा। मंत्रालय के इस कानून में एक प्रस्ताव ऐसा भी है। जिसके कानून का रूप लेने के बाद पूरे देश में शादी के आयोजन दिन के उजाले में और चाय-नाश्ते में ही संपन्न करना होगा।
 लेकिन  सदियों से रात में शादी का आयोजन करने वाला समाज क्या इस कानून को लागू होने के बाद,इसे मामने को तैयार होगा।  इस पर आशंका के बादल मंडरा रहे है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमारे किसी काम से अगर  जनहित को नुकसान नहीं हो रहा है। सरकार का कोई कानून हमारे व्यापक मौलिक अधिकारों  में हस्तक्षेप करता है। तो इस पर अदालत का डंडा भी चल सकता है। इस कानून में इसकी अनुगंूज भी निहित है।

ऐसा भी नहीं है कि हमारे देश के राजनीतिज्ञों ने महंगी शादियों की तरफ से आंख बंद किए  रहे। बल्कि समय-समय पर ऐसे कानून बनाएं गए। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के कायर्काल के दौरान शादी में सिर्फ पांच सदस्यों के जाने और सिर्फ 15 लोगों तक को ही खाना खिलाने का प्रयोग किया गया था। कुछ समय तक इसका पालन भी हुआ, लेकिन धीरे-धीरे खत्म हो गया। कांग्रेसी नेता संजय गांधी ने इमरजेंसी के दौरान पांच सूत्रीय कार्यक्रम में शादी के दौरान चाय-पकौड़े के रिवाज को भी तवज्जो दी थी। इसके तहत किसी भी शादी में सिर्फ चाय-पकौड़े ही दिए जाने का प्रावधान था। लेकिन समय के साथ ही यह भी बंद हो गया। बहुभाषी, बहुधार्मिक और महिला विरोधी रीति रिवाजों वाले देश में अगर सबने बिना किसी दुराग्रह के इस कानून को लागू होने में साथ दिया तो यह कानून देश के इतिहास में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो सकता है। धार्मिक दृष्टिकोणों और वैचारिक पूर्वाग्रहों को त्यागकर इस कदम का स्वागत करते हैं तो आधी आबादी के अधिकारों के लिए यह रामबाण साबित होगा।
जो सतीप्रथा निरोधक कानून के बाद महिलाओं की स्थिति  के लिए अखिल भारतीय स्तर पर कानून का रूप लेगा। लेकिन व्यवहार में यह लागू हो पाएंगा। इसमें आशंका है। देश के अंदर महिला कानूनों को जमीन पर लागू होने का रिकॉर्ड पहले से ही बहुत अच्छा नहीं है। ऐसे में   कानून की किताबों में एक और कानून की संख्या बढ़ने से महिलाओं की स्थिति में कितना परिवर्तन हो सकेगा। यह तो समय ही बताएगा।
-प्रदीप सिंह।

सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

अदालतें भ्रष्टाचार से मुक्त हों

न्यायपालिका के पास विशाल शक्तियाँ है क्योंकि वह जो कहती है अंतिम बात होती है, अचूक एवं अमोघ। इतनी शक्तिशाली है न्यायपालिका कि जब कार्यपालिका का कोई अधिकारी कानून का उल्लंघन करता है तो जज उसके आदेश को निरस्त कर सकते हैं और हुक्मनामे की अपनी ताकत से दिशा-निर्देश दे सकते हैं। जब संसद कोई कानून पास करती है और कानून का अतिक्रमण कर देती है या मौलिक अधिकारों की सीमाओं से बाहर निकल कर आदेश जारी करती है तो अदालत उस आदेश और कार्रवाई को खारिज कर सकती है। पर जब उच्च न्यायालय कानून के बेरोकटोक उल्लंघन के अपराधी हों तो उनकी इस चूक, उनकी इस गलती के लिए कोई तरीका है संहिता। हर संविधान का एक सामाजिक दर्शन होता है, खासकर भारत के संविधान का एक सामाजिक दर्शन है। हम एक समाजवादी लोकतांत्रिक गणतंत्र हैं। यदि संविधान के इन आदेशों का उल्लंघन होता है और जजों से जिस तरह के बर्ताव की उम्मीद की जाती है वे उस बर्ताव को धता बता देते हैं तो किसी को अधिकार नहीं कि उन्हें सही रास्ते पर लाए और उनके दुराचार को ठीक करे।
“जज लोग तत्वतः दूसरे सरकारी अधिकारियों से कुछ अलग नहीं हैं। न्यायिक ड्यूटियों पर आकर भी सौभाग्य से वे इंसान बने रहते हैं। अन्य इंसानों की तरह उन पर भी समय-समय पर गर्व और मनोविकारों का, तुच्छता एवं चोट खाई भावनाओं का, गलत समझ या फालतू जोश का असर पड़ता है।”
-ह्यूगो ब्लैक
अपनी पुस्तक में डेविड पैमिक जजों के बारे में लिखते हैंः
“अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जैक्सन ने 1952 में टिप्पणी की कि “जो लोग कुर्सी पर पहुँच जाते हैं कभी-कभी घमंड, गुस्सेपन, तंग नजरी, हेकड़ी और हैरान करने वाली कमजोरियों जैसी उन कमजोरियों का परिचय देते हैं जो इंसानियत को विरासत में मिली हुई है। यह हैरानी की बात होगी, असल में चिंताजनक बात होगी कि जो प्रख्यात मस्तिष्क वाले लोग इंग्लैंड की न्यायपालिका में हैं वे अपने अवकाश, जो उन्हें विरले ही मिलता है, के दिनों में गैरन्यायिक तरीके से काम करें। हाल में लॉर्ड चांसलर हेल्शाम ने स्वीकार किया, उन्होंने कहा कि जो लोग जज की कुर्सी पर बैठते हैं कभी वे उस चीज का शिकार हो जाते हैं जिसे जजी का रोग कहते हैं अर्थात एक ऐसी हालत जिसके लक्षण हैं तड़क-भड़क, चिड़चिड़ापन, बातूनीपन, ऐसी बातें कहने की प्रवृत्ति जो मामले में फैसला करने में जरूरी नहीं होती और शार्टकट का रुझान।”
दुख की बात है कि कानून के अंदर महाभियोग-जो इस बीमारी को बढ़ने से रोकने के लिए एक राजनैतिक इलाज है- के अलावा इसका अन्य कोई इलाज नहीं। इन चिंताजनक बातों से भी बदतर बात है वह जो लार्ड एक्शन ने कही है- ”सत्ता भ्रष्ट बनाती है और चरम भ्रष्ट बनाती है।” लोकतंत्र में लोगों को न्यायपालिका की आलोचना करने का अधिकार है जिससे पारदर्शी, स्वतंत्र, अच्छे व्यवहार वाली, पक्षपात से दूर और हर किस्म की कमजोरियों से मुक्त होने की अपेक्षा की जाती है। कितना भी महत्वपूर्ण मामला क्यांे न हो हर विवाद मंे जज जो फैसला करते हैं वह उस संबंध में अंतिम फैसला होता है। अतः जजों का चयन जाँच-पड़ताल के बाद और उनकी वर्ग राजनीति और वर्ग पूर्वाग्रहों के समीक्षात्मक मूल्यांकन के बाद हद दर्जे की सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। (देखिए, पोलिटिक्स ऑफ जुडिशयरी, लेखक प्रो. ग्रिफिथ)।
“जज लोग आप कहाँ निष्पक्ष हैं?” आप सभी कर्मचारियों की तरह उसी गोल चक्कर में चलते रहते हैं और नियोक्ता लोग जिन विचारों में शिक्षित हुए हैं और पले-बढ़े हैं आप लोग भी उन्हीं मंे शिक्षित हुए और पले-बढ़े हैं। किसी मजदूर या टेªड यूनियन कार्यकर्ता को इंसाफ कैसे मिल सकता है? जब विवाद का एक पक्ष आपके वर्ग का होता है और दूसरा आपके वर्ग का नहीं होता तो कभी-कभी यह सुनिश्चित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि आपने इन दो पक्षों के बीच स्वयं को पूरी तरह निष्पक्ष स्थिति में रखा है।”
- लॉर्ड जस्टिस स्क्रटून
न्याय और न्यायतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता और भाई-भतीजावाद। हाल के दिनों में न्यायापालिका में भ्रष्टाचार बहुत अधिक बढ़ा है यहाँ तक कि सर्वोच्च स्तर पर भी। गुनाहगार जजों पर संसद में महाभियोग का तरीका पूरी तरह नाकाफी और बेकार साबित हुआ है, इसका ज्वलंत उदाहरण है रामास्वामी का मामला। प्रशांत भूषण ने
न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार का जो आरोप लगाया है, और जिसका समर्थन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा ने किया है, क्या उसमें रत्तीभर भी अतिशयोक्ति है? जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप दिन दूना रात चैगुना बढ़ते ही जा रहे हैं। महाभियोग इनका कतई कोई समाधान नहीं है। अदालतों में बकाया पड़े-मुकदमों का अम्बार बढ़ता जा रहा है, पार्किन्सन्स कानून (संख्या बढ़ा दो) और पीटर प्रिंसिपल (अयोग्यता में वृद्धि)। कोई इलाज नहीं, इसका इलाज है नियुक्ति आयोग (अपॉइटमेंट कमीशन) और एक ऐसा कार्य निष्पादन आयोग (परफार्मेन्स कमीशन) जिनके पास काफी अधिक शक्तियाँ हों। नियुक्ति आयोग के पास यह शक्ति हो कि वह कार्य पालिका द्वारा नियुक्ति के लिए सुझाए गए नामों को खारिज कर सके और नियुक्ति से पहले उनके नाम सार्वजनिक कर सके। परफार्मेन्स कमीशन के पास जजों के दुराचार के खिलाफ जाँच करने की और दोषी पाए जाने पर उन्हें बर्खास्त करने की शक्तियाँ हों। ये चीजें संविधान में संशोधन कर न्यायिक आचरण संहिता का हिस्सा होना चाहिए। प्रस्तावित उम्मीदवार के बारे में कुछ कहने का अधिकार हर नागरिक को होना चाहिए। क्यों?
एक रोमन कहावत हैः जिस चीज का हम सब पर असर पड़ता है उसका फैसला सबके द्वारा होना चाहिए। हमारी न्यायापालिका अभी भी एक प्रतिष्ठित संस्था है। उनके नियतकालिक पाठ्यक्रम होने चाहिए ताकि वे अपने विषय में पूरी तरह पारंगत रहें।

-वी0आर0 कृष्णा अय्यर

बुधवार, 31 अगस्त 2011

उत्तर प्रदेश पुलिस में राजनीति

उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक श्री करमवीर सिंह की सेवानिवृत्ति के बाद डी.जी आर.के तिवारी को अतिरिक्त कार्यभार दिया गया हैडी.जी.पी पद पर सत्तारूढ़ दल स्पेशल डी.जी बृजलाल को नियुक्त करना चाहता है किन्तु वह डी.जी पद पर प्रोन्नत नहीं हैं इसलिए सियासी तिकड़म के तहत डी.जी पी.एस.सी को अतिरिक्त कार्यभार दे दिया गया जो आगामी 30 सितम्बर को सेवानिवृत्त होने जा रहे हैं रणनीति के तहत सत्तारूढ़ दल इसी एक माह में बृजलाल को डी.जी पद पर प्रोन्नत करा देगा और 30 सितम्बर के बाद डी.जी.पी के पद पर बृजलाल को नियुक्ति दे दी जाएगीकल शाम को डी.जी एंटी करप्शन अतुल को पुलिस महानिदेशक पद पर नियुक्त तय माना जा रहा था उनको बधाइयाँ भी मिलनी शुरू हो गयी थी
इस तरह से डी.जी बृजलाल सबसे जूनीयर अधिकारी होने के बाद भी उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक होंगेइसके पूर्व भी सत्तारूढ़ दल ने रणनीति के तहत पुलिस महानिदेशक पद पर वी.के.वी नायर को प्रदेश का महानिदेशक नियुक्त किया थाइसके खेल पीछे का खेल यह होता है सबसे जूनीयर अधिकारी को मुख्य अधिकारी नियुक्त कर देने से वह अधिकारी राजनीतज्ञों के हाथ की कठपुतली बना रहता है और राजनीतज्ञ अपने इशारे पर जिस तरह से चाहें उसको संचालित करें और यहीं से शुरू होता है विभाग का राजनीतिकरण ऐसे प्रोन्नत पाए हुए अधिकारीयों से किसी भी तरह के न्याय की आशा नही की जा सकती हैऐसे अधिकारी सत्तारूढ़ दल के रैली जुटाने से लेकर चुनावों में सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवारों के लिये चुनाव प्रचार तक करते रहते हैंउनकी निष्ठा जन गण मन में नहीं होती हैउनकी मात्र निष्ठा अपने भाग्य विधाता में ही होती है

सुमन
लो क सं घ र्ष !
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