मंगलवार, 25 दिसंबर 2012

नारी सुरक्षा का मामला

  1. नारी सुरक्षा का मामला --- मुद्दा ( प्रदेश सरकार द्वारा वूमन पावर लाइन
  2. 1090 के संदर्भ में )
औरतो को सामाजिक जीवन में  सुरक्षा प्रदान किये जाने का पहले का दृष्टिकोण अब नारी देह और सौन्दर्य के प्रति फूहड़ व आक्रामक भोगवादी दृष्टिकोण में बदलता जा रहा है | ऐसी ही मनोवृत्तियो एवं प्रवित्तियो को बढावा दिया जा रहा है | नारी असुरक्षा को लेकर राजनितिक एवं प्रचार माध्यमी हिस्सों में भारी चिंताए व्यक्त की जाती रही है | लडकियों और महिलाओं पर किये जाते रहे हमलो दुर्व्यवहारो बद से बदतर छेडखानियो के विरुद्ध नारी सुरक्षा की गुहार लगाईं जाती  रही है उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री जी ने भी इस गुहार को सुनते हुए वूमन पावर लाइन 1090 के नाम से एक पुलिस सेवा की शुरुआत की है | इस सेवा के अंतर्गत किसी अवांछनीय मोबाइल काल अथवा एस एम् एस आदि के जरिये प्रताड़ित की जा रही कोई लड़की या महिला पुलिस को 1090 का नम्बर डायल करके सूचित कर सकती है | उसकी फोन काल को महिला पुलिस द्वारा रिसीव किया जाएगा | उसे अपनी परेशानी बताने के लिए पुलिस स्टेशन जाने की जरूरत नही होगी | उसकी पहचान भी गोपनीय रखी जायेगी | पुलिस उसकी सहायता के लिए उसके सम्पर्क में तब तक रहेगी जब तक कि समस्या का निराकरण न हो जाए |
इसी तरह से छेड़खानी और बलात्कार जैसे अपराधो के लिए कानून और ज्यादा सख्त करने की भी मांग उठती रही है | इस दिशा में कुछ कानूनी प्रयास भी किये जाते रहे है | ऐसे शासकीय व कानूनी सुधार औरतो को कितनी सुरक्षा देते रहे है और दे सकते है इसका अंदाजा सभी को है | लेकिन यहाँ पर हमारी चर्चा का यह प्रमुख विषय नही है | हमारी चर्चा का प्रमुख मुद्दा नारियो के प्रति समाज में बढ़ रही भारी असुरक्षा के बुनियादी कारण , कारक और उसके आधार है | कयोंकि नारी असुरक्षा या नारियो के प्रति किये जाते रहे दुर्व्यवहारो की जड़ शासन -- प्रशासन व कानून की कमियों -- खामियों में नही बल्कि समाज में है |
इसे कोई भी देख सकता है | कि वर्तमान दौर के आधुनिक समाज में नारी असुरक्षा नए रूपों में बढती जा रही है | इसीलिए वर्तमान समाज में चंद शोहदों , गुंडों या अपराधियों का नही रह गया है , बल्कि वह ख़ास व आम समाज का अर्थात पूरे समाज का मामला बन गया है |
आधुनिक समाज में नारियो की असुरक्षा का मामला वस्तुत: नारियो के प्रति समाज के खासकर पुरुष समाज के दृष्टिकोण एवं व्यवहार का मामला है | खासकर यह मामला नारियो के प्रति बढ़ते जा रहे आधुनिकतावादी -- भोगवादी दृष्टिकोण के अनुसार बढती या बढाई जाती रही मनोवृत्तियो एवं व्यवहारों का मामला है |
इन दृष्टिकोणों एवं मनोवृत्तियो के रहते नारी सुरक्षा का समुचित समाधान नही किया जा सकता | इसीलिए समाज में  खासकर समाज में नारियो की असुरक्षा को बढाने वाले दृष्टिकोणों व्यवहारों एवं प्रवित्तियो को जानने . समझने के साथ उसके समाधान का सामाजिक स्तर पर प्रयास जरुर किया जाना चाहिए | इस प्रयास के साथ ही कोई शासकीय -- प्रशासकीय तथा कानूनी प्रयास सफल हो सकते है | अन्यथा केवल या मुख्यत: किये जा रहे शासकीय , प्रशासकीय व कानूनी प्रयास व पद्दतिया सफल नही हो सकती | उसे ही अपना कर इस असुरक्षा को कदापि रोका नही जा सकता |
जहा तक औरतो के प्रति समाज में व्यापत प्रचलित दृष्टिकोण का प्रश्न है , उसमे पहली बात तो यह है कि औरतो को पुरुष के अधीन रहकर उनकी अनुगामी बने रहने का दृष्टिकोण सदियों से बना रहा है और बहुत हद आज भी है | यह दृष्टिकोण न केवल पुरुष समाज का रहा है , बल्कि नारियो का भी रहा है | यहाँ हम इसके आर्थिक , सामाजिक कारणों पर कोई चर्चा नही कर रहे है | इसी के साथ दूसरी प्रमुख बात यह है कि नारियो के प्रति पुरुष समाज का दृष्टिकोण पहले से ही  किसी हद तक भोगवादी रहा है | हालाकि पिछड़े समाजो में यह दृष्टिकोण आज से कही कम था | उस समय का भोगवादी दृष्टिकोण संकुचित दायरे में ही था और आम तौर पर घर परिवार से बाहर था | फिर यह दृष्टिकोण उस समय के राजाओं , सामन्तो एवं अन्य धनाढ्य  हिस्सों में ही व्याप्त था | आम समाज में खासकर करकर  समाज में तो यह दृष्टिकोण बहुत कम था या कहिये न के बराबर था | बाजार के आधार पर खड़े होते रहे आधुनिक जनतांत्रिक समाज ने नारियो को बहुत सारे सामाजिक अधिकारों को देकर उन्हें पुरातन तथा मध्ययुगीन कठोर बन्धनों से मुक्त होने का पथ प्रशस्त किया | आधुनिक शिक्षा प्राप्त करने से लेकर हर क्षेत्र में पुरुषो की तरह आगे बढने , विभिन्न पेशो को अपनाने , धन संम्पत्ति का मालिक बनने से लेकर पद प्रतिष्ठा पाने का भी पथ प्रशस्त किया |
सदियों से पारिवारिक सीमाओं और पहचानो के साथ बंधे नारी जीवन को आगे बढाकर उसे नए सामाजिक कामो संबंधो से जुडी पहचानो को पाने का द्वार खोल दिया | अब केवल फला की लड़की फला की पत्नी या फला की माँ ही नही रह गयी , अपितु सामाजिक जीवन में अध्यापक , डाक्टर वकील वैज्ञानिक , कर्मचारी , अधिकारी व राजनेता की पहचान भी पाने लगी |
लेकिन इसी के साथ पैसे -- पूंजी खरीद बिक्री के इस आधुनिक समाज में खासकर उसके वर्तमान विश्व व्यापी दौर ने नारी की दैहिक सुन्दरता और उसके प्रदर्शन को भी वाणिज्य -- व्यापार का हिस्सा बना दिया | नारी के अंग प्रदर्शन या अर्धनग्नता को आधुनिकता व प्रगतिशीलता का नाम देकर उसका बाजारवादी , प्रचारवादी , भोगवादी इस्तेमाल भी शुरू कर दिया | इसने नारी की माँ के रूप में पहचान को मन समाज की सृजनकर्ता और पालनकर्ता की महान पहचान और भूमिका को अपने बाजारवादी , भोगवादी इस्तेमाली दृष्टिकोण से दबा भी दिया | फिर इसने नारी शरीर और उसकी सुन्दरता के भोगवादी प्रचार के जरिये सामाजिक पहचानो को भी दबा देने का काम किया , जो आज भी जारी है | मध्ययुगीन समाज में धनाढ्य वर्गो , सामन्तो , राजाओं के नारियो के प्रति उस समय भोगवादी दृष्टिकोण को आधुनिक फैशनबाजी माडलिंग बाजी मालो -- सामानों के बाजार वादी प्रचारवादी हथकण्डो से उसे आम समाज में फैला व बढा दिया गया | उसे आधुनिक समाज का नया भोगवादी या उपभोक्तावादी रूप प्रदान कर दिया | मालो -- सामानों के प्रचारों से लेकर फिल्मो , टी . वी  सीरियल पात्र -- पत्रिकाओं में नारी के शारीरिक सौन्दर्य और अर्धनग्नता का यह इस्तेमाल बखूबी देखा जा सकता है | आपने भी ध्यान दिया होगा कि किन्ही ख़ास मौको पर उच्च व संभ्रान्त परिवारों का पुरुष समाज की वेश भूषा तो कुछ ठीक -- ठाक सी रहती है , लेकिन औरते कम से कम कपड़ो में या यो कहे कि नग्नता को कम या ज्यादा उभारने वाले पहनावे में ही सजी -- धजी नजर आती है | यह बताने की जरूरत नही है कि माडलों , फिल्मो और टी . वी सीरियल से लेकर तरह -- तरह के प्रचारों में प्रदर्शित की जा रही यही नारी आम समाज की अनुकरणीय नारी बनती जा रही है | यह अनुकरण या कहिये अंधानुकरण आम समाज की लडकियों और औरतो में बढ़ता जा रहा है | सुन्दर से सुन्दर दिखने -- दिखाने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है और वह भी बाजारी हथकंडो के जरिये | व्यूटी पार्लर से लेकर तमाम तरह के आधुनिक प्रसाधन सामग्री के जरिये |
सुन्दर दिखने -- दिखाने के प्रदर्शनों आयोजनों के जरिये लडकियों एवं महिलाओं के दिमाग में भी पुरुष की तरह उन्मुक्त होकर जीवन जीने का पाठ पढ़ाया बढाया जा रहा है | लेकिन नारी देह और सुन्दरता के प्रति बढाया जा रहा यही चलन तथा उपभोक्तावादी दृष्टिकोण आम समाज में भी नारियो के प्रति भोगवादी दृष्टिकोण को ही बढावा दे रहा है | साथ ही यह चलन व दृष्टिकोण नारी के बुनियादी चारित्रिक गुणों , विशेषताओं को खासकर उसके समाज की जननी होने के महान प्राकृतिक व चारित्रिक गुण को धूमिल व विखंडित करती जा रही है |
वस्तुत: आधुनिक बाजारवादी व्यवस्था का यह चलन व दृष्टिकोण अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे पश्चिमी साम्राज्यी देशो से भारत जैसे पिछड़े देशो में आता व बढ़ता जा रहा है | यह बढाव खासकर पिछले 20 सालो से वैश्वीकरणवादी  अन्तरराष्ट्रीय नीतियों को लागू किये जाने तथा विदेशी पूंजी , तकनीक व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के अधिकाधिक घुसपैठ के साथ तेज होता रहा है | फिर यह बढाव देश के महानगरो से लेकर शहरों कस्बो से होता हुआ गाँवों -- देहातो तक के इलाको में फैलता व बढ़ता जा रहा है | समाज में औरतो को सामाजिक जीवन में सुरक्षा प्रदान किये जाने का दृष्टिकोण  अब  नारी देह और सौन्दर्य के प्रति फूहड़ व आक्रामक भोगवादी दृष्टिकोण में बदलता जा रहा है | ऐसी ही मनोवृत्तियो एवं प्रवित्तियो को बढावा दिया जा रहा है | आधुनिक समाज में बढ़ता जा रहा यही चलन नारी असुरक्षा का प्रमुख कारक व कारण बन गया है | इसे बदलने व हटाने का कोई प्रयास किये बिना नारी सुरक्षा का कोई शासकीय व कानूनी उपाय सफल नही हो सकता | अत: यह आवश्यक है कि लडकियों व  औरतो में आधुनिक व न्यायसंगत स्वतंत्रता को बढावा देने के अर्थात उनमे आधुनिक शिक्षा -- दीक्षा तथा आम समाज  के विभिन्न कामो व पेशो में जाने को बढावा देने के साथ उनमे बढाये जा रहे अर्धनग्न या देह प्रदर्शन व सौन्दर्य प्रदर्शन पर रोक लगाई जानी चाहिए | नि;सन्देह , ऐसी रोक पुरुष समाज पर भी जरुर लगनी चाहिए | इसे बढावा देने वाले नाच -- गानों , फिल्मो पर भी रोक लगनी चाहिए | आम समाज में उसकी निंदा आलोचना होनी चाहिए | उसका विरोध किया जाना चाहिए | लेकिन यह काम देश के धनाढ्य हिस्से व सत्ता -- सरकारे करने वाली नही है | कयोंकि ये हिस्से ही अपनी बाजारवादी गतिविधियों तथा उपभोक्तावादी सांस्कृतिक नीतियों छूटो से इसे बढावा देते जा रहे है | उच्च स्तरीय सांस्कृतिक एवं प्रचार माध्यमी कलाकार समाज में उसे बढावा देने वाले अग्रदूत बने हुए है | इसीलिए ये हिस्से नारी सुरक्षा का काम भी करने वाले नही है | यह काम देश के जन साधारण को ही करना होगा | स्वंय संगठित रूप से अपने दृष्टिकोण व मनोवृत्तियो को बदलना होगा | बाजारवादी , भोगवादी चलन व दृष्टिकोण के विरुद्ध उसकी अभिव्यक्तियों के विरुद्ध संघर्ष करना होगा |
-सुनील दत्ता 
पत्रकार

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