बुधवार, 12 दिसंबर 2012

अफ़ज़ल गुरू -2

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 2

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०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )
1f53e3fe-40be-49d4-8ec3-b3e88c5f590cHiRes( पहले भाग से जारी…) मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी इसलिए ह्रदयग्राही है क्योंकि वह मक़बूल बट्ट नहीं है। ताहम, उसकी कहानी भी कश्मीर घाटी की कहानी से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। यह ऐसी कहानी है जिसके नियामक तत्व न्यायालय की चारदीवारी से और ऐसे लोगों की सीमित कल्पना से, जो स्वघोषित ‘महाशक्ति’ के सुरक्षित केन्द्र में रहते हैं, बहुत आगे तक फैले हुए हैं। मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी का उत्स ऐसे युद्ध-क्षेत्र में है जिसके नियम सामान्य न्याय-व्यवस्था के सूक्ष्म तर्कों और नाज़ुक संवेदनाओं से परे है।
इन सभी कारणों से यह महत्त्वपूर्ण है कि हम संसद पर 13 दिसम्बर की अजीब, दुखद और पूरी तरह अमंगलसूचक कहानी को सावधानी से जांचे-परखें। यह दरअसल हमें इस बारे में ढेर सारी बातें बतलाती है कि दुनिया का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ किस तरह काम करता है। यह सबसे बड़ी चीज़ों को सबसे छोटी चीज़ों से जोड़ती है। यह उन गलियों-पगडंडियों को चिह्नित करती है जो उस सबको जो हमारे पुलिस थानों की अंधेरी कोठरियों में होता है, उस सबसे जोड़ती है जो धरती के स्वर्ग की सर्द, बर्फ़ीली सड़कों पर हो रहा है; और वहां से उस निस्संग दुर्भावनापूर्ण रोष तक, जो राष्ट्रों को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचा देता है। यह ऐसे स्पष्ट, सुनिश्चित सवाल उठाती है जिन्हें विचारधारा से जुड़े अथवा वाग्मितापूर्ण उत्तरों की नहीं, बल्कि स्पष्ट, सुनिश्चित उत्तरों की दरकार है।
इस साल 4 अक्टूबर को मैं भी उस छोटे-से समूह में शामिल थी जो मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी की सज़ा दिये जाने के ख़िलाफ़ नयी दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर इकट्ठा हुआ था। मैं वहां इसलिए थी कि मैं मानती हूं कि मोहम्मद अफ़ज़ल एक बहुत ही शातिराना शैतानी खेल का महज़ एक मोहरा है। अफ़ज़ल वह राक्षस नहीं है जो कि उसे बनाया जा रहा है। वह तो राक्षस के पंजे का निशान भर है और अगर पंजे के निशान को ही ‘मिटा’ दिया जाता है तो हम कभी नहीं जान पाएंगे कि राक्षस कौन था। और है।
कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि उस दोपहर वहां विरोध करने वालों से ज़्यादा पत्रकार और टीवी के लोग थे। सबसे अधिक ध्यान फ़रिश्ते की तरह सुंदर अफ़ज़ल के बेटे ग़ालिब पर था। भले दिल वाले लोग, जो यह नहीं समझ पा रहे थे कि उस लड़के का क्या करें जिसका बाप फांसी के तख़्ते की तरफ़ जा रहा था, उसे आइसक्रीम और कोल्ड़ड्रिंक दिये जा रहे थे। वहां जमा लोगों की ओर देखते हुए मेरा ध्यान एक छोटे-से उदास ब्योरे पर गया। इस विरोध-प्रदर्शन का संयोजक दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी का प्राध्यापक एस.ए.आर. गिलानी था, छोटे क़द का गठीला आदमी जो थोड़े घबराये-से अन्दाज़ में वक्ताओं का परिचय दे रहा था और घोषणाएं कर रहा था। संसद पर आक्रमण के मामले में आरोपी नंबर तीन। उसे आक्रमण के एक दिन बाद, 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा गिरफ़्तार किया गया था। हालांकि गिलानी को गिरफ़्तारी के दौरान बर्बर यातनाएं दी गयी थीं, हालांकि उसके परिवार को – पत्नी, छोटे बच्चे और भाई – को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से हवालात में रखा गया था, फिर भी उसने उस अपराध को स्वीकार करने से मना कर दिया था, जो उसने किया नहीं था।
निश्चय ही उसकी गिरफ़्तारी के बाद के दिनों में अगर आपने अख़बार नहीं पढ़े होंगे तो आप यह सब जान नहीं पाये होंगे। उन्होंने एक सर्वथा काल्पनिक, अस्तित्वहीन स्वीकारोक्ति के विस्तृत विवरण छापे थे। दिल्ली पुलिस ने गिलानी को साज़िश के भारतीय पक्ष का दुष्ट सरग़ना ( मास्टर माइंड ) कहा था। इसके पटकथा लेखकों ने उसके ख़िलाफ़ नफ़रत-भरा प्रचार-अभियान छेड़ रखा था जिसे अति-राष्ट्रवादी, सनसनी-खोजू मीडिया ने बढ़ा-चढ़ाकर और नमक-मिर्च लगाकर पेश किया था। पुलिस अच्छी तरह जानती थी कि फ़ौजदारी मामलों में यह फ़र्ज़ किया जाता है कि जज मीडिया रिपोर्टों का नोटिस नहीं लेते। इसलिए पुलिस को पता था कि उसके द्वारा इन ‘आतंकवादियों’ का निर्मम मनगढ़न्त चरित्र-चित्रण जनमत तैयार करेगा और मुक़दमें के लिए माहौल तैयार कर देगा। लेकिन पुलिस क़ानूनी जांच-परख के दायरे से बाहर होगी।
यहां प्रस्तुत हैं कुछ विद्वेषपूर्ण, कोरे झूठ जो मुख्यधारा के समाचार-पत्रों में छपें:
‘गुत्थी सुलझी : आक्रमण के पीछे जैश’, नीता शर्मा और अरुण जोशी : द हिंदुस्तान टाइम्स, 16 दिसम्बर, 2001 :
‘दिल्ली में स्पेशल सेल के गुप्तचरों ने अरबी के एक अध्यापक को गिरफ़्तार कर लिया है जो कि ज़ाकिर हुसैन कॉलेज ( सांध्यकालीन ) में पढ़ाता है…इस बात के साबित हो जाने के बाद कि उसके मोबाइल फ़ोन पर उग्रवादियों द्वारा किया गया फ़ोन आया था।’
‘दिल्ली विश्वविद्यालय का अध्यापक आतंकवादी योजना की धुरी था’, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 17 दिसम्बर, 2001 :
‘संसद पर 13  दिसम्बर का आक्रमण आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा की संयुक्त कार्रवाई था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय का अध्यापक सैयद ए.आर. गिलानी दिल्ली में सुविधाएं जुटाने वाले ( फ़ैसिलिटेटर ) प्रमुख लोगों में से एक था। यह बात पुलिस कमिश्नर अजय राज शर्मा ने रविवार को कही।’
‘प्रोफ़ेसर ने “फ़ियादीन” का मार्गदर्शन किया,’ देवेश के.पांडे, द हिंदू, 17 दिसम्बर, 2001 :
‘पूछताछ के दौरान गिलानी ने यह राज़ खोला कि वह षड्यंत्र के बारे में उस दिन से जानता था जब “फ़ियादीन” हमले की योजना बनी थी।’
‘डॉन ख़ाली समय में आतंकवाद सिखाता था,’ सुतीथो पत्रनवीस, द हिंदुस्तान टाइम्स, 17 दिसम्बर, 2001 :
‘जांच से यह बात सामने आयी है कि सांझ होने तक वह कॉलेज पहुंचकर अरबी साहित्य पढ़ा रहा होता था। ख़ाली समय में, बंद दरवाज़ों के पीछे, अपने या फिर संदेह में गिरफ़्तार किये गये दूसरे आरोपी शौकत हुसैन के घर पर वह आतंकवाद का पाठ पढ़ता और पढ़ाता था।’
‘प्रोफ़ेसर की आय’ द हिंदुस्तान टाइम्स, 17 दिसम्बर, 2001 :
‘गिलानी ने हाल ही में पश्चिमी दिल्ली में 22 लाख का एक मकान ख़रीदा था। दिल्ली पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि उसे इतना पैसा किस छप्पर के फटने से मिला।’
‘अलीगढ़ से इग्लैंड तक छात्रों में आतंकवाद के बीज बो रहा था गिलानी,’ सुजीत ठाकुर, राष्ट्रीय सहारा, 18  दिसम्बर, 2001 :
‘जांच कर रही एजेंसियों के सूत्रों और उनके द्वारा इकट्ठा की गयी सूचनाओं के अनुसार गिलानी ने पुलिस को एक बयान में कहा है कि वह लंबे समय से जैश-ए-मोहम्मद का एजेंट था…गिलानी की वाग्विदग्धता, काम करने की शैली और अचूक आयोजन क्षमता के कारण ही 2000 में जैश-ए-मोहम्मद ने उसे बौद्धिक आतंकवाद फैलाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी।’
‘आतंकवाद का आरोपी पाकिस्तानी दूतावास में जाता रहता था,’ स्वाती चतुर्वेदी, द हिंदुस्तान टाइम्स, 21 दिसम्बर, 2001 :
‘पूछताछ के दौरान गिलानी ने स्वीकार किया कि उसने पाकिस्तान को कई फ़ोन किये थे और वह जैश-ए-मोहम्मद से संबंध रखनेवाले आतंकवादियों के संपर्क में था…। गिलानी ने कहा कि जैश के कुछ सदस्यों ने उसे पैसे दिये थे और दो फ़्लैट ख़रीदने को कहा जिन्हें आतंकवादी कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किया जा सके।’
‘सप्ताह का व्यक्ति,’ संडे टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 23 दिसंबर, 2001 :
‘एक सेलफ़ोन उसका दुश्मन साबित हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय का सैयद ए.आर. गिलानी 13 दिसम्बर के मामले में गिरफ़्तार किया जाने वाला पहला व्यक्ति था – एक स्तब्ध करने वाली चेतावनी कि आतंकवाद की जड़े दूर तक और गहरे उतरती हैं।’
ज़ी टीवी ने इन सबको मात कर दिया। उसने ‘13 दिसम्बर’ नाम की एक फ़िल्म बनायी, एक डॉक्यूड्रामा जिसमें यह दावा किया गया कि वह ‘पुलिस की चार्जशीट पर आधारित सत्य’ है। ( इसे क्या शब्दावली में अंतर्विरोध नहीं कहा जायेगा? ) फ़िल्म को निजी तौर पर प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को दिखलाया गया। दोनों ने फ़िल्म की तारीफ़ की। उनके अनुमोदन को मीडिया ने व्यापक स्तर पर प्रचारित-प्रसारित किया।9
सर्वोच्च न्यायालय ने इस फ़िल्म के प्रसारण पर पाबन्दी लगाने की अपील यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि न्यायाधीश मीडिया से प्रभावित नहीं होते।10 ( क्या सर्वोच्च न्यायालय यह मानेगा कि भले ही न्यायाधीश मीडिया की रिपोर्टों से प्रभावित नहीं होते, क्या ‘समाज का सामूहिक अंतःकरण’ प्रभावित नहीं हो सकता? ) ‘13 दिसम्बर’ नामक फ़िल्म त्वरित-सुनवाई अदालत द्वारा गिलानी, अफ़ज़ल और शौकत को मृत्युदंड दिये जाने से कुछ दिन पहले ज़ी टीवी के राष्ट्रीय नेटवर्क पर दिखलायी गयी। गिलानी ने इसके बाद 18 महीने जेल में काटे; कई महीने फांसीवालों के लिए निर्धारित क़ैदे-तन्हाई में।
उच्च न्यायालय द्वारा उसे और अफ़सान गुरू को निर्दोष पाये जाने पर छोड़ा गया। ( अफ़सान गिरफ़्तारी के दौरान गर्भवती थी। उसके बच्चे का जन्म जेल में ही हुआ। उस अनुभव ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया। अब वह गंभीर मानसिक विकार से पीड़ित है। ) सर्वोच्च न्यायालय ने रिहाई के आदेश को बरक़रार रखा। उसने संसद पर आक्रमण के मामले से गिलानी को जोड़ने या किसी आतंकवादी संगठन से उसका संबंध होने का कोई प्रमाण नहीं पाया। एक भी अख़बार या पत्रकार या टीवी चैनल ने अपने झूठों के लिए उससे ( या किसी और से ) माफ़ी मांगने की ज़रूरत महसूस नहीं की। लेकिन एस.ए.आर. गिलानी की परेशानियों का अंत यहीं नहीं हुआ। उसकी रिहाई के बाद स्पेशल सेल के पास साज़िश तो रह गयी पर कोई ‘सरग़ना’ ( मास्टर माइंड ) नहीं बचा। जैसा कि हम देखेंगे, यह एक समस्या बन गयी।
इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गिलानी अब एक आज़ाद इंसान था – प्रेस से मिलने, वकीलों से बात करने और अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए आज़ाद। सर्वोच्च न्यायालय की अंतिम सुनवाई के दौरान 8 फ़रवरी, 2005 की शाम को गिलानी अपने वकील से मिलने उसके घर जा रहा था। नीम-अंधेरे से एक रहस्यमय बंदूकधारी प्रकट हुआ और उसने गिलानी पर पांच गोलियां दाग़ी।11 चामत्कारिक ढंग से वह बच गया। कहानी में यह नया अविश्वसनीय मोड़ था। साफ़ तौर पर कोई इस बात को लेकर चिंतित था कि गिलानी क्या जानता था और क्या कहने वाला था। कोई भी सोच सकता था कि पुलिस इस उम्मीद में इस मामले की जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी कि इससे संसद पर हुए आक्रमण के मामले में नये महत्त्वपूर्ण सुराग़ मिलेंगे। उलटे स्पेशल सेल ने गिलानी से इस तरह व्यवहार किया मानो अपनी हत्या के प्रयत्न का मुख्य संदेहास्पद व्यक्ति वह ख़ुद ही हो। उन्होंने उसका कंप्यूटर ज़ब्त कर लिया और उसकी कार ले गये। सैकड़ों कार्यकर्ता अस्तपाल के बाहर जमा हुए और उन्होंने हत्या के प्रयास की जांच की मांग की, जिसमें कि स्पेशल सेल पर भी जांच की मांग शामिल थी। ( बेशक वह कभी नहीं हुई। साल भर से ज़्यादा गुज़र चुका है, कोई भी इस मामले की जांच में रुचि नहीं ले रहा है। अजीब बात है। )
सो अब यहां था वह, एस.ए.आर. गिलानी। इस भयावह विपदा से उबर आने के बाद, जन्तर-मन्तर में जनता के साथ खड़ा, यह कहता हुआ कि मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी नहीं लगनी चाहिए। उसके लिए कितना आसान रहा होता घर में दुबककर बैठे रहना। साहस के इस शांत प्रदर्शन से मैं बहुत गहराई तक प्रभावित हुई, जीत ली गयी।
एस.ए.आर. गिलानी की दूसरी ओर, पत्रकारों और फ़ोटोग्राफ़रों की भीड़ में, हाथ में छोटा टेप रिकार्डर लिये, नींबू के रंग की टी-शर्ट और गैबर्डीन की पतलून में पूरी तरह सामान्य दिखने की कोशिश करता हुआ एक और गिलानी था। इफ़्तेख़ार गिलानी। वह भी क़ैद भुगत चुका था। उसे 9 जून, 2002 को गिरफ़्तार किया गय़ा था और पुलिस हिरासत में रखा गया था। उस समय वह जम्मू के दैनिक ‘कश्मीर टाइम्स’ का संवाददाता था। उस पर ‘सरकारी गोपनीयता अधिनियम’ ( ऑफ़िशियल सीक्रेट्स ऐक्ट ) के तहत आरोप लगाया गया था।12 उसका ‘अपराध’ यह था कि उसके पास ‘भारत-अधिकृत कश्मीर’ में भारतीय सेना की तैनाती को लेकर कुछ पुरानी सूचनाएं थी। ( ये सूचनाएं, बाद में पता चला, एक पाकिस्तानी शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित आलेख था जो इंटरनेट पर खुल्लमखुल्ला उपलब्ध था। ) इफ़्तेख़ार गिलानी के कंप्यूटर को ज़ब्त कर लिया गया। इंटेलिजेंस ब्यूरों के अधिकारियों ने उसकी हार्ड डिस्क के साथ छेड़-छाड़ की, डाउनलोड फ़ाइलों को उलट-पुलट किया। यह एक भारतीय दस्तावेज़-सा लगे इसके लिए ‘भारत-अधिकृत कश्मीर’ को बदल कर ‘जम्मू और कश्मीर’ किया गया और ‘केवल संदर्भ के लिए। प्रसार के लिए पूरी तरह निषिद्ध।’ – ये शब्द जोड़ दिये गये, जिससे यह ऐसा गुप्त दस्तावेज़ लगे जिसे गृहमंत्रालय से उड़ाया गया हो। सैन्य गुप्तचर विभाग के महानिदेशालय ने – हालांकि उसे इस आलेख की एक प्रति उपलब्ध करवा दी गयी थी – इफ़्तेख़ार गिलानी के वकील द्वारा बार-बार किये गये अनुरोधों की अनदेखी कर पूरे छह महीने तक इस मामले को निपटाने की कोशिश नहीं की।
एक बार फिर स्पेशल सेल के विद्वेषपूर्ण झूठों को अख़वारों ने पूरी फ़र्माबरदारी से छाप दिया। उन्होंने जो लिखा, उसमें से कुछ पंक्तियां यहां दी जा रही हैं -
‘हुर्रियत के कट्टरपंथी नेता सैयद अली शाह गिलानी के 35 वर्षीय दामाद, इफ़्तिख़ार गिलानी ने, ऐसा विश्वास है कि शहर की एक अदालत में यह मान लिया है कि वह पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी का एजेंट था।’
-नीता शर्मा, द हिंदुस्तान टाइम्स, 11 जून, 2002
‘इफ़्तिख़ार गिलानी हिजबुल मुजाहिदीन के सैयद सलाहुद्दीन का ख़ास आदमी था। जांच से पता चला है कि इफ़्तिख़ार भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों के बारे में सलाहुद्दीन को सूचना देता था। जानकार सूत्रों ने कहा कि उसने अपने असली इरादों को अपने पत्रकार होने की आड़ में इतनी सफ़ाई से छिपा रखा था कि उसका पर्दाफ़ाश करने में कई वर्ष लग गये।’
-प्रमोद कुमार सिंह, द पायनियर, जून 2002
‘गिलानी के दामाद के घर आयकर के छापों में बेहिसाब संपत्ति और संवेदनशील दस्तावेज़ बरामद’
-हिंदुस्तान, 10 जून, 2002
इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि पुलिस की चार्जशीट में उसके घर से मात्र 3450 रुपये बरामद होने की बात दर्ज़ थी। इस बीच दूसरी मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि उसका एक तीन कमरों वाला फ़्लैट है, 22 लाख रुपये की अघोषित आय है, उसने 79 लाख रुपये के आयकर की चोरी की है तथा वह और उसकी पत्नी गिरफ़्तारी से बचने के लिए घर से भागे हुए हैं।
लेकिन वह गिरफ़्तार था। जेल में इफ़्तिख़ार गिलानी को पीटा गया, बुरी तरह ज़लील किया गया। अपनी किताब ‘जेल में कटे दिन’ में उसने लिखा है कि किस तरह अन्य बातों के अलावा उससे अपनी कमीज़ से शौचालय साफ़ करवाया गया और फिर उसी कमीज़ को कई दिन तक पहनने के लिए मजबूर किया गया।13 छह महीने की अदालती जिरह और उसके मित्रों द्वारा दवाब बनाने के बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि अगर उसके ख़िलाफ़ मामला चला तो इससे ज़बर्दस्त भद्द पिटने का ख़तरा है, उसे छोड़ दिया गया।14
अब वह वहां था। एक स्वतंत्र व्यक्ति, एक रिपोर्टर जो जन्तर-मन्तर पर एक आयोजन की ख़बरे इकट्ठी करने के लिए आया था। मुझे लगा कि एस.ए.आर. गिलानी, इफ़्तिख़ार गिलानी और मोहम्मद अफ़ज़ल – तीनों ही, एक साथ, एक ही समय पर तिहाड़ जेल में रहे होंगे ( दूसरे कई कम जाने-पहचाने कश्मीरियों के साथ, जिनकी कहानियां हम कभी नहीं जान पाएंगे )।
कहा जा सकता है और कहा भी जायेगा कि एस.ए.आर. गिलानी और इफ़्तिख़ार गिलानी, दोनों के मसले भारतीय न्याय-व्यवस्था की वस्तुपरकता और उसकी आत्म-संशोधन की क्षमता दिखलाते हैं, वे उसकी साख पर बट्टा नहीं लगाते। यह आंशिक रूप से ही सही है। एस.ए.आर. गिलानी और इफ़्तिख़ार गिलानी दोनॊं इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि वे दिल्ली में रहने वाले कश्मीरी हैं और उनके साथ मध्यवर्ग के मुखर संगी-साथी हैं; पत्रकार और विश्वविद्यालय के अध्यापक, जो उन्हें अच्छी तरह जानते थे और संकट की घड़ी में उनके साथ खड़े हो गये थे। एस.ए.आर. गिलानी की वकील नन्दिता हक्सर ने एक ‘अखिल भारतीय एस.ए.आर. गिलानी बचाव समिति’ बनायी  ( जिसकी एक सदस्य मैं भी थी )।15 गिलानी के पक्ष में खड़े होने के लिए कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों ने एकजुट होकर अभियान चलाया। जाने-माने वकील राम जेठमलानी, के.जी. कन्नाबिरन और वृंदा ग्रोवर अदालत में उसकी तरफ़ से पेश हुए। उन्होंने मुक़दमें की असली सूरत उजागर कर दी – गढ़े गये सबूतों से खड़ा किया गया बेहूदा अटकलों, फ़र्ज़ी बातों और कोरे झूठों का पुलिन्दा। सो बेशक, न्यायिक वस्तुनिष्ठता मौजूद है। लेकिन वह एक शर्मीला जन्तु है जो हमारी क़ानूनी व्यवस्था की भूल-भुलैया में कहीं गहरे में रहता है। बिरले ही नज़र आता है। इसे इसकी मांद से बाहर लाने और करतब दिखाने के लिए नामी वकीलों की पूरी टोली की ज़रूरत होती है। अख़बारों की भाषा में कहें तो यह भगीरथ प्रयत्न था। मोहम्मद अफ़ज़ल के साथ कोई भगीरथ नहीं था।
 
प्रस्तुति – रवि कुमार

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