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बुधवार, 12 दिसंबर 2012

अफ़ज़ल गुरू -2

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 2

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०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )
1f53e3fe-40be-49d4-8ec3-b3e88c5f590cHiRes( पहले भाग से जारी…) मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी इसलिए ह्रदयग्राही है क्योंकि वह मक़बूल बट्ट नहीं है। ताहम, उसकी कहानी भी कश्मीर घाटी की कहानी से अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। यह ऐसी कहानी है जिसके नियामक तत्व न्यायालय की चारदीवारी से और ऐसे लोगों की सीमित कल्पना से, जो स्वघोषित ‘महाशक्ति’ के सुरक्षित केन्द्र में रहते हैं, बहुत आगे तक फैले हुए हैं। मोहम्मद अफ़ज़ल की कहानी का उत्स ऐसे युद्ध-क्षेत्र में है जिसके नियम सामान्य न्याय-व्यवस्था के सूक्ष्म तर्कों और नाज़ुक संवेदनाओं से परे है।
इन सभी कारणों से यह महत्त्वपूर्ण है कि हम संसद पर 13 दिसम्बर की अजीब, दुखद और पूरी तरह अमंगलसूचक कहानी को सावधानी से जांचे-परखें। यह दरअसल हमें इस बारे में ढेर सारी बातें बतलाती है कि दुनिया का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ किस तरह काम करता है। यह सबसे बड़ी चीज़ों को सबसे छोटी चीज़ों से जोड़ती है। यह उन गलियों-पगडंडियों को चिह्नित करती है जो उस सबको जो हमारे पुलिस थानों की अंधेरी कोठरियों में होता है, उस सबसे जोड़ती है जो धरती के स्वर्ग की सर्द, बर्फ़ीली सड़कों पर हो रहा है; और वहां से उस निस्संग दुर्भावनापूर्ण रोष तक, जो राष्ट्रों को परमाणु युद्ध के कगार पर पहुंचा देता है। यह ऐसे स्पष्ट, सुनिश्चित सवाल उठाती है जिन्हें विचारधारा से जुड़े अथवा वाग्मितापूर्ण उत्तरों की नहीं, बल्कि स्पष्ट, सुनिश्चित उत्तरों की दरकार है।
इस साल 4 अक्टूबर को मैं भी उस छोटे-से समूह में शामिल थी जो मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी की सज़ा दिये जाने के ख़िलाफ़ नयी दिल्ली में जन्तर-मन्तर पर इकट्ठा हुआ था। मैं वहां इसलिए थी कि मैं मानती हूं कि मोहम्मद अफ़ज़ल एक बहुत ही शातिराना शैतानी खेल का महज़ एक मोहरा है। अफ़ज़ल वह राक्षस नहीं है जो कि उसे बनाया जा रहा है। वह तो राक्षस के पंजे का निशान भर है और अगर पंजे के निशान को ही ‘मिटा’ दिया जाता है तो हम कभी नहीं जान पाएंगे कि राक्षस कौन था। और है।
कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि उस दोपहर वहां विरोध करने वालों से ज़्यादा पत्रकार और टीवी के लोग थे। सबसे अधिक ध्यान फ़रिश्ते की तरह सुंदर अफ़ज़ल के बेटे ग़ालिब पर था। भले दिल वाले लोग, जो यह नहीं समझ पा रहे थे कि उस लड़के का क्या करें जिसका बाप फांसी के तख़्ते की तरफ़ जा रहा था, उसे आइसक्रीम और कोल्ड़ड्रिंक दिये जा रहे थे। वहां जमा लोगों की ओर देखते हुए मेरा ध्यान एक छोटे-से उदास ब्योरे पर गया। इस विरोध-प्रदर्शन का संयोजक दिल्ली विश्वविद्यालय में अरबी का प्राध्यापक एस.ए.आर. गिलानी था, छोटे क़द का गठीला आदमी जो थोड़े घबराये-से अन्दाज़ में वक्ताओं का परिचय दे रहा था और घोषणाएं कर रहा था। संसद पर आक्रमण के मामले में आरोपी नंबर तीन। उसे आक्रमण के एक दिन बाद, 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल द्वारा गिरफ़्तार किया गया था। हालांकि गिलानी को गिरफ़्तारी के दौरान बर्बर यातनाएं दी गयी थीं, हालांकि उसके परिवार को – पत्नी, छोटे बच्चे और भाई – को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से हवालात में रखा गया था, फिर भी उसने उस अपराध को स्वीकार करने से मना कर दिया था, जो उसने किया नहीं था।
निश्चय ही उसकी गिरफ़्तारी के बाद के दिनों में अगर आपने अख़बार नहीं पढ़े होंगे तो आप यह सब जान नहीं पाये होंगे। उन्होंने एक सर्वथा काल्पनिक, अस्तित्वहीन स्वीकारोक्ति के विस्तृत विवरण छापे थे। दिल्ली पुलिस ने गिलानी को साज़िश के भारतीय पक्ष का दुष्ट सरग़ना ( मास्टर माइंड ) कहा था। इसके पटकथा लेखकों ने उसके ख़िलाफ़ नफ़रत-भरा प्रचार-अभियान छेड़ रखा था जिसे अति-राष्ट्रवादी, सनसनी-खोजू मीडिया ने बढ़ा-चढ़ाकर और नमक-मिर्च लगाकर पेश किया था। पुलिस अच्छी तरह जानती थी कि फ़ौजदारी मामलों में यह फ़र्ज़ किया जाता है कि जज मीडिया रिपोर्टों का नोटिस नहीं लेते। इसलिए पुलिस को पता था कि उसके द्वारा इन ‘आतंकवादियों’ का निर्मम मनगढ़न्त चरित्र-चित्रण जनमत तैयार करेगा और मुक़दमें के लिए माहौल तैयार कर देगा। लेकिन पुलिस क़ानूनी जांच-परख के दायरे से बाहर होगी।
यहां प्रस्तुत हैं कुछ विद्वेषपूर्ण, कोरे झूठ जो मुख्यधारा के समाचार-पत्रों में छपें:
‘गुत्थी सुलझी : आक्रमण के पीछे जैश’, नीता शर्मा और अरुण जोशी : द हिंदुस्तान टाइम्स, 16 दिसम्बर, 2001 :
‘दिल्ली में स्पेशल सेल के गुप्तचरों ने अरबी के एक अध्यापक को गिरफ़्तार कर लिया है जो कि ज़ाकिर हुसैन कॉलेज ( सांध्यकालीन ) में पढ़ाता है…इस बात के साबित हो जाने के बाद कि उसके मोबाइल फ़ोन पर उग्रवादियों द्वारा किया गया फ़ोन आया था।’
‘दिल्ली विश्वविद्यालय का अध्यापक आतंकवादी योजना की धुरी था’, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 17 दिसम्बर, 2001 :
‘संसद पर 13  दिसम्बर का आक्रमण आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा की संयुक्त कार्रवाई था जिसमें दिल्ली विश्वविद्यालय का अध्यापक सैयद ए.आर. गिलानी दिल्ली में सुविधाएं जुटाने वाले ( फ़ैसिलिटेटर ) प्रमुख लोगों में से एक था। यह बात पुलिस कमिश्नर अजय राज शर्मा ने रविवार को कही।’
‘प्रोफ़ेसर ने “फ़ियादीन” का मार्गदर्शन किया,’ देवेश के.पांडे, द हिंदू, 17 दिसम्बर, 2001 :
‘पूछताछ के दौरान गिलानी ने यह राज़ खोला कि वह षड्यंत्र के बारे में उस दिन से जानता था जब “फ़ियादीन” हमले की योजना बनी थी।’
‘डॉन ख़ाली समय में आतंकवाद सिखाता था,’ सुतीथो पत्रनवीस, द हिंदुस्तान टाइम्स, 17 दिसम्बर, 2001 :
‘जांच से यह बात सामने आयी है कि सांझ होने तक वह कॉलेज पहुंचकर अरबी साहित्य पढ़ा रहा होता था। ख़ाली समय में, बंद दरवाज़ों के पीछे, अपने या फिर संदेह में गिरफ़्तार किये गये दूसरे आरोपी शौकत हुसैन के घर पर वह आतंकवाद का पाठ पढ़ता और पढ़ाता था।’
‘प्रोफ़ेसर की आय’ द हिंदुस्तान टाइम्स, 17 दिसम्बर, 2001 :
‘गिलानी ने हाल ही में पश्चिमी दिल्ली में 22 लाख का एक मकान ख़रीदा था। दिल्ली पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि उसे इतना पैसा किस छप्पर के फटने से मिला।’
‘अलीगढ़ से इग्लैंड तक छात्रों में आतंकवाद के बीज बो रहा था गिलानी,’ सुजीत ठाकुर, राष्ट्रीय सहारा, 18  दिसम्बर, 2001 :
‘जांच कर रही एजेंसियों के सूत्रों और उनके द्वारा इकट्ठा की गयी सूचनाओं के अनुसार गिलानी ने पुलिस को एक बयान में कहा है कि वह लंबे समय से जैश-ए-मोहम्मद का एजेंट था…गिलानी की वाग्विदग्धता, काम करने की शैली और अचूक आयोजन क्षमता के कारण ही 2000 में जैश-ए-मोहम्मद ने उसे बौद्धिक आतंकवाद फैलाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी।’
‘आतंकवाद का आरोपी पाकिस्तानी दूतावास में जाता रहता था,’ स्वाती चतुर्वेदी, द हिंदुस्तान टाइम्स, 21 दिसम्बर, 2001 :
‘पूछताछ के दौरान गिलानी ने स्वीकार किया कि उसने पाकिस्तान को कई फ़ोन किये थे और वह जैश-ए-मोहम्मद से संबंध रखनेवाले आतंकवादियों के संपर्क में था…। गिलानी ने कहा कि जैश के कुछ सदस्यों ने उसे पैसे दिये थे और दो फ़्लैट ख़रीदने को कहा जिन्हें आतंकवादी कार्रवाई के लिए इस्तेमाल किया जा सके।’
‘सप्ताह का व्यक्ति,’ संडे टाइम्स ऑफ़ इंडिया, 23 दिसंबर, 2001 :
‘एक सेलफ़ोन उसका दुश्मन साबित हुआ। दिल्ली विश्वविद्यालय का सैयद ए.आर. गिलानी 13 दिसम्बर के मामले में गिरफ़्तार किया जाने वाला पहला व्यक्ति था – एक स्तब्ध करने वाली चेतावनी कि आतंकवाद की जड़े दूर तक और गहरे उतरती हैं।’
ज़ी टीवी ने इन सबको मात कर दिया। उसने ‘13 दिसम्बर’ नाम की एक फ़िल्म बनायी, एक डॉक्यूड्रामा जिसमें यह दावा किया गया कि वह ‘पुलिस की चार्जशीट पर आधारित सत्य’ है। ( इसे क्या शब्दावली में अंतर्विरोध नहीं कहा जायेगा? ) फ़िल्म को निजी तौर पर प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण आडवाणी को दिखलाया गया। दोनों ने फ़िल्म की तारीफ़ की। उनके अनुमोदन को मीडिया ने व्यापक स्तर पर प्रचारित-प्रसारित किया।9
सर्वोच्च न्यायालय ने इस फ़िल्म के प्रसारण पर पाबन्दी लगाने की अपील यह कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि न्यायाधीश मीडिया से प्रभावित नहीं होते।10 ( क्या सर्वोच्च न्यायालय यह मानेगा कि भले ही न्यायाधीश मीडिया की रिपोर्टों से प्रभावित नहीं होते, क्या ‘समाज का सामूहिक अंतःकरण’ प्रभावित नहीं हो सकता? ) ‘13 दिसम्बर’ नामक फ़िल्म त्वरित-सुनवाई अदालत द्वारा गिलानी, अफ़ज़ल और शौकत को मृत्युदंड दिये जाने से कुछ दिन पहले ज़ी टीवी के राष्ट्रीय नेटवर्क पर दिखलायी गयी। गिलानी ने इसके बाद 18 महीने जेल में काटे; कई महीने फांसीवालों के लिए निर्धारित क़ैदे-तन्हाई में।
उच्च न्यायालय द्वारा उसे और अफ़सान गुरू को निर्दोष पाये जाने पर छोड़ा गया। ( अफ़सान गिरफ़्तारी के दौरान गर्भवती थी। उसके बच्चे का जन्म जेल में ही हुआ। उस अनुभव ने उसे पूरी तरह तोड़ दिया। अब वह गंभीर मानसिक विकार से पीड़ित है। ) सर्वोच्च न्यायालय ने रिहाई के आदेश को बरक़रार रखा। उसने संसद पर आक्रमण के मामले से गिलानी को जोड़ने या किसी आतंकवादी संगठन से उसका संबंध होने का कोई प्रमाण नहीं पाया। एक भी अख़बार या पत्रकार या टीवी चैनल ने अपने झूठों के लिए उससे ( या किसी और से ) माफ़ी मांगने की ज़रूरत महसूस नहीं की। लेकिन एस.ए.आर. गिलानी की परेशानियों का अंत यहीं नहीं हुआ। उसकी रिहाई के बाद स्पेशल सेल के पास साज़िश तो रह गयी पर कोई ‘सरग़ना’ ( मास्टर माइंड ) नहीं बचा। जैसा कि हम देखेंगे, यह एक समस्या बन गयी।
इससे भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि गिलानी अब एक आज़ाद इंसान था – प्रेस से मिलने, वकीलों से बात करने और अपने ऊपर लगे आरोपों का जवाब देने के लिए आज़ाद। सर्वोच्च न्यायालय की अंतिम सुनवाई के दौरान 8 फ़रवरी, 2005 की शाम को गिलानी अपने वकील से मिलने उसके घर जा रहा था। नीम-अंधेरे से एक रहस्यमय बंदूकधारी प्रकट हुआ और उसने गिलानी पर पांच गोलियां दाग़ी।11 चामत्कारिक ढंग से वह बच गया। कहानी में यह नया अविश्वसनीय मोड़ था। साफ़ तौर पर कोई इस बात को लेकर चिंतित था कि गिलानी क्या जानता था और क्या कहने वाला था। कोई भी सोच सकता था कि पुलिस इस उम्मीद में इस मामले की जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता देगी कि इससे संसद पर हुए आक्रमण के मामले में नये महत्त्वपूर्ण सुराग़ मिलेंगे। उलटे स्पेशल सेल ने गिलानी से इस तरह व्यवहार किया मानो अपनी हत्या के प्रयत्न का मुख्य संदेहास्पद व्यक्ति वह ख़ुद ही हो। उन्होंने उसका कंप्यूटर ज़ब्त कर लिया और उसकी कार ले गये। सैकड़ों कार्यकर्ता अस्तपाल के बाहर जमा हुए और उन्होंने हत्या के प्रयास की जांच की मांग की, जिसमें कि स्पेशल सेल पर भी जांच की मांग शामिल थी। ( बेशक वह कभी नहीं हुई। साल भर से ज़्यादा गुज़र चुका है, कोई भी इस मामले की जांच में रुचि नहीं ले रहा है। अजीब बात है। )
सो अब यहां था वह, एस.ए.आर. गिलानी। इस भयावह विपदा से उबर आने के बाद, जन्तर-मन्तर में जनता के साथ खड़ा, यह कहता हुआ कि मोहम्मद अफ़ज़ल को फांसी नहीं लगनी चाहिए। उसके लिए कितना आसान रहा होता घर में दुबककर बैठे रहना। साहस के इस शांत प्रदर्शन से मैं बहुत गहराई तक प्रभावित हुई, जीत ली गयी।
एस.ए.आर. गिलानी की दूसरी ओर, पत्रकारों और फ़ोटोग्राफ़रों की भीड़ में, हाथ में छोटा टेप रिकार्डर लिये, नींबू के रंग की टी-शर्ट और गैबर्डीन की पतलून में पूरी तरह सामान्य दिखने की कोशिश करता हुआ एक और गिलानी था। इफ़्तेख़ार गिलानी। वह भी क़ैद भुगत चुका था। उसे 9 जून, 2002 को गिरफ़्तार किया गय़ा था और पुलिस हिरासत में रखा गया था। उस समय वह जम्मू के दैनिक ‘कश्मीर टाइम्स’ का संवाददाता था। उस पर ‘सरकारी गोपनीयता अधिनियम’ ( ऑफ़िशियल सीक्रेट्स ऐक्ट ) के तहत आरोप लगाया गया था।12 उसका ‘अपराध’ यह था कि उसके पास ‘भारत-अधिकृत कश्मीर’ में भारतीय सेना की तैनाती को लेकर कुछ पुरानी सूचनाएं थी। ( ये सूचनाएं, बाद में पता चला, एक पाकिस्तानी शोध संस्थान द्वारा प्रकाशित आलेख था जो इंटरनेट पर खुल्लमखुल्ला उपलब्ध था। ) इफ़्तेख़ार गिलानी के कंप्यूटर को ज़ब्त कर लिया गया। इंटेलिजेंस ब्यूरों के अधिकारियों ने उसकी हार्ड डिस्क के साथ छेड़-छाड़ की, डाउनलोड फ़ाइलों को उलट-पुलट किया। यह एक भारतीय दस्तावेज़-सा लगे इसके लिए ‘भारत-अधिकृत कश्मीर’ को बदल कर ‘जम्मू और कश्मीर’ किया गया और ‘केवल संदर्भ के लिए। प्रसार के लिए पूरी तरह निषिद्ध।’ – ये शब्द जोड़ दिये गये, जिससे यह ऐसा गुप्त दस्तावेज़ लगे जिसे गृहमंत्रालय से उड़ाया गया हो। सैन्य गुप्तचर विभाग के महानिदेशालय ने – हालांकि उसे इस आलेख की एक प्रति उपलब्ध करवा दी गयी थी – इफ़्तेख़ार गिलानी के वकील द्वारा बार-बार किये गये अनुरोधों की अनदेखी कर पूरे छह महीने तक इस मामले को निपटाने की कोशिश नहीं की।
एक बार फिर स्पेशल सेल के विद्वेषपूर्ण झूठों को अख़वारों ने पूरी फ़र्माबरदारी से छाप दिया। उन्होंने जो लिखा, उसमें से कुछ पंक्तियां यहां दी जा रही हैं -
‘हुर्रियत के कट्टरपंथी नेता सैयद अली शाह गिलानी के 35 वर्षीय दामाद, इफ़्तिख़ार गिलानी ने, ऐसा विश्वास है कि शहर की एक अदालत में यह मान लिया है कि वह पाकिस्तानी गुप्तचर एजेंसी का एजेंट था।’
-नीता शर्मा, द हिंदुस्तान टाइम्स, 11 जून, 2002
‘इफ़्तिख़ार गिलानी हिजबुल मुजाहिदीन के सैयद सलाहुद्दीन का ख़ास आदमी था। जांच से पता चला है कि इफ़्तिख़ार भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों के बारे में सलाहुद्दीन को सूचना देता था। जानकार सूत्रों ने कहा कि उसने अपने असली इरादों को अपने पत्रकार होने की आड़ में इतनी सफ़ाई से छिपा रखा था कि उसका पर्दाफ़ाश करने में कई वर्ष लग गये।’
-प्रमोद कुमार सिंह, द पायनियर, जून 2002
‘गिलानी के दामाद के घर आयकर के छापों में बेहिसाब संपत्ति और संवेदनशील दस्तावेज़ बरामद’
-हिंदुस्तान, 10 जून, 2002
इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था कि पुलिस की चार्जशीट में उसके घर से मात्र 3450 रुपये बरामद होने की बात दर्ज़ थी। इस बीच दूसरी मीडिया रिपोर्टों में कहा गया कि उसका एक तीन कमरों वाला फ़्लैट है, 22 लाख रुपये की अघोषित आय है, उसने 79 लाख रुपये के आयकर की चोरी की है तथा वह और उसकी पत्नी गिरफ़्तारी से बचने के लिए घर से भागे हुए हैं।
लेकिन वह गिरफ़्तार था। जेल में इफ़्तिख़ार गिलानी को पीटा गया, बुरी तरह ज़लील किया गया। अपनी किताब ‘जेल में कटे दिन’ में उसने लिखा है कि किस तरह अन्य बातों के अलावा उससे अपनी कमीज़ से शौचालय साफ़ करवाया गया और फिर उसी कमीज़ को कई दिन तक पहनने के लिए मजबूर किया गया।13 छह महीने की अदालती जिरह और उसके मित्रों द्वारा दवाब बनाने के बाद जब यह स्पष्ट हो गया कि अगर उसके ख़िलाफ़ मामला चला तो इससे ज़बर्दस्त भद्द पिटने का ख़तरा है, उसे छोड़ दिया गया।14
अब वह वहां था। एक स्वतंत्र व्यक्ति, एक रिपोर्टर जो जन्तर-मन्तर पर एक आयोजन की ख़बरे इकट्ठी करने के लिए आया था। मुझे लगा कि एस.ए.आर. गिलानी, इफ़्तिख़ार गिलानी और मोहम्मद अफ़ज़ल – तीनों ही, एक साथ, एक ही समय पर तिहाड़ जेल में रहे होंगे ( दूसरे कई कम जाने-पहचाने कश्मीरियों के साथ, जिनकी कहानियां हम कभी नहीं जान पाएंगे )।
कहा जा सकता है और कहा भी जायेगा कि एस.ए.आर. गिलानी और इफ़्तिख़ार गिलानी, दोनों के मसले भारतीय न्याय-व्यवस्था की वस्तुपरकता और उसकी आत्म-संशोधन की क्षमता दिखलाते हैं, वे उसकी साख पर बट्टा नहीं लगाते। यह आंशिक रूप से ही सही है। एस.ए.आर. गिलानी और इफ़्तिख़ार गिलानी दोनॊं इस मामले में सौभाग्यशाली हैं कि वे दिल्ली में रहने वाले कश्मीरी हैं और उनके साथ मध्यवर्ग के मुखर संगी-साथी हैं; पत्रकार और विश्वविद्यालय के अध्यापक, जो उन्हें अच्छी तरह जानते थे और संकट की घड़ी में उनके साथ खड़े हो गये थे। एस.ए.आर. गिलानी की वकील नन्दिता हक्सर ने एक ‘अखिल भारतीय एस.ए.आर. गिलानी बचाव समिति’ बनायी  ( जिसकी एक सदस्य मैं भी थी )।15 गिलानी के पक्ष में खड़े होने के लिए कार्यकर्ताओं, वकीलों और पत्रकारों ने एकजुट होकर अभियान चलाया। जाने-माने वकील राम जेठमलानी, के.जी. कन्नाबिरन और वृंदा ग्रोवर अदालत में उसकी तरफ़ से पेश हुए। उन्होंने मुक़दमें की असली सूरत उजागर कर दी – गढ़े गये सबूतों से खड़ा किया गया बेहूदा अटकलों, फ़र्ज़ी बातों और कोरे झूठों का पुलिन्दा। सो बेशक, न्यायिक वस्तुनिष्ठता मौजूद है। लेकिन वह एक शर्मीला जन्तु है जो हमारी क़ानूनी व्यवस्था की भूल-भुलैया में कहीं गहरे में रहता है। बिरले ही नज़र आता है। इसे इसकी मांद से बाहर लाने और करतब दिखाने के लिए नामी वकीलों की पूरी टोली की ज़रूरत होती है। अख़बारों की भाषा में कहें तो यह भगीरथ प्रयत्न था। मोहम्मद अफ़ज़ल के साथ कोई भगीरथ नहीं था।
 
प्रस्तुति – रवि कुमार

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

अफ़ज़ल गुरू -1

अफ़ज़ल और संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान – 1

afzal_guru1( कसाब की फांसी के बाद, अफ़ज़ल को भी जल्दी ही फांसी की मांग उठाए जाने की पृष्ठभूमि में यह आलेख पढ़ने को मिला. 13 दिसम्बर, संसद पर हमले की तारीख़ की आमद के मद्देनज़र अरुंधति रॉय के इस आलेख को गंभीरता से पढ़ा जाना और आम किया जाना और भी मौज़ूं हो उठता है. हिंदी में यह अभी नेट पर उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इसे यहां प्रस्तुत करना आवश्यक लग रहा है. आलेख लंबा है अतः व्यक्तिगत टाइपिंग की सीमाओं के बरअक्स यह कुछ भागों में प्रस्तुत किया जाएगा.
अरुंधति आलेख के अंत में कहती हैं, ‘यह जाने बग़ैर कि दरअसल क्या हुआ था, अफ़ज़ल को फांसी पर चढ़ाना ऐसा दुष्कर्म होगा जो आसानी से भुलाया नहीं जा पायेगा। न माफ़ किया जा सकेगा। किया भी नहीं जाना चाहिए।’ इसी परिप्रेक्ष्य में अफ़ज़ल की कहानी और भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान से बावस्ता होने का जिगर टटोलिए. )

और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए

भारतीय संसद पर हमले की अजीबो-ग़रीब दास्तान (पहला भाग )

०अरुंधति रॉय ( अनुवाद – जितेन्द्र कुमार )
patrliament attack-0इतना भर हम जानते हैं : 13 दिसम्बर, 2001 को भारतीय संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था। ( राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, एनडीए सरकार पर एक और भ्रष्टाचार के प्रवाद को लेकर हमले हो रहे थे ) सुबह के साढ़े ग्यारह बजे पांच हथियारबंद आदमी एक सफ़ेद अम्बैसेडर कार में, जिसमें कामचलाऊ विस्फोटक उपकरण ( इम्प्रोवाइज़्ड एक्सप्लोज़िव डिवाइस ) लगा हुआ था, नई दिल्ली में संसद भवन के फाटक से होकर बढ़े। जब उनको रोका गया तो वे कार से कूदे और उन्होंने गोलियां बरसानी शुरू कर दीं। इसके बाद की गोलीबारी में सारे-के-सारे हमलावर मार गिराये गये। आठ सुरक्षाकर्मी और एक माली भी मारा गया। पुलिस ने कहा कि मारे गये आतंकवादियों के पास संसद भवन को उड़ाने के लिए काफ़ी विस्फोटक पदार्थ और एक पूरी बटालियन का सामना करने के लिए गोला-बारूद था।1 अधिकतर आतंकवादियों के विपरीत, ये पांच अपने अपने पीछे सुराग़ों की जबरदस्त श्रृंखला छोड़ गये – हथियार, मोबाइल फ़ोन, फ़ोन नंबर, पहचान पत्र, फ़ोटो, सूखे मेवों के पैकेट, यहां तक कि एक प्रेम-पत्र भी।2
आश्चर्य नहीं कि प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए हमले की तुलना अमरीका के 11 सितंबर के आक्रमण से की, जो सिर्फ़ तीन महिने पहले की घटना थी।
संसद पर आक्रमण के दूसरे दिन, 14 दिसम्बर, 2001 को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने दावा किया कि उसने ऐसे कई लोगों का पता लगा लिया है, जिन पर इस षडयंत्र में शामिल होने का संदेह है। एक दिन बाद, 15 दिसम्बर को उसने घोषणा की कि उसने ‘मामले को सुलझा लिया था’ : पुलिस ने दावा किया कि हमला पाकिस्तान आधारित दो आतंकवादी गुटों, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद का संयुक्त अभियान था। इस षडयंत्र में 12 लोगों के शामिल होने की बात कही गयी। जैश-ए-मोहम्मद का ग़ाज़ी बाबा ( आरोपी नंबर -1), जैश-ए-मोहम्मद का ही मौलाना मसूद अज़हर ( आरोपी नंबर -2), तरीक़ अहमद ( पाकिस्तानी नागरिक ), पांच मारे गये ‘पाकिस्तानी आतंकवादी’( आज तक हम नहीं जानते कि वे कौन थे ) और तीन कश्मीरी मर्द एस.ए.आर. गिलान, शौकत गुरू और मोहम्मद अफ़ज़ल। इसके अलावा शौकत की बीबी अफ़सान गुरू। सिर्फ़ यही चार गिरफ़्तार हुए।3
उसके बाद के तनाव-भरे दिनों में संसद को स्थगित कर दिया गया। 21 दिसम्बर को भारत ने अपने राजदूत को पाकिस्तान से वापस बुला लिया, हवाई, रेल और बस संपर्क रोक दिये गये और हमारी वायु-सीमा से गुज़रने वाली पाकिस्तानी उडानोंपररोक लगा दी गयी। भारत ने युद्ध की जबरदस्त तैयारी शुरू कर दी और पांच लाख से ज़्यादा सैनिकों को पाकिस्तान की सीमा पर भेज दिया गया। विदेशी दूतावासों ने अपने कर्मचारियों को हटाना शुरू कर दिया और भारत आने वाले पर्यटकों को यात्रा की चेतावनी वाली सलाह जारी कर दी। परमाणु युद्ध के कगार की ओर बढ़ते उपमहाद्वीप को दुनिया सांस रोककर देखने लगी।4 भारत को इस सबकी क़ीमत जनता के दस हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च करके चुकानी पड़ी। कुछ सौ सैनिक तो हड़बड़ाहट-भरी तैनाती की प्रक्रिया में ही जान से हाथ धो बैठे।
लगभग साढे़ तीन साल बाद, 4 अगस्त, 2005 को इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपना अंतिम फ़ैसला सुना दिया। उसने इस दृष्टिकोण की पुष्टि की कि संसद पर हमले को जंगी कार्रवाई के तौर पर लिया जाना चाहिए। उसने कहा ‘संसद पर आक्रमण की कोशिश निःसंदेह भारतीय राज्य और सरकार की, जो उसकी ही प्रतिरूप है, प्रभुसत्ता का अतिक्रमण है…मृत आतंकवादियों को जबरदस्त भारत विरोधी भावनाओं से भड़काकर यह कार्रवाई करने के लिए प्रेरित किया गया जैसा कि कार ( एक्स.पी डब्लू 1-8 ) पर पाये गये गृहमंत्रालय के नक़ली स्टिकर में लिखे हुए शब्दों से भी साबित होता है।’ न्यायालय ने आगे कहा, ‘कट्टर फ़ियादिनों ने जो तरीक़े अपनाये वे सब भारत सरकार के ख़िलाफ़ जंग छेड़ने की मंशा दर्शाते हैं।’
गृहमंत्रालय के नक़ली स्टिकर पर जो लिखा था, वह यह है :
‘हिन्दुस्तान बहुत ख़राब मुल्क है और हम हिन्दुस्तान से नफ़रत करते हैं, हम हिन्दुस्तान को बर्बाद कर देना चाहते हैं और अल्लाह के करम से हम ऐसा करेंगे अल्लाह हमारे साथ है और हम भरसक कोशिश करेंगे। यह मूरख वाजपेयी और आडवाणी हम उन्हें मार देंगे। इन्होंने बहुत से मासूम लोगों की जानें ली हैं और वे बेइन्तहा ख़राब इन्सान हैं, उनका भाई बुश भी बहुत ख़राब आदमी है, वह अगला निशाना होगा। वह भी बेकुसूर लोगों का हत्यारा है उसे भी मरना ही है और हम यह कर देंगे।’5
चतुराई-भरे शब्दों में लिखी गयी यह स्टिकर-घोषणा संसद की ओर जाते कार-बम के अगले शीशे पर लगा हुआ था। ( इस पाठ में जितने शब्द हैं उन्हें देखते हुए यह हैरत की बात है कि ड्राइवर कुछ देखने की स्थिति में रहा भी होगा। शायद यही कारण है कि वह उप-राष्ट्रपति की कारों के काफ़िले से टकरा गया था? )
पुलिस ने अपना आरोप-पत्र एक त्वरित-सुनवाई अदालत में दायर किया जो कि ‘आतंकवाद निरोधक अधिनियम’ ( पोटा ) के मामलों को निपटाने के लिए स्थापित की गयी थी। निचली अदालत ( ट्रायल कोर्ट ) ने 16 दिसम्बर, 2002 को गिलानी, शौकत और अफ़ज़ल को मौत की सज़ा सुनायी। अफ़सान गुरू को पांच वर्ष की कड़ी कैद की सज़ा दी गयी। साल भर बाद उच्च न्यायालय ने गिलानी और अफ़सान गुरू को बरी कर दिया। लेकिन शौकत और अफ़ज़ल की मौत की सज़ा को बरकरार रखा। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने भी रिहाइयों को यथावत् रखा और शौकत की सज़ा को 10 वर्ष की कड़ी सज़ा में तब्दील कर दिया। लेकिन उसने न केवल मोहम्मद अफ़ज़ल की सज़ा को बरक़रार रखा, बल्कि बढ़ा दिया। उसे तीन आजीवन कारावास और दोहरे मृत्युदंड की सज़ा दी गयी।
4 अगस्त, 2005 के अपने फ़ैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने साफ़-साफ़ कहा है कि इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि मोहम्मद अफ़ज़ल किसी आतंकवादी गुट या संगठन का सदस्य है। लेकिन न्यायालय ने यह भी कहा है : ‘जैसा कि अधिकांश षड्यंत्रों के मामले में होता है, उस सांठ-गांठ का सीधा प्रमाण नहीं हो सकता और न है जो आपराधिक षड्यंत्र ठहरती हो। फिर भी, कुल मिलाकर आंके जाने पर परिस्थितियां अचूक ढंग से अफ़ज़ल और मारे गये ‘फ़ियादीन’ आतंकवादियों के बीच सहयोग की ओर इशारा करती हैं।’
यानि सीधा कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन परिस्थितिजन्य प्रमाण हैं।
फ़ैसले के एक विवादास्पद पैरे में कहा गया है : ‘इस घटना ने, जिसके कारण कई मौतें हुईं, पूरे राष्ट्र को हिला दिया था और समाज का सामूहिक अन्तःकरण तभी संतुष्ट होगा जब अपराधी को मृत्युदंड दिया जायेगा।’6
हत्या के अनुष्ठान को, जो  कि मृत्युदंड वास्तव में है, सही साबित करने की ख़ातिर ‘समाज के सामूहिक अन्तःकरण’ का आह्वान करना भीड़ द्वारा हत्या करने के क़ानून को मानक बनाने के बहुत नज़दीक आ जाता है। यह सोचकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि यह हमारे ऊपर शिकारी राजनेताओं या सनसनी तलाशते पत्रकारों की ओर से नहीं आया ( हालांकि उन्होंने भी ऐसा किया है ), बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत की ओर से एक फ़रमान की तरह जारी हुआ है।
अफ़ज़ल को फांसी की सज़ा देने के कारणों को स्पष्ट करते हुए फ़ैसले में आगे कहा गया है, ‘अपील करने वाला, जो हथियार डाल चुका उग्रवादी है और जो राष्ट्रद्रोही कार्यों को दोहराने पर आमादा था, समाज के लिए एक ख़तरा है और उसकी ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए।’
यह वाक्य ग़लत तर्क और इस तथ्य के निपट अज्ञान का मिश्रण है कि आज के कश्मीर में ‘हथियार डाल चुका उग्रवादी’ होने का क्या मतलब होता है।
सो : क्या मोहम्मद अफ़ज़ल की ज़िंदगी का चिराग़ बुझना ही चाहिए?
बुद्धिजीवियों, कार्यकर्ताओं, संपादकों, वकीलों और सार्वजनिक क्षेत्र के महत्त्वपूर्ण लोगों के एक छोटे-से, लेकिन प्रभावशाली समूह ने नैतिक सिद्धांत के आधार पर मृत्युदंड का विरोध किया है। उनका यह भी तर्क है कि ऐसा कोई व्यावहारिक प्रमाण नहीं है जो सुझाता हो कि मौत की सज़ा आतंकवादियों के लिए अवरोधक का काम करती है। ( कैसे कर सकती है, जब फ़िदायीनों और आत्मघाती बमवारों के इस दौर में मौत सबसे बड़ा आकर्षण बन गई जान पड़ती हो? )
अगर जनमत-संग्रह ( ओपिनियन पोल ), संपादक के नाम पत्र और टीवी स्टूडियो के सीधे प्रसारण में भाग ले रहे दर्शक भारत में जनता की राय का सही पैमाना हैं तो हत्यारी भीड़ ( लिंच मॉब ) में घंटे-दर-घंटे इज़ाफ़ा हो रहा है। ऐसा लगता है मानो भारतीय नागरिकों की बहुसंख्यक आबादी मोहम्मद अफ़ज़ल को अगले कुछ वर्षों तक हर दिन फांसी पर चढ़ाये जाते हुए देखना चाहेगी, जिनमें सप्ताहांत की छुट्टियां भी शामिल हैं। विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी, अशोभनीय हड़बड़ी प्रदर्शित करते हुए, चाहते हैं कि उसे फ़ौरन से पेश्तर फांसी दे दी जाये, एक मिनट की भी देर किये बिना।7
इस बीच कश्मीर में भी लोकमत उतना ही प्रबल है। ग़ुस्से से भरे बड़े-बड़े प्रदर्शन बढ़ती हुई मात्रा में यह स्पष्ट करते जा रहे हैं कि अगर अफ़ज़ल को फांसी दी गयी तो इसके राजनैतिक परिणाम होंगे। कुछ इसे न्याय का विचलन मानकर इसका विरोध कर रहे हैं, लेकिन विरोध करते हुए भी वे भारतीय न्यायालयों से न्याय की अपेक्षा नहीं करते। वे इतनी ज़्यादा बर्बरता से गुज़र चुके हैं कि अदालतों, हलफ़नामों और इन्साफ़ पर उनका अब कोई विश्वास नहीं रह गया है। कुछ दसरे लोग भी हैं जो चाहते हैं कि मोहम्मद अफ़ज़ल मक़बूल बट्ट की तरह फांसी चढ़ जाये – कश्मीर के स्वतंत्रता-संघर्ष के एक गर्वीले शहीद के रूप में।8 कुल मिलाकर, ज़्यादातर कश्मीरी मोहम्मद अफ़ज़ल को एक युद्धबंदी की तरह देखते हैं, जिस पर क़ब्ज़ा करने वाली ताक़त की अदालत में मुक़दमा चल रहा है ( जो निस्संदेह सच है )। स्वाभाविक रूप से राजनैतिक दलों ने भारत में भी और कश्मीर में भी हवा को सूंघ लिया है और बेमुरव्वती से जस्त लगाये, शिकार पर झपट पड़ने के लिए बढ़ रहे हैं।
दुखद यह है कि इस पागलपन में लगता है अफ़ज़ल ने व्यक्ति होने का अधिकार गंवा दिया है। वह राष्ट्रवादियों, पृथकतावादियों और मृत्युदंड विरोधी कार्यकर्ताओं – सबकी कपोल-कल्पनाओं का माध्यम बन गया है। वह भारत का महा-खलनायक बन गया है और कश्मीर का महानायक – महज़ यह सिद्ध करते हुए कि हमारे विद्धज्जन, नीति-निर्धारक और शांति के गुरू चाहे जो कहें, इतने साल बाद भी कश्मीर में युद्ध को किसी भी तरह ख़त्म हुआ नहीं कहा जा सकता।
ऐसी परिस्थिति में, जो इतनी आशंका भरी हों और जिसका इस हद तक राजनीतिकरण कर दिया गया हो, यह मानने का लालच होता है कि हस्तक्षेप का समय आकर चला गया है। आख़िरकार, कानूनी प्रक्रिया चालीस महीने चली और सर्वोच्च न्यायालय ने उन साक्ष्यों को जांचा है जो उसके सामने मौजूद थे।  उसने आरोपियों में से दो को सज़ा सुना दी और दो को बरी कर दिया। निश्चय ही यह अपने आप में न्याय की वस्तुपरकता का प्रमाण हैं? इसके बाद कहने को क्या रह जाता है? इसे देखने का एक और तरीक़ा भी है। क्या यह अजीब नहीं है कि अभियोजन पक्ष आधे मामले में इतने विलक्षण ढंग से ग़लत साबित हुआ और आधे में इतने शानदार तरीक़े से सही?
( अगली बार लगातार… दूसरा भाग )

संदर्भ :
1. संसद के हमले और उसके बाद की अदालती कार्रवाई के लिए देखें, नन्दिता हक्सर, फ्रेमिंग गिलानी, हैंगिंग अफ़ज़ल : पेट्रिऑटिज़म इन द नेम ऑफ़ टेरर ( नयी दिल्ली, प्रॉमिला, 2007 ); प्रफ़ुल्ल बिदवई, 13 डिसेम्बर-ए रीडर : द स्ट्रेंज केस ऑफ़ दी अटैक ऑन दी इंडियन पार्लियामेंट ( नयी दिल्ली : पेंगुइन बुक्स इंडिया, 2006 ); सैयद बिस्मिल्लाह गिलानी, मैन्युफ़ैक्चरिंग टेरिज़्म : कश्मीरी एनकाउंटर्स विद मीडिया एंड द लॉ ( नई दिल्ली, प्रॉमिला, 2006 ); निर्मलांशु मुखर्जी, डिसेम्बर 13 : टेरर ओवर डेमोक्रेसी ( नयी दिल्ली, प्रॉमिला, 2005 ); पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, बैलेंसिंग एक्ट : हाई कोर्ट जजमेंट ऑन द 13 डिसेम्बर, 2001 केस ( नयी दिल्ली : 19 दिसम्बर, 2003 ); पीपुल्स यूनियन फ़ॉर डेमोक्रेटिक राइट्स, ट्रायल ऑफ़ एरर्स : ए क्रिटिक ऑफ़ द पोटा कोर्ट जजमेंट ऑन द 13 दिसम्बर केस ( नई दिल्ली, 15 फ़रवरी, 2003 )।
2. न्यायाधीश एस.एन. ढींगरा, विशेष पोटा अदालत का फ़ैसला, मोहम्मद अफ़ज़ल बनाम राज्य ( दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र ), 16 दिसम्बर, 2002।
3. गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी का बयान, 18 दिसम्बर, 2001 । पाठ भारतीय दूतावास (वाशिंगटन) की बेबसाइट पर उपलब्ध है : http://www.indianembassy.org/new/parliament_doc_12_01.html ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया ) ( अब यह उपलब्ध नहीं है – प्रस्तुतकर्ता )।
4. देखें, सूज़न मिलिगन, ‘डिस्पाइट डिप्लोमेसी, कश्मीर ट्रूप्स ब्रोस’, बॉस्टन ग्लोब, 20 जनवरी, 2002, पृ. A1; फ़राह स्टॉकमैन एंड ऐंटनी शदीद, ‘सेक्शन फ़्यूएलिंग आयर बिटवीन इंडिया एंड पाकिस्तान’, बॉस्टन ग्लोब, 28 दिसम्बर, 2001, पृ. A3;  ज़ाहिद हुसैन, ‘टिट फ़ॉर टैट बैन्स रेज़ टेन्शन ऑन कश्मीर’, द टाइम्स (लंदन), 28 दिसम्बर, 2001; और ग़ुलाम हसनैन और निकोलस रफ़र्ड, ‘पाकिस्तान रेज़ेज़ कश्मीर न्यूक्लियर स्टेक्स’, संडे टाइम्स (लंदन), 30 दिसम्बर, 2001 ।
5. ढींगरा, विशेष पोटा कोर्ट का फ़ैसला।
6. देखें, सोमिनी सेनगुप्ता, ‘इंडियन ओपिनियन स्प्लिट्स ऑन कॉल फ़ॉर एक्सीक्यूशन’, इंटरनेशनल हेरल्ड ट्रिब्यून, 9 अक्टूबर, 2006; और सोमिनी सेनगुप्ता और हरी कुमार, ‘डेथ सेंटेस इन टेरर अटैक पुट्स इंडिया ऑन ट्रायल’, न्यूयार्क टाइम्स, 10 अक्टूबर, 2006, पृ. A3 ।
7. ‘आडवाणी क्रिटिसाइज्ड डिले इन अफ़ज़ल एक्जुक्यूषन’, द हिंदू, 13 नवम्बर, 2006 ।
8. जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के एक संस्थापक मक़बूल बट्ट को 11 फ़रवरी, 1984 को दिल्ली में फांसी दी गयी। देखें, ‘इंडिया हैंग्स कश्मीरी फ़ॉर स्लेयिंग बैंकर’, न्यूयार्क टाइम्स, 12 फ़रवरी, 1984, सेक्शन 1, पृ. 7 । मक़बूल बट्ट के बारे में विवरण इंटरनेट पर उपलब्ध है : http://www.maqboolbutt.com और http://www.geocities.com/jklf-kashmir/maqboolstory.html ( 29 मार्च, 2009 को देखा गया ) ( अब यह साइट बंद हो गई है – प्रस्तुतकर्ता )।

प्रस्तुति – रवि कुमार
( यह आलेख अरुंधति रॉय के लेखों के संग्रह, राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित और नीलाभ द्वारा संपादित पुस्तक “कठघरे में लोकतंत्र” से साभार प्रस्तुत किया जा रहा है. यह अंग्रेजी की मूलकृति Listening of Grasshoppers से अनूदित है. यह लेख सबसे पहले ३० अक्‍तूबर, २००६ को ‘आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ था. )
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