शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

पाकिस्तान में

निमंत्रण
दक्षिण एशियाई देशों मंे अल्पसंख्यकों की स्थिति पर इस्लामाबाद में आयोजित सेमीनार और करांची में कुछ अन्य कार्यक्रमों में भागीदारी करने का निमंत्रण प्राप्त होने पर मैं रोमांंिचत हो उठा। अन्य बातों के अतिरिक्त, मेरे लिए यह ‘‘शत्रु देश‘‘ को व्यक्तिगत तौर पर देखने-समझने का एक मौका था। मैंने पहले यह तय किया कि इस्लामाबाद और करांची के अतिरिक्त, मैं झंग भी जाऊंगा जहां  विभाजन की त्रासदी के कुछ ही समय पूर्व मेरा जन्म हुआ था। बाद में मुझे यह पता लगा कि पाकिस्तान का वीजा प्राप्त करना बहुत कठिन है और वहां हर शहर के लिए अलग वीजा दिया जाता है। इसलिए मैंने झंग जाने का इरादा छोड़ दिया और अपनी यात्रा को केवल करांची व इस्लामाबाद तक ही सीमित रखने का फैसला किया। इन दोनों शहरों की यात्रा के लिए मुझे निमंत्रित किया गया था लिहाजा वहां का वीजा प्राप्त करना आसान था।
मैंने अपने जिन भी मित्रों या रिश्तेदारों से अपनी पाकिस्तान यात्रा के संबंध में चर्चा की उन सभी की प्रतिक्रिया एक सी थी। अरे बाप रे, आप पाकिस्तान जा रहे हैं। वहां बहुत सावधान रहिएगा! ऐसा लग रहा था कि लोग यह तो मानते ही हैं कि पाकिस्तान, भारत में होने वाले आतंकी हमलों का मास्टरमाइंड है बल्कि वे यह भी मानते हैं कि पाकिस्तान में सड़कों पर बंदूक लिए आतंकवादी घूमते रहते हैं और वे जब और जिसे चाहे गोलियों से भून देते हैं। यह भी आम मान्यता है कि पाकिस्तान, भारत का स्थायी शत्रु है क्योंकि उसने भारत के साथ तीन युद्ध लड़े हैं और वहां दर्जनों ऐसे केन्द्र हंै जहां आतंकियों को प्रशिक्षण दिया जाता है।
इस्लामाबाद
पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद मुझे विशुद्ध सरकारी शहर लगा। यहां की आबादी का केवल बहुत छोटा सा हिस्सा ऐसा है जो किसी न किसी सरकारी कार्यालय या एजेन्सी में काम नहीं करता। हमनें शहर के पास की पहाड़ी से मनमोहक रावल झील देखी। यह झील इस्लामाबाद को रावलपिंडी से अलग करती है। इस्लामाबाद में मुझे ऐसा लग ही नहीं रहा था कि मैं विदेशी धरती पर हूं। चाहे भाषा हो या खानपान या फिर आम लोगों की गर्मजोशी, ऐसा महसूस होता था मानो हम भारत में ही हों।
यह सही है कि दक्षिण एशिया के लगभग सभी देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति अच्छी नहीं है और इस संबंध में कार्यशाला में कई शोधपत्र भी प्रस्तुत किए गए परंतु यह भी उतना ही सच है कि पाकिस्तान में मानवाधिकार कार्यकर्ता अत्यंत मुखर हैं और बड़ी हिम्मत और निष्ठा से प्रजातंत्र की मशाल प्रज्जवलित किए हुए हैं।
कार्यक्रम के आयोजकों द्वारा दिए गए भोज में मुझे पाकिस्तान के मानवाधिकार आंदोलन के कई जाने-माने कार्यकर्ताओं, जिनमें आई. ए. रहमान शामिल थे, से मिलने का मौका मिला। मुझे रहमान साहब की पुस्तक ‘‘पाकिस्तान: नाईदर ए स्टेट, नार ए नेशन‘‘ (पाकिस्तान: न राज्य न राष्ट्र) की प्रति भी मिली। यह पुस्तक पाकिस्तान के मूल चरित्र का गंभीर विश्लेषण और अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह देश केवल साम्राज्यवादी साजिश के तहत बना और इसके निर्माण में आम मुसलमानों की कोई भूमिका नहीं थी। बल्कि अविभाजित भारत के अधिकांश मुसलमान और विशेषकर गरीब मुसलमान, जो कारीगर और किसान थे, पाकिस्तान के निर्माण के खिलाफ थे। भोज में मुझे एक और सुखद अनुभूति हुई। भोजन तो शानदार था ही और बातचीत भी बहुत दिलचस्प हो रही थी, परंतु मेरा ध्यान खींचा वहां गाए जा रहे मेरे प्रिय, पुरानी हिन्दी फिल्मों के गानों ने। यहां तक कि मुझे स्वयं को यह याद दिलाना पड़ा कि मैं भारत में नहीं बल्कि पाकिस्तान में हूं। गायक दल के सदस्यों ने मानो समां ही बांध दिया और उन्होंने एक से बढ़कर एक सुमधुर हिन्दी गीत उतने ही सुमधुर अंदाज मंे प्रस्तुत किए। उस दिन का यह मेरा सबसे आल्हादकारी अनुभव था।
भारत का ‘साफ्ट पावर‘
करांची का अनुभव एकदम अलग था। वहां मैंने पाया कि अलग-अलग समुदाय के सदस्य अपने-अपने मोहल्लों में रहते हैं। तथापि वहां विभिन्न समुदायों के बीच की भौगोलिक दूरियां, भारत में मुसलमानों के अपने मोहल्लों में सिमटने की बढ़ती प्रवृत्ति से भिन्न हंै। करांची की चैड़ी सड़कों और मंथर गति से बहते यातायात ने मुझे पांच दशक पहले के मुंबई की याद दिला दी।
किसी भी शहर के आटो या टैक्सी ड्राईवरों से बातचीत हमें उस शहर के बारे में बहुत कुछ बता सकती है। मेरी टैक्सी का ड्राईवर पेशावर का एक युवक था और वह तालिबानियों से तंग आकर पेशावर छोड़ करांची में बस गया था। अन्य कट्टरपंथियों की तरह, तालिबान भी लोगों पर ड्रेस कोड लाद रहे हैं और उनकी हुक्मउदूली की एकमात्र सजा मौत है। इस युवक ने मुझे बताया कि पहले उसके परिवार में शादियों में लगभग एक हफ्ते तक नाच-गाना चलता था परंतु अब तालिबानियों ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया है। तालिबानियों के आतंक के कारण बड़ी संख्या में लोग पेशावर छोड़कर करांची और दूसरे शहरों में बस रहे हैं। इस युवक से मेरी उस विषय पर भी चर्चा हुई, जिसे कई लेखक भारत का ‘‘साफ्ट पावर‘‘ कहते हैं। और वह है बालीवुड। इस युवक के लिए बालीवुड के तीनों खान भगवान से कम नहीं हैं। उसने कहा कि शाहरूख खान की टीम की आईपीएल में जीत पर उसने जमकर जश्न मनाया था। उसने मुुझे यह भी बताया कि उसने वैसी ही मूंछें और लंबे बाल रखे थे जैसे कि शाहरूख खान के उनकी फिल्म ‘मंगल पाण्डे‘ में थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि आम पाकिस्तानी हिन्दी फिल्मों और भारतीय संगीत का दीवाना है।
करांची के मलयाली कामरेड
मेरी मुलाकात कई मित्रों से हुई जो पाकिस्तान में प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत करने और भारत के साथ बेहतर संबंधों की कायमी के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। इनमें से एक हैं केरल के कामरेड बी. एम. कुट्टी। इन्हें कुट्टी साहब कहकर पुकारा जाता है और वे करांची के जाने-माने नागरिक हैं। शहर में होने वाले हर प्रगतिशील आंदोलन और अभियान में उनकी भागीदारी होती है और वे युवाओं को प्रजातांत्रिक समाज और
धर्मनिरपेक्ष राज्य के मूल्यों से परिचित करवाने की मुहिम में दिन-रात एक किए हुए हैं।
ये मलयाली सज्जन पिछले 60 सालों से करांची में रह रहे हैं और उनकी आत्मकथा का शीर्षक ‘‘सिक्स डिकेड्स आॅफ एक्साइल: नो रिगरेट्स‘‘ (निर्वासन के छःह दशक: कोई ख्ेाद नहीं) उनके जीवनदर्शन को प्रतिबिंबित करता है। मीडिया, ट्रेड यूनियन और करांची विश्वविद्यालय के कई मित्रों और कामरेडों ने न सिर्फ बड़ी बेबाकी और गर्मजोशी से हम लोगों से बातचीत की बल्कि उन्होंने अपनी इस तीव्र इच्छा को भी खुलकर व्यक्त किया कि पाकिस्तान में जल्द से जल्द सेना अपनी बैरकों में वापिस जाए और आम नागरिक एक प्रजातांत्रिक सरकार के जरिए अपनी महत्वाकांक्षाओं, विचारों और इच्छाओं को स्वर दे सकें।
इस्लाम किसी राज्य का आधार हो सकता है, इसे गलत साबित करता है पाकिस्तान का मुहाजिर कौमी मूवमेंट जिसे भारत छोड़कर पाकिस्तान में बसे कई मुसलमानों का समर्थन प्राप्त है। उन्हें पाकिस्तान में उनके वाजिब हक नहीं मिले और अब वे इतने संगठित हो गए हैं कि पाकिस्तान की सीनेट और बड़े-बड़े व्यावासायिक कारपोरेशनों में उनका प्रतिनिधित्व है। करांची का प्रसिद्ध प्रेस क्लब सेना के दबाव के बावजूद अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रख सका है और समय-समय पर विभिन्न विवादास्पद विषयों पर भाषण देने के लिए विद्वानों को आमंत्रित करता रहता है। क्लब के सदस्य इस बात की कतई परवाह नहीं करते कि उनके कई आयोजनों के विषय, शासकों को बिल्कुल नहीं भाते। करांची प्रेस क्लब ने हमारी यात्रा के दौरान ‘‘सांझी विरासत: एक से सपने‘‘ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया था जिसमें पाकिस्तान और भारत की सांझा सांस्कृतिक विरासत पर जोर दिया गया और अत्यंत सकारात्मक ढंग से इन दो तथाकथित शत्रु राष्ट्रों के बीच सहयोग और मित्रता की आवश्यकता को प्रतिपादित किया गया।  
       -राम पुनियानी

2 टिप्‍पणियां:

आशा बिष्ट ने कहा…

ACHHI PRASTUTI...

राजन ने कहा…

आपके ब्लॉग पर जब मैं कोई पोस्ट पढ़ना शुरू करता हूँ उससे पहले एक बार नीचे लेखक का नाम जरूर देख लेता हूँ।इस बार भी ऐसा ही किया और जैसा कि यकीन था राम पुनियानी जी इस लेख में 'क्या नहीं' बताने वाले हैं वही हुआ।पूरे लेख में पाकिस्तानी अलपसंख्यकों की हालत के बारे में कोई जिक्र नहीं।वो किन हालातों में रह रहे हैं किस कदर असुरक्षित हैं।उनकी लड़कियों का जीना कैसे हराम किया हुआ है और कैसे उनके त्योहारों में आग लगाई जाती है कुछ नहीं बताया।अरे थोडी लिप सर्विस ही कर दी होती।और आपको किसी लेखक का हवाला देने की जरूरत नहीं है क्योंकि एक बच्चा भी जानता है कि पाकिस्तान के निर्माण का शगूफा भले ही कुछ राजनैतिज्ञों ने छेडा हो लेकिन मुस्लिमों के एक वर्ग का समर्थन इन्हें प्राप्त था।इनमें ज्यादातर पढे लिखे और अमीर मुसलमान थे जो नौकरी व्यापार में प्रतिस्पर्धा से बचना चाहते थे और नये मुल्क में ऊँचे ओहदों पर बैठ मलाई खाना चाहते थे और ऐसा हुआ भी।हाँ गरीब मुसलमानों का इसमें कोई दोष नहीं था।