बुधवार, 30 जनवरी 2013

शिन्दे का हिन्दू आतंकवाद :नामकरण की दुविधा


केेन्द्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिन्दे के हिन्दू आतंकवाद और उसके भाजपा व आरएसएस से संबंधों के बारे में बयान (23 जनवरी, 2013) के विरोध में देश भर में प्रदर्शन हो रहे हैं। अगले सत्र में संसद की कार्यवाही न चलने देने की धमकियां भी दी जा रही हैं। गृहमंत्री के बयान के दो हिस्से हैं-पहला, ‘आतंकवाद‘ शब्द के पहले ‘हिन्दू‘ उपसर्ग का प्रयोग और दूसरा, संघ और भाजपा पर आतंकी प्रशिक्षण केन्द्र संचालित करने का आरोप। शिन्दे ने जिसे हिन्दू आतंकवाद कहा है, उसे भगवा आतंकवाद और हिन्दुत्व आतंकवाद भी कहा जाता रहा है। ‘हिन्दू आतंकवाद‘ का आशय उन आतंकी हमलों से है जिन्हें साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, स्वामी असीमानंद, कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित, रामजी कालसांगरा, सुनील जोशी व उनके जैसे कई अन्यों ने अंजाम दिया था। ये सब हिन्दुत्व की विचारधारा से सक्रिय रूप से जुड़े हुए थे और इनमें से कुछ का संबंध आरएसएस से था। कुछ अन्य, हमलों के समय या उनके पहले, संघ के अनुषांगिक संगठनों जैसे अभाविप, बजरंग दल आदि से जुड़े हुए थे। इनमें से अनेक सनातन संस्था, अभिनव भारत आदि जैसे संगठनों के सदस्य थे। इन संगठनों का उद्धेश्य हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है और विचारधारा के स्तर पर ये आरएसएस के एजेन्डे से प्रेरित हैं।
गृह मंत्री का वक्तव्य, विभिन्न राज्यों के आतंकवाद-निरोधक दस्तों और एनआईए द्वारा की गई जांच-पड़ताल के नतीजों पर आधारित था। इसके पहले, जुलाई 2010 में, तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने संसद को बताया था कि एनआईए, समझौता एक्सप्रेस पर आतंकी हमले और उसके पीछे के षड़यंत्र की जांच करेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि समझौता एक्सप्रेस धमाकों के आरोपियों की मालेगांव (8 सितम्बर 2006), हैदराबाद की मक्का मस्जिद (18 मई 2007) और अजमेर दरगाह (11 अक्टूबर 2007) पर हुए आतंकी हमलों में संलिप्तता थी या नहीं, यह भी जांच का विषय होगा। चिदम्बरम ने भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था।
पिछले लगभग दस वर्षों के दौरान अनेक ऐसे आतंकी हमले हुए हैं जिनमें ये लोग शामिल थे। इन हमलों की एक लंबी सूची है, जिसमें 2003 में महाराष्ट्र के परभनी, जालना और जलगांव जिलों, 2006 मंे उत्तरप्रदेश के मऊ जिले, जनवरी 2008 में नांदेड, अगस्त 2008 में तमिलनाडू के तिरूनेल्वेली जिले के तेनकासी में आरएसएस के कार्यालय व कानपुर में हुए हमले शामिल हैं। इनमें से कुछ घटनाओं की विस्तृत जानकारी अपने आप में दोषियों का पर्दाफाश करने के लिए पर्याप्त हैः-
1.    सन् 2006 में 6 अप्रैल को महाराष्ट्र के नांदेड़ में बम बनाते हुए बजरंग दल के दो कार्यकर्ता मारे गए। जिस मकान में यह घटना हुई, उसका मालिक आरएसएस कार्यकर्ता था और मकान के ऊपर भगवा झंडा फहरा रहा था। मकान की दीवार पर एक बोर्ड टंगा था, जिसमें  भवन को बजरंग दल की नांदेड़ शाखा का कार्यालय बताया गया था।
2.    महाराष्ट्र के ठाणे में 4 जून 2008 को हिन्दू जागरण समिति के दो कार्यकर्ताओं को गड़करी रंगायतन के तलघर में बम विस्फोट के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इस घटना में 7 लोग घायल हुए थे। यही संगठन वाशी और पनवेल में हुए धमाकों के लिए भी जिम्मेदार था।
3.    गोवा के मारगांव मंे दीपावली की पूर्वसंध्या (17 अक्टूबर 2009) को स्कूटर की डिक्की में रखा एक बम फट गया। इस घटना में मालगोंडा पाटील मारा गया और योगेश नायक घायल हुआ। एक अन्य बम, सांकोले में उस ट्रक से बरामद हुआ, जिसमें 40 युवक नरकासुर मेले में भाग लेने जा रहे थे। मृतक और घायल दोनों सनातन संस्था के सदस्य थे। इस धमाके का उद्धेश्य मारगांव में साम्प्रदायिक तनाव फैलाना था। मारगांव का साम्प्रदायिक हिंसा का लंबा इतिहास है। सनातन संस्था, सावरकर (हिन्दू महासभा) व हेडेेगेवार (आरएसएस) से प्रेरित है और अपने सदस्यों को मुसलमानों और ईसाईयों से नफरत करना सिखाती है।
4.    कानपुर में 24 अगस्त 2008 को बजरंग दल के दो कार्यकर्ता उस समय मारे गए जब वे देसी बम बना रहे थे। कानपुर जोन के पुलिस महानिरीक्षक एसएन सिंह ने कहा कि पुलिस की जांच से यह पता लगा है कि बजरंग दल, उत्तरप्रदेश के विभिन्न स्थानों पर बड़े पैमाने पर बम धमाके करने की योजना बना रहा था।
5.    23 अक्टूबर 2008 के ‘इंडियन एक्सप्रेस‘ में छपी एक रपट के अनुसार, मालेगांव और मोडासा में सितंबर 2008 में हुए बम विस्फोटों के तार अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े थे। तमिलनाडू के तेनकासी में आरएसएस के कार्यालय पर बम हमले (जनवरी 2008) के लिए भी यही संगठन जिम्मेदार बताया जाता है। उस समय यह कहा गया था कि यह हमला जेहादी मुसलमानों द्वारा किया गया है।

इन सभी घटनाओं में कई समानताएं थीं। कुछ मामले ऐसे थे जिनमें बजरंग दल और उसके सहयोगी संगठनों के सदस्य, बम बनाने की कोशिश में जान गंवा बैठे। दूसरे, इन सभी हमलों का उद्धेश्य ज्यादा से ज्यादा संख्या में मुसलमानों को मारना था। यही कारण है कि ये हमले ऐसे दिनों, समय और स्थानों पर किए गए जब नमाज या शब-ए-बारात (मालेगांव) जैसे अवसरों पर बड़ी संख्या मंे मुसलमान एकत्रित थे। इसी तरह, समझौता एक्सप्रेस के अधिकांश यात्री भी मुसलमान होते हैं।
शुरूआत में ‘सभी आतंकी मुसलमान हैं‘ की मान्यता से पूर्वाग्रहग्रस्त पुलिस जांचकर्ताओं ने गलत दिशा में जांच की। परंतु मालेगांव धमाकों से साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर का जुड़ाव  उजागर होने के बाद पुलिस अन्वेषण ने सही दिशा पकड़ ली। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की पूर्व कार्यकर्ता साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की मोटरसाईकिल का इस्तेमाल मालेगांव बम धमाके के लिए किया गया था। इसके बाद, साध्वी प्रज्ञा ठाकुर से जुड़े कई व्यक्तियों के नाम एक के बाद एक सामने आने लगे। इनमें से बहुत से अब जेल की हवा खा रहे हैं। ये तथ्य यदि सामने आ सके तो उसका श्रेय महाराष्ट्र एटीएस के तत्कालीन मुखिया हेमन्त करकरे की मेहनत और सूक्ष्म जांच को जाता है। करकरे ने बहुत बारीकी से बिखरे हुए सूत्रों को जोड़ा और इसी का  नतीजा है कि इनमें से अधिकांश सलाखों के पीछे हैं। इस जांच प्रक्रिया के दौरान करकरे पर भाजपा और उसकी चचेरी बहिन शिवसेना के नेताओं ने भारी दबाव डाला। यही वह दौर था जब नरेन्द्र मोदी ने हेमन्त करकरे को देशद्रोही कहा और बाल ठाकरे ने अपने ‘सामना‘ में लिखा कि ‘‘हम करकरे के मुंह पर थूकते हैं‘‘। बाद में करकरे 26/11/2008 के मुंबई आतंकी हमले में मारे गए।
इन घटनाओं में शामिल लोग या तो आरएसएस और या फिर उसके अनुषांगिक संगठनों से जुड़े हुए थे। केन्द्रीय गृह सचिव आरके सिंह ने संघ से जुड़े उन लोगों की सूची जारी की है जिन पर आतंकी हमलों में शामिल होने के आरोप हैं-ः
1.    सुनील जोशी (मृत) जो देवास और महू में सन् 1990 के दशक से लेकर 2003 तक ‘आरएसएस कार्यकर्ता‘ था।
2.    संदीप डांगे (फरार) जो इंदौर, उत्तरकाशी और शाजापुर में 1990 के दशक से लेकर 2006 तक ‘आरएसएस प्रचारक‘ था।
3.    लोकेश शर्मा (हिरासत में) जो देवगढ़ में आरएसएस का ‘नगर कार्यवाह‘ था।
4.    स्वामी असीमानंद (हिरासत में) जो गुजरात के डांग में 1990 के दशक से लेकर 2007 तक आरएसएस की आदिवासियों के बीच काम करने वाली संस्था ‘वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़ा हुआ था‘।
5.    राजिन्दर उर्फ समुन्दर (हिरासत में) जो ‘आरएसएस वर्ग विस्तारक‘ था।
6.    मुकेश वासानी (हिरासत में) जो गोधरा में ‘आरएसएस कार्यकर्ता‘ था।
7.    देवेन्दर गुप्ता (हिरासत में) जो मऊ व इंदौर में ‘आरएसएस प्रचारक‘ था।
8.    चन्द्रशेखर लेवे (हिरासत में) जो शाहजहांपुर में 2007 में ‘आरएसएस प्रचारक‘ था।
9.    कमल चैहान (हिरासत में) जो ‘आरएसएस कार्यकर्ता‘ था।

10.    रामजी कालसांगरा (फरार) जो  ‘आरएसएस से जुड़ा हुआ‘ था।
इनके अतिरिक्त, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, स्वामी दयानंद पाण्डे, ले. कर्नल प्रसाद श्रीकांत पुरोहित व पूर्व मेजर उपाध्याय भी इस गिरोह का हिस्सा थे।
इनमंे से कई लोगों ने टुकड़ों-टुकड़ों में अनेक तथ्य उजागर किए परंतु पूरे चित्र को सामने लाने का श्रेय है स्वामी असीमानंद को, जिन्होंने मजिस्ट्रेट के सामने अपने इकबालिया बयान में सभी तथ्यों का विस्तार से खुलासा किया। अपने बयान में असीमानंद ने उस पूरे सांगठनिक ढांचे का वर्णन किया जो आतंकी हमले करने के लिए खड़ा किया गया था और जिसके समन्वयक वे स्वयं थे। अनेक आरएसएस कार्यकर्ता और संघ से जुड़े लोग इस ढांचे का हिस्सा थे। असीमानंद के अनुसार, इस योजना को इस्लामिक आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए तैयार किया गया था। ये लोग संकटमोचन मंदिर पर आतंकी हमले का बदला लेना चाहते थे। इस योजना का एक और उद्धेश्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना का मार्ग प्रशस्त करना था।
विभिन्न राज्यों की एटीएस व एनआईए द्वारा की गई पड़ताल में इन लोगों से जुड़े अन्य कई व्यक्तियों के नाम सामने आए और वे सब जेल में हैं। इस गिरोह द्वारा अंजाम दिए गए अधिकांश आतंकी हमलों के बाद निर्दोष मुस्लिम नौजवानों को गिरफ्तार किया गया। इनमें से कुछ को बाद में सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया।
इन आतंकी हमलों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने वाले सभी व्यक्ति हिन्दू थे। क्या इस कारण इस तरह के आतंकवाद को ‘हिन्दू आतंकवाद‘ कहा जा सकता है? कतई नहीं। इस आतंकवाद को यदि शिन्दे हिन्दू आतंकवाद कह रहे हैं तो वे गलत कर रहे हैं।
क्या ‘भगवा आतंकवाद‘ शब्द सही है? बिल्कुल नहीं। इस शब्द का इस्तेमाल मालेगांव धमाकों की हेमन्त करकरे द्वारा  जांच के बाद तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम सहित कई अन्य लोगों ने किया था। स्पष्टतः इस आतंकवाद को न तो हिन्दू आतंकवाद कहा जाना उचित है और न ही भगवा आतंकवाद। परंतु हमें उस पृष्ठभूमि में जाना होगा जिसके कारण ये शब्द इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
आरएसएस नियमित रूप से ‘इस्लामिक आतंकवाद को सख्ती से कुचलने‘ की मांग करता रहा है। इस्लामिक आतंकवाद शब्द  9/11 के हमले के बाद अमेरिकी मीडिया ने गढ़ा था। यह आतंकवाद को किसी धर्म विशेष से जोड़ने का पहला बड़ा प्रयास था। शनैः-शनैः यह शब्द लोकप्रिय हो गया और दुनिया भर का मीडिया व राजनेता इसका खुलकर इस्तेमाल करने लगे। यह अमेरिका की एक सोची-समझी चाल थी जिसका उद्धेश्य था मुसलमानों पर निशाना साधना और पश्चिम एशिया के तेल संसाधनों पर कब्जा करने के लिए अपने सैन्य अभियानों को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना। भारत में भी मीडिया के एक बड़े हिस्से ने इस शब्द का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। संघ और उसके अनुषांगिक संगठन आतंकवाद के ‘इस्लामिक चरित्र‘ पर बहुत जोर देते थे। इस सिलसिले में जेहादी आतंकवाद शब्द का भी प्रयोग होता रहा है। इस तरह, धीरे-धीरे आतंकवाद को धर्म से जोड़ना सामान्य बात बन गया और आम लोगों ने इसे स्वीकार कर लिया।
इस पृष्ठभूमि में जब ऐसी आतंकी घटनाएं सामने आईं जिन्हें केवल हिन्दुओं ने अंजाम दिया था तब उनकी हरकतों को हिन्दू या भगवा आतंकवाद कहा जाना अस्वाभाविक नहीं था। हिन्दू या भगवा आतंकवाद शब्द उतने ही गलत हैं जितने कि इस्लामिक या जेहादी आतंकवाद। इनके लिए सही शब्द क्रमशः अल्कायदा आतंकवाद और हिन्दुत्व आतंकवाद होगा। यहां भी हिन्दुत्व आतंकवाद शब्द के प्रयोग से गलतफहमियां उपजने की संभावना है। वैसे तो हिन्दुत्व वह राजनीति है जिसका उद्धेश्य हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है परंतु चूंकि हिन्दुत्व शब्द में हिन्दू शब्द शामिल है इसलिए हिन्दुत्व को भी सामान्य जनता हिन्दू धर्म के अर्थ में लेती है। स्पष्टतः, शिन्दे बड़े दुविधाग्रस्त रहे होंगे। वे नहीं समझ पा रहे होंगे कि इस प्रकार के आतंकवाद को वे क्या नाम दें। यहां हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि हिन्दुत्व आतंकवाद का हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। आम जनता को यह समझाया जाना आवश्यक है कि हिन्दू (एक धर्म) और हिन्दुत्व (एक राजनीति) एकदम अलग-अलग हैं।
कहने की आवश्यकता नहीं कि जो लोग हिन्दू-भगवा आतंकवाद शब्द के इस्तेमाल पर चिल्लपों मचा रहे हैं वे अपना दोगलापन ही उजागर कर रहे हैं। यही वे लोग हैं जो बिना किसी संकोच के इस्लामिक आतंकवाद और जेहादी आतंकवाद जैसे शब्दों का प्रयोग करते रहे हैं और जो सीना ठोंककर यह कहते रहे हैं कि सभी आतंकवादी मुसलमान हैं। हम सबको यह समझना होगा कि आतंकवाद को जिन मदरसों में प्रोत्साहन मिला, उनकी स्थापना अमेरिका ने पाकिस्तान की धरती पर इसलिए की थी ताकि मुस्लिम युवकों के दिमागों में जहर भरा जा सके और अल्कायदा जैसे संगठनों का निर्माण किया जा सके। फिर, इस्लाम और मुसलमानों का दानवीकरण कहां तक उचित है? जेहादी या इस्लामिक आतंकवाद शब्द का प्रयोग क्यों किया जाना चाहिए? चाहे हिन्दू-भगवा आतंकवाद हो या इस्लामिक-जेहादी आतंकवाद इन सभी शब्दों का प्रयोग अनुचित हैं।
अब हम शिन्दे के बयान के दूसरे हिस्से पर आएं अर्थात, क्या आरएसएस और भाजपा आतंकवादियों को प्रशिक्षण देने के शिविर चला रही हैं? ईमानदारी की बात यह है कि यद्यपि आरएसएस द्वारा अपने प्रशिक्षण शिविरों में लाठी और राईफिल चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता है परंतु सीधे आरएसएस-भाजपा द्वारा बम बनाने या उसका इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण देने का कोई प्रमाण अभी तक सामने नहीं आया है।   इसके साथ ही यह भी सही है कि बम बनाने की गतिविधि में जो लोग संलग्न हैं वे संघ-भाजपा से जुड़े हुए हैं। इस सिलसिले में प्रज्ञा सिंह ठाकुर का राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह चैहान के साथ फोटो को हल्के में नहीं लिया जा सकता। हम यह भी नहीं भूल सकते कि लालकृष्ण आडवाणी और सुषमा स्वराज ने प्रधानमंत्री से मिलकर प्रज्ञा सिंह ठाकुर की पैरवी की थी। इस तथ्य को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जो लोग बम बनाने का प्रशिक्षण दे रहे थे या पा रहे थे, वे या तो तत्समय या पूर्व में आरएसएस से किसी न किसी रूप में जुड़े थे।
यह स्पष्ट है कि भाजपा के विरोध प्रदर्शन और धमकियां और संसद के सत्र को न चलने देने की उसकी घोषणा शुद्ध राजनैतिक और अर्थहीन हैं। भाजपा का इन आतंकवादियों से संबंध दुनिया के सामने है। शिन्दे ने जो कुछ कहा उसकी सत्यता संदेह से परे है परंतु वे इस परिघटना के नामकरण के संबंध में थोड़े भ्रमित नजर आते हैं। और इसमें भी उनकी कोई गलती नहीं है। हम अब तक विभिन्न प्रकार के आतंकवादों के लिए सही शब्द चुन ही नहीं पाए हैं। यही कारण है कि जेहादी आतंकवाद का हवाला देने वालों को कोई कुछ नहीं कहता परंतु हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग करने पर शिन्दे को जमकर लताड़ा जा रहा है।
 -राम पुनियानी

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

SHREEMAN JI JAB AP KO ITNI PUKHTA JANKAARI HAI AUR SABOOT HAI FIR DER KIS BAAT KI. YE AATANKVADI CAMP POK ME TO CHAL NAHI RAHE. MAAR GIRAAIYE BHAGWAA AATANKIYON KO POLICE AAPKI HAI. POORA SACH APNE AAP AA JAYEGA. BEKAAR KI BAYAANBAZI KYUN.