गुरुवार, 21 मार्च 2013

हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व और न्यायपालिका

  1. हिन्दू धर्म की परिभाषा के संबंध में भारतीय न्यायपालिका लंबेे समय से विभ्रम का शिकार रही है। और इस विभ्रम से हिन्दू राष्ट्रवादी और हिन्दू धार्मिक संस्थाएं लाभ उठाती रहे हैं। हिन्दू धर्म को परिभाषित करने के मामले में न्यायपालिका घड़ी के पेंडुलम की तरह, एक कोने से दूसरे कोने तक झूलती रही है। आयुक्त संपत्तिकर मद्रास बनाम स्वर्गीय आर. श्रीधरन के मामले में हिन्दू को एक धर्म बताया गया-एक ऐसा धर्म जिसमें कई भगवान, अनेक ग्रंथ और अलग-अलग धार्मिक कर्मकांड हैं। मनोहर जोशी मामले में कहा गया कि ‘‘हिन्दुत्व जीवनपद्धति है“। हाल में आयकर अपीलीय अधिकरण, नागपुर ने अपने एक निर्णय में कहा कि ‘‘हिन्दू न तो कोई धर्म है और ना ही हिन्दुओं को धार्मिक समुदाय कहा जा सकता है।‘‘ इन परस्पर विरोधाभासी व्याख्याओं का धार्मिक संगठन और मंदिर तो लाभ उठा ही रहे हैं, इससे उन हिन्दू राष्ट्रवादियों की बांछें भी खिल रही हैं जो हिन्दू धर्म को राष्ट्रीय संस्कृति के नाम पर देश पर लादने पर आमादा हैं।
    आयकर अपीलीय अधिकरण ने अपीलकर्ता शिव मंदिर देवस्थान पंच कमेटी संस्थान के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा कि शिव, हनुमान और देवी दुर्गा ब्रम्हांड की महाशक्तियां हैं और वे किसी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। अपीलकर्ता ने आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80जी(5)(6) के अंतर्गत मंदिर के रखरखाव पर किए गए खर्च को इस आधार पर करमुक्त घोषित करने की मांग की थी कि शिव की भक्ति, धार्मिक गतिविधि नहीं है और इसमें सभी समुदायों के लोग भाग ले सकते हैं। अपीलकर्ता का यह भी तर्क था कि शिवभक्ति, परोपकार का कार्य है।
    हिन्दू मूर्तियों का विधिशास्त्र
    हालिया निर्णय, जिसमें यह कहा गया कि शिव कोई भगवान नहीं वरन् महाशक्ति हैं, के विपरीत, पूर्व में न्यायालयों ने मूर्तियों को भगवान का दर्जा दिया है और उन्हंे कानून की दृष्टि में व्यक्ति माना है। देवकीनंदन बनाम मुरलीधर मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिन्दू विधि के अनुसार मूर्ति, विधिक दृष्टि से एक व्यक्ति है, जो संपत्ति धारण कर सकती है और धार्मिक संस्थान को प्राप्त संपत्ति, दरअसल, वहां स्थापित मूर्तियों की संपत्ति है। बाबरी मस्जिद विरूद्ध राम जन्मभूमि मामले में इलाहबाद उच्च न्यायालय ने मूर्तियों को शाश्वत अवयस्क का दर्जा दिया है जो संपत्ति की मालिक हो सकती हैं और जिनपर परिसीमा विधि लागू नहीं होती। हिन्दू विधि के अनुसार, मूर्तियां अदालतों में याचिका दायर कर संपत्ति के बंटवारे की मांग भी कर सकती हैं (श्री श्री श्रीधर ज्यू विरूद्ध महिन्द्रा के मिटर)।
    स्वामीनारायण संप्रदाय ने शास्त्री यज्ञ पुरूष दासजी बनाम मूलदास भुनादरदास वैश्य मामले में उच्चतम न्यायालय में यह तर्क दिया कि वे हिन्दू धर्म से विशिष्ट और अलग हैं। यह इसलिए कहा गया ताकि यह दावा किया जा सके कि ‘‘बाम्बे हिन्दू प्लेसिस आॅफ पब्लिक वरशिप एक्ट‘‘ स्वामीनारायण सम्प्रदाय पर लागू नहीं होता। इस अधिनियम के जरिए, दलितों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिया गया था। इस मामले में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने यह स्वीकार करते हुए कि हिन्दू धर्म में धार्मिक कर्मकाण्डों और प्रथाओं की विविधिता है और वह एक जीवनपद्धति है यह भी कहा कि ‘‘इन सब मसलों में विविधताओं के बाद भी कुछ मूल अवधारणाएं ऐसी हैं जिनमें सभी हिन्दू विश्वास करते हैं। जैसे, वेदों की सर्वाेच्चता, दार्शनिक मसलों में गीता की श्रेष्ठता और पुनर्जन्म व पूर्वजन्म में विश्वास।‘‘
     जीवनपद्धति
    हिन्दू राष्ट्रवादी, उनकी सुविधानुसार, कभी यह कहते हैं कि हिन्दू एक धर्म है तो कभी यह कि वह एक संस्कृति और जीवनपद्धति है। वे इन दोनों में से उस व्याख्या को चुनते हैं जिसमंे उन्हें तत्समय लाभ नजर आता है। जब मध्यप्रदेश के स्कूलों में सूर्य नमस्कार, योग की शिक्षा और गीता की पढ़ाई अनिवार्य की गई, तब भाजपा राज्य सरकार ने यह दावा किया कि गीता, धार्मिक ग्रंथ नही है। वह इसलिए क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 28 कहता है कि राज्य के अंशतः या पूर्णतः  अनुदान से संचालित स्कूलों में कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं पढ़ाया जा सकता। इसके विपरीत, जब जून 2011 में भगवत गीता के रूसी भाषा के संस्करण को प्रतिबंधित करने के लिए रूस की एक अदालत में इस आधार पर याचिका प्रस्तुत की गई कि गीता धार्मिक अतिवाद को बढ़ावा देती है, तब भाजपा ने रूस के राष्ट्रपति को गीता की एक प्रति भेजते हुए लिखा कि गीता आध्यात्मिकता को बढ़ावा देती है। इस मामले में संसद में दिए गए अपने वक्तव्य में विदेशी मामलों के मंत्री एस. एम. कृष्णा ने गीता को ‘धार्मिक ग्रंथ‘ बताया था। मध्यप्रदेश सरकार तो वरिष्ठ नागरिकों की तीर्थयात्राओं का खर्च भी उठाती है परंतु केवल हिन्दू तीर्थस्थलों की। बाद में, धर्मनिरपेक्षतावादियों के दबाव के चलते, अजमेर शरीफ को इस सूची में जोड़ा गया।
    मनोहर जोशी मामले में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के बीच अंतर न कर सका। वह दोनों के बीच भ्रमित हो गया और यह कह बैठा कि हिन्दुत्व भी एक
    जीवनपद्धति है। तथ्य यह है कि हिन्दुत्व एक राजनैतिक विचारधारा है, जो हिन्दू समुदाय को सावरकर व गोलवलकर के विचारों के अनुरूप, एक अलग नस्ल मानती है। राष्ट्र व नस्ल की विभाजक रेखाएं खींचकर, हिन्दुत्व ने मुसलमानों और ईसाईयांे को हिन्दू राष्ट्र का शत्रु घोषित कर दिया है। सावरकर तक हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म में अंतर करते थे परंतु दुर्भाग्यवश उच्चतम न्यायालय यह नहीं कर सका। हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को एक बताने के पीछे उच्चतम न्यायालय ने तार्किक कारण तो छोडि़ए, कोई भी कारण नहीं बताया। सावरकर ने हिन्दू धर्म नहीं बल्कि हिन्दू नस्ल को श्रेष्ठ बताया था। सावरकर ने लिख था, ‘‘हिन्दू भारतीय राज्य के नागरिक मात्र नहीं हैं। वे मातृभूमि के प्रति प्रेम के धागे से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। अपने वैदिक पूर्वजों से अवतीर्ण शक्तिशाली नस्ल के सदस्य बतौर वे खून के रिश्तों से भी बंधे हुए हैं।‘‘ परंतु सावरकर एक मातृभूमि-एक नस्ल की अवधारणा पर रूके नहीं। उनके लिए हिन्दू केवल वह व्यक्ति था जिसे भारतीय सभ्यता विरासत में प्राप्त हुई हो। और भारतीय सभ्यता क्या है? सावरकर के अनुसार उसमें शामिल हैं ‘‘एक इतिहास, एक साहित्य, एक से नायक, एक कला, एक कानून, एक विधिशास्त्र, एक से मेले और त्यौहार, एक से कर्मकाण्ड और संस्कार, एक से समारोह और धार्मिक कृत्य।‘‘ इस तरह, सावरकर हिन्दुओं को उनकी सांझा सांस्कृतिक विरासत के आधार पर भी परिभाषित करते हैं। सावरकर के अनुसार हिन्दू ‘‘वह व्यक्ति है जो सिन्धु से लेकर समुद्रों तक फैले भारतवर्ष को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों मानता है।‘‘ हिन्दू कहलाने के लिए भारतवर्ष को पितृभूमि और मातृभूमि दोनों मानने की अनिवार्यता के जरिए, सावरकर ने हिन्दुओं की एक अलग राजनैतिक श्रेणी का निर्माण किया। इस श्रेणी में गैर-हिन्दुओं, विशेषकर मुसलमानों और ईसाईयों के लिए, कोई स्थान न था। यह इस तथ्य के बावजूद कि मुसलमानों और ईसाईयों की भी यही मातृभूमि है और उन्होंने भी हमारी सांझा संस्कृति-भाषा, कानून, परंपराएं, लोककलाएं और इतिहास-विरासत में पाए हैं, वे हिन्दू नहीं हैं और ना ही हिन्दू माने जा सकते हैं।
    इस मायने में आयकर अपीलीय प्राधिकरण का आदेश एक दुधारी तलवार है और हिन्दुत्व की विचारधारा की जड़ों पर प्रहार करती है। हिन्दुत्व का दावा है कि हिन्दू केवल एक सामाजिक नहीं बल्कि एक राजनैतिक समुदाय हैं। यद्यपि हिन्दू धर्म में आस्थाओं की चकरा देने वाली विविधता है तथापि हिन्दुत्व उन्हीं धर्मों की नकल करना चाहता है, जिनका वह विरोधी है। हिन्दुत्व, हिन्दुओं के विचारों को एकसार करना चाहता है। वह हिन्दुओं का सैन्यीकरण करने का इच्छुक है। हिन्दुत्ववादी, हिन्दुओं को ऐसे राजनैतिक ढ़ांचे में ढालना चाहते हैं जिसके शीर्ष पर होगी एक उदार सत्ता, जिसके समक्ष सारे सदस्यों को सिर झुकाना होगा। जो लोग ऐसा नहीं करेंगे उनपर समुचित बल प्रयोग किया जाएगा और उनके लिए उचित सजा की व्यवस्था होगी। अधिकरण का आदेश, हिन्दुत्व के इन इरादों को इस अर्थ में पलीता लगाता है कि वह कहता है कि हिन्दू तो एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय भी नहीं हैं।
    भेदभाव
    हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व की  अलग-अलग और कदाचित विरोधाभासी न्यायिक परिभाषाओं का कारण यह है कि वे हिन्दू धर्म की सांस्कृतिक और कर्मकाण्डीय विविधता को देखते हैं उसके सिद्धांतो को नहीं। इसके विपरीत, जब इस्लाम या ईसाई धर्म के बारे में कोई न्यायिक समीक्षा होती है तो सिद्धांतों और ग्रंथों पर अधिक जोर होता है व इस पर कम कि इन धर्मांे के मानने वालोें की जीवनपद्धति कैसी है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म विविधतापूर्ण प्रतीत होता है व इस्लाम और ईसाई धर्म, सिद्धांतों से बंधे हुए और संकीर्ण जान पड़ते हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म की भी कई अलग-अलग व्याख्याएं हैं और जहां तक ईसाईयों और मुसलमानों के दैनिक जीवन का प्रश्न है, उसमें उतनी ही विविधिताएं हैं जितनी कि हिन्दू धर्म में। जैसे लक्षद्वीप के मुसलमान और मेघालय के ईसाईयों में मातृसत्तात्मक परिवार होते हैं। भारत में हिन्दुओं, ईसाईयों और मुसलमानों के बीच कई धार्मिक व सांस्कृतिक समानताएं हैं। अगर शिव, हनुमान और दुर्गा ब्रम्हांड की महाशक्तियां हैं तो कुरान भी अल्लाह को रब-उल-अलामीन (पूरे ब्रम्हांड का ईश्वर ) बताती है न कि रब-उल-मुसलमीन (मुसलमानों के ईश्वर )। कुरान में अल्लाह के जो कई नाम दिए गए हैं उनमें से एक है ‘‘जब्बार‘‘ अर्थात ईश्वर शक्तिशाली है। इस तरह, अल्लाह भी ब्रम्हांड की महाशक्ति है। ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर अजर-अमर है, उसने ही सृष्टि का निर्माण किया है और वही उसे संचालित कर रहा है। अधिकरण के अनुसार, चर्च और मस्जिदें, मंदिरों की तुलना में, सबके लिए अधिक खुले हुए हैं। जहां अधिकांश मंदिरों में दलितों को प्रवेेश नहीं दिया जाता वहीं मस्जिदों, चर्चाें और सूफी दरगाहों में किसी के प्रवेश पर प्रतिबंध नहीं होता। वहां सभी का स्वागत है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इस्लाम और ईसाईयत को हमेशा धर्म ही माना जाएगा और मुसलमानों और ईसाईयों को धार्मिक समुदाय। 
    19वीं सदी में धर्म के नए अर्थ
    19वीं सदी के भारत में धर्म ने नए अर्थ ग्रहण किए। हिन्दू शब्द का प्रयोग मूलतः भौगोलिक अर्थ में होता था। इसका अर्थ था सिन्धु नदी के दक्षिण-पूर्व की भूमि पर रहने वाले लोग। सिन्धु को हिन्दू कहा जाने लगा। हिन्दू धर्म मानने वाले लोग अलग-अलग परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं का पालन करते थे जिन्हें उन्होंने इतिहास के विभिन्न दौरों से ग्रहण किया था। परंतु हिन्दू धर्म में जातिगत ऊँचनीच के मामले में कोई विविधता नहीं थी।  ऊँचनीच हिन्दू समुदाय का एक आवश्यक लक्षण थी। लोगों को उनके पारंपरिक काम-धंधे अपनाने पर मजबूर किया जाता था और समुदाय के एक बड़े हिस्से को कई अधिकार प्राप्त नहीं थे। धार्मिक शुद्धता और धार्मिक प्रदूषण के सिद्धांतों का अविष्कार ही इसलिए किया गया ताकि कुछ लोगों के अपवर्जन को औचित्यपूर्ण सिद्ध किया जा सके। जिन समुदायों को अलग-थलग रखा जाता था वे अपनी अलग धार्मिक परंपराएं और कर्मकाण्ड अपनाने के लिए स्वतंत्र रहते थे बशर्ते वे अपने पारंपरिक काम-धंधे ही करते रहें और अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करें। जहां विशेषाधिकार प्राप्त ऊँची जातियां अपना उच्च दर्जा कायम रखने के लिए अपनी परंपराओं की विशुद्धता को बनाए रखने में जुटी रहीं वहीं नीची जातियों ने अलग-अलग परंपराओं और इस्लाम व ईसाई धर्म सहित अन्य धर्मों से बहुत कुछ अपना लिया। इन लोगों को जातिगत ढ़ांचे को बनाए रखने में कोई रूचि नहीं थी। इससे एक ओर हिन्दू धर्म में विविधताएं आईं तो दूसरी ओर मिलीजुली परंपराएं उभरीं, जिनमें से कुछ का पालन एक से अधिक धार्मिक समुदाय करते थे। इन परंपराओं के अनुयायियों के बीच धर्म के आधार पर विभाजक रेखा खींचना संभव नहीं था।
    हमारे औपनिवेशिक शासकों ने यह जरूरी समझा कि वे अपनी प्रजा की संख्या गिनें और उनके धर्मों को नाम दें। इस प्रक्रिया में धार्मिक सीमाएं कठोर बन गईं। औपनिवेशिक राज्य ने धार्मिक पहचानों का निर्धारण किया। चूंकि अधिक संख्या का अर्थ था सत्ता पाने की अधिक संभावना, इसलिए उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग ने उन समुदायों का,े जिनकी धार्मिक वफादारी बहुत स्पष्ट नहीं थी,  अपने झंडे तले लाने के लिए शुद्धि और तबलीगी आंदोलन शुरू किए। शुद्धि आंदोलन का उद्धेश्य था इन समुदायों को संस्कृतनिष्ठ बनाना तो तबलीगी आंदोलन का लक्ष्य था ऐसे समुदायों का इस्लामीकरण। इस प्रक्रिया में धार्मिक विभाजक रेखाएं और कठोर और गहरी हुईं।
    इस यथार्थ और इतिहास को हमारी न्यायपालिका नजरअंदाज करती आई है और यही कारण है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई ऐतिहासिक निर्णय सुनाने वाली हमारी अदालतों ने हिन्दू  धर्म और हिन्दुत्व के मसलो पर ऐसे कई निर्णय दिए हैं जिनका लाभ हिन्दुत्ववादी शक्तियां अपने विचारों को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उठा रही हैं। हमें आशा है कि भविष्य में न्यायिक संस्थाएं इस मामले में अधिक सावधानी से काम करेंगी।
  2. -इरफान इंजीनियर

कोई टिप्पणी नहीं: