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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

अपराधी को तिरंगा और हिन्दुवत्व राष्ट्रवाद

हिन्दुवत्वराष्ट्रवाद की नयी परिभाषा में अपराधी की न्यायिक अभिरक्षा में मृत्यु होने पर तिरंगे में लपेटकर ताबूत को उसके गाँव ले जाना जहाँ एक ओर अपराधी को महिमा मंडित करके सीमा पर शहीद होने वाले जते हैं लेकिन विपक्ष के लोग अगर उसके ऊपर कोई बात कहते हैं तो वह गद्दार होने की श्रेणी में आएगा. वान की बराबरी करने का यह प्रयास कहीं से औचित्यपूर्ण नहीं है. इस तरह का कृत्य अशोभनीय है और राष्ट्रध्वज के अपमान का मामला बनता है लेकिन अंधभक्तों के दबाव के आगे उत्तर प्रदेश सरकार लाचार व बेबस है. अंधभक्तों ने मोदी को राष्ट्र घोषित कर दिया है और राष्ट्र की कोई बुराई करेगा तो वह गद्दार कहलायेगा. उसी तरह उरी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक का राजनीतिक उपयोग अंधभक्त व संघी कर सक
                     वहीँ, उरी हमले के बाद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में सर्जिकल स्ट्राइक करके कई आंतकियों को मार गिराने के लिए काफी तारीफ बटोर चुकी नरेंद्र मोदी सरकार अब आलोचनाओं में घिरती नजर आ रही है। मोदी सरकार पर सर्जिकल स्ट्राइक का प्रचार करके सियासी लाभ लेने की कोशिश करने का आरोप लगाया जा रहा है। पूर्व गृह मंत्री पी चिंदबरम और कांग्रेसी नेता संदीप दीक्षित ने सार्वजनिक तौर पर कहा है कि भारत पहले भी ऐसी सर्जिकल स्ट्राइक करता रहा है लेकिन कूटनीतिक चिंताओं के चलते इसका “प्रचार” नहीं किया जाता था। सेना के कुछ पूर्व अधिकारियों और कुछ सुरक्षा विशेषज्ञों ने भी मोदी सरकार के सर्जिकल स्ट्राइक के “प्रचार” पर सवाल उठाया है। भारतीय सेना के अनुसार 28-29 सितंबर की रात को उसके पैरा फोर्सेज के कमाडों ने इस सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम दिया था। 17 सितंबर को हुई उरी हमले में 18 भारतीय जवान मारे गए थे। दो घायल जवानों की अस्पताल में मृत्यु हो गई थी।
             पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनाव को लेकर सर्जिकल स्ट्राइक का प्रचार व प्रसार किया जा रहा है और उसका राजनीतिक लाभ भी लेने की कोशिश भारतीय जनता पार्टी कर रही है. उसमें तरह-तरह के पोस्टर व होर्डिंग्स ज़ारी कर दिए हैं तो दूसरी तरफ न्यायिक हिरासत में मृत होने वाले रवि को तिरंगे में लपेट कर माहौल को ख़राब करके चुनावी लाभ लेने का प्रयास है.  

सुमन 

शुक्रवार, 26 जून 2015

महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी वारदात

वरिष्ट पत्रकार सुभाश गताडे से आतंकवाद के मुद्दे पर की गई बातचीत के अंश
                                                                                                    -राजीव यादव
 देश में आतंकवादी घटनाओं की शुरुआत कहाँ से मानते हैं?

    अगर आजाद भारत की बात करें तो मेरी समझ से महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी घटना है, और वहीं से कमसे कम भारत के सन्दर्भ में आतंकवाद की शुरूआत मानी जा सकती है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ भारत की अवाम के संघर्ष के नेता गांधी जिन्होंने साम्प्रदायिक राजनीति की निरन्तर मुखालिफत की एवं समावेशी राजनीति की हिमायत की, उनकी हत्या में नाथूराम गोड्से ने भले ही गोली चलाई हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके लिए लम्बी साजिश रची गई थी, जिसमें हिन्दुत्ववादी संगठनों का हाथ था। गांधी की हत्या को लेकर एक बात अक्सर भुला दी जाती है कि उन्हें मारने के लिए इसके पहले इन्हीं संगठनों की तरफ से कई कोशिशें हुई थीं, और इस आखरी कोशिश में वे कामयाब हुए।
     यह जो आतंकवाद है यह कितना देशी है और कितना वैश्विक है?
    मेरे खयाल से यह प्रश्न बहुत प्रासंगिक नहीं है। आतंकवाद के देशी रूप भी
हो सकते हैं और उसके वैश्विक रूप भी हो सकते हैं, मूल बात यह समझने की है कि आप उसे किस तरह परिभाषित करते हैं। यूँ तो आतंकवाद को कई ढंग से परिभाषित किया जा सकता है, राज्यसत्ता द्वारा निरपराधों पर किए जाने वाले जुल्म-अत्याचार को भी इसमें जोड़ा जाता है, मगर इसकी अधिक सर्वमान्य परिभाषा है जब राजनैतिक मकसद से कोई समूह, कोई गैर राज्यकारक अर्थात नानस्टेट एक्टर हिंसा या हिंसा के तथ्य fact of violence का इस्तेमाल करे और निरपराधों को निशाना बनाए। इसके तहत फिर हम साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित जैसे हिन्दुत्ववादी गिरोहों की हिंसक कार्रवाइयों को भी समेट सकते हैं या किसी जिहादी संगठन द्वारा निरपराधों को निशाना बना कर की गई कार्रवाई को भी देख सकते हैं या किसी जियनवादी गिरोह द्वारा फिलिस्तीनी बस्ती में मचाए कत्लेआम को भी देख सकते हैं या किसी ब्रेविक द्वारा अंजाम दिए गए मासूमों के कत्लेआम को भी समेट सकते हैं।
    मोदी के आने के बाद आतंकवाद की राजनीति और संस्थाबद्ध होगी या रुकेगी। रुक जाने का सन्दर्भ यह है कि क्या वह दूसरी राजनीति करेंगे?
    मोदी जो हिन्दुत्व की लहर पर सवार होकर प्रधानमंत्री बने हैं, उनके सत्तारोहण को हम बहुंसंख्यकवाद की राजनीति की जीत के तौर पर देख सकते हैं। यह भी स्पष्ट है कि आजादी के बाद पहली दफा हिन्दुत्व की ताकतों को अपने बलबूते सत्ता सँभालने का मौका मिला है, जिसे एक तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे की बढ़ती स्वीकार्यता के तौर पर व्याख्यायित किया जा रहा है। आजादी के बाद यह पहली दफा हुआ है कि संसद में अल्पसंख्यक समुदायांे का न्यूनतम प्रतिनिधित्व है, यहाँ तक कि सत्ताधारी पार्टी के सांसदों में भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से एक भी  प्रतिनिधि नहीं है। अब इस समूची परिस्थिति में जाहिर है कि ऐसी ताकतें-जो हिन्दुत्ववादी संगठनों से ताल्लुक रखती थीं, उस विचार से प्रेरित थी, मगर साथ ही साथ आतंकी घटनाओं में मुब्तिला थीं-उनकी रणनीति में फर्क अवश्य आएगा। एक तो वह कोशिश करेंगी कि उनके जो तमाम कार्यकर्ता जेल में बन्द हैं, उन्हें रिहा करवाया जाए, उनके खिलाफ जारी केस को कमजोर किया जाए और फिर उन्हें नए अधिक वैध एवं स्वीकार्य रूपों में पेश किया जाए। दूसरी यह भी सम्भावना है कि चूंकि राज्यसत्ता में उनके विचारों के हिमायती बैठे हों, वह और अधिक आक्रामक हों, आतंकी घटनाओं को खुद अंजाम दें मगर उसका दोषारोपण अल्पसंख्यक समुदायों पर अधिक निर्भीकता से करें। आप चाहें नांदेड़ में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा अंजाम दी गई आतंकी घटना (अप्रैल 2006) को देखें या मालेगांव की घटना (सितम्बर 2006 और सितम्बर 2008) को देखें हम बार-बार यही पाते हैं कि उनकी लगातार कोशिश रहती आई है कि खुद घटना को अंजाम दो, मगर उसे इस ढंग से डिजाइन करो कि अल्पसंख्यक पकड़ में आएँ। दूसरी तरफ इस्लामिक ताकतों का वह हिस्सा-जो आतंकी घटनाओं में मुब्तिला रहा है-वह नई बदली हुई परिस्थितियों में नए ध्रुवीकरण को अंजाम देने या मजबूती दिलाने के लिए कुछ आततायी कार्रवाइयों को अंजाम दे सकता है। हाल के समय में इस्लामिक स्टेट के नाम पर जो सरगर्मी बढ़ी है या अल कायदा की तरफ से भारत में अपना पैर जमाने की जो कोशिशें की जा रही
हैं, वह भी असर डालेंगी। कुल मिला कर आनेवाला समय ऐसे सभी लोगों, समूहों के लिए चुनौती भरा होगा जो हर किस्म के आतंकवाद-फिर चाहे राज्य आतंकवाद हो या गैर राज्यकारकों द्वारा अंजाम दिया जा रहा आतंकवाद हो (जिसका महत्वपूर्ण हिस्सा विशिष्ट धर्म से अपने आप को प्रेरित कहते हुए हिंसा को अंजाम देना होता है)-की मुखालिफत करते हैं और एक आपसी सद्भावपूर्ण समाज की रचना चाहते हैं।
    क्या कानूनों के सेलेक्टिव प्रयोग से इससे शिकार लोगों में राज्य के प्रति नफरत पैदा हो रही है?
    1950 में जब संविधान निर्माताओं ने देश की जनता को संविधान सौंपा तो यह संकल्प लिया गया था कि जाति, वर्ग, धर्म, नस्ल, जेण्डर आदि आधारों पर अब किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा, कानून के सामने सभी समान होंगे। आजादी के साठ साल से अधिक वक्त गुजर जाने के बाद हम इन संकल्पों एवं वास्तविकता के बीच गहरे अन्तराल से रूबरू हैं, जब हम पाते हैं कि दमित, शोषित, उत्पीडि़त समुदायों एवं लोगों पर महज इसी वजह से कहर बरपा हो रहा है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की बहाली के लिए प्रयासरत है और ऐसे लोग, तबके जो सत्ता एवं सम्पत्ति के इदारों पर कुंडली मार कर बैठे हैं, उनके प्रति राज्यसत्ता का रुख नरम है। जाहिर है कि इस दोहरे व्यवहार से जनता के व्यापक हिस्से में राज्य के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है।
    आतंकवाद की राजनीति के आर्थिक आधार क्या हैं? क्या यह वैश्विक आर्थिक मंदी से जुड़ा हुआ है?
    आतंकवाद को महज आर्थिक मंदी से जोड़ना नाकाफी होगा, वह इस वजह से भी इन दिनों बलवती जान पड़ता है क्योंकि परिवर्तनकामी ताकतें एवं आन्दोलन कमजोर पड़ रहे है। अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ के बिखराव की शुरूआत एवं अन्ततः उसके विघटन ने समाजवाद के विचार एवं प्रयोग को जो जबरदस्त क्षति पहुँचाई है और पूँजीवाद की अंतिम जीत को प्रचारित किया है, उसने भी दुनिया में तरह-तरह के नस्लवादी आन्दोलनों, आतंकी समूहों के फलने फूलने का रास्ता सुगम किया है। जरूरत इस बात की दिखती है कि जनता के हालात में आमूलचूल बदलाव चाहने वाली ताकतें नए सिरेसे संगठित हों, एक समतामूलक राजनीति को मजबूती प्रदान करें तो हम साथ ही साथ इन दिनों सर उठाए आतंकवाद को हाशिए पर जाता देख सकते हैं।
      सजा होने की सम्भावना आतंकवादी घटनाओं में बहुत कम है ऐसा लगता है कि न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीरे चलाई जा रही है ताकि आरोपियों को अधिक समय तक जेल में रखा जा सके। इस पर आप क्या सोचते हैं?
    अगर राज्यसत्ता इच्छाशक्ति का परिचय दे तो आतंकवादी घटनाओं में भी मुकदमे तेजी से चलाए जा सकते हैं और दोषियों को दंडित किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे मसलों पर राज्यसत्ता में बैठे लोग-या तो अपने एकांगी विचारों के चलते या ढुलमुल रवैयों के परिणाम स्वरूप सख्त रुख अपनाने से बचते हैं, जिसके चलते ऐसे मुकदमे सालों साल चलते हैं। अगर यौन अत्याचार के मसले को लेकर स्पीडी ट्रायल की बात की जा सकती है तो आतंकी घटनाआंे के मामले में भी हमें इसी किस्म की माँग करनी चाहिए, ताकि असली दोषी को सजा हो और मूलतः निरपराध जेल की यातना से बचें। आप अक्षरधाम आतंकी हमले को देखें जिसे लेकर बारह साल तक कइयों को जेल में सड़ना पड़ा और अन्ततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सभी बेदाग बरी हुए। अदालत का कहना था कि इन लोगों पर ‘आतंकवाद की धाराओं के तहत मुकदमा चलाने का निर्णय बिना दिमाग के लिया गया था। ध्यान रहे कि वर्तमान प्रधानमंत्राी उन दिनों गुजरात में गृह मंत्रालय का कार्यभार सँभाल रहे थे। अब अगर स्पीडी ट्रायल होता तो उनकी बेगुनाही जल्दी सामने आती और उन्हें तथा उनके परिवारजनों को इतना अधिक समय दुख में नहीं गुजारना पड़ता।
    खुफिया एजेंसियों की निष्पक्षता के बारे में बार-बार सवाल उठता रहा है, देश में आई.बी. और रॉ में अल्पसंख्यकों को जाने से रोका जा रहा है इसको कैसे देखा जाए। क्या इनको सही प्रतिनिधित्व मिल जाने से समस्याएँ हल हो जाएगी?
    देश की खुफिया एजेंसियों के कामों में निष्पक्षता को सुनिश्चित करना हो, उसमें अल्पसंख्यक समुदायों के आगमन को रोकने के मसले को सम्बोधित करना हो तो यह बहुत जरूरी है कि उसके कामों में पारदर्शिता लाई जाए और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। कुछ समय पहले पश्चिमी एशियाई मामलों के जानकार एवं वर्तमान उपराष्ट्रपति डाॅ. हामिद अन्सारी ने रिसर्च एण्ड एनलिसिस विंग अर्थात ‘रॉ’ द्वारा आयोजित आर एन कॉव स्मृति व्याख्यान में इसी मसले को उठाया था। डाॅ. अन्सारी का
कहना था कि गुप्तचर एजंेसियों के संचालन में अधिक निगरानी एवम् जवाबदेही की आवश्यकता है। उनके मुताबिक यह जनतांत्रिक समाजांे का तकाजा होता है कि बेहतर शासन के लिए वह ऐसी प्रक्रियाओं को संस्थागत करें जिसके अन्तर्गत गुप्तचर एजेंसियों को संसद के सामने जवाबदेह बनाया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि ‘‘राज्य के गुप्तचर और सुरक्षा ढाँचे’’ को लेकर अब तक सिर्फ कार्यपालिका और राजनैतिक देखरेख होती रही है, जिसमें इसके दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है। इनमें जवाबदेही के अभाव की चर्चा के सन्दर्भ में उन्होंने कारगिल प्रसंग का जिक्र किया जिसमें गुप्तचर एजेंसियों की बड़ी नाकामी सामने आई थी। ध्यान रहे कि आधिकारिक तौर पर कारगिल पर पाकिस्तानी आक्रमण की खबर पहली दफा गुप्तचर एजेंसियों की तरफ से नहीं बल्कि उस इलाके मंे अपने मवेशी चराने के लिए ले जाने वाले गड़रियों से हुई थी। देश की सुरक्षा को जोखिम में डालने वाली इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद किसी भी गुप्तचर  अधिकारी को दण्डित नहीं किया गया था और विभिन्न एजेंसियों ने एक दूसरे पर दोषारोपण करके मामले की इतिश्री कर दी थी।
    हिंदुत्व से उपजे आतंकवाद की सच्चाई क्या है?
    जैसा कि मैं पहले ही चर्चा कर चुका हूँ कि आजाद भारत की पहली आतंकी कार्रवाई को हिन्दुत्ववादी आतंकी गोड्से एवं उसके गिरोह ने अंजाम दिया था यह धारा भले ही मद्धिम हुई हो, लेकिन दबी नहीं है। इस तथ्य से भी बहुत कम लोग वाकि़फ है कि बँटवारे के वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो कार्यकर्ता बम बनाते वक्त कराँची के अपने मकान में मारे गए थे और ट्यूशन पढ़ाने के लिए लिए गए उपरोक्त मकान में विस्फोटकों का जखीरा बरामद हुआ था। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में बने जीवनलाल कपूर कमीशन ने गांधी हत्या की साजिश के लिए प्रत्यक्ष सावरकर को जिम्मेदार ठहराया था। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने आप को ‘चरित्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध कहलाने वाले’ हिन्दुत्ववादी संगठन भी वक्त पड़ने पर आतंकवाद का सहारा लेते रहे हैं। 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में हम पाते हैं कि इसे नए सिरेसे उभारा जा रहा है और अधिक स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए उसे ‘इस्लामिस्ट आतंकवाद’ की प्रतिक्रिया के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। दूसरी अहम बात यह है कि हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व समानार्थी नहीं है (अधिक स्पष्टीकरण के लिए सावरकर की बहुचर्चित किताब ‘हिन्दुत्व’ को देखा जा सकता है), जिस तरह इस्लाम और राजनैतिक इस्लाम को समानार्थी नहीं कहा जा सकता, वही हाल हिन्दुइज्म अर्थात हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व का है। यह फर्क स्पष्ट करना इसलिए जरूरी है क्योंकि जबभी हिन्दु आतंकवादी गिरफ्तार होते हैं या उसकी चर्चा होती है, संघ परिवारी संगठनों की तरफ से हल्ला किया जाता है कि आप धर्मविशेष को बदनाम कर रहे हैं। यह सर्वथा गलत है। इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई की तमाम घटनाएँ इस बात को प्रमाणित करती हंै कि हिन्दुत्व आतंकवाद एक परिघटना है, जो भारत के सेक्युलर एवं जनतांत्रिक स्वरूप के लिए जबरदस्त खतरा बन कर उपस्थित है। जाहिर है कि जो बात अक्सर प्रचारित की जाती है कि हिन्दू आतंकी नहीं हो सकता, यह बात तथ्यों से परे है। जिस तरह हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग होते हैं, वही हाल आतंकवाद से प्रभावित होने को लेकर भी देख सकते हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि देश का कानून सभी के लिए समान हो, किसी आतंकी को इसलिए नहीं बक्शा जाए कि वह विशिष्ट समुदाय से है, किसी आतंकी गिरोह के सरगनाओं, मास्टरमाइंडों को इसलिए न बचाया जाए कि वह बहुसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। अपराध सिर्फ अपराध होता है, उसके किसी खास समुदाय द्वारा अंजाम देने से उसकी तीव्रता कम नहीं होती है।
 मो0-09452800752
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

शनिवार, 19 जुलाई 2014

मोदी की 2014 विजय: भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव


सामाजिक आंदोलनों के लिए आगे का रास्ता
सन् 2014 के आम चुनाव, इसके पहले के चुनावों से कई मामलों में भिन्न थे। मोदी की दिल्ली की गद्दी की ओर की यात्रा के हर कदम के पहले भारी प्रचार हुआ। जब वे भाजपा की चुनाव प्रचार अभियान समिति के प्रमुख बने तब इसका जमकर ढिंढोरा पीटा गया। वही सब कुछ तब हुआ जब वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए गए। चुनाव प्रचार अभियान भी जबरदस्त था। मोदी ने अपने प्रचार में सोशल मीडिया का जमकर उपयोग किया। सैंकड़ों लोगों ने दिन-रात सोशल मीडिया में उनकी ओर से मोर्चा संभाला। उन्होंने अपनी छवि के निर्माण के लिए अमरीकी एजेंसी एप्को की सेवाएं हासिल कीं1। औपचारिक रूप से चुनाव प्रचार शुरू होने के बहुत पहले से ही मोदी का अभियान शुरू हो गया था। उन्हें जनता के सामने ‘विकास’ के पर्यायवाची के रूप में प्रस्तुत किया गया। गुजरात के सन् 2002 के कत्लेआम में उनकी भूमिका को ‘क्लीन चिट’ के नाम पर दबा दिया गया। इस बार आरएसएस, खुलकर मोदी के समर्थन में सामने आया और पोलिंग बूथ से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक उसके स्वयंसेवक सक्रिय हो गए। ‘‘इस बार, 2014 के चुनाव में, राष्ट्रवादी संगठन ने अपने सभी कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों-जिनकी संख्या 10 लाख से ज्यादा है-अपनी 40 हजार से अधिक स्थानीय इकाईयों, जिन्हें शाखा कहा जाता है, के अतिरिक्त, अपनी विचारधारा से सहानुभूति रखने वालों और समान विचारधारा वाले लोगों को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के समर्थन में मिशनरी भाव से जुट जाने को कहा।’’इस चुनाव में पहली बार संघ परिवार की एक सदस्य भाजपा अपने बल पर बहुमत हासिल कर सत्ता में आ सकी। यह आरएसएस के लिए एक बड़ी सफलता है जो अलग-अलग रास्तों से हिन्दू राष्ट्र के अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए सन् 1925 से काम कर रहा है।

पृष्ठभूमि
मोदी एक प्रशिक्षित आरएसएस प्रचारक हैं और हिन्दू राष्ट्रवाद के रास्ते हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के प्रति प्रतिबद्ध हैं।3 सन् 1980 के दशक से कई वैष्विक व स्थानीय कारकों के चलते, दकियानूसी मध्यमवर्ग, छोटे उद्योगपतियों, समृद्ध किसानों और धनी पेशेवरों के वर्गों का उदय हुआ। ये सभी वर्ग यथास्थितिवाद की राजनीति के हामी थे। इसी दौरान वैष्विकरण का जाल फैल रहा था और श्रमिक आंदोलनों पर हमले बढ़ रहे थे। इसी दौर में आरएसएस व विहिप ने धार्मिकता का झंडा उठा लिया।शाहबानो के बहाने आरएसएस ने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ तीखा संघर्ष प्रारंभ कर दिया। वह छद्म धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण जैसी शब्दावली का इस्तेमाल करने लगा। इस सब के बीच शुरू हुई आडवाणी की रथयात्रा।4 यही वह समय था जब देश, अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण व श्रमिकों के अधिकारों जैसे मुद्दों में उलझा हुआ था। महिलाओं और आदिवासियों के अधिकारों की चर्चा भी हो रही थी। जिस देश के लोगों की मूलभूत
आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो रही थीं और जहां कमजोर वर्गों के मानवाधिकारों की रक्षा एक कठिन कार्य बना हुआ था; वहां संघ परिवार ने हिन्दुओं के एक तबके की पहचान से जुड़े मुद्दों को समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण बनाने का षड़यंत्र शुरू कर दिया। इसके साथ ही, धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध दुष्प्रचार शुरू हुआ, इतिहास का तोड़ा-मरोड़ा गया संस्करण जनता के सामने परोसा जाने लगा और पीडि़तों को दोषी बताया जाने लगा। आडवाणी की रथयात्रा ने अल्पसंख्यकों के विरूद्ध नफरत को और बढ़ावा दिया और हिंसा की कई घटनाएं हुईं।
राममंदिर अभियान का एक प्रमुख नतीजा यह हुआ कि मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए। रोटी, कपड़ा और मकान के मसले गौण हो गए व सामाजिक-राजनीतिक एजेण्डा के केन्द्र में आ गए पहचान से जुड़े मुद्दे। आरएसएस ने अपनी सांप्रदायिक राजनीति को जमकर हवा देनी शुरू की और इसी के हिस्से के रूप में आदिवासी क्षेत्रों में ईसाईयों के विरूद्ध हिंसा में तेजी से बढ़ोतरी हुई। यह मात्र संयोग नहीं है कि यह वही क्षेत्र हैं जहां बड़े औद्योगिक घराने अपने उद्योग स्थापित करना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा करने या प्राकृतिक संसाधनों को लूटने में कोई संकोच नहीं है। 
संघ परिवार और हिन्दू राष्ट्रवाद का एजेण्डा
आरएसएस की शुरूआत, आजादी के आंदोलन के दौरान एक ऐसे संगठन के रूप में हुई जो महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन के खिलाफ था, भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा का विरोधी था और प्राचीन हिन्दू राजाओं व पशुपालक आर्यों के युग और हिन्दू धर्मग्रन्थों के महिमामंडन में विष्वास रखता था। आरएसएस की स्थापना उन लोगों ने की जो दलितों के उनके भू-अधिकार हासिल करने के आंदोलन और ब्राह्मणवाद के खिलाफ समाज में उठ रहे स्वर को दबाना चाहते थे। गैर-ब्राह्मणों के आंदोलनों के प्रणेता थे जोतिबा फुले और डाक्टर अंबेडकर। जैसे-जैसे आम लोग स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ते गए, ऊँची जातियों के श्रेष्ठी वर्ग को यह आशंका होने लगी कि समाज पर उसका प्रभुत्व खतरे में है। अंततः, इन्हीं वर्गों ने आरएसएस की स्थापना की। इस संगठन ने अपनी शाखाएं आयोजित करनी शुरू कीं और अपना एक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया, जिसका मूलभाव यह था कि भारत अनादिकाल से हिन्दू राष्ट्र है। आरएसएस को स्वाधीनता आंदोलन में सभी धर्मों के लोगों की भागीदारी नहीं भाती थी। उन्होंने लड़कों और युवाओं को स्वयंसेवक के रूप में प्रशिक्षित करना शुरू किया। ये लोग यह शपथ लेते थे कि वे हिन्दू राष्ट्र के लिए काम करेंगे। वे स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सेदारी नहीं करते थे। आरएसएस की स्थापना चितपावन ब्राह्मणों ने की थी और वह केवल पुरूषों का संगठन है।
आरएसएस ने अपने अधीन कई संगठनों की स्थापना की। इनमें शामिल थी राष्ट्रसेविका समिति, जो कि महिलाओं के लिए है। ज्ञातव्य है कि इसके नाम में ‘स्वयं’ शब्द गायब है। आरएसएस, पुरूषों के प्रभुत्व वाला पितृसत्तात्मक संगठन है। उसकी यह मान्यता है कि महिलाओ का समाज में दोयम दर्जा है और उन्हें पुरूषों के अधीन ही रहना चाहिए। आगे चलकर आरएसएस ने अपनी छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का गठन किया। उसके बाद उसने हिन्दू महासभा के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ बनाया, जो कि वर्तमान भाजपा का पूर्व अवतार है। उसने विश्व हिन्दू परिषद का निर्माण किया जिसका उद्देश्य हिन्दुओं के विभिन्न पंथों को आरएसएस के नियंत्रण में लाना था। उसने आदिवासियों का हिन्दूकरण करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की और सड़कों पर गुंडागर्दी के लिए बजरंग दल बनाया। इसी तरह, दुर्गावाहिनी आदि जैसे कई संगठन स्थापित किए गए।
इसी तरह आरएसएस ने अपने विचारों का प्रसार-प्रचार करने के लिए भी कई संस्थाएं और संगठन स्थापित किए। इनमें शामिल हैं साप्ताहिक पाञ्चजन्य व आर्गेनाइजर और आदिवासी क्षेत्रों में एकल विद्यालय व अन्य क्षेत्रों में सरस्वती शिशु मंदिर। संघ ने विभिन्न क्षेत्रों में ब्राह्मणवादी मूल्यों की स्थापना कर अपनी वैचारिकी को मजबूती दी। स्वयंसेवकों ने राज्य के तंत्र, पुलिस, सेना व नौकरशाही में गहरे तक घुसपैठ कर ली।
वैचारिक घुट्टी
अपनी शाखाओं के द्वारा संघ, अल्पसंख्यकों के विरूद्ध घृणा फैलाने लगा। उसने धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और भारतीय संविधान का भी विरोध करना शुरू  कर दिया। उसने संचार के लगभग हर माध्यम का प्रयोग किया। उसने ‘आईटी मिलन’ आयोजित कर सूचना प्रौद्योगिकी पेशेवरों में अपनी पैठ स्थापित कर ली। संघ परिवार ने सोशल मीडिया का भी अत्यंत प्रभावकारी ढंग से इस्तेमाल किया। इस सब का नतीजा यह हुआ कि समाज पर पुरातनपंथी और दकियानूसी सोच हावी हो गई। आरएसएस ने हिन्दुत्व शब्द को भी लोकप्रिय बनाया। हिन्दुत्व, दरअसल, जातिगत व लैंगिक पदानुक्रम के ब्राह्मणवादी मूल्यों पर आधारित राजनीति का नाम है। विभ्रम के शिकार कई लोग, हिन्दुत्व को ‘जीवन पद्धति’ बताते हैं।
सन् 1960 व 1970 के दशक में, देश में हिंसा की छुटपुट घटनाएं हुईं। इनके चलते धार्मिक समुदायों का ध्रुवीकरण हो गया और साम्प्रदायिक पार्टी की शक्ति में वृद्धि की जमीन तैयार हो गई। सन् 1980 के दशक में, जैसे-जैसे राममंदिर आंदोलन जोर पकड़ता गया वैसे-वैसे हिंसा बढ़ने लगी। उत्तर भारत के कई
शहरों में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। परंतु बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने के बाद हुई हिंसा अभूतपूर्व थी। मुंबई, भोपाल और सूरत जैसे शहरों में हुई हिंसा की भयावहता और क्रूरता को शब्दों में बयान करना मुश्किल है। गोधरा ट्रेन आगजनी के बहाने गुजरात में भड़काई गई हिंसा ने देश का सिर शर्म से झुका दिया।
मोदी, गुजरात हिंसा और उसके बाद
गोधरा के बाद हुई हिंसा इस बात का उदाहरण थी कि राज्य, किस प्रकार, सक्रिय रूप से हिंसा को प्रोत्साहन दे सकता है। उसके पहले तक देश में जब भी सांप्रदायिक हिंसा होती थी, पुलिस व राज्यतंत्र या तो मूकदर्शक  बना रहता था अथवा दंगाईयों का साथ देता था। परंतु गुजरात में मोदी के नेतृत्व में राज्यतंत्र ने हिंसा को खुलकर बढ़ावा दिया। यद्यपि यह दावा किया जाता है कि गुजरात दंगों की जांच के लिए नियुक्त विशेष  जांच दल ने मोदी को क्लीनचिट दे दी है तथापि उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायमित्र राजू रामचंद्रन ने यह मत व्यक्त किया है कि एसआईटी की रपट के आधार पर मोदी के विरूद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है।हिंसा के बाद गुजरात सरकार ने पीडि़तों के पुनर्वास की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया। धार्मिक अल्पसंख्यकों को समाज के हाषिए पर पटक दिया गया। अहमदाबाद में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक अपने मोहल्लों में सिमटने पर मजबूर कर दिए गए, उनके नागरिक व राजनीतिक अधिकारों को कुचल दिया गया और वे दूसरे दर्जे के नागरिक बना दिए गए। अक्सर यह प्रचार किया जाता है कि मोदी राज में गुजरात तेजी से विकसित हुआ।  तथ्य यह है कि गुजरात, हमेश से विकसित राज्य रहा है। वाइबे्रण्ट गुजरात शिखर बैठकों के जरिये, गुजरात में भारी भरकम निवेश  होने के दावों में कोई दम नहीं है। निवेश के वायदे तो बहुत हुए परंतु उनमें से कम ही जमीन पर उतर सके। गुजरात, सामाजिक विकास के मानकों में अन्य राज्यों से काफी पिछड़ा हुआ है। रोजगार सृजन की दर बहुत नीची है व प्रति व्यक्ति व्यय बहुत कम है। पिछले डेढ़ दशक में गुजरात में लैंगिक अनुपात तेजी से गिरा है और गर्भवती महिलाओं का हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत नीचा है।
हिन्दुत्व: चुनावी रणनीति
आरएसएस, चुनाव मैदान में शनैः शनैः उतरा। सन् 1984 के चुनाव में उसने गांधीवादी समाजवाद का नारा दिया और उसे लोकसभा में केवल दो सदस्यों से संतोष करना पड़ा। वहां से शुरू कर, सन् 1996 के चुनाव में उसके 120 सांसद चुनकर आए और वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। परंतु कोई भी अन्य दल उसके साथ हाथ मिलाने को तैयार नहीं था और उसकी सरकार गिर गई। ‘तीसरा मोर्चा’ बनाने के कुछ असफल प्रयासों के बाद, भाजपा, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाने में सफल हो गई। परंतु बदले में उसे राममंदिर, संविधान के अनुच्छेद 370 की समाप्ति व समान नागरिक संहिता जैसे अपने मूल मुद्दे छोड़ने पड़े। परंतु यह रणनीति पार्टी के लिए उपयोगी सिद्ध हुई और एनडीए ने लगभग छह वर्षों तक शासन किया। इस दौरान उसने पाठ्यपुस्तकों का सांप्रदायिकीकरण कर दिया और आरएसएस के कार्यकर्ताओं को सरकारी सेवा में घुसपैठ करने की पूरी छूट मिल गई। संघ के एजेण्डे वाले कई एनजीओ को जमकर सरकारी सहायता उपलब्ध करवाई गई। इस सब से आरएसएस के प्रभावक्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि हुई और जीवन के सभी क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति स्पष्ट नजर आने लगी।चूंकि हिन्दुत्व परिवार यह जानता था कि वह अपने बल पर कभी सत्ता में नहीं आ सकता, इसलिए उसने ‘विकास के गुजरात माॅडल’ को सामने रखा और हिंदुत्व के एजेण्डे को पीछे।
 हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा
मोदी, हिन्दुत्व के एजेण्डे के आक्रामक चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने खुलेआम यह कहा है कि वे हिन्दू राष्ट्रवाद में यकीन करते हैं। दरअसल, हिन्दू राष्ट्रवाद उस सांप्रदायिक फासीवाद का मुखौटा मात्र है जो आरएसएस और मोदी देश पर लादना चाहते हैं। आरएसएस और मोदी के समर्थक एक ओर कार्पोरेट सेक्टर व उसके मध्य स्तर के कर्मचारी हैं तो दूसरी ओर, सूचना प्रौद्योगिकी-एमबीए युवा वर्ग भी उनसे प्रभावित है। मोदी ने गुजरात में यह दिखा दिया है कि वे उद्योगपतियों के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल सकते हैं। इससे कार्पोरेट सेक्टर बहुत प्रभावित है और मोदी के नाम का जाप कर रहा है। कार्पोरेट मीडिया बिना कोई जांच पड़ताल केे उनके विकास के नारे का गुणगान कर रहा है। गुजरात में समाज कल्याण की योजनाओं को लगभग ठप्प कर दिया गया है, जिसके कारण समाज का गरीब तबका परेशान हाल है। जहां तक अल्पसंख्यकों का सवाल है, सच्चर कमेटी की सिफारिशों  के आधार पर शुरू की गईं केन्द्रीय योजनाओं को गुजरात में लागू नहीं किया जा रहा है। मुस्लिम विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा जो धनराशि  राज्य को भेजी जा रही है उसे साल-दर-साल वापस लौटाया जा रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि मोदी, धार्मिक अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए किसी भी प्रकार की योजना लागू किए जाने के खिलाफ हैं।
वे कारपोरेट जगत, मध्यम वर्ग, व्यापारियों और आरएसएस समर्थकों की पसंद हैं। इनमें से हर एक वर्ग मोदी को अलग-अलग तरीके से देखता है और तीनों को वे उपयोगी नजर आते हैं। कारपोरेट जगत मानता है कि मोदी उन्हें देश के प्राकृतिक संसाधनों को खुलकर लूटने की इजाजत देंगे। मध्यम वर्ग को यह मालूम है कि मोदी का शासन इस बात की गारंटी है कि राज्य, वंचित वर्गों और धार्मिक अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए आवश्यक सामाजिक परिवर्तन नहीं होने देगा। आरएसएस ने आडवाणी को दो कारणों से त्याग दिया है। पहला, उनका यह वक्तव्य कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष नेता थे और दूसरा यह कि उनकी आयु बहुत अधिक हो गई है। भाजपा का असली नियंत्रक आरएसएस है और वह जानता है कि मोदी एक ऐसे स्वयंसेवक हैं जो निर्ममतापूर्वक देश में हिन्दू राष्ट्र ला सकते हैं।
  कांग्रेश  शासित प्रदेशो  में अधिक हिंसा हुई है। यह भी कहा जाता है कि इससे यह सिद्ध होता है कि भाजपा, सांप्रदायिक नहीं है।कांग्रेश  शासनकाल में देश भर में अनेक दंगे हुए हैं। ये दंगे सांप्रदायिक संगठनों द्वारा भड़काए जाते हैं और कांग्रेस सरकारें निश्चित तौर पर इन दंगों को नियंत्रित न करने के लिए दोषी ठहरायी जा सकती हैं। अधिकांश  दंगा जांच आयोगों की रपटों से यह साफ है कि हिंसा की योजना बनाने से लेकर उसे अंजाम देने तक का काम सांप्रदायिक संगठन करते हैं और कांग्रेस का नेतृत्व या तो असहाय हो उन्हें देखता रहता है या अपरोक्ष रूप से उनकी मदद करता है। परंतु हमें यह याद रखना चाहिए कि एक पार्टी के बतौर भाजपा की किसी और पार्टी से तुलना न तो की जानी चाहिए और ना ही की जा सकती है। भाजपा केवल एक राजनीतिक दल नहीं है। वह आरएसएस की राजनैतिक शाखा है जिसका एजेण्डा धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत के एजेण्डे के विरूद्ध है। यह भारतीय राष्ट्रवाद के विरूद्ध है, उन लोगों के सपनों के खिलाफ है जिन्होंने भारत को एक राष्ट्र का स्वरूप देने में भूमिका निभाई और गांधी, भगत सिंह व अंबेडकर की विचारधारा के भी विरूद्ध है। 
चुनाव 2014
हालिया आमचुनाव के नतीजे बहुत दिलचस्प हैं। लगभग 31 प्रतिशत वोट प्राप्त कर भाजपा-मोदी, 282 लोकसभा सीटें जीतने में सफल हो गए हैं। निःसंदेह, मोदी इस चुनाव के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व बनकर उभरे हैं। यह बार-बार कहा जा रहा है कि धर्म और जाति के बंधनों को तोड़कर, मतदाताओं ने उन्हें इसलिए समर्थन दिया क्योंकि वे ‘‘विकास के पुरोधा’’ हैं। यह दावा किस हद तक सही है? सबसे पहली बात तो यह है कि मोदी को बड़े उद्योगपतियों का जबरदस्त समर्थन प्राप्त था। उनके चुनाव अभियान में पैसा, पानी की तरह बहाया गया। इसके अतिरिक्त, लाखों आरएसएस कार्यकर्ताओं ने भाजपा को जीत दिलाने के लिए जमीनी स्तर पर दिन-रात पसीना बहाया। इस तरह, मोदी की जीत के दो स्तंभ थेः पहला कारपोरेट घराने और व दूसरा आरएसएस। मोदी ने बार-बार दोहराया कि यद्यपि वे भारत की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान न्योछावर नहीं कर सके परंतु वे स्वतंत्र भारत के लिए सब कुछ करेंगे। यह उन कई झूठों में से एक है जो उन्होंने अपनी छवि को चमकदार बनाने के लिए गढ़े थे।
हम सब जानते हैं कि वे आरएसएस-हिन्दुत्व की उस राजनैतिक विचारधारा के हामी हैं, जिसने भारत के
स्वाधीनता संग्राम में कभी हिस्सा नहीं लिया। संघ-भाजपा-हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद, स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रवाद से बिल्कुल भिन्न है।
गांधी और स्वाधीनता संग्राम का राष्ट्रवाद, भारतीय राष्ट्रवाद था जबकि मोदी परिवार का राष्ट्रवाद, हिन्दू राष्ट्रवाद है। यह जिन्ना के मुस्लिम राष्ट्रवाद की तरह, एक प्रकार का धार्मिक राष्ट्रवाद है।  मुस्लिम लीग का मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू महासभा-आरएसएस का हिन्दू राष्ट्रवाद, परतंत्र भारत में दो समानांतर राजनैतिक धाराएं थीं। स्वाधीनता संग्राम के दौरान संघ और उसके साथी, आजादी की लड़ाई की आलोचना किया करते थे क्योंकि वह समावेशी  भारतीय राष्ट्रवाद पर आधारित थी। इसलिए, मोदी और उनके जैसे लोगों का देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान न्योछावर करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था।
मोदी की जीत के कई कारण हैं। इनमें शामिल हैं हमारी चुनाव प्रणाली, मोदी की आक्रामक शैली , कांग्रेस की कमजोरियों का लाभ उठाने में उनकी सफलता, जनता से संवाद स्थापित करने की उनकी असाधारण क्षमता और राष्ट्रपति प्रणाली की तर्ज पर चलाया गया चुनाव अभियान। इसके मुकाबले, कांग्रेस का प्रचार अभियान अत्यंत फीका था और यूपीए सरकार पर भ्रष्ट होने और अनिर्णय का शिकार होने के आरोप थे। कांग्रेस की साख को गिराने का काम अन्ना हजारे के आंदोलन से शुरू हुआ, जिसे आरएसएस का समर्थन प्राप्त था। इस आंदोलन को केजरीवाल आगे ले गए और उन्होंने कांग्रेस की जीत की संभावनाओं को धूमिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। केजरीवाल ने भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में काफी देर से बोलना शुरू किया और वह भी काफी हिचकिचाहट के साथ। ऐसा क्यों हुआ, यह कहना मुष्किल है। अन्ना, जिन्हें दूसरा गांधी बताया जा रहा था, मंच पर अपनी भूमिका निभाकर अदृष्य हो गए। केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने सामाजिक आंदोलन को राजनैतिक दल की शक्ल दे दी। इससे सभी सामाजिक आंदोलनों की साख और उनके असली इरादों पर प्रश्नचिन्ह लगा। आप का भ्रष्टाचार विरोधी प्रचार, मुख्यतः कांग्रेस पर केन्द्रित था। आप ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया  कि भ्रष्टाचार हमारी सामाजिक व्यवस्था में गहरे तक पैठी विकृतियों का नतीजा है। यह भी तथ्य है कि भ्रष्टाचार वही कर सकता है जो सत्ता में हो और समाज का वह वर्ग, जो जल्द से जल्द अमीर बन जाना चाहता है, भी भ्रष्टाचार के लिए उतना ही दोषी है जितना कि भ्रष्ट मंत्री या अधिकारी। आप ने 400 से अधिक उम्मीदवार खड़े किए, जिनमें से अधिकांष ने अपनी जमानतें गवां दीं। इनमें से कई उम्मीदवार ऐसे थे जिनकी जनता में बहुत उजली छवि थी और जिन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए अथक और कठिन संघर्ष किए थे। आप ने कांग्रेस की साख को गिराने में महती भूमिका निभाई। उसने भाजपा को भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ने वाले दल के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने में मदद की। आप ने काफी बाद में भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में बात करनी शुरू की। 
जहां तक ‘विकास’ के एजेण्डे का सवाल है, मोदी ने गुजरात कत्लेआम में अपनी भूमिका निभाने के बाद, जल्दी ही गुजरात के विकास के नारे का दामन थाम लिया। गुजरात के विकास का मिथक, अरबपति उद्योगपतियों के प्रति राज्य सरकार की उदारता पर आधारित था। गुजरात सरकार से मिल रहे लाभों के बदले, उद्योगपतियांे ने 2007 से ही ‘‘मोदी को प्रधानमंत्री होना चाहिए’’ के मंत्र का अनवरत जाप शुरू कर दिया था। जहां गुजरात में धार्मिक अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिए पर पटक दिया गया और उन्हें दूसरी श्रेणी का नागरिक बना दिया गया वहीं गुजरात के विकास के किस्से देशभर में गूंजने लगे। दूसरे राजनीतिक दलों और अध्येताओं ने लंबे समय तक इन दावों को चुनौती नहीं दी। जब गुजरात के समााजिक-आर्थिक सूचकांकों व अन्य आंकड़ों का आलोचनात्मक विष्लेषण किया गया तब गुजरात के विकास का सच सामने आया; परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस सच को आमजनों तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा था।
सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि मोदी का चुनाव अभियान केवल विकास के एजेण्डे पर आधारित था। परंतु यह सच नहीं है। मोदी ने सांप्रदायिकता और जाति के कार्ड को जमकर खेला। यह काम अत्यंत कुटिलता से किया गया। उन्होंने भारत से मांस के निर्यात की आलोचना की और उसे पिंक रेव्युलेशन बताया। इसका उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को गौहत्या से जोड़ना था। इस तरह, उन्होंने एक आर्थिक मुद्दे को सांप्रदायिक मुद्दे मंे बदल दिया। मोदी बार-बार बांग्लाभाषी मुसलमानों के विरूद्ध बोलते रहे। उन्होंने अपनी अनेक जनसभाओं में कहा कि असम की सरकार एक सींग वाले गेंडे को मारकर, बांग्लादेशी घुसपैठियांे के लिए जगह बना रही है। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेशी  घुसपैठियों को 16 मई को अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर भारत से प्रस्थान करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ये सारी बातें उनके चुनाव प्रचार के सांप्रदायिक चेहरे को उजागर करने के लिए काफी हैं। भाजपा के प्रवक्ता कई बार कह चुके हैं कि जहां बांग्लाभाषी हिन्दू शरणार्थी हैं, वहीं बांग्लाभाषी मुसलमान घुसपैठिए हैं। उनकी पार्टी के नेता अमित शाह ने मुजफ्फरनगर में ‘प्रतिशोध’ की बात कही और गिरीराज सिंह ने यह चेतावनी दी कि मोदी के विरोधियों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
अगर हम उन क्षेत्रों पर नजर डालें जहां भाजपा ने विजय प्राप्त की है तो अत्यंत चिंताजनक तथ्य सामने आता है। ऊपर से देखने पर तो प्रतीत होता है कि भाजपा की विजय के पीछे विकास का वायदा था परंतु इस जीत में धार्मिक धु्रवीकरण की भूमिका को नकारना बचपना होगा। भाजपा को उन्हीं क्षेत्रों में अधिक सफलता मिली है जहां सांप्रदायिक या आतंकवादी हिंसा के कारण, सांप्रदायिक धु्रवीकरण हुआ है। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार व असम-इन सभी राज्यों में अलग-अलग समय पर व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई है। इसके विपरीत, तमिलनाडु, बंगाल और केरल, जो सांप्रदायिक हिंसा से तुलनात्मक रूप से मुक्त रहे हैं, वहां भाजपा अधिक सफलता अर्जित नहीं कर सकी है। इस मामले में उड़ीसा एक अपवाद है, जहां ईसाई-विरोधी कंधमाल हिंसा के बावजूद, नवीन पटनायक की पार्टी ने अपनी पकड़ बनाए रखी है।
सांप्रदायिक हिंसा व आरएसएस-भाजपा-मोदी की जीत के अंतर्संबंध का गहन अध्ययन आवश्यक है। इसी तरह, सांप्रदायिक व आतंकवादी हिंसा के कारण होने वाले सांप्रदायिक धु्रवीकरण का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। यह मात्र संयोग नहीं है कि विकास के मिथक से देश के केवल उन हिस्सों के मतदाता प्रभावित हुए जहां पिछले कुछ वर्षों में हिंसा हुई थी। सांप्रदायिक हिंसा की जांच करने वाले अधिकांश आयोगों ने दंगों के लिए संघ की मशीनरी को जिम्मेदार ठहराया है।यद्यपि मोदी ने खुलकर जाति का कार्ड नहीं खेला परंतु उन्होंने प्रियंका गांधी के ‘नीच राजनीति’ के आरोप को तोडमरोड़ कर, ‘नीच जाति’ में परिवर्तित कर अपनी जाति का ढिंढोरा पीटने का अवसर ढंूढ लिया। उन्होंने अपनी जाति घांची का बार-बार नाम लिया ताकि वे नीची जातियों के मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकें।
मोदी की जीत के क्या मायने हैं? मुंबई, गुजरात, मुजफ्फरनगर और ढेर सारी अन्य जगहों में हुए सांप्रदायिक दंगों ने हमारे समाज के एक हिस्से में गहरे तक असुरक्षा का भाव भर दिया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं के कठिन संघर्ष के बावजूद, हमारी न्यायिक प्रणाली बहुत धीमी गति से काम कर रही है और पीडि़तों को न्याय नहीं मिल सका है।
अपराधी यह दावा करते घूम रहे हैं कि वे निर्दोष हैं और उन्हें क्लीन चिट मिल गई है। मोदी की इस जीत में कई चीजें पहली बार हुई हैं। यह भी पहली बार हुआ है कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसपर कत्लेआम में भागीदारी का आरोप है, देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठेगा। ऐसे में भारतीय प्रजातंत्र का क्या भविष्य है? भारतीय संविधान के मूल्य कितने सुरक्षित रह सकेंगे? क्या मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के अपने मूल एजेण्डे को त्यागेंगे? क्या वे उस विचारधारा से अपने को अलग करंेगे, जो उनकी राजनीति का आधार है? या वे अपने आकाओं को हिन्दू राष्ट्र भेंट में देंगे? इन प्रष्नों का सही उत्तर देने के लिए कोई ईनाम नहीं है।  
मोदी का व्यक्तित्व: एकाधिकार-फासीवादी
आमचुनाव में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से उनकी तुलना एक ओर रिचर्ड निक्सन, मार्गरेट थैचर व रोनाल्ड रीगन से की जा रही है तो दूसरी ओर हिटलर से। हिटलर से उनकी तुलना की कई विष्लेषकों ने कड़े शब्दों में निंदा की है। उनका कहना है कि न तो मोदी, हिटलर हैं और ना ही 2014 का भारत, 1930 का जर्मनी है। इन विष्लेषकों का कहना है कि प्रथम विश्वयुद्ध में हार के बाद, जर्मनी एक बहुत कठिन दौर से गुजर रहा था। सन् 1920 के दषक के अंत में आई  विश्वव्यापी मंदी ने जर्मनी में हालात को बद से बदतर बना दिया था। यही वे परिस्थितियां थीं, जिनमें हिटलर और उसकी नरसंहार की राजनीति का उदय हुआ। हिटलर के उदय के पीछे एक कारक यह भी था कि जर्मनी में प्रजातंत्र कमजोर था व केवल 30 प्रतिशत मत हासिल कर नाजी वहां सत्ता में आ गए थे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि दो अलग-अलग कालों में, दो अलग-अलग देशों की राजनैतिक परिस्थितियां कभी एकदम एक-सी नहीं हो सकतीं। परंतु यह भी सच है कि कभी-कभी उनमें अंतर बहुत सतही होते हैं जबकि समानताएं मूलभूत होती हैं। यह सही है कि भारत को उस तरह का अपमान बर्दाश्त नहीं करना पड़ा है जैसा कि जर्मनी को प्रथम  विश्वयुद्ध में करना पड़ा था। परंतु यह भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में अन्ना हजारे के आंदोलन से शुरू कर, अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी आदि ने देश  की जनता में राजनैतिक व्यवस्था व शासक दल के प्रति गहरे अविष्वास के भाव को जन्म दिया है। इस मोहभंग को अत्यंत योजनाबद्ध तरीके से उत्पन्न किया गया। अन्ना के आंदोलन के पीछे वही आरएसएस था, जो मोदी के उदय के पीछे है। निरंतर दुष्प्रचार और आम लोगों की भागीदारी से व्यापक आंदोलन चलाकर, अन्ना हजारे ने वर्तमान व्यवस्था के प्रति गंभीर अविष्वास व आक्रोष का माहौल पैदा किया। शासक दल की विष्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई। केजरीवाल ने नागरिक समूहों की सहायता से शासक दल की विष्वसनीयता को और गिराया।
जहां तक प्रजातंत्र का सवाल है, भारत में प्रजातंत्र अभी भी विकास के दौर में है। वह पूरी तरह से परिपक्व नहीं हुआ है। एक ओर प्रजातंत्र के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और लोग पहले से कहीं अधिक संख्या में मत दे रहे हैं-जो कि एक सकारात्मक परिवर्तन है-तो दूसरी ओर, शासन के वेस्टमिंसटर माॅडल ने भारतीय प्रजातंत्र के प्रातिनिधिक चरित्र को कमजोर किया है। जर्मनी में नाजी केवल 30 प्रतिषत वोट पाकर सत्ता में आ गए थे। सन् 2014 में भारत में भाजपा केवल 31 प्रतिषत वोट हासिल कर लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने और अपनी सरकार बनाने में सफल हो गई है! भारतीय प्रजातंत्र को दूसरा खतरा जातिगत व लैंगिक पदानुक्रम से है। इस पदानुक्रम के चलते, महिलाओं और दलितों के साथ अन्याय हो रहा है परंतु समाज का इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं है। राज्यतंत्र का सांप्रदायिकीकरण भी भारतीय प्रजातंत्र के लिए खतरा है। इसके चलते, धार्मिक अल्पसंख्यक नियमित रूप से हिंसा के शिकार हो रहे हैं और उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है। देश के विभिन्न इलाकों में हुए बम धमाकों के बाद, बड़ी संख्या में निर्दोष युवकों को गिरफ्तार कर उनकी जिंदगियां और कैरियर बर्बाद कर दिये गए। यद्यपि अदालतें उन्हें बरी कर रही हैं परंतु इस प्रक्रिया में लंबा समय लगता है और तब तक ऐसे युवकों का जीवन तबाह हो चुका होता है। इसके समानांतर, अल्पसख्यंकों के दानवीकरण की प्रक्रिया भी चल रही है और कुछ क्षेत्रों में उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन बिताने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
हिटलर, यहूदियों और संसदीय प्रजातंत्र के प्रति अपनी घृणा को सार्वजनिक व खुले रूप में व्यक्त करता था। मोदी यद्यपि ऐसा नहीं करते तथापि वे ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ के हामी हैं और हिन्दू राष्ट्रवाद की मूल अवधारणाओं में से एक यह है कि केवल हिन्दुओं को ही देश का नागरिक होने का हक है। ‘विदेशी  धर्मों’ जैसे इस्लाम व ईसाईयत के मानने वालों को हिंदू राष्ट्र के लिए खतरा समझा जाता है। आरएसएस के सबसे प्रसिद्ध विचारक एमएस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ए बंच आॅफ थाॅट्स मंे हिन्दू राष्ट्रवाद को परिभाषित किया है। मोदी इसी विचारधारा में यकीन करते हैं और यह विचारधारा, हिटलर की विचारधारा से काफी हद तक मिलती-जुलती है। हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्लेआम को जायज व प्रशंसनीय ठहराते हुए, मोदी के वैचारिक गुरू, गोलवलकर लिखते हैं, ‘‘...अपने राष्ट्र और संस्कृति की शुद्धता को बनाये रखने के लिए जर्मनी ने अपने देश को यहूदियों से मुक्त कर दुनिया को चौका दिया। यह राष्ट्रीय गौरव का उच्चतम प्रकटीकरण था। जर्मनी ने यह दिखा दिया है कि जिन नस्लों व संस्कृतियों के बीच मूलभूत अंतर होते हैं, उन्हें एक राष्ट्र के रूप में संगठित करना संभव नहीं है। इससे हिन्दुस्तान बहुत कुछ सीख सकता है, लाभांवित हो सकता है’’।
मोदी ने ठीक यही गुजरात में किया, जहां करीब 2,000 लोगों को अत्यंत क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया गया और मुसलमानों का एक बड़ा तबका अपमान और वंचना सहने पर मजबूर कर दिया गया। मुसलमानों को उनके मोहल्लों में कैद कर दिया गया है, जहां नागरिक सुविधाओं का नितान्त अभाव है। 
एक जर्मन प्रतिनिधिमंडल, जिसने अप्रैल 2010 में गुजरात की यात्रा की थी, के एक सदस्य ने कहा था कि उसे यह देखकर बहुत धक्का लगा कि हिटलर के राज में  जर्मनी और मोदी के राज में गुजरात में कितनी समानताएं हैं। यहां यह याद दिलाना समीचीन होगा कि गुजरात में स्कूली पाठ्यपुस्तकों में हिटलर का एक महान राष्ट्रवादी के रूप में महिमामंडन किया गया है। मोदी और हिटलर की समानताएं यहीं खत्म नहीं होतीं। हिटलर की तरह, मोदी को भी कारपोरेट धनकुबेरों का पूरा समर्थन प्राप्त है। हिटलर की तरह, मोदी भी धार्मिक अल्पसंख्यकों से घृणा करते हैं और उन्होंने यह स्वयं स्वीकार किया है कि वे हिन्दू राष्ट्रवाद में विश्वास रखते हैं। धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति उनके रवैये व उनके व्यक्तित्व का अत्यंत सटीक वर्णन, मनोविश्लेशक आशीश  नंदी ने किया है। आशीश नंदी ने मोदी का साक्षात्कार, गुजरात कत्लेआम के काफी पहले लिया था। वे लिखते हैं ‘‘...मुझे मोदी का साक्षात्कार लेने का अवसर प्राप्त हुआ...उसके बाद मेरे मन में तनिक भी संदेह नहीं रह गया कि वे एक पक्के व विशुद्ध फासीवादी हैं। मैंने कभी ‘फासीवादी’ शब्द का प्रयोग गाली के रूप में नहीं किया। मेरे लिए वह एक बीमारी है जिसका संबंध व्यक्ति की विचारधारा के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व व उसके प्रेरणास्त्रोतों से भी है।’
जहां 1930 के जर्मनी और 2014 के भारत में बहुत अंतर हैं वहीं उनमें बहुत सी समानताएं भी हैं। हिटलर और मोदी की पृष्ठभूमि अलग-अलग है परंतु दोनों की राजनीति, सम्प्रदायवादी राष्ट्रवाद पर आधारित है। दोनों चमत्कारिक नेता हैं और दोनों ‘दूसरे’ का दानवीकरण करने में दक्ष हैं। दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र का भविष्य डावांडोल है। यदि हमें संभावित खतरों से बचना है तो हमें यह सुनिष्चित करना होगा कि देश  में कानून का राज हो, सबको न्याय मिले और प्रजातांत्रिक व मानवाधिकार आंदोलनों को मजबूत किया जाए। हमें ऐसे सामाजिक आंदोलनों को बढ़ावा देना है जो समावेशी  हों और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में न केवल दृढ़ विष्वास रखते हों बल्कि उनकी स्थापना के लिए संघर्ष करने को उद्यत भी हों।

मोदी के सत्ता में आने के बाद
मोदी को प्रधानमंत्री की गद्दी संभाले अभी कुछ ही हफ्ते बीते हैं परंतु अभी से उनका असली एजेण्डा देश  के सामने आने लगा है। हिन्दू दक्षिणपंथी तत्व आक्रामक हो उठे हैं और खुलकर हिंसा कर रहे हैं। राज्यतंत्र अपने पूर्वाग्रह छिपाने का प्रयास तक नहीं कर रहा है। केरल के एक कालेज के प्राचार्य और छःह छात्रों को मोदी का चित्र, हिटलर और ओसामा के साथ लगाने के बाद, गिरफ्तार कर लिया गया है। गोवा में एक व्यक्ति को पुलिस ने मोदी के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी करने के कारण हिरासत में ले लिया। मोदी की चुनावी विजय के बाद जो हिंसा हुई और हो रही है, वह आने वाले समय का संकेत है। बालठाकरे और शिवाजी के रूपांतरित चित्र, सोशल वेबसाईटों पर अपलोड होने के कुछ समय बाद ही पुणे में अल्पसंख्यकों पर योजनाबद्ध हमले शुरू हो गए (मई 2014) जिसके दौरान एक सूचना प्रौद्योगिकी पेशेवर को सिर्फ इसलिए जान से मार डाला गया क्योंकि उसकी दाढ़ी बड़ी हुई थी और वह पठानी सूट पहने था। संघ परिवार के सदस्यों ने अपने हिन्दुत्ववादी एजेण्डे को लागू करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। वे मांग कर रहे हैं कि धारा 370 समाप्त की जाए, समान नागरिक संहिता लागू हो और राममंदिर का निर्माण शुरू हो। नागरिक अधिकार संगठनों को कुचलने के प्रयास  शुरू हो गए हैं। उन संगठनों को निशाना बनाया जा रहा है जो पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन और आदिवासियों के अधिकारों के अतिक्रमण का विरोध कर रहे हैं। जो एनजीओ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा स्थानीय रहवासियों को बेदखल करने और पर्यावरण को हानि पहुंचाने का विरोध कर रहे हैं, उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। जिन एनजीओ पर पहले यह आरोप लगाया जाता था कि वे विदेशी कंपनियों के इशारे पर काम कर रहे हैं, उनके बारे में ही अब यह कहा जा रहा है कि वे इन कंपनियों द्वारा भारत में निवेश की राह में बाधक बन रहे हैं।
मोदी ने अपने हाथों में सत्ता का केन्द्रीकरण शुरू कर दिया है। भारत सरकार के सचिवों से कहा गया है कि वे सीधे मोदी को रिपोर्ट करें। केबिनेट व्यवस्था को कमजोर किया जा रहा है। हिन्दुत्ववादी अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जा रहा है। कई पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है और आरएसएस का अनुशांगिक संगठन, शिक्षा बचाओ आंदोलन ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। कई प्रकाशक इतने आतंकित हो गए हैं कि उन्होंने अपनी पूर्व में प्रकाशित  किताबों का पुनर्वालोकन शुरू कर दिया है। इनमें मेघा कुमार की पुस्तक ‘‘कम्युनलिज्म एण्ड जेंडर वायलेंसः अहमदाबाद सिन्स 1969’’ शामिल है।

नई सरकार और सामाजिक आंदोलन
चुनाव में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्षरत व्यक्तियों और संगठनों ने प्रजातांत्रिक अधिकारों और उदारवादी मूल्यों की रक्षा के लिए नई रणनीति बनाने पर विचार शु रू कर दिया है। एक एकाधिकारवादी शासक धीरे-धीरे देश पर हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा लाद सकता है, यह खतरा अब स्पष्ट नजर आ रहा है। मोदी सरकार के पहले महीने ने ही आने वाले दिनों के बारे में कई आशंकाओं को जन्म दिया है। ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि यह सरकार प्रजातांत्रिक अधिकारों के लिए खतरा है। प्रजातांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करने के लिए कई नागरिक समाज समूह एक दूसरे से हाथ मिला रहे हैं। इस पर भी विचार किया जा रहा है कि किस तरह एक ऐसे ऐसे समाज के निर्माण के हमारे सपने को पूरा किया जा सकता है जिसमें अभिव्यक्ति व आस्था की स्वतत्रंता हो और हमारी विविधता का सम्मान भी। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत समूहों को एकजुट होना होगा।
सन् 1992-93 की मुंबई हिंसा से सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ संघर्ष की आवश्यकता रेखांकित हुई थी। सन् 2002 के गुजरात कत्तेलाम और 2008 के कंधमाल हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ संघर्ष अनिवार्य व अपरिहार्य है। ये नागरिक समूह मिलकर उस धुरी की स्थापना कर सकते हैं जो समाज के कमजोर वर्गों के मानवाधिकारों की रक्षा का केन्द्र बन सके। सामाजिक संगठनों को एक मंच पर लाया जाना आवश्यक है। अगर संसद कोई  दमनकारी कानून बनाती है या राज्य तंत्र नागरिकों के किसी समूह के साथ भेदभाव करता है तो इसके विरोध में सड़कों पर उतरने से लेकर अदालतों के दरवाजे खटखटाने तक हर संभव उपाय करना होगा।
यह साफ है कि हम चाहे अभिव्यक्ति की आजादी के लिए लड़ रहे हों या फिर महिलाओं के अधिकारों के लिए पर्यावरण की रक्षा के लिए, या अल्पसंख्यकों के अधिकारों की खातिर-हम सब को एक होना होगा। और यह काम हर शहर, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए। वामपंथी पार्टियों को जनता से संबंधित मुद्दों को गंभीरता से लेना होगा और सामाजिक आंदोलनों को अपना समर्थन व सहयोग उपलब्ध करवाना होगा। तभी हम अपने प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक अधिकारों को सुरक्षित रख सकेंगे।
-राम पुनियानी

बुधवार, 29 जनवरी 2014

मोदी की जाति और हिन्दुत्ववादी रणनीति

नरेन्द्र मोदी की प्रधानमंत्री पद की दावेदारी की घोषणा के कुछ ही समय पहले, एक दूसरे मोदी-सुशील मोदी-ने पहली बार नमो के ओबीसी होने की चर्चा सार्वजनिक रूप से की। हाल (जनवरी 2014) में दिल्ली में एक सार्वजनिक सभा में नरेन्द्र मोदी ने अपनी जाति का जिक्र किया। यह आश्चर्यजनक है कि मोदी अपनी जाति पर इतना जोर दे रहे हैं क्योंकि आरएसएस, जिसके वे प्रशिक्षित स्वयंसेवक हैं, एकाश्म हिन्दू पहचान का निर्माण करना चाहता है और हिन्दू धर्म में जातिगत भेदभाव और ऊँचनीच के अस्तित्व को नकारना चाहता है। आरएसएस की राजनीति, दरअसल, जाति के पिरामिड पर आधारित विचारधारा है जिसमें हर जाति के लिए स्थान नियत है। जातिप्रथा के मूल में है नीची जातियों का दमन। हिन्दुत्व की राजनीति का लक्ष्य यह है कि ये दमित जातियां अर्थात दलित और ओबीसी अपनी जातिगत पहचान को भुलाकर केवल हिन्दू के रूप में अपनी पहचान को याद रखें।
हिन्दुत्व की राजनीति को समय-समय पर जाति व्यवस्था से चुनौती मिलती रही है। आरएसएस की शुरूआत ही समाज में नीची जातियों के आगे बढ़ने की प्रतिक्रिया स्वरूप हुई थी। सन् 1920 में दलितों ने जमींदार-ब्राह्मण गठबंधन से मुकाबला करने के लिए ब्राह्मण-विरोधी आंदोलन शुरू किया। इसकी प्रतिक्रिया में ऊंची जातियों ने एक मंच पर आकर आरएसएस की नींव रखी। इस गठबंधन का लक्ष्य था हिन्दू राष्ट्र का निर्माण। इसके ठीक विपरीत था अंबेडकर का एजेंडा, जो जाति के उन्मूलन की बात करता था और जो सामाजिक न्याय की अवधारणा को भारतीय राष्ट्रवाद के उभरते हुए ढांचे में उसका उचित स्थान दिलवाने के प्रति प्रतिबद्ध था। संघ, राष्ट्रीय आंदोलन के भी विरूद्ध था क्योंकि इस आंदोलन की यह मान्यता थी कि जातिगत पदानुक्रम को समाप्त कर समानता की ओर अग्रसर होना, स्वाधीनता हासिल करने के लिए आवश्यक है। इस दौरान हिन्दुत्व के झंडाबरदार, जिनमें गोलवलकर शामिल थे, उन हिन्दू धर्मग्रन्थों कीशान में कसीदे काढ़ रहे थे, जिनमें जाति भेद को औचित्यपूर्ण और दैवीय ठहराया गया था। हिन्दुत्ववादी चिंतकों को जातिप्रथा की क्रूरता से कोई लेनादेना नहीं था। वे तो जातिप्रथा का महिमामंडन करते थे और यह मानते थे कि जातिप्रथा हिन्दू समाज का आधार और उसकी ताकत है। स्वाधीनता के बाद, भारतीय संविधान ने दलितों की समानता की ओर की यात्रा को सुगम बनाया। संविधान में कई ऐसे सकारात्मक प्रावधान किए गए जिनसे दलितों को कुछ हद तक अवसरों की समानता हासिल हो सकी।
सन् 1980 का दशक आते आते तक सामाजिक वातावरण बदल चुका था। ऊँची जातियों को ऐसा लगने लगा था कि शिक्षा और नौकरियों के मामले में सरकार, दलितों को उनकी योग्यता और जरूरत के मान से बहुत अधिक दे रही है। वे यह कहते थे कि दलित सरकारी दामाद बन गए हैं। उनकी यह मान्यता थी कि उनके ‘योग्य’ बच्चों को शिक्षण संस्थाओं और नौकरियों में उचित हिस्सेदारी नहीं मिल रही है। इसी तरह की भावना के चलते, सन् 1980 के दशक में अहमदाबाद में दलित विरोधी हिंसा हुई। सन् 1980 के मध्य में अन्य पिछड़े वर्गों को पदोन्नति में आरक्षण देने के मुद्दे पर ओबीसी के खिलाफ हिंसा हुई। सन् 1990 के दशक में मंडल आयोग आया। ऊँची जातियों में इस आयोग की रपट लागू होने के विरूद्ध जो गुस्सा था, उसे संघ परिवार के सदस्यों ने स्वर दिया। चुनावी गणित के कारण संघ और उसके विभिन्न संगठनांे ने यद्यपि औपचारिक रूप से मंडल आयोग का विरोध नहीं किया परंतु राम मंदिर का मुद्दा उठाकर, समाज का ध्यान दूसरी ओर खींचने की पर्याप्त कोशिश  की।
इस बीच आरएसएस ने सोशल इंजीनियरिंग की एक योजना बनाई जिसके तहत दलितों को हिन्दुत्व की राजनीति में सहयोजित किया जाना था। उन्हें बाबरी ध्वंस और गुजरात की मुस्लिम-विरोधी हिंसा में बढ़चढकर भाग लेने केलिए प्रोत्साहित किया गया। अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा करने से धार्मिक पहचान मजबूत होती है। दलितों के मामले में साम्प्रदायिक हिंसा के कारण हिन्दू पहचान महत्वपूर्ण बन गई और जातिगत पहचान नेपथ्य में चली गई। अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा में भाग लेने वाले दलितों की हिन्दू पहचान मजबूत होती चली गई। हाल के मुजफ्फरनगर दंगे, इस रणनीति की सफलता का अच्छा उदाहरण है। यहां जाटों और मुसलमानों के बीच पीढि़यों से चले आ रहे नजदीकी संबंधों को तोड़ने के लिए जाट पहचान के स्थान पर हिन्दू पहचान की स्थापना कर दी गई। इसके लिए मुसलमानों का दानवीकरण किया गया। इसी तरह की सोशल इंजीनियरिंग के जरिए दलित व पिछड़े नेताओं जैसे उमा भारती, कल्याण सिंह और विनय कटियार को आरएसएस अपनी राजनीति की अग्रिम पंक्ति में ले आया और उनके जरिए बाबरी मस्जिद का ध्वंस और अपने अन्य सांप्रदायिक एजेंडे लागू किए। इस सोशल इंजीनियरिंग के चलते दलितों का एक हिस्सा विभाजनकारी राजनीति की ओर आकर्षित हो रहा है।
दूसरे स्तर पर ‘सामाजिक समरसता मंच’ जैसे संगठन गठित किए जा रहे हैं जो विभिन्न जातियों के बीच सौहार्द की बात तो करते हैं परंतु जातिप्रथा के उन्मूलन या जातिगत भेदभाव की समाप्ति की नहीं। यह अंबेडकर की सोच के धुर विपरीत है, जिनकी दृष्टि में जाति का उन्मूलन ही दलित राजनीति का केन्द्रीय एजेंडा था। जहां अंबेडकर ने दलितों की बदहाली की ओर देश और दुनिया का ध्यान आकर्षित किया और उनको न्याय दिलवाने के लिए संघर्ष किया वहीं आरएसएस ने दबे छुपे ढंग से दलितों की भलाई के लिए उठाए जाने वाले सकारात्मक कदमों का विरोध किया। संघ ने कभी दलितों पर होने वाली ज्यादतियों के खिलाफ अपनी आवाज नहीं उठाई। इस तरह, सांप्रदायिक राजनीति के खिलाडि़यों ने एक चतुर रणनीति बनाई है। एक ओर वे दमित जातियों की बेहतरी के लिए उठाए जाने वाले सकारात्मक कदमों का विरोध करते हैं तो दूसरी ओर वे उन्हें हिन्दुत्व में सहयोजित भी कर रहे हैं। इसके साथ ही वे विभिन्न जातियों के बीच सौहार्द की बात भी करते हैं।
जाति के प्रश्न पर संघ परिवार की दो समानांतर रणनीतियां हैं। एक ओर वह मोदी की ओबीसी पहचान का पर्याप्त प्रचार करना चाहता है ताकि उन्हें उनकी जाति के आधार पर ज्यादा से ज्यादा मत मिल सकें।  परंतु इस जातिगत पहचान को जीवित रखते हुए भी वह उनकी छवि एक हिन्दू नेता की बनाना चाहता है। इस हिन्दू पहचान, जो कि जातिगत पहचान के ऊपर है, के निर्माण के लिए सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसके साथ ही ‘दूसरे’ के प्रति भय का भाव भी उत्पन्न किया जा रहा है (हम हिन्दुओं को मुसलमानों और ईसाईयों से खतरा है)। विचारधारा के स्तर पर संघ, दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानवतावाद का प्रचार करता है। एकात्म मानवतावाद के सिद्धांत की मूल अवधारणा यह है कि विभिन्न वर्ण, विराट पुरूष के विभिन्न अंगो से उपजे। उसके मुख से ब्राह्मण बने, भुजाओं से क्षत्रिय, जंघाओं से वैष्य व पैरों से शूद्र। कुल मिलाकर इसका अर्थ यह है कि ये सभी वर्ण और जातियां एक दूसरे की पूरक हैं।
मोदी इस अवधारणा को आध्यात्मिक स्तर तक ले गए। गुजरात के सूचना विभाग ने उनकी एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसका शीर्षक है ‘कर्मयोग‘। इस पुस्तक में मोदी कहते हैं, ‘‘वाल्मीकि जाति के लिए सफाई करना एक आध्यात्मिक अनुभव रहा होगा। किसी समय, किसी को यह ज्ञान प्राप्त हुआ होगा कि पूरे समाज और ईश्वर की प्रसन्नता की खातिर यह काम करना उनका (वाल्मीकि) कर्तव्य है: व यह कि ईश्वर द्वारा सौंपी गई इस जिम्मेदारी को उन्हें निभाना है व यह कि उन्हें सफाई के इस काम को एक आध्यात्मिक कार्य मानकर सदियों तक करना है। यह काम वे पीढ़ी दर पीढ़ी करते आ रहे हैं। यह विष्वास करना असंभव है कि उनके पूर्वज कोई और काम या व्यवसाय शुरू नहीं कर सकते थे।’’ ध्यान रहे कि यह आध्यात्मिक अनुभव केवल वाल्मीकि-जो कि दलितों की एक उपजाति है-के लिए आरक्षित है। यह जाति सदियों से सफाई के काम करने के लिए मजबूर रही है। इस जाति के कार्य को कई बाबा महिमामंडित करते आए हैं। उनमें से एक पांडुरंग शास्त्री अठावले ने साफ शब्दों में घोषणा की कि किसी भी जाति को उसके कर्तव्यपथ से विचलित नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे समाज को नुकसान होगा। एक दूसरे बाबा श्री श्री रविशंकर अपनी लेखनी के जरिए जातिगत सौहार्द का प्रचार करते आ रहे हैं।
इस राजनीति और उसकी रणनीतियों के बीच कोई सीधा रिश्ता नहीं है। हिन्दुत्व की राजनीति, जातिगत पदानुक्रम को बनाए रखना चाहती है और इसके लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करती है। निःसंदेह इस राजनीति की सबसे बड़ी ‘सफलता‘ यही होगी कि विचारधारा की घुट्टी पिला-पिलाकर किसी गैर-उच्च जाति के हिन्दू को इस राजनीति का नायक बना दिया जाए। मोदी हिन्दुत्व नायक हैं और साथ ही ओबीसी भी। यह हिन्दुत्ववादी एजेंडे को लागू करने की दिशा  में बड़ी सफलता है क्यांेकि ऐसा करके जातिव्यवस्था का पोषण करते हुए भी चुनावी मैदान में जीत हासिल की जा सकती है।
   -राम पुनियानी

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

मोदी और हिन्दू राष्ट्रवाद


गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, जिन्हें उम्मीद है कि भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव मंे उन्हें प्रधानमंत्री पद का अपना उम्मीदवार घोषित करेगी, शायद विवादों में घिरे रहने में ही आनंद महसूस करते हैं। नरेन्द्र मोदी अपने शब्द बहुत सोच-समझकर चुनते हैं। उनका प्रचारतंत्र काफी मेहनत से इन शब्दों को ढूंढता होगा। ‘कुत्ते का पिल्ला‘, ‘धर्मनिरपेक्षता के बुर्के के पीछे छुपी कांग्रेस‘, ‘मुझे हिन्दू राष्ट्रवादी होने पर गर्व है‘ आदि कुछ ऐसे वाक्य हैं, जिनका उद्धेश्य केवल विवाद पैदा करना, आमचुनाव के लिए अघोषित साम्प्रदायिक प्रचार करना और चर्चा के केन्द्र में बने रहना है। मोदी अक्सर मतदाताओं के दिमाग में साम्प्रदायिकता का जहर भरने के लिए अर्धसत्यों, असत्यों और कटु व असंसदीय भाषा का उपयोग करते हैं। अगर वे इन शब्दों का सोच-समझकर उपयोग नहीं कर रहे हैं तो इससे सिर्फ यही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उनके शब्दकोष में केवल साम्प्रदायिकता से लबरेज शब्द हैं। दोनों ही स्थितियों में, मतदाताओं को उन्हें सत्ता सौंपने के पहले दस बार सोचना चाहिए। मोदी कहते हैं कि वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं और उन्हें इसपर गर्व है। आईए, हम समझंे कि क्यों मोदी न तो राष्ट्रवादी हैं, न हिन्दू हैं और न इस पर गर्वित हैं।
राष्ट्रवादी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसके बल पर मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने, ने भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में कभी कोई हिस्सेदारी नहीं की। संघ ने स्वाधीनता आंदोलन से हमेशा गज भर की दूरी बनाए रखी और हमारे साम्राज्यवादी शासकों का हमेशा साथ दिया। ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ताधारियों की सलाह पर ही खाकी हाफपेन्ट को आरएसएस के गणवेश का हिस्सा बनाया गया। सन् 1942 मंे, जब सारा देश अंग्रेजों से भारत छोड़ने के लिए कह रहा था, तब आरएसएस और मुस्लिम लीग, द्वितीय विश्वयुद्ध के लिए समर्थन जुटाने में लगे थे। असली राष्ट्रवादी उस समय साम्राज्यवादियों की लाठी-गोलियां खा रहे थे, जेल जा रहे थे और वहां घोर यंत्रणाएं भोग रहे थे। अपने ब्रिटिश आकाओं की सलाह पर, आरएसएस ने युद्ध के लिए काडर तैयार करने की दृष्टि से, युवाओं को सैनिक प्रशिक्षण देना शुरू किया। संघ के ब्रिटिश आकाओं ने उन्हें सलाह दी कि मैदानों में पीटी करते हुए संघ के कार्यकर्ताओं को कहीं सरकारी सैनिक न समझ लिया जाए इसलिए खाकी फुलपैंट की जगह उन्हें खाकी हाफपैंट पहनना चाहिए। संघ ने अंग्रेजों की बात मानने में तनिक भी देरी नहीं की। संघ के एक भी नेता ने स्वाधीनता संग्राम में भाग नहीं लिया और वे सभी अंग्रेजों ंकी जय-जयकार करते रहे।
आरएसएस के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ था अंग्रेजों का समर्थन  और दंगों में उत्साहपूर्वक भागीदारी, ताकि अंग्रेज अपनी फूट डालो और राज करो की नीति को बेहतर ढंग से लागू कर सकें। इसके विपरीत, राष्ट्रवादी, सारे देश को एक कर, अंग्रेजों के विरूद्ध लामबंद हो रहे थे। नाथूराम गोडसे के लिए हिन्दू राष्ट्रवाद या देशभक्ति का अर्थ था गांधीजी के सीने पर गोलियां दागना क्योंकि उनका उदारवादी और समावेशी हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व की विचारधारा के प्रचार-प्रसार में सबसे बड़ी बाधा थी। परंतु स्वाधीनता आंदोलन के समय, आरएसएस ने क्या किया या क्या नहीं, उसके लिए हम मोदी को दोषी क्यों ठहराएं? उनका जन्म तो स्वाधीनता के बाद, सन् 1950 में हुआ था।
स्वाधीनता के बाद राष्ट्रवाद का अर्थ होना चाहिए था देश की स्वाधीनता की रक्षा और ऐसी राष्ट्रीय संस्थाओं का निर्माण, जिनमें सभी नागरिकों की बराबरी की हिस्सेदारी और अधिकार हों। मोदी तो प्रजातंत्र की उस महान संस्था को ही नष्ट करने पर तुले हुए हैं जिसे हमने स्वाधीनता के बाद खड़ा किया है। उदाहरण के लिए, जितने शीर्ष पुलिस अधिकारी गुजरात की जेलों में बंद हैं, उतने किसी अन्य राज्य में नहीं हैं। पुलिस तंत्र का काम था गुजरात के लोगों की रक्षा करना और प्रजातंात्रिक संस्थाओं को सुरक्षा प्रदान करना। परंतु वहां के पुलिस अधिकारी तो मोदी को प्रसन्न करने में व्यस्त थे। मोदी ने एक लोकायुक्त कानून बनाया है, जिसके अन्तर्गत न तो न्यायपालिका, न राज्यपाल और ना ही किसी अन्य स्वतंत्र संस्था का गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति में कोई हस्तक्षेप होगा। इसका अर्थ यह है कि गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति वे ही लोग करेंगे, जिनके भ्रष्टाचार के मामले लोकायुक्त के सामने जाएंगे। जिस व्यक्ति का एकमात्र एजेन्डा देश को नहीं, बल्कि स्वयं को आगे बढ़ाना हो और जो राष्ट्र की सेवा करने की बजाए स्वयं का आभामंडल निर्मित करने में अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर रहा हो, उसे भला राष्ट्रवादी कैसे कहा जा सकता है।
मोदी ने खुलेआम यह घोषित किया है कि उनके लिए हिन्दू राष्ट्रवादी होने का अर्थ है उद्योग जगत का समर्थक होना। मोदी के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ है गरीबों, विशेषकर किसानों और मछुआरों, की कीमत पर, पूंजीपतियों को मनमाना लाभ कमाने की छूट देना। उनके लिए देशभक्ति का मतलब है साणंद (जिला अहमदाबाद) के किसानों से 1100 एकड़ जमीन छीनकर, रातों-रात टाटा मोटर्स को हस्तांतरित कर देना और वह भी किसानों को दिए गए मुआवजे से भी कम दर पर। मोदी की देशभक्ति का एक और सबूत यह है कि उन्होंने टाटा मोटर्स को 9570 करोड़ रूपये (गुजरात के वार्षिक बजट का लगभग एक-चैथाई) का सुलभ ऋण दिया है, जिसे टाटा मोटर्स 0.1 प्रतिशत प्रतिवर्ष की ब्याज दर पर, अगले बीस वर्षों में चुकाएगी। यद्यपि कंपनी को जमीन मिट्टी के मोल आवंटित की गई है परंतु फिर भी उसे इस राशि को 8 समान वार्षिक किस्तों में चुकाना है। सरकार ने टाटा नैनो की फेक्ट्री और पावर प्लांट तक चार लेन की सड़क बनाई है। कहते हैं कि राबिन हुड, अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करता था। मोदी, गुजरात के गरीब किसानों और मजदूरों को लूटकर, टाटाओं, अदानियों, अंबानियों और करसन भाई पटेलों की भरपूर मदद कर रहे हैं। आमजनों को लूटकर पूंजीपतियों की जेबें भरने की इसी नीति के कारण, गुजरात में गरीबी बढ़ी है। जब गुजरात में कुपोषण की भयावह स्थिति मोदी के सामने आई तो उन्होंने भूखे-नंगे लोगांे के घावों पर नमक छिड़कते हुए कहा कि कुपोषण का कारण, गुजरात की महिलाओं की सुंदर दिखने की चाहत है! गुजरात के लोगों-चाहे वे हिन्दू हों या मुसलमान-की बेहतरी शायद मोदी की देशभक्ति की परिभाषा में शामिल नहीं है और इसलिए सरकार, कुपोषण दूर करने के उपायों पर विचार तक नहीं करना चाहती है। गुजरात में राष्ट्रवाद/देशभक्ति का अर्थ है लोगों में झूठे गर्व का भाव भरना ताकि वे अपनी रोजाना की जिन्दगी की दुःख तकलीफें भूल जायें। यही प्रयास एक और हिन्दू राष्ट्रवादी-आडवाणी ने सन् 2004 के लोकसभा चुनाव के ‘इण्डिया शायनिंग’ अभियान के जरिए किया था।
क्या मोदी राष्ट्रवादी होने का दावा कर सकते हैं, जबकि उनके राज्य के बचाव दल ने, उत्तराखण्ड के बाढ़ पीडि़तों में से कथित रूप से केवल गुजरातियों को बचाया और अन्य भारतीयों को उनके हाल पर छोड़ दिया।
हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए राष्ट्रवाद का अर्थ है अल्पसंख्यकों के विरूद्ध घृणा फैलाना ताकि करदाताओं के पैसे से उद्योगपतियों और मुनाफाखोरों को फायदा पहुंचाने वाली नीतियों के कारण  बढ़ रही गरीबी पर से जनता का ध्यान हटाया जा सके। हिन्दू राष्ट्रवाद के विमर्श के केन्द्र में है अल्पसंख्यकों का दानवीकरण। अल्पसंख्यकों के दानवीकरण और उनके विरूद्ध हो रही हिंसा को नजरअंदाज करके, सरकार बहुसंख्यक वर्ग के मेहनतकश गरीबों को उनकी कुंठाओं से मुक्त करने की कोशिश कर रही है। बहुसंख्यक वर्ग के गरीबों में व्याप्त निराशा और कुंठा से जनित ऊर्जा का इस्तेमाल, परिवर्तन लाने के लिए किया जाना चाहिए-एक ऐसे समाज के निर्माण के लिए, जिसमें सभी को आगे बढ़ने के अवसर उपलब्ध हों और समाज के हाशिए पर पटक दिए गए लोगों की बेहतरी के लिए सरकार विशेष प्रयास करे। इसकी जगह, इस ऊर्जा का उपयोग अल्पसंख्यकांे को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। अतः मोदी किसी भी तरह से राष्ट्रवादी नहीं हैं। वे तो पूंजीपतियों के मित्र हैं और उनके लिए राष्ट्रवाद का अर्थ है बहुसंख्यक समुदाय के मन में अल्पसंख्यकों के प्रति काल्पनिक भय पैदा करना और उन्हें अल्पसंख्यकों पर हमले करने के लिए उकसाना।
हिन्दू?
गांधी जी के लिए हिन्दू धर्म का अर्थ था सत्य और अहिंसा। ‘‘धर्म का संबंध हृदय से है’’, गांधी जी ने कहा, ‘‘कोई भी दुख या परेशानी, किसी के लिए उसके धर्म को त्यागने का कारण नहीं बन सकती।’’ एक अन्य स्थान पर गांधी जी कहते हैं, ‘‘मैं ईश्वर की आराधना केवल सत्य के रूप में करता हूँ। मैंने अब तक उसे पाया नहीं है परन्तु मैं उसे खोज रहा हूँ। इस खोज की खातिर मैं उन सभी चीजों का त्याग करने को तत्पर हूँ जो मुझे प्रिय हैं। अगर इसके लिए मुझे अपना जीवन भी त्यागना पड़े तो मुझे आशा है कि मैं इसके लिए तैयार रहूंगा।’’ गांधी जी के लिए हिन्दू धर्म का अर्थ था सत्य, अहिंसा और त्याग। क्या कोई कल्पना भी कर सकता है कि मोदी केवल और केवल सत्य बोलते हैं? जब अखबारों में यह छपा कि मोदी ने दो दिनों में 80 इनोवा कारों से 15,000 गुजरातियों को उत्तराखंड से निकाल लिया तब मोदी ने इसका खंडन करने की आवश्यकता महसूस नहीं की। कुछ दिनों बाद, जब यह कहा जाने लगा कि इतने लोगों को केवल दो दिनों मंे बचाना संभव ही नहीं है तब मोदी के लोगों ने झट यह दावा कर दिया कि मोदी ने ऐसा वक्तव्य दिया ही नहीं था! वे इतनी बार झूठ बोलते हुए पकड़ाये जा चुके हैं कि उन्हें ‘फेंकू’ कहा जाने लगा है। गुजरात में पिछले कई दशकों में जो भी प्रगति हुई है, उस सब का श्रेय मोदी स्वयं लेते हैं। यहां तक कि उनके सत्ता में आने के पहले भी गुजरात में जो विकास हुआ, उसे वे अपनी उपलब्धि बताते हैं। उनका सरकारी तंत्र निर्दोष नागरिकों की फर्जी मुठभेड़ों में हत्या कर रहा है। सोहराबुद्दीन, कौसर बानो, तुलसीराम प्रजापति और इशरत जहां उन लोगों मंे से हैं जिन्हें ऐसी ही मुठभेड़ों में मारा गया परन्तु जिनका सच लोगों के सामने आ गया। निहत्थे नागरिकों को मारकर और यह दावा कर कि वे उनकी हत्या करने के इरादे से आए आतंकवादी थे, मोदी, ‘हिन्दू नायक’ बनना चाहते हैं। क्या जो व्यक्ति सच नहीं बोलता, वह सच्चा हिन्दू हो सकता है? गांधी जी कभी ऐसे व्यक्ति को हिन्दू नहीं मानते। जहां तक मोदी की अहिंसा में आस्था का प्रश्न है, उस पर कोई टिप्पणी करना ही बेकार है। गांधी जी के लिए हिन्दू धर्म के पालन का अर्थ था अपने हितों की कीमत पर दुःखी और जरूरतमंदों की मदद करना। मोदी अपने हितों के लिए हजारों लोगों की जानें कुर्बान करने से पीछे नहीं हटेंगे। यहां तक कि उन्होंने अपने हितों की रक्षा के लिए अपने राजनैतिक गुरू को भी हाशिए पर पटक दिया, जिसने उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनवाया था और सन् 2002 के दंगों के बाद उनकी कुर्सी बचाई थी। गांधी जी ने हिन्दू कहलाने के लिए जो तीन शर्तें निर्धारित की थीं, मोदी उनमें से एक पर भी खरे नहीं उतरते। गुजरात के 2002 के दंगों को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए मोदी ने जिस क्रिया-प्रतिक्रिया की बात कही थी वह न केवल बहुत बड़ा झूठ थी वरन् अल्पसंख्यकों का दानवीकरण करने का प्रयास भी थी। गांधी जी, जो सनातन धर्म के अनुयायी थे, ने 19 जनवरी 1928 को ‘‘यंग इंडिया’’ में लिखा, ‘‘मैं बहुत पहले इस निष्कर्ष पर पहुंच चुका हूं कि...  सभी धर्म सच्चे हैं और सभी में कुछ कमियां भी हैं। और यह, कि मैं अपने धर्म का पालन करते हुए भी दूसरे धर्मों से उतना ही प्रेम कर सकता हूँ, जितना कि हिन्दू धर्म से’’।
हिन्दू धर्म के एक और महान अध्येता राधाकृष्णन ने कहा था, ‘‘हिन्दू धर्म किसी पंथ या पुस्तक या पैगम्बर या संस्थापक से बंधा हुआ नहीं है। यह तो नित नवीनीकृत अनुभवों के आधार पर सत्य की खोज है।’’ ईश्वर की खोज वही कर सकता है जो सहिष्णु हो। ऋग्वेद के समय से लेकर आज तक, भारत कई धर्मों का देश रहा है और जियो और जीने दो उसकी स्थायी नीति रही है। भारतीय धार्मिक परपंरा ने धर्म के हर उस स्वरूप को स्वीकार किया जो सत्य की खोज में रत था।
विभिन्नता की स्वीकार्यता, ,हिन्दू धर्म का एक अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ है। राधाकृष्णन ने लिखा था, ‘‘हिन्दू धर्म के मूल में है सहयोग का भाव। हिन्दू धर्म यह स्वीकार करता है कि परम सत्य की खोज के कई रास्ते हो सकते हैं। हिन्दू धर्म उस तत्व की खोज करता है, जो सभी प्राणियों में अन्तर्निहित और अविनाशी है।’’ उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय मंे हिन्दू धर्म के बारे में कहा, ‘‘दुनिया के दूसरे धर्मों के विपरीत, हिन्दू धर्म का कोई एक पैगम्बर नहीं है, कोई एक ईश्वर नहीं है, वह किसी एक सिद्धांत को नहीं मानता और ना ही किसी एक दर्शन को। इसके धार्मिक कर्मकाण्डों में एकरूपता नहीं है। सच यह है कि संकीर्ण, पारम्परिक अर्थ में यह धर्म नहीं है। मोटे तौर पर इसे जीवन जीने का एक तरीका कहा जा सकता है, इससे अधिक कुछ नहीं।’’ किसी भी हिन्दू के लिए हर धर्म सच्चा है, बशर्ते उसके मानने वाले अपने धर्म का निष्ठा और ईमानदारी से पालन करते हों।
दूसरी ओर, मोदी केवल अल्पसंख्यकों और उनके धर्म को निशाना बनाने और उनका दानवीकरण करने में विश्वास रखते हैं। अपनी गौरव यात्रा के दौरान अपने भाषणों में मोदी ने कई बार दोहराया कि ‘‘हम पांच हमारे पच्चीस (चार महिलाओं से विवाह करना और बड़ी संख्या में बच्चे पैदा करना) की नीति के कारण मुसलमानों की आबादी दिन दुगनी रात चैगुनी गति से बढ़ रही है‘‘। राधाकृष्णन लिखते हैं कि ‘‘मेरा धर्म मुझे इस बात की इजाजत नहीं देता कि मैं किसी भी ऐसी चीज के बारे में, जिसे कोई भी व्यक्ति पवित्र मानता है या मानता था, एक भी अपमानजनक या ठेस पहुंचाने वाला शब्द कहूं। हिन्दू परंपरा यह सिखाती है कि हमें सभी विचारों और पंथों का सम्मान करना चाहिए’’।
गर्व?
मोदी का कहना है कि जिसे वे ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ कहते हैं, उसके अनुयायी होने में वे गर्व महसूस करते हैं। मोदी ने अपने राजनैतिक हितों की खातिर अपना एजेण्डा इतनी बार बदला है कि उससे यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं होगा कि वे अपने ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ पर गर्व नहीं करते। अगर उन्हें अपने ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ पर इतना ही गर्व है तो वे उस समय क्या कर रहे थे जब भाजपा ने, 1998 से लेकर 2004 तक, सत्ता में बने रहने की खातिर, संविधान के अनुच्छेद 370 को समाप्त करने, समान नागरिक संहिता लागू करने और अयोध्या में राममंदिर बनाने के अपने हिंदुत्ववादी एजेण्डे को ताक पर रख दिया था। कोई व्यक्ति यदि अपने विचारों पर गर्व महसूस करता है तो वह उनकी खातिर अपना सब कुछ त्यागने को तत्पर रहता है। मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया। सन् 2002 से लेकर अब तक वे सत्ता में बने हुए हैं परन्तु उन्होंने कभी उन मुद्दों को लेकर त्यागपत्र देने की पेशकश नहीं की, जिन पर वे अब गर्वित होने का दावा करते हैं। उनका हिंदू राष्ट्रवाद शायद सिर्फ इस बात पर गर्वित है कि वे उस सरकार के मुखिया थे, जिसके कार्यकाल मंे सन् 2002 का कत्लेआम हुआ था। क्या वे इस बात पर गर्वित हैं कि जहां वे इजारेदारों को हर तरह से फायदा पहुंचा रहे हैं वहीं देश का सबसे पिछड़ा जिला-डांग-न तो बिहार में है, न उत्तर प्रदेश में, न उड़ीसा में और न उत्तर पूर्व में। वह गुजरात में है! क्या वे इस बात पर गर्वित हैं कि पूरे डांग जिले में पीने का पानी पहुंचाने की योजना पर खर्च की जाने वाली राशि, केवल उस गांव पर खर्च कर दी गई, जहां मक्का मस्जिद धमाकों और अन्य आतंकी हमलों के आरोपी, कुख्यात स्वामी असीमानन्द, शबरी कुंभ मेले का आयोजन कर रहे थे। पूरा डांग आज भी प्यासा है और जिले के निवासियों को पानी उपलब्ध करवाने के लिए आवंटित धनराशि, उन बाहरी व्यक्तियों के लिए एक हफ्ते के पीने के पानी के इंतजाम पर खर्च कर दी गई, जो वहां राजनैतिक हितों की पूर्ति के लिए, शबरी कुंभ नामक नए आयोजन में इकट्ठा हुए थे।
मोदी ‘मियां मुशर्रफ’, ‘कुत्ते के पिल्ले’, ‘धर्मनिरपेक्षता का बुर्का’ जैसी शब्दावलियों का प्रयोग इसलिए करते हैं ताकि वे इस तथ्य को छुपा सकें कि वे हिन्दुत्व के भी सच्चे और ईमानदार अनुयायी नहीं हैं। उनके लिए हिन्दुत्व भी सत्ता हासिल करने और उस पर काबिज  रहने का एक हथियार भर है। ।
                                                             
 -इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 21 मार्च 2013

हिन्दू धर्म, हिन्दुत्व और न्यायपालिका

  1. हिन्दू धर्म की परिभाषा के संबंध में भारतीय न्यायपालिका लंबेे समय से विभ्रम का शिकार रही है। और इस विभ्रम से हिन्दू राष्ट्रवादी और हिन्दू धार्मिक संस्थाएं लाभ उठाती रहे हैं। हिन्दू धर्म को परिभाषित करने के मामले में न्यायपालिका घड़ी के पेंडुलम की तरह, एक कोने से दूसरे कोने तक झूलती रही है। आयुक्त संपत्तिकर मद्रास बनाम स्वर्गीय आर. श्रीधरन के मामले में हिन्दू को एक धर्म बताया गया-एक ऐसा धर्म जिसमें कई भगवान, अनेक ग्रंथ और अलग-अलग धार्मिक कर्मकांड हैं। मनोहर जोशी मामले में कहा गया कि ‘‘हिन्दुत्व जीवनपद्धति है“। हाल में आयकर अपीलीय अधिकरण, नागपुर ने अपने एक निर्णय में कहा कि ‘‘हिन्दू न तो कोई धर्म है और ना ही हिन्दुओं को धार्मिक समुदाय कहा जा सकता है।‘‘ इन परस्पर विरोधाभासी व्याख्याओं का धार्मिक संगठन और मंदिर तो लाभ उठा ही रहे हैं, इससे उन हिन्दू राष्ट्रवादियों की बांछें भी खिल रही हैं जो हिन्दू धर्म को राष्ट्रीय संस्कृति के नाम पर देश पर लादने पर आमादा हैं।
    आयकर अपीलीय अधिकरण ने अपीलकर्ता शिव मंदिर देवस्थान पंच कमेटी संस्थान के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा कि शिव, हनुमान और देवी दुर्गा ब्रम्हांड की महाशक्तियां हैं और वे किसी धर्म का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं। अपीलकर्ता ने आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80जी(5)(6) के अंतर्गत मंदिर के रखरखाव पर किए गए खर्च को इस आधार पर करमुक्त घोषित करने की मांग की थी कि शिव की भक्ति, धार्मिक गतिविधि नहीं है और इसमें सभी समुदायों के लोग भाग ले सकते हैं। अपीलकर्ता का यह भी तर्क था कि शिवभक्ति, परोपकार का कार्य है।
    हिन्दू मूर्तियों का विधिशास्त्र
    हालिया निर्णय, जिसमें यह कहा गया कि शिव कोई भगवान नहीं वरन् महाशक्ति हैं, के विपरीत, पूर्व में न्यायालयों ने मूर्तियों को भगवान का दर्जा दिया है और उन्हंे कानून की दृष्टि में व्यक्ति माना है। देवकीनंदन बनाम मुरलीधर मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि हिन्दू विधि के अनुसार मूर्ति, विधिक दृष्टि से एक व्यक्ति है, जो संपत्ति धारण कर सकती है और धार्मिक संस्थान को प्राप्त संपत्ति, दरअसल, वहां स्थापित मूर्तियों की संपत्ति है। बाबरी मस्जिद विरूद्ध राम जन्मभूमि मामले में इलाहबाद उच्च न्यायालय ने मूर्तियों को शाश्वत अवयस्क का दर्जा दिया है जो संपत्ति की मालिक हो सकती हैं और जिनपर परिसीमा विधि लागू नहीं होती। हिन्दू विधि के अनुसार, मूर्तियां अदालतों में याचिका दायर कर संपत्ति के बंटवारे की मांग भी कर सकती हैं (श्री श्री श्रीधर ज्यू विरूद्ध महिन्द्रा के मिटर)।
    स्वामीनारायण संप्रदाय ने शास्त्री यज्ञ पुरूष दासजी बनाम मूलदास भुनादरदास वैश्य मामले में उच्चतम न्यायालय में यह तर्क दिया कि वे हिन्दू धर्म से विशिष्ट और अलग हैं। यह इसलिए कहा गया ताकि यह दावा किया जा सके कि ‘‘बाम्बे हिन्दू प्लेसिस आॅफ पब्लिक वरशिप एक्ट‘‘ स्वामीनारायण सम्प्रदाय पर लागू नहीं होता। इस अधिनियम के जरिए, दलितों को मंदिरों में प्रवेश का अधिकार दिया गया था। इस मामले में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने यह स्वीकार करते हुए कि हिन्दू धर्म में धार्मिक कर्मकाण्डों और प्रथाओं की विविधिता है और वह एक जीवनपद्धति है यह भी कहा कि ‘‘इन सब मसलों में विविधताओं के बाद भी कुछ मूल अवधारणाएं ऐसी हैं जिनमें सभी हिन्दू विश्वास करते हैं। जैसे, वेदों की सर्वाेच्चता, दार्शनिक मसलों में गीता की श्रेष्ठता और पुनर्जन्म व पूर्वजन्म में विश्वास।‘‘
     जीवनपद्धति
    हिन्दू राष्ट्रवादी, उनकी सुविधानुसार, कभी यह कहते हैं कि हिन्दू एक धर्म है तो कभी यह कि वह एक संस्कृति और जीवनपद्धति है। वे इन दोनों में से उस व्याख्या को चुनते हैं जिसमंे उन्हें तत्समय लाभ नजर आता है। जब मध्यप्रदेश के स्कूलों में सूर्य नमस्कार, योग की शिक्षा और गीता की पढ़ाई अनिवार्य की गई, तब भाजपा राज्य सरकार ने यह दावा किया कि गीता, धार्मिक ग्रंथ नही है। वह इसलिए क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 28 कहता है कि राज्य के अंशतः या पूर्णतः  अनुदान से संचालित स्कूलों में कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं पढ़ाया जा सकता। इसके विपरीत, जब जून 2011 में भगवत गीता के रूसी भाषा के संस्करण को प्रतिबंधित करने के लिए रूस की एक अदालत में इस आधार पर याचिका प्रस्तुत की गई कि गीता धार्मिक अतिवाद को बढ़ावा देती है, तब भाजपा ने रूस के राष्ट्रपति को गीता की एक प्रति भेजते हुए लिखा कि गीता आध्यात्मिकता को बढ़ावा देती है। इस मामले में संसद में दिए गए अपने वक्तव्य में विदेशी मामलों के मंत्री एस. एम. कृष्णा ने गीता को ‘धार्मिक ग्रंथ‘ बताया था। मध्यप्रदेश सरकार तो वरिष्ठ नागरिकों की तीर्थयात्राओं का खर्च भी उठाती है परंतु केवल हिन्दू तीर्थस्थलों की। बाद में, धर्मनिरपेक्षतावादियों के दबाव के चलते, अजमेर शरीफ को इस सूची में जोड़ा गया।
    मनोहर जोशी मामले में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के बीच अंतर न कर सका। वह दोनों के बीच भ्रमित हो गया और यह कह बैठा कि हिन्दुत्व भी एक
    जीवनपद्धति है। तथ्य यह है कि हिन्दुत्व एक राजनैतिक विचारधारा है, जो हिन्दू समुदाय को सावरकर व गोलवलकर के विचारों के अनुरूप, एक अलग नस्ल मानती है। राष्ट्र व नस्ल की विभाजक रेखाएं खींचकर, हिन्दुत्व ने मुसलमानों और ईसाईयांे को हिन्दू राष्ट्र का शत्रु घोषित कर दिया है। सावरकर तक हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म में अंतर करते थे परंतु दुर्भाग्यवश उच्चतम न्यायालय यह नहीं कर सका। हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म को एक बताने के पीछे उच्चतम न्यायालय ने तार्किक कारण तो छोडि़ए, कोई भी कारण नहीं बताया। सावरकर ने हिन्दू धर्म नहीं बल्कि हिन्दू नस्ल को श्रेष्ठ बताया था। सावरकर ने लिख था, ‘‘हिन्दू भारतीय राज्य के नागरिक मात्र नहीं हैं। वे मातृभूमि के प्रति प्रेम के धागे से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं। अपने वैदिक पूर्वजों से अवतीर्ण शक्तिशाली नस्ल के सदस्य बतौर वे खून के रिश्तों से भी बंधे हुए हैं।‘‘ परंतु सावरकर एक मातृभूमि-एक नस्ल की अवधारणा पर रूके नहीं। उनके लिए हिन्दू केवल वह व्यक्ति था जिसे भारतीय सभ्यता विरासत में प्राप्त हुई हो। और भारतीय सभ्यता क्या है? सावरकर के अनुसार उसमें शामिल हैं ‘‘एक इतिहास, एक साहित्य, एक से नायक, एक कला, एक कानून, एक विधिशास्त्र, एक से मेले और त्यौहार, एक से कर्मकाण्ड और संस्कार, एक से समारोह और धार्मिक कृत्य।‘‘ इस तरह, सावरकर हिन्दुओं को उनकी सांझा सांस्कृतिक विरासत के आधार पर भी परिभाषित करते हैं। सावरकर के अनुसार हिन्दू ‘‘वह व्यक्ति है जो सिन्धु से लेकर समुद्रों तक फैले भारतवर्ष को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनों मानता है।‘‘ हिन्दू कहलाने के लिए भारतवर्ष को पितृभूमि और मातृभूमि दोनों मानने की अनिवार्यता के जरिए, सावरकर ने हिन्दुओं की एक अलग राजनैतिक श्रेणी का निर्माण किया। इस श्रेणी में गैर-हिन्दुओं, विशेषकर मुसलमानों और ईसाईयों के लिए, कोई स्थान न था। यह इस तथ्य के बावजूद कि मुसलमानों और ईसाईयों की भी यही मातृभूमि है और उन्होंने भी हमारी सांझा संस्कृति-भाषा, कानून, परंपराएं, लोककलाएं और इतिहास-विरासत में पाए हैं, वे हिन्दू नहीं हैं और ना ही हिन्दू माने जा सकते हैं।
    इस मायने में आयकर अपीलीय प्राधिकरण का आदेश एक दुधारी तलवार है और हिन्दुत्व की विचारधारा की जड़ों पर प्रहार करती है। हिन्दुत्व का दावा है कि हिन्दू केवल एक सामाजिक नहीं बल्कि एक राजनैतिक समुदाय हैं। यद्यपि हिन्दू धर्म में आस्थाओं की चकरा देने वाली विविधता है तथापि हिन्दुत्व उन्हीं धर्मों की नकल करना चाहता है, जिनका वह विरोधी है। हिन्दुत्व, हिन्दुओं के विचारों को एकसार करना चाहता है। वह हिन्दुओं का सैन्यीकरण करने का इच्छुक है। हिन्दुत्ववादी, हिन्दुओं को ऐसे राजनैतिक ढ़ांचे में ढालना चाहते हैं जिसके शीर्ष पर होगी एक उदार सत्ता, जिसके समक्ष सारे सदस्यों को सिर झुकाना होगा। जो लोग ऐसा नहीं करेंगे उनपर समुचित बल प्रयोग किया जाएगा और उनके लिए उचित सजा की व्यवस्था होगी। अधिकरण का आदेश, हिन्दुत्व के इन इरादों को इस अर्थ में पलीता लगाता है कि वह कहता है कि हिन्दू तो एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय भी नहीं हैं।
    भेदभाव
    हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व की  अलग-अलग और कदाचित विरोधाभासी न्यायिक परिभाषाओं का कारण यह है कि वे हिन्दू धर्म की सांस्कृतिक और कर्मकाण्डीय विविधता को देखते हैं उसके सिद्धांतो को नहीं। इसके विपरीत, जब इस्लाम या ईसाई धर्म के बारे में कोई न्यायिक समीक्षा होती है तो सिद्धांतों और ग्रंथों पर अधिक जोर होता है व इस पर कम कि इन धर्मांे के मानने वालोें की जीवनपद्धति कैसी है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म विविधतापूर्ण प्रतीत होता है व इस्लाम और ईसाई धर्म, सिद्धांतों से बंधे हुए और संकीर्ण जान पड़ते हैं। इस्लाम और ईसाई धर्म की भी कई अलग-अलग व्याख्याएं हैं और जहां तक ईसाईयों और मुसलमानों के दैनिक जीवन का प्रश्न है, उसमें उतनी ही विविधिताएं हैं जितनी कि हिन्दू धर्म में। जैसे लक्षद्वीप के मुसलमान और मेघालय के ईसाईयों में मातृसत्तात्मक परिवार होते हैं। भारत में हिन्दुओं, ईसाईयों और मुसलमानों के बीच कई धार्मिक व सांस्कृतिक समानताएं हैं। अगर शिव, हनुमान और दुर्गा ब्रम्हांड की महाशक्तियां हैं तो कुरान भी अल्लाह को रब-उल-अलामीन (पूरे ब्रम्हांड का ईश्वर ) बताती है न कि रब-उल-मुसलमीन (मुसलमानों के ईश्वर )। कुरान में अल्लाह के जो कई नाम दिए गए हैं उनमें से एक है ‘‘जब्बार‘‘ अर्थात ईश्वर शक्तिशाली है। इस तरह, अल्लाह भी ब्रम्हांड की महाशक्ति है। ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर अजर-अमर है, उसने ही सृष्टि का निर्माण किया है और वही उसे संचालित कर रहा है। अधिकरण के अनुसार, चर्च और मस्जिदें, मंदिरों की तुलना में, सबके लिए अधिक खुले हुए हैं। जहां अधिकांश मंदिरों में दलितों को प्रवेेश नहीं दिया जाता वहीं मस्जिदों, चर्चाें और सूफी दरगाहों में किसी के प्रवेश पर प्रतिबंध नहीं होता। वहां सभी का स्वागत है। परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि इस्लाम और ईसाईयत को हमेशा धर्म ही माना जाएगा और मुसलमानों और ईसाईयों को धार्मिक समुदाय। 
    19वीं सदी में धर्म के नए अर्थ
    19वीं सदी के भारत में धर्म ने नए अर्थ ग्रहण किए। हिन्दू शब्द का प्रयोग मूलतः भौगोलिक अर्थ में होता था। इसका अर्थ था सिन्धु नदी के दक्षिण-पूर्व की भूमि पर रहने वाले लोग। सिन्धु को हिन्दू कहा जाने लगा। हिन्दू धर्म मानने वाले लोग अलग-अलग परंपराओं और धार्मिक प्रथाओं का पालन करते थे जिन्हें उन्होंने इतिहास के विभिन्न दौरों से ग्रहण किया था। परंतु हिन्दू धर्म में जातिगत ऊँचनीच के मामले में कोई विविधता नहीं थी।  ऊँचनीच हिन्दू समुदाय का एक आवश्यक लक्षण थी। लोगों को उनके पारंपरिक काम-धंधे अपनाने पर मजबूर किया जाता था और समुदाय के एक बड़े हिस्से को कई अधिकार प्राप्त नहीं थे। धार्मिक शुद्धता और धार्मिक प्रदूषण के सिद्धांतों का अविष्कार ही इसलिए किया गया ताकि कुछ लोगों के अपवर्जन को औचित्यपूर्ण सिद्ध किया जा सके। जिन समुदायों को अलग-थलग रखा जाता था वे अपनी अलग धार्मिक परंपराएं और कर्मकाण्ड अपनाने के लिए स्वतंत्र रहते थे बशर्ते वे अपने पारंपरिक काम-धंधे ही करते रहें और अपनी सीमाओं का अतिक्रमण न करें। जहां विशेषाधिकार प्राप्त ऊँची जातियां अपना उच्च दर्जा कायम रखने के लिए अपनी परंपराओं की विशुद्धता को बनाए रखने में जुटी रहीं वहीं नीची जातियों ने अलग-अलग परंपराओं और इस्लाम व ईसाई धर्म सहित अन्य धर्मों से बहुत कुछ अपना लिया। इन लोगों को जातिगत ढ़ांचे को बनाए रखने में कोई रूचि नहीं थी। इससे एक ओर हिन्दू धर्म में विविधताएं आईं तो दूसरी ओर मिलीजुली परंपराएं उभरीं, जिनमें से कुछ का पालन एक से अधिक धार्मिक समुदाय करते थे। इन परंपराओं के अनुयायियों के बीच धर्म के आधार पर विभाजक रेखा खींचना संभव नहीं था।
    हमारे औपनिवेशिक शासकों ने यह जरूरी समझा कि वे अपनी प्रजा की संख्या गिनें और उनके धर्मों को नाम दें। इस प्रक्रिया में धार्मिक सीमाएं कठोर बन गईं। औपनिवेशिक राज्य ने धार्मिक पहचानों का निर्धारण किया। चूंकि अधिक संख्या का अर्थ था सत्ता पाने की अधिक संभावना, इसलिए उच्च जातियों के श्रेष्ठि वर्ग ने उन समुदायों का,े जिनकी धार्मिक वफादारी बहुत स्पष्ट नहीं थी,  अपने झंडे तले लाने के लिए शुद्धि और तबलीगी आंदोलन शुरू किए। शुद्धि आंदोलन का उद्धेश्य था इन समुदायों को संस्कृतनिष्ठ बनाना तो तबलीगी आंदोलन का लक्ष्य था ऐसे समुदायों का इस्लामीकरण। इस प्रक्रिया में धार्मिक विभाजक रेखाएं और कठोर और गहरी हुईं।
    इस यथार्थ और इतिहास को हमारी न्यायपालिका नजरअंदाज करती आई है और यही कारण है कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कई ऐतिहासिक निर्णय सुनाने वाली हमारी अदालतों ने हिन्दू  धर्म और हिन्दुत्व के मसलो पर ऐसे कई निर्णय दिए हैं जिनका लाभ हिन्दुत्ववादी शक्तियां अपने विचारों को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उठा रही हैं। हमें आशा है कि भविष्य में न्यायिक संस्थाएं इस मामले में अधिक सावधानी से काम करेंगी।
  2. -इरफान इंजीनियर
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