शुक्रवार, 26 जून 2015

महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी वारदात

वरिष्ट पत्रकार सुभाश गताडे से आतंकवाद के मुद्दे पर की गई बातचीत के अंश
                                                                                                    -राजीव यादव
 देश में आतंकवादी घटनाओं की शुरुआत कहाँ से मानते हैं?

    अगर आजाद भारत की बात करें तो मेरी समझ से महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी घटना है, और वहीं से कमसे कम भारत के सन्दर्भ में आतंकवाद की शुरूआत मानी जा सकती है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ भारत की अवाम के संघर्ष के नेता गांधी जिन्होंने साम्प्रदायिक राजनीति की निरन्तर मुखालिफत की एवं समावेशी राजनीति की हिमायत की, उनकी हत्या में नाथूराम गोड्से ने भले ही गोली चलाई हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके लिए लम्बी साजिश रची गई थी, जिसमें हिन्दुत्ववादी संगठनों का हाथ था। गांधी की हत्या को लेकर एक बात अक्सर भुला दी जाती है कि उन्हें मारने के लिए इसके पहले इन्हीं संगठनों की तरफ से कई कोशिशें हुई थीं, और इस आखरी कोशिश में वे कामयाब हुए।
     यह जो आतंकवाद है यह कितना देशी है और कितना वैश्विक है?
    मेरे खयाल से यह प्रश्न बहुत प्रासंगिक नहीं है। आतंकवाद के देशी रूप भी
हो सकते हैं और उसके वैश्विक रूप भी हो सकते हैं, मूल बात यह समझने की है कि आप उसे किस तरह परिभाषित करते हैं। यूँ तो आतंकवाद को कई ढंग से परिभाषित किया जा सकता है, राज्यसत्ता द्वारा निरपराधों पर किए जाने वाले जुल्म-अत्याचार को भी इसमें जोड़ा जाता है, मगर इसकी अधिक सर्वमान्य परिभाषा है जब राजनैतिक मकसद से कोई समूह, कोई गैर राज्यकारक अर्थात नानस्टेट एक्टर हिंसा या हिंसा के तथ्य fact of violence का इस्तेमाल करे और निरपराधों को निशाना बनाए। इसके तहत फिर हम साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित जैसे हिन्दुत्ववादी गिरोहों की हिंसक कार्रवाइयों को भी समेट सकते हैं या किसी जिहादी संगठन द्वारा निरपराधों को निशाना बना कर की गई कार्रवाई को भी देख सकते हैं या किसी जियनवादी गिरोह द्वारा फिलिस्तीनी बस्ती में मचाए कत्लेआम को भी देख सकते हैं या किसी ब्रेविक द्वारा अंजाम दिए गए मासूमों के कत्लेआम को भी समेट सकते हैं।
    मोदी के आने के बाद आतंकवाद की राजनीति और संस्थाबद्ध होगी या रुकेगी। रुक जाने का सन्दर्भ यह है कि क्या वह दूसरी राजनीति करेंगे?
    मोदी जो हिन्दुत्व की लहर पर सवार होकर प्रधानमंत्री बने हैं, उनके सत्तारोहण को हम बहुंसंख्यकवाद की राजनीति की जीत के तौर पर देख सकते हैं। यह भी स्पष्ट है कि आजादी के बाद पहली दफा हिन्दुत्व की ताकतों को अपने बलबूते सत्ता सँभालने का मौका मिला है, जिसे एक तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे की बढ़ती स्वीकार्यता के तौर पर व्याख्यायित किया जा रहा है। आजादी के बाद यह पहली दफा हुआ है कि संसद में अल्पसंख्यक समुदायांे का न्यूनतम प्रतिनिधित्व है, यहाँ तक कि सत्ताधारी पार्टी के सांसदों में भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से एक भी  प्रतिनिधि नहीं है। अब इस समूची परिस्थिति में जाहिर है कि ऐसी ताकतें-जो हिन्दुत्ववादी संगठनों से ताल्लुक रखती थीं, उस विचार से प्रेरित थी, मगर साथ ही साथ आतंकी घटनाओं में मुब्तिला थीं-उनकी रणनीति में फर्क अवश्य आएगा। एक तो वह कोशिश करेंगी कि उनके जो तमाम कार्यकर्ता जेल में बन्द हैं, उन्हें रिहा करवाया जाए, उनके खिलाफ जारी केस को कमजोर किया जाए और फिर उन्हें नए अधिक वैध एवं स्वीकार्य रूपों में पेश किया जाए। दूसरी यह भी सम्भावना है कि चूंकि राज्यसत्ता में उनके विचारों के हिमायती बैठे हों, वह और अधिक आक्रामक हों, आतंकी घटनाओं को खुद अंजाम दें मगर उसका दोषारोपण अल्पसंख्यक समुदायों पर अधिक निर्भीकता से करें। आप चाहें नांदेड़ में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा अंजाम दी गई आतंकी घटना (अप्रैल 2006) को देखें या मालेगांव की घटना (सितम्बर 2006 और सितम्बर 2008) को देखें हम बार-बार यही पाते हैं कि उनकी लगातार कोशिश रहती आई है कि खुद घटना को अंजाम दो, मगर उसे इस ढंग से डिजाइन करो कि अल्पसंख्यक पकड़ में आएँ। दूसरी तरफ इस्लामिक ताकतों का वह हिस्सा-जो आतंकी घटनाओं में मुब्तिला रहा है-वह नई बदली हुई परिस्थितियों में नए ध्रुवीकरण को अंजाम देने या मजबूती दिलाने के लिए कुछ आततायी कार्रवाइयों को अंजाम दे सकता है। हाल के समय में इस्लामिक स्टेट के नाम पर जो सरगर्मी बढ़ी है या अल कायदा की तरफ से भारत में अपना पैर जमाने की जो कोशिशें की जा रही
हैं, वह भी असर डालेंगी। कुल मिला कर आनेवाला समय ऐसे सभी लोगों, समूहों के लिए चुनौती भरा होगा जो हर किस्म के आतंकवाद-फिर चाहे राज्य आतंकवाद हो या गैर राज्यकारकों द्वारा अंजाम दिया जा रहा आतंकवाद हो (जिसका महत्वपूर्ण हिस्सा विशिष्ट धर्म से अपने आप को प्रेरित कहते हुए हिंसा को अंजाम देना होता है)-की मुखालिफत करते हैं और एक आपसी सद्भावपूर्ण समाज की रचना चाहते हैं।
    क्या कानूनों के सेलेक्टिव प्रयोग से इससे शिकार लोगों में राज्य के प्रति नफरत पैदा हो रही है?
    1950 में जब संविधान निर्माताओं ने देश की जनता को संविधान सौंपा तो यह संकल्प लिया गया था कि जाति, वर्ग, धर्म, नस्ल, जेण्डर आदि आधारों पर अब किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा, कानून के सामने सभी समान होंगे। आजादी के साठ साल से अधिक वक्त गुजर जाने के बाद हम इन संकल्पों एवं वास्तविकता के बीच गहरे अन्तराल से रूबरू हैं, जब हम पाते हैं कि दमित, शोषित, उत्पीडि़त समुदायों एवं लोगों पर महज इसी वजह से कहर बरपा हो रहा है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की बहाली के लिए प्रयासरत है और ऐसे लोग, तबके जो सत्ता एवं सम्पत्ति के इदारों पर कुंडली मार कर बैठे हैं, उनके प्रति राज्यसत्ता का रुख नरम है। जाहिर है कि इस दोहरे व्यवहार से जनता के व्यापक हिस्से में राज्य के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है।
    आतंकवाद की राजनीति के आर्थिक आधार क्या हैं? क्या यह वैश्विक आर्थिक मंदी से जुड़ा हुआ है?
    आतंकवाद को महज आर्थिक मंदी से जोड़ना नाकाफी होगा, वह इस वजह से भी इन दिनों बलवती जान पड़ता है क्योंकि परिवर्तनकामी ताकतें एवं आन्दोलन कमजोर पड़ रहे है। अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ के बिखराव की शुरूआत एवं अन्ततः उसके विघटन ने समाजवाद के विचार एवं प्रयोग को जो जबरदस्त क्षति पहुँचाई है और पूँजीवाद की अंतिम जीत को प्रचारित किया है, उसने भी दुनिया में तरह-तरह के नस्लवादी आन्दोलनों, आतंकी समूहों के फलने फूलने का रास्ता सुगम किया है। जरूरत इस बात की दिखती है कि जनता के हालात में आमूलचूल बदलाव चाहने वाली ताकतें नए सिरेसे संगठित हों, एक समतामूलक राजनीति को मजबूती प्रदान करें तो हम साथ ही साथ इन दिनों सर उठाए आतंकवाद को हाशिए पर जाता देख सकते हैं।
      सजा होने की सम्भावना आतंकवादी घटनाओं में बहुत कम है ऐसा लगता है कि न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीरे चलाई जा रही है ताकि आरोपियों को अधिक समय तक जेल में रखा जा सके। इस पर आप क्या सोचते हैं?
    अगर राज्यसत्ता इच्छाशक्ति का परिचय दे तो आतंकवादी घटनाओं में भी मुकदमे तेजी से चलाए जा सकते हैं और दोषियों को दंडित किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे मसलों पर राज्यसत्ता में बैठे लोग-या तो अपने एकांगी विचारों के चलते या ढुलमुल रवैयों के परिणाम स्वरूप सख्त रुख अपनाने से बचते हैं, जिसके चलते ऐसे मुकदमे सालों साल चलते हैं। अगर यौन अत्याचार के मसले को लेकर स्पीडी ट्रायल की बात की जा सकती है तो आतंकी घटनाआंे के मामले में भी हमें इसी किस्म की माँग करनी चाहिए, ताकि असली दोषी को सजा हो और मूलतः निरपराध जेल की यातना से बचें। आप अक्षरधाम आतंकी हमले को देखें जिसे लेकर बारह साल तक कइयों को जेल में सड़ना पड़ा और अन्ततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सभी बेदाग बरी हुए। अदालत का कहना था कि इन लोगों पर ‘आतंकवाद की धाराओं के तहत मुकदमा चलाने का निर्णय बिना दिमाग के लिया गया था। ध्यान रहे कि वर्तमान प्रधानमंत्राी उन दिनों गुजरात में गृह मंत्रालय का कार्यभार सँभाल रहे थे। अब अगर स्पीडी ट्रायल होता तो उनकी बेगुनाही जल्दी सामने आती और उन्हें तथा उनके परिवारजनों को इतना अधिक समय दुख में नहीं गुजारना पड़ता।
    खुफिया एजेंसियों की निष्पक्षता के बारे में बार-बार सवाल उठता रहा है, देश में आई.बी. और रॉ में अल्पसंख्यकों को जाने से रोका जा रहा है इसको कैसे देखा जाए। क्या इनको सही प्रतिनिधित्व मिल जाने से समस्याएँ हल हो जाएगी?
    देश की खुफिया एजेंसियों के कामों में निष्पक्षता को सुनिश्चित करना हो, उसमें अल्पसंख्यक समुदायों के आगमन को रोकने के मसले को सम्बोधित करना हो तो यह बहुत जरूरी है कि उसके कामों में पारदर्शिता लाई जाए और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। कुछ समय पहले पश्चिमी एशियाई मामलों के जानकार एवं वर्तमान उपराष्ट्रपति डाॅ. हामिद अन्सारी ने रिसर्च एण्ड एनलिसिस विंग अर्थात ‘रॉ’ द्वारा आयोजित आर एन कॉव स्मृति व्याख्यान में इसी मसले को उठाया था। डाॅ. अन्सारी का
कहना था कि गुप्तचर एजंेसियों के संचालन में अधिक निगरानी एवम् जवाबदेही की आवश्यकता है। उनके मुताबिक यह जनतांत्रिक समाजांे का तकाजा होता है कि बेहतर शासन के लिए वह ऐसी प्रक्रियाओं को संस्थागत करें जिसके अन्तर्गत गुप्तचर एजेंसियों को संसद के सामने जवाबदेह बनाया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि ‘‘राज्य के गुप्तचर और सुरक्षा ढाँचे’’ को लेकर अब तक सिर्फ कार्यपालिका और राजनैतिक देखरेख होती रही है, जिसमें इसके दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है। इनमें जवाबदेही के अभाव की चर्चा के सन्दर्भ में उन्होंने कारगिल प्रसंग का जिक्र किया जिसमें गुप्तचर एजेंसियों की बड़ी नाकामी सामने आई थी। ध्यान रहे कि आधिकारिक तौर पर कारगिल पर पाकिस्तानी आक्रमण की खबर पहली दफा गुप्तचर एजेंसियों की तरफ से नहीं बल्कि उस इलाके मंे अपने मवेशी चराने के लिए ले जाने वाले गड़रियों से हुई थी। देश की सुरक्षा को जोखिम में डालने वाली इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद किसी भी गुप्तचर  अधिकारी को दण्डित नहीं किया गया था और विभिन्न एजेंसियों ने एक दूसरे पर दोषारोपण करके मामले की इतिश्री कर दी थी।
    हिंदुत्व से उपजे आतंकवाद की सच्चाई क्या है?
    जैसा कि मैं पहले ही चर्चा कर चुका हूँ कि आजाद भारत की पहली आतंकी कार्रवाई को हिन्दुत्ववादी आतंकी गोड्से एवं उसके गिरोह ने अंजाम दिया था यह धारा भले ही मद्धिम हुई हो, लेकिन दबी नहीं है। इस तथ्य से भी बहुत कम लोग वाकि़फ है कि बँटवारे के वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो कार्यकर्ता बम बनाते वक्त कराँची के अपने मकान में मारे गए थे और ट्यूशन पढ़ाने के लिए लिए गए उपरोक्त मकान में विस्फोटकों का जखीरा बरामद हुआ था। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में बने जीवनलाल कपूर कमीशन ने गांधी हत्या की साजिश के लिए प्रत्यक्ष सावरकर को जिम्मेदार ठहराया था। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने आप को ‘चरित्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध कहलाने वाले’ हिन्दुत्ववादी संगठन भी वक्त पड़ने पर आतंकवाद का सहारा लेते रहे हैं। 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में हम पाते हैं कि इसे नए सिरेसे उभारा जा रहा है और अधिक स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए उसे ‘इस्लामिस्ट आतंकवाद’ की प्रतिक्रिया के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। दूसरी अहम बात यह है कि हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व समानार्थी नहीं है (अधिक स्पष्टीकरण के लिए सावरकर की बहुचर्चित किताब ‘हिन्दुत्व’ को देखा जा सकता है), जिस तरह इस्लाम और राजनैतिक इस्लाम को समानार्थी नहीं कहा जा सकता, वही हाल हिन्दुइज्म अर्थात हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व का है। यह फर्क स्पष्ट करना इसलिए जरूरी है क्योंकि जबभी हिन्दु आतंकवादी गिरफ्तार होते हैं या उसकी चर्चा होती है, संघ परिवारी संगठनों की तरफ से हल्ला किया जाता है कि आप धर्मविशेष को बदनाम कर रहे हैं। यह सर्वथा गलत है। इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई की तमाम घटनाएँ इस बात को प्रमाणित करती हंै कि हिन्दुत्व आतंकवाद एक परिघटना है, जो भारत के सेक्युलर एवं जनतांत्रिक स्वरूप के लिए जबरदस्त खतरा बन कर उपस्थित है। जाहिर है कि जो बात अक्सर प्रचारित की जाती है कि हिन्दू आतंकी नहीं हो सकता, यह बात तथ्यों से परे है। जिस तरह हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग होते हैं, वही हाल आतंकवाद से प्रभावित होने को लेकर भी देख सकते हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि देश का कानून सभी के लिए समान हो, किसी आतंकी को इसलिए नहीं बक्शा जाए कि वह विशिष्ट समुदाय से है, किसी आतंकी गिरोह के सरगनाओं, मास्टरमाइंडों को इसलिए न बचाया जाए कि वह बहुसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। अपराध सिर्फ अपराध होता है, उसके किसी खास समुदाय द्वारा अंजाम देने से उसकी तीव्रता कम नहीं होती है।
 मो0-09452800752
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

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