मंगलवार, 26 मार्च 2013

पाकिस्तान में जातीय हिंसा




दक्षिण एशिया एक लंबे समय से जातीय हिंसा के दौर से गुजर रहा है। पिछले तीन दशकों, व विशेषकर पिछले दशक में, इस हिंसा की भयावहता में वृद्धि हुई है और इसने और बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले लिया है। लाहौर के बादामी बाग इलाके में स्थित जोजफ़ कालोनी के ईसाई रहवासियों को हाल ;मार्च 2013 में इसी तरह की हिंसा का सामना करना पड़ा। यह घटना अत्यंत दुःखद व निंदनीय है। हमलावरों ने गरीब ईसाईयों के 178 घर जला दिए। उनकी दुकानों और तीन चर्चों में लूटपाट के बाद आग लगा दी गई। स्थानीय पास्टर पर भी हमला हुआ। सवन मसीह, जिस पर ईशनिंदा का झूठा आरोप लगाया गया था,  के पिता की पहले तो जमकर पिटाई की गई और बाद में उसे गिरफ्तार कर लिया गया।
पाकिस्तान में कुछ मुस्लिम और गैर.मुस्लिम पंथों को लंबे समय से धार्मिक आधार पर प्रताड़ित किया जाता रहा है। जो मुस्लिम पंथ हिंसा के शिकार होते रहे हैं, उनमें शामिल हैं शिया व अहमदिया। अहमदियाओं को तो संसद के एक अधिनियम द्वारा गैर.मुस्लिम घोषित कर दिया गया है। पाकिस्तान में शिया, सूफी, बरेलवी, अहमदिया, ईसाई, सिक्ख और हिन्दू उन धार्मिक समुदायों में शामिल हैं जो पाकिस्तान की साम्प्रदायिक ताकतों के निशाने पर हैं। जिस समय पाकिस्तान का निर्माण हुआ था, वहां की आबादी में अल्पसंख्यकों का प्रतिशत 23 से अधिक था। शनैः.शनैः इसमें गिरावट आती गई। इस साम्प्रदायिक हिंसा की बुनियाद मे है यह सामूहिक सामाजिक सोच की पाकिस्तान एक इस्लामिक राज्य है। गैर.मुस्लिम अल्पसंख्यक व कुछ इस्लामिक पंथ हिंसा का शिकार बनते आए हैं। जिया.उल.हक के शासनकाल में तो स्थिति और भी बदतर थी। उस समय खाकी और दाढ़ी.टोपी का संयुक्त गठबंधन था, जिससे इन दोनों ही समूहों की ताकत में जबरदस्त बढ़ोत्तरी हुई थी।
सन् 1980 के दशक में जिस अन्य कारक ने बांटने वाली विचारधाराओं और शक्तियों को प्रोत्साहित किया वह था अमेरिका द्वारा पाकिस्तान में स्थापित किए गए मदरसे। इन मदरसों की स्थापना के पीछे अमेरिका का  उद्धेश्य तेल के संसाधनों पर कब्जा करना और अफगानिस्तान में सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने के लिए जुनूनी लड़ाकों की फौज तैयार करना था। अमेरिका व सऊदी अरब के द्वारा उपलब्ध कराए गए धन से स्थापित इन मदरसों ने इस्लाम के सलाफी व वहाबी संस्करणों को मजबूत किया। इसके बाद से ही गैर.मुसलमानों के अलावा शियाओ और अहमदियाओं पर भी हमले होने लगे। अहमदियाओं की तो पाकिस्तान में खासी आबादी है।
इस्लामिक अल्पसंख्यकों पर हमले के पीछे भी सीमा पार से मिलने वाली मदद है। जहां सुन्नी गुटों को सऊदी अरब से मदद मिल रही है वहीं शियाओं को ईरान का समर्थन प्राप्त है। ईसाई और हिन्दू तो फिरकापरस्त ताकतों के लिए आसान निशाने हैं। धीरे.धीरे, सामाजिक स्तर से शुरू हुए इस संघर्ष से अलकायदा जैसे आतंकी संगठन भी जुड़ गए।
पाकिस्तान में रहने वाले ईसाईयों में बड़ी संख्या सफाईकर्मियों की है। उन्हें नीची निगाहों से देखा जाता है। उनके खिलाफ हिंसा का एक उद्धेश्य उन्हें उनकी जमीनों से बेदखल करना भी है। यह एक अत्यंत निरीह सामाजिक समूह है, जिसे अनेक तरह से प्रताड़ित किया जा रहा है। ईशनिंदा कानून, साम्प्रदायिक ताकतों के हाथों में एक बड़ा हथियार बन गया है। हम सबको आसिया बीबी का मामला याद है, जिन्हें पैगम्बर मोहम्मद के खिलाफ तथाकथित अपमानजनक बातें कहने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई है। वे इस समय जेल में हैं और उनकी अपील पंजाब उच्च न्यायालय में लंबित है। पंजाब के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर ने जब पाकिस्तान के ईशनिंदा कानूनों में संशोधन करने की बात कही तो उन्हें उनके सुरक्षा दस्ते के ही एक सदस्य ने जान से मार डाला।
प्रत्येक जातीय व साम्प्रदायिक समूह, अल्पसंख्यकों पर हमला करने के लिए बहाने ढूंढ़ लेता है और कारण गढ़ लेता है। आसिया बीबी ने एक कुएं से पानी निकाल लिया था और मुसलमानों की एक भीड़ ने उनपर कुएं को दूषित करने का आरोप लगाया। यह कहा गया कि वे एक नीची जाति की ईसाई हैं। इसके बाद जो तर्क.वितर्क हुए उनका अंत आसिया बीबी को मौत की सजा सुनाए जाने से हुआ। इसी तरहए अगस्त 2012 में 14 साल के मानसिक रूप से विक्षिप्त रिम्साह मसीह को कुरान के पृष्ठ जलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।
सबसे ताजा घटना में मस्जिद से बाहर निकल रहे मुसलमानों ने कई ईसाईयों के मकानों में तोड़फोड़ की और उनमें आग लगा दी। कारण यह बताया गया कि एक ईसाई व्यक्ति ने एक मुसलमान के साथ बहस के दौरान ईशनिंदा का अपराध किया था। तथाकथित रूप से एक व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध की सजा पूरे समुदाय को दी गई। भीड़ ने बिना किसी तर्क.वितर्क या विचार के एक व्यक्ति को दोषी ठहरा दिया और उसके समुदाय के सैकड़ों लोगों पर हल्ला बोल दिया।
बहाने चाहे कितने ही अलग.अलग क्यों न हों, घटनाक्रम में समानताएं सच जाहिर कर देती हैं। जिया सरकार के समय से ही मुस्लिम साम्प्रदायिक संगठनों की ताकत बढ़ती जा रही है। उनके दुःसाहस का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि वे ना केवल हिंसा करते हैं वरन् गर्व से उसका ब्यौरा भी देते हैं। इससे यह भी साफ है कि शासनतंत्र में उनकी कितनी घुसपैठ है और उन्हें किस हद तक समाज की स्वीकार्यता भी प्राप्त है।
दक्षिण एशिया के तीनों बड़े देशों में साम्प्रदायिक तत्वों की शक्ति में समानांतर वृद्धि हुई है। भारत में हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने वातावरण में नफरत का जहर घोला और ईसाईयों व मुसलमानों को निशाना बनाया। बीच में सिक्खों को भी गंभीर हिंसा का सामना करना पड़ा। पिछले कुछ दशकों के दौरान दलित विरोधी हिंसा में हुई वृद्धि को भी मुस्लिम व ईसाई विरोधी हिंसा से जोड़कर देखा जाना चाहिए। सन् 1980 के दशक में भारत में अल्पसंख्यक विरोधी हिंसा में तेजी आई। बांग्लादेश और पाकिस्तान में गैर.मुसलमानों के अलावा, मुसलमानों के कुछ पंथ भी निशाने पर हैं। पाकिस्तान में तो ऐसा लगता है कि मुसलमानों के अल्पसंख्यक पंथ और ईसाई व हिन्दू एक ही नाव पर सवार हैं।
यह महत्वपूर्ण है कि हाल में पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हुए हमलों की वहां के धर्मनिरपेक्ष संगठनों ने कड़े शब्दों में निंदा की है। इससे भारत में फैले या जानबूझकर फैलाए गए इस मिथक को तोड़ने में मदद मिलेगी कि सभी मुसलमान, हिन्दू.विरोधी होते हैं और हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा को जायज मानते हैं। लाहौर में ईसाईयों पर हुए भयावह हमले की फोरम फार सेक्युलर पाकिस्तान ने कठोर निंदा की है और यह इच्छा व्यक्त की है कि पाकिस्तान एक धर्मनिरपेक्ष राज्य बने और वहां धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को संविधान व कानून में उचित स्थान मिले। लाहौर में हुई ईसाई विरोधी हिंसा के प्रति अपनी वितृष्णा व्यक्त करने के लिए दिल्ली में जामिया मिलिया इस्लामिया के छात्रों ने एक विशाल मोमबत्ती जुलूस निकाला। और खुदाई खिदमतगारों ने इसकी निंदा करते हुए वक्तव्य जारी किए। कई अन्य संगठनों ने भी इस उन्मादी हिंसा की निंदा की है।
भारत में धर्मनिरपेक्ष संगठन जब भी अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा की निंदा करते हैं तो उनसे अक्सर यह पूछा जाता है कि वे केवल एक प्रकार की साम्प्रदायिकता के खिलाफ क्यों हैं। भारतीय धर्मनिरपेक्ष संगठनों ने पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हो रही हिंसा की कड़े शब्दों में निंदा कर इस प्रश्न का समुचित उत्तर दे दिया है। जो धर्मनिरपेक्ष समूह और टिप्पणीकार हिंसा के खिलाफ आवाज उठाते हैंए उन्हें एकतरफा व एक धर्मविशेष का विरोधी बता दिया जाता है। यह साफ है कि धर्मनिरपेक्ष संगठन हर अल्पसंख्यक समूह को प्रताड़ित किए जाने के विरोधी हैंए चाहे उस समूह का धर्म कोई भी क्यों न हो। कुल मिलाकर, ऐसा लगता है कि हम इतिहास के एक काले दौर से गुजर रहे हैं। हर ऐसा समूह जो कमजोर है, गरीब है या अल्पसंख्या में है, प्रभुत्वशाली समूहों व ताकतों की हिंसा का शिकार बन रहा है।
 -राम पुनियानी

कोई टिप्पणी नहीं: