रविवार, 14 अप्रैल 2013

धर्मांध राष्ट्रवाद के बसंत उत्सव

मुक्त बाजार की विकासगाथा जमीनी हकीकत न होकर कारपोरेट अर्थशास्त्रियों की आंकड़ा कलाबाजी है। इस बार विकीलिक्स ने वाशिंगटन ​​के जो केबिल लीक किये, उससे साफ जाहिर है कि कैसे सत्तर के दशक से खुल्ला खेल फर्रऊखाबादी चल रहा है। ललितनारायण मिश्र की हत्या का मामला इस खुलासे में शामिल है। भारतीय वर्चस्ववादी मनुस्मृति राजनीति और अर्थ व्यवस्था विकास गाथा नहीं, हत्या, साजिश और भ्रष्टाचार की हरिकथा अनंत है।इस कांड के खुलासे के सात साथ हमें अब डा. अंबेडकर की रहस्यमय मृत्यु के रहस्योद्गाटन के लिे भी शायद असांज की ओर देखना पड़ेगा। क्योंकि भारत के सत्तावर्ग ने इस मामले को सिरे से खारिज कर दिया। अंबेडकर जयंती पर विकीलिक्स के नये खुलासे के मद्देनजर हत्या साजिश और भ्रष्टाचार की निरंतरता के परिप्रेश्क्ष्य में इस मुद्दे पर बहुजन समाज को अवश्य चिंतन करना चाहिए। हिंदू साम्राज्यवाद को खुल्ला अमेरिकी कारपोरेट साम्राज्यवादी जायनवादी समर्थन के बाद तो देश के अंबेडकरवादियों गैर अंबेडकरवादियों, वामपंथियों, क्रांतिकारियों और लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देशभक्त ताकतों को इस सिलसिले पर हिंदुत्व आंदोलन और कारपोरेट मुक्त बाजार के अंतर्संबंध पर नये सिरे से सोचना चाहिए। मजे की बात है कि ये केबल असांज ने हमेशा की तरह लीक हीं किये। ये अमेरिकी प्रशासन के अधिकृत वैबसाइट की वर्गीकृत जानकारी भंडार से वैध तरीके से लिये गये हैं।जिसमें कांग्रेस के वंशीय राजकाज का पर्दाफाश करते हुए राज परिवार की छवि ध्वस्त की गयी है और युवराज की ताजपोशी के रास्ते में कांटे बिछाये गये है। इन दस्तावेजों के विश्लेषण से पता चलता है कि कैसे भारत मुक्तबाजार बना और भारतीय जनता के कत्लेआम के जरिये अमेरिकी उपनिवेश भी। इन दस्तावेजों से अमेरिका की भारत नीति में परिवर्तन के साफ संकेत हैं, जो पहले ही नरेंद्र मोदी को अमेरिकी वीसा के लिए हरी झंडी से साफ है। जाहिर है कि अमेरिकापरस्त असंवैधानिक कारपोरेट एजंटों को हटाकर भारतीय अर्थव्यवस्था राजनेताओं के हवाले करने के लिए अमेरिका कतई तैयार नहीं है। मनमोहन हटे तो अमेरिकी शिकंजा ढीला पड़ना तय है। इसलिए राहुल की दावेदारी इसतरह हवा में उड़ाने का चाकचौबंद इंतजाम किया गया है। भारत में हिंदुत्व के पुनरुत्थान की कथा जेपी आंदोलन और आपातकाल से शुरु है, जिसके जरिये भारतीय संविधान, लोकतंत्र, संप्रभुता और लोककल्याणकारी गणराज्य की एकमुश्त तिलांजलि दे दी गयी और भारत को कारपोरेट वध स्थल में तब्दील कर दिया गया। अब आर्थिक सुधारों के लिए कांग्रेसी नरम हिंदुत्व अमेरिकी हितों के कतई अनुकूल नहीं है। अमेरिका दुनियाभर में उग्रतम धर्मांध राष्ट्रवाद का कोरोबार चलाता है, क्यों उसके नीति निर्धारक जायनवादी आका युद्ध और गृहयुद्ध के कारोबार में हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में बढ़ते धर्मांध राष्ट्रवाद के    बसंत उत्सव का तात्पर्य भी कुल जमा यही है। जहां जनता के सारे हक हकूक छिने जाने हैं। जनता को कोई राहत नहीं मिलनी है। हर दलील, हर आंकड़ा, हर तथ्य और सूचना सिर्फ पूंजी के अबाध प्रवाह और कालेधन  की अर्थ व्यवस्था के लिए है।
-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास​

कोई टिप्पणी नहीं: