बुधवार, 3 जुलाई 2013

वाजिद अली शाह

    वाजिद अली शाह को इस बात का अहसास ही नही था कि वह एक दिन अवध के बादशाह बनेंगे। वाजिद अली शाह की पैदाईश 30 जुलाई 1821 ई0 की है। वह नवाब
मुक़र्रर जो था वक़्त वो आ गया
पकड़ कर सरे तक पहुँचाया गया
बना मेरे जे़रे क़लम सब अवध
हुआ क़ब्जा मुल्क में अब अवध
ख़ुदा ने मेरे सर पे रखा ये बार
मगर देखिए उसका अंजाम कार
(हैबत हैदरी)

    वली अहद के ज़माने में वाजिद अली शाह हर रोज़ सुबह तीन घंटे अवाम की दरख़्वास्त सुनते थे। लोगों से शहर और मुल्क के हालात की जानकारी हासिल करके और रोज़मर्रा काम में आने वाली चीज़ों की क़ीमत पर क़ाबू रखने का हुक्म देते थे।
    नवाब अमजद अली का इंतेक़ाल 12 फरवरी 1847 में हुआ। वाजिद अली शाह की ताजपोषी 13 फ़रवरी 1847 में हुई। अब्दुल मन्सूर, सिकन्दर झा, बादशाह आदिल, क़ैसरजमाँ, सुल्ताने आलम, मोहम्मद वाजिद अली शाह का खि़ताब अखि़्तयार  किया।
    वाजिद अली शाह को जो सरकार विरासत में मिली उसकी हालत बेहद अफ़सोस जनक थी। जागीरदारों की ताकत बढ़ गई थी, काष्तकारों से ज़ोर जबरदस्ती से लगान वसूल करते और शाही ख़जाने में मनचाहे तरीक़े से पेष करते। फ़ौज के हालात इतने ख़राब थे कि वह कभी काम की ही ना थी, हैनरी लोरेन्स ने लिखा है कि ‘‘वह सिर्फ़ दुष्मन के काम आने वाली थी, सरकार और अवाम के बेहतरी के खि़लाफ जंग के लिए नाकारा और हालाते अमन में बदमाषी से भरपूर।‘‘ 
    1857 में डाॅ. बटलर ने एक रिपोर्ट में लिखा था कि अवध की फ़ौज की तन्ख़्वाह बेहद कम, कोई छावनी नहीं, कभी परेड नहीं होती, किसी भी तरह की तक़नीक नहीं सिखाई जाती, कोई फ़ौजी तरबीयत नहीं। सबसे पहले वाजिद अली शाह ने फ़ौज को सुधारने का काम हाथ में लिया। वे चाहते थे कि अवध-फौज की टेªनिंग ठीक वैसे ही हो जैसे ब्रिटिशफ़ौज की होती थी। सबसे पहले उन्होंने भर्ती में जो धाँधली होती थी उस पर रोक लगाई। भर्ती का सारा काम उन्हीं की देखरेख में होता था। रोज सुबह 4 बजे जनरल की वर्दी पहनकर परेड में जाते। यह हुक्म दिया कि जो भी देर से आएगा हर्जाने के तौर पर उसकी तन्ख़्वाह से पैसे काटे जाएँगे। ख़ुद के लिए हुक्म दिया कि किसी भी दिन वे देर से आएँ तो 2000/- रूपये का जुर्माना उन पर किया जाए और रक़म फ़ौज में बाँट दी जाए।
    अंग्रेज़ी तौर तरीक़े की नक़ल नहीं करते हुए उन्होंने फ़ौज के हुक्म फारसी और उर्दू ज़ुबाँ पर रखे। जैसे सुल्तानी, ग़ाज़ी, मन्सूरी, गज़नफ़ी, दख्खनी, बाँका, तिरछा, हुसैनी, घनघोर वग़ैरह, ख़ुद परेड ग्राउण्ड पर तीन-चार घंटे रहते। उन्होंने 400 सवारों की भर्ती भी की। अंग्रेज़ी हुकूमत को वाजिद अली शाह की फ़ौज में दिलचस्पी नाग़वार गुज़री। लाॅर्ड हार्डिंग ने वाजिद अली शाह को लिखा कि जो काम वे कर रहे थे, वो अहदनामें 1801 के खि़लाफ है। 400 सवारो की भर्ती को लेकर अवध के रेज़ीडेन्ट ने उन्हें पत्र लिखा और हिदायत दी कि ये सही नहीं हैं। अगर उन्हें किसी भी तरह का ख़तरा महसूस हो तो ब्रिटिश फ़ौज की मदद ले सकते है। वाजिद अली शाह नहीं चाहते थे कि ब्रिटिश सरकार से रिष्ते बिगड़ें, उन्होंने फ़ौज में भर्ती वगैरह का काम बंद कर दिया।
         अमजद अली के जमाने में अमीन-उद्-दौला वज़ीर थे। वाजिद अली शाह को वे नापसन्द थे। अमीन-उद्-दौला ने ब्रिटिश सरकार से यह कहा कि वे किसी और को वज़ीर बना दें। मगर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें बदलने का फैसला नहीं लिया क्योंकि वे ब्रिटिष सरकार के तरफ़दार थे। वाजिद अली ने उन्हें हटाकर अली-नक़ी-ख़ान को वज़ीर मुकर्रर किया।
     वाजिद अली का यह फ़ैसला ब्रिटिश सरकार को मंज़ूर नही था। रेज़ीडेन्ट ने ब्रिटिश सरकार को लिखा कि अमीनउद्दौला को हटाना ग़लत है। ख़त के ज़रिए यह भी बताया गया कि अहदनामें के मुताबिक़ वाजिद अली शाह को रेज़ीडेन्ट की बात माननी पडे़गी। वाजिद अली शाह ने इस बात की परवाह नहीं की और अली नक़ी ख़ान को 5 अगस्त 1847 को वज़ीर मुकर्रर किया। ये पहला मौक़ा था जब बादशाह और रेज़ीडेन्ट के बीच मनमुटाव पैदा हुआ।
    गवर्नर जनरल लाॅर्ड हार्डिंग जब 1847 में लखनऊ तशरीफ लाए तब उन्होंने वाजिद अली शाह को हिदायत दी कि सरकारी काम काज में तऱक्क़ी की जाए। उन्होंने राय दी कि ज़मीन की आमदनी के लिए अमानी सिस्टम लागू करना जरूरी है और जगह जगह पर गैर कानूनी हरकतों को रोकने के लिए पुलिस चैकियाँ बनानी चाहिए, साथ-साथ उन्होनंे यह भी कहा कि सरकारी बन्दोबस्त में सुधार किया गया तो अवाम को भी सहूलियत होगी, रियासत अवध और ब्रिटिश हुकूमत के बीच रिष्ता भी अच्छा होगा, वाजिद अली शाह नवाब बने ही रहेंगे। अगर नहीं किया गया तो वे जानते है कि उसका नतीजा क्या होगा।
    अवाम से सीधा रिष्ता कायम करने के लिए वाजिद अली शाह जब भी सवारी में बाहर जाते तो उनके साथ चांदी का सन्दूक जाता जिसमें हर शख्स अपनी दरख्वास्त और षिकायत डाल सकता था। इस सन्दूक़ का नाम था ‘‘मशगिला-ए-नौषेरवान‘‘ इसे एक आदमी अपने सिर पर रखकर सवारी के साथ चलता था। सन्दूक़ वाजिद अली शाह की नज़रों के सामने खोला जाता। हर दरख़्वास्त को ख़ुद पढ़ते और उस पर तामील का हुक्म देते। आवाम के दुःख की सुनवाई होती, बदमाष अफ़सरों को सज़ा होती। इस सन्दूक़ के बारे में हज्जो शरफ़ ने अपनी मसनवी में लिखा है कि -
वो चांदी का था एक सन्दूक़चा बन्द
अदालत का था शग़्ल हज़रत पसन्द
रहा करता था वो सवारी के साथ
पड़ा करती थीं अर्जियाँ हाथों हाथ
मुराद अपनी पाते थे सब नामुराद
मिला करती थी दादख़्वाहों को दाद
जहाँ में था यह अदल हज़रत का हाल
सताये कोई किसको क्या थी मजाल
सज़ा मुफ़सिद ज्यादा गुपाते थे
जो सरकष थे इबरत से थर्राते थे
(अफसाना-ए-लखनऊ)

    लाजि़म था कि जो बेईमान अफ़सर थे उन्हें यह बात नागवार गुज़री। उन्होंने यह काम शुरू किया कि रोज़ सन्दूक़ में गाली-गलौच, बेहूदा अष्लील बातें डाली जातीं। वाजिद अली शाह परेशान हो गए और एक निहायत अच्छा काम बन्द करना पड़ा।
    सरकारी काम काज मंे सुधार के लिए उन्होंने 25 महकमे क़ायम किए। खुद 9 बजे सुबह दफ़्तर में पहुँच जाते और तमाम महकमों के काम काज पर अपनी पैनी नज़र रखते थे।
1-दीवान-ए-ख़ास:- तमाम ज़्ाुबानी और लिखित फरमान इसी महकमें से जारी होते थे।
2-दीवान-ए-आम:- यह सूचना का महकमा था। तमाम ख़बरों को अवाम तक पहुँचाने के लिए अख़बारों में छपवाने का काम इस महकमे का था।
3-दफ़्तर-ख़ज़ाना-मसारिफ:- यह ख़ज़ाने का महक़मा था।
4-दफ़्तर बैत-उल-इन्षा या मुन्षी खाना सुल्तानी:- यह ख़ुफिया का काम करता था।
5-दफ़्तर वज़ारत:- यह वज़ीरे-आला का दफ़्तर था, तमाम महकमों के काम वज़ीरे आला की नज़र से गुज़रते थे। तमाम फरमान शाही मोहर से जारी करना और नियुक्ति भी इसी महकमें के तहत था।
6-सरीष्ता-ए-ढयोढियात:- जो भी वाक़्यात् शहर में, राजमहल में होते उनकी ख़बर रोज़ बादषाह को पहुँचाना इसका काम था।
7-सरीष्ता-ए-कोटगष्ती:- इस महकमे में कुछ लोगों को लगाया जाता था जो शहर में  घूम-घूम कर चारों तरफ़ जो भी वाक़्यात होते उनकी ख़बर तफ़सील से बादषाह के नज़र की जाती।
8-सरीष्ता-ए-रविन्द:-  इस महक़मे की जि़म्मेदारी थी कि कुछ हथियार बन्द और घुड़सवार शहर में गष्त देते ताकि़ कोई गै़रक़ानूनी हरकत ना हों।
9-सरीष्ता-ए-अख़बार-मुल्की:- इसकी जि़म्मेदारी थी कि रियासत अवध के हर जि़ले की ख़बर को इकट्ठा करना, इस काम के लिए क्लर्क, नाजि़म, और चकलादार और तहसीलदार, के साथ टूर पर रहते और वहाँ की ख़बर को बराबर लिखते। इसके बाद में छंटनी होती, तामील होती, अगर ज़रूरत होती तो केन्द में हुक्म के लिए ख़बरों को भेजा जाता।
10-सरीष्ता-ए-अख़बार दफ़्तर-ए बादषाही:- तमाम महकमों के रोज़ाना काम की रिपोर्ट बादशाह को पेश करना।
11-दफ़्तर-दीवानी:- यह महकमा रेवेन्यू सिविल कोर्ट था।
12-दफ़्तर बैतुल-इज़ारा:- ये दफ़्तर वेत-उल्-इन्षा का हिस्सा था। तमाम ख़तों की किताबत पहले यहाँ आके देखा जाता, फिर अलग-अलग महकमों में भेजा जाता।
13-दफ़्तर बाजीगिरी:- यह फ़ौज का बजी हुआ करता था, इसका काम था फ़ौज का बन्दोबस्त, तन्ख़्वाह और ख़र्च का ब्यौरा रखना। महकमे के अधिकारी का नाम बजी उल् मुल्क था।
14-महकमा शाह-ए-अमानत:- जम़ीनों के तमाम मुक़दमात् अमीन की देख-रेख में होते। 
15-महकमा-ए-अदालत-औलिया:- ज़मीनों और इमारतों का रजिस्टेªषन इस महकमें के ज़रिए होता।
16-महकमा कोतवाली:- शहर लखनऊ और बाक़ी शहर पुलिस कोतवाली की जि़म्मेदारी थी।
17-महकमा-ए-मुराफि़या:- महकमा अपील का था।
18-महकमा -ए-फ्रन्टियर पुलिस:- ब्रिटिश रेजीडेन्ट की राय से काम होता था, इसकी जि़म्मेदारी थी, ठगी और डकैती को बन्द करना।
19-महकमा तनकी-जुर्म-फौज़दारी मुल्क अवधी:- यह महकमा पहली बार वाजिद अली शाह ने बनाया।
20-महकमा-जदीद-मुकदमा-क़र्ज-क़र्ज को लेकर जो मुकदमें होते उनका फैसला करना।
21-बैतफुल ज़र्ब:- रूपये और मोहर इस महकमें के तहत् बनाए जाते।
22-सरीष्ता-ए-नज़्ाूल:-  तमाम जायदाद जो सरकार की थी उसका रिकार्ड यह महकमा रखता था।
23-सरीष्ता-ए-गंजियात वा परमिट:- उन तमाम चीजों के लिए परमिट बनाना।
24-सरीष्ता-ए-दुआब:- तोपखाना अस्तबल और गेैराज की देखभाल करना।
25-सरीष्ता-ए-आबकारी:- यह शराब का महकमा था, शराब का बनाना और उसे बेचना और तमाम ठेकों का काम देखना।
    जो हिदायत लाॅर्ड हाॅर्डिंग ने दी थी उसकी बख़ूबी तामील वाजिद अली शाह ने की। उन्होंने रियासत के कारोबार का इंतज़ाम किया। अमानी सिस्टम को लागू किया, जगह-जगह पर पुलिस चैकियाँ बनाईं, अवाम की हिफ़ाज़त का पूरा ध्यान रखते हुए क़ानून क़ायदे का सख़्त बन्दोबस्त किया। अवाम की ख़ुषहाली का हर तरह से ख़याल रखा गया। बेईमान शाही मुलाजि़मों को कड़ी सज़ा दी जाती। किसी भी तरह की जात-पात का भेद नहीं किया जाता था। चारो तरफ़ अवाम, ज़मीदार सब ख़ुषहाल थे। मगर किस्मत को यह मंज़ूर नहीं था। 1849 में अचानक वाजिद अली शाह सख़्त बीमार पडे़, दिल का दौरा पड़ा था, पूरे साल जि़न्दगी और मौत के बीच लड़ाई लड़ते रहे। सियासती तौर पर हालात इतने ख़तरनाक हो गए थे कि रेज़ीडेन्ट विलियम  सलीमन ने इलियट को जो उस वक़्त सेक्रेटरी आॅफ स्टेट थे, उन्हे कई ख़त लिखें और वाजिद अली शाह की बीमारी का हाल बताया। उन्हंे यह बताया कि अगर वाजिद अली शाह का इंतेक़ाल हो जाता है तो फ़ौरन वली अहद को तख़्त पर बैठाना निहायत जरूरी है। क्योंकि इस बात की पूरी गुंजाइश है कि गद्दी के लिए झगड़ा हो।
          उधर महलों में जब दवा-दारू ने कोई असर नहीं किया तो शाही औरतों ने और बेईमान बेवफ़ा मुलाजि़मों ने वक़्त का फ़ायदा उठाते हुए जादू-टोने की मदद शुरू की। इसका पूरा ख़याल रखा कि बादशाह से कोई भी न मिल सके। वाजिद अली शाह बीमारी से बेबस और बेहाल, बदजात, बदअखलाक् गिरोह की गिरफ़्त में कैद, न सरकारी कारोबार देख सकते थे और न सरकारी मुलाजि़मों से मिल सकते थे। इसी दौर का जि़क्र विलियम सलीमन ने किया जब उन्होंने लिखा कि ‘‘अवध में कोई सरकार नहीं है, बादशाह हालाते रियासत से बिल्कुल नावाकि़फ हैं।‘‘ अंग्रेज़ों ने वज़ीर अली खाँ को भी अपनी तरफ़ कर लिया था, बेबस, लाचार, वाजिद अली शाह ज्यादातर अदब और कला की तरफ झुक गए।
         आफ़ते आती हैं तो एक साथ चारों तरफ से आती हैं जो भी वाजिद अली शाह और रियासत अवध के साथ हुआ शायद वह नहीं होता अगर डलहौजी गवर्नर जनरल बनकर हिन्दुस्तान नहीं आता। 12 जनवरी 1848 को लाॅर्ड हाॅर्डिंग का जाना और डलहौज़ी का गवर्नर जनरल का ओहदा सँभालना
अवध के लिए ख़तरनाक साबित हुआ।
    डलहौज़ी शुरू से ही यह मानस बनाकर आया था कि तमाम देषी राजाओं को ख़त्म करके उनकी रियासतों को ब्रिटिश हुकूमतों के नीचे लाया जाएँ। 18 सितम्बर 1848 में बोर्ड आॅफ़ डायरेक्टर्स को एक ख़त में लिखा ‘‘मेरे पास दो रियासतें और हैं
अवध और हैदराबाद, जिन्हंे बहुत जल्द हमारे तहत लाना है। मुझे पूरा भरोसा है कि यह काम मैं दो साल में अंजाम दे दूँगा।
    बतौर साजि़श के डलहौज़ी का पहला कदम यह था कि अपने खास भरोसे के अफ़सर सलीमन को लखनऊ का रेज़ीडेन्ट बनाया उसे ख़त में यह लिखा कि मैंने तुम्हें इस काम के लिए इस वास्ते चुना है कि आने वाले वक़्त में बहुत कुछ अहम काम करना है, यह अहम काम अवध को ख़त्म करना ही था। 11 जनवरी 1849 को सलीमन लखनऊ का रेज़ीडेन्ट बना।
    रेज़ीडेन्ट बनने के फ़ौरन बाद सलीमन ने सरकारी कामकाज में दख़ल देना शुरू किया। सबसे पहले उसने इस बात पर एतराज़ किया कि शाही मोहर पर लफ्ज ‘‘ग़ाज़ी‘‘ को हटाया जाएँ। वाजिद अली शाह के वफ़ादार वज़ीर वसी अली को हटाने के लिए हुक्म दिया। जब उससे वाजिद अली शाह ने यह पूछा कि वसी अली की ख़ता क्या है तो सलीमन ने जवाब दिया ‘‘ख़ता का सबब बताना ज़रूरी नही है‘‘ वैसे यह उसके बाप की जागीर नहीं  है, उसे हटाने के लिए सबूत की ज़रूरत नहीं है ‘‘वसी अली को लखनऊ भी छोड़ना पड़ा। मगर जब वाजिद अली शाह ने शरफ़उद्दौला को देष निकाला दिया तो सलीमन ने उसको बचाया और छावनी में रहने का बन्दोबस्त किया। हनुवन्त सिंह, राजा काला काकर ने सरकार के खिलाफ़ बग़ावत की तो उन्हंे भी छावनी में रहने दिया और वहाँ मकान बनाने की इजाज़त भी दी। इस तरह अवध में दो शाही सरकारंे बन गई।
     डलहौज़ी का हुक्म था कि सलीमन एक रिपोर्ट बनाकर दे ताकि वो वाजिद अली शाह को गद्दी से हटा सके। सलीमन ने अवध का दौरा किया और एक रिपोर्ट बनाकर दी मगर सलीमन वाजिद अली शाह को गद्दी से हटाने और रियासत अवध को खत्म करने के खि़लाफ़ था। वह रिपोर्ट में उस तरह का बदलाव करने से मना करता रहा। उसका कहना था कि हम सरकारी काम काज को अपने हाथ में ले सकते हैं मगर रियासत को खत्म करना ग़लत होगा और खतरनाक भी, मगर डलहौज़ी ने यह तय कर लिया था कि अवध पर कब्ज़ा करना है। वह वाजिद अली शाह के सख़्त खि़लाफ था। एक ख़त दिनांक 30 जुलाई 1851 में लिखा‘‘ उस बदनसीब (वाजिद अली शाह) ने जो लखनऊ का बांषिदा है, सुना है कि उसने अपना ताज लंदन की नुमाइश में भेजा है। अच्छा होता कि उसके साथ वह अपना सर भी भेज देता।‘‘ अवध के लिए उसने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बोर्ड आॅफ डायरेक्टर्स को लिखा ‘‘कि चैरी काफी वक़्त से पक रही है, किसी भी वक़्त वो अपने मुँह में गिर सकती है‘‘ सलीमन और डलहौज़ी में ना इत्तिफ़ाकी बढ़ती गई। सलीमन ने बीमारी की वजह से अपना ओहदा 1854 में छोड़ दिया। 1856 में जब वापस जा रहा था तो 10 फरवरी 1856 को उसका इंतेक़ाल हो गया था। ठीक अवध के खालसा होने के 2 दिन बाद।
    सलीमन के जगह आउटरम को लगाया गया। वाजिद अली शाह को हटाना मुष्किल हो रहा था। अवध की रिआया और ज़मींदार जो ज़्यादातर हिन्दू थे उन्हें पसन्द करते थे और उनके वफ़ादार थे। ब्रिटिश हुकूमत के लिए यह ज़रूरी था कि वाजिद अली शाह को किसी तरह बदनाम किया जाए और मुसलमानों और हिन्दूओं में फूट डाली जाए। उसके लिए डलहौज़ी ने सियासती चाल चली। 1855 में उसने फैजाबाद में हनुमान गढ़ी को लेकर मुतअस्सिब मौलवी अमीर अली और पण्डितों में मन्दिर और मस्जिद का झगड़ा करवा दिया। जैसे ही वाजिद अली शाह को इस बात की ख़बर मिली उन्होंने फ़ौरन फ़ौज भेजी, लड़ाई में मौलवी अमीर अली मारा गया। डलहौज़ी की साजि़ष कामयाब हुई। मुसलमान नाराज़ हुए कि एक मौलवी को मार डाला और हिन्दुओं का साथ दिया। आग़ा हज्जो शरफ ने अपनी मसनवी अफ़साना-ए-लखनऊ में इसका जि़क्र किया है-
सुनो इंतज़ामे अवध का सबब
हुआ नागहाँ ये जो हंगामा अब
जो मस्जिद थी एक फ़ैज़ाबाद में
नमाजी थे अल्लाह की याद में
इसी से है मुलहिक़ अयोध्या गढ़ी
बराबर महन्तों ने पोथी पढ़ी
इधर जि़क्र अल्लाहो अकबर का था
उधर शोर नाक़ूस अक़फर का था
वो कहते थे इस दम न पूजा करो
यह कहते थे इस जा न सिजदा करो
अज़ां होने लगती थी जिस दम यहाँ
तो वो शंख को फूँकते थे वहांँ
वो सामान था बूद ना बूद का
कि था ज़माना आज बारूद का
हुई न उनमें इन में फिर ऐसी निज़ाँ
दो जानिब हुआ जाबजा इजत्माह
नमाज़ी व हिन्दू फिर ऐसे डटे
न ये ही हटे न फिर वो ही हटे
दो जानिब से ऐसी हुई तेजि़याँ
लगी होने आखि़र को खूंरेजि़याँ
ये परचों से हज़रत को पहुँची ख़बर
लड़ाई अवध में है बाह्म दीग़र
वो फ़रमान यहाँ से रवाना हुआ
कि इंसा का एक फ़साना हुआ,

    हिन्दुस्तान में शायद यह पहला मौक़ा था जब हिन्दू मुसलमानों के बीच झगड़ा हुआ, बाद में इन दोनों में फूट डालो राज करो का इस्तेमाल ब्रिटिश सरकार ने किया। 14 मार्च 1855 में डलहौज़ी ने बीमारी की वजह से अपना इस्तीफ़ा पेश किया मगर उन्हें कुछ और दिन रहने के लिए कहा गया। डलहौज़ी एक शर्त पर राज़ी हुए कि उन्हें अवध पर कब्जा करने दिया जाए। डलहौज़ी ने आउटरम को एक रिपोर्ट बनाने का हुक्म दिया, ख़ुद उसमें काफी रद्दोबदल की। उन्होंने ख़ुद इस बात को क़बूल किया है कि रिपोर्ट इतनी सख़्त है कि चाहे मेरे हाथ से या कैनी के हाथों रियासत अवध को ख़त्म करने का हुक़्म देना ही होगा। उनकी सोच सही थी। कोर्ट आॅफ डायरेक्टर्स ने 21 नवम्बर 1855 में हुक़्म दिया कि अवध पर कम्पनी का कब्ज़ा किया जाए। 20 जनवरी 1856 की तारीख में डलहौज़ी ने साफ तौर पर लिखा कि ‘‘काम आसान है या तो बादशाह ख़ुद हुक़ूमत हमें सौंप दे या हम ख़ुद लें लेंगे, मेरा ख़याल है कि वो ख़ुद दे देगा, वरना हम ज़बरदस्ती ले लेंगे।‘‘ एक अहदनामा का मसौदा बनाया गया और आउटरम कलकत्ते से लखनऊ 23 जनवरी 1856 को रवाना हुए और 30 जनवरी को लखनऊ पहुँचे।
    यह अहदनामा वाजिद अली शाह को पेश किया गया और कहा गया कि वे उस पर दस्तख़त करें। वाजिद अली शाह ने उस पर दस्तख़त करने से इन्कार किया क्योंकि वे महज़ एक पेंशनकार रह जाते और उनके हाथों हुक़ूमत नहीं रहती। वाजिद अली शाह को समझाया गया, धमकाया गया मगर वे अपनी बात पर अडे़ रहें। 4 फरवरी 1856 में ज़र्द कोठी में वाजिद अली शाह उनके वज़ीर मुसाहिद और आउटरम की मुलाक़ात हुई। शाही महल में मातम का माहौल था। तोपें उतार दी गई थीं, गर्दी उठा दी गई थी, वाजिद अली शाह ने अपना ताज उतारकर आउटरम को दे दिया और कहा कि यह ताज और बादशाह का खिताब मल्लिका विक्टोरिया ने दिया था, यह उन्हें वापस कर दो। मेरा ब्रिटानियाँ हुकूमत से कोई ताल्लुक नहीं रहा। लिहाज़ा मैं इस काग़ज़ पर दस्तख़त नहीं करूँगा। मैं ख़ुद पेष मल्लिका को यह ताज, उन्हीं का है बख़्शा हुआ मुझको राज। इसके बाद वाजिद अली शाह ने 5 फरवरी को एक फ़रमान जारी किया। अवाम को यह बताया कि
अवध की हुकुमत अब ब्रिटिश सरकार के हाथ में होगी। वे ख़ुद कलकत्ते जा रहे है। वहाँ से लन्दन जाएँगे और मल्लिका विक्टोरिया से बात करेंगे। किसी भी तरह का कोई दंगा फ़साद, खून-ख़राबा ना हो, यह फ़रमान लखनऊ में और अवध के ख़ास-ख़ास शहरों में लगाया गया। 7 फरवरी 1856 को आउटरम को साफ़ लफ़्ज़ो में बता दिया गया कि वाजिद अली शाह दस्तख़त नहीं करेंगे।
    डलहौज़ी ने मल्लिका विक्टोरिया को 19 फरवरी 1856 में ख़बर कर दी कि अवध पर ब्रिटिश सरकार का कब्ज़ा हो गया। वाजिद अली शाह 13 मार्च 1856 को लखनऊ से रुख़सत हुए। पूरे मुल्क़ में मातम छा गया। लखनऊ में हर आँख आँसुओं से भरी थी। जैसे ही शाही पालकी को कहार उठाने वाले थे वाजिद अली शाह ने हसरत  भरी आँखों से अपने लोगों से यह कहते हुए रुख़सत ली
दरो दीवार पर हसरत से नज़र करते हैं
खु
श रहो अहले वतन हम तो सफ़र करते हैं
    लखनऊ से कलकत्ते तक के सफ़र को वाजिद अली शाह ने अपनी मसनवी हुज़्न-ए-अख़्तर में बयान किया है। (उसका तजऱ्ुमा हिन्दी में मैंने किया है अभी अप्रकाषित है), 13 मई 1857 में वे कलकत्ते पहुँचे। वहाँ 21 तोपों की सलामी दी गई। महाराज वर्दमान की कोठी, मटिया बुजऱ् (गार्डन रीच) में 500 रुपये माहवार दी गई और बदनसीब बादशाह वाजिद अली शाह ने वहाँ जि़न्दगी के 32 साल गुज़ारे।
    कलकत्ते में उनकी तबीयत ख़राब हो गई, वे लंदन नहीं जा सके। मगर उन्होंने मसीह-उद्-दीन को अपना सफ़ीर बनाकर तमाम इखि़्तयारात देकर लंदन भेजा। जून 1856 जहाज बंगाल में उनके साथ वालिदा मल्लिका किष्वर, मिजऱ्ा सिकन्दर हषमत मिजऱ्ा, हामिद अली वली अहद, लंदन को रवाना हुए। लंदन में मल्लिका किष्वर और दीगर हज़रात के साथ मल्लिका विक्टोरिया से बाइज्ज़त मुलाक़ात हुई और अवध की हुक़ूमत मिलने का भरोसा भी हुआ। मगर कि़स्मत को यह मंज़ूर नही था। 1857 के जंग की ख़बर वहाँ पहुँच गई थी और यह भी मालूम हो गया था कि बेग़म हज़रत महल बगावत में शामिल हो गई। तमाम कोषिषो पर पानी फिर गया। मल्लिका किष्वर का पेरिस में इंतेक़ाल हो गया, वे वहीं दफ़नाई गईं। मिजऱ्ा सिक़न्दर हशमत का इंतेक़ाल लंदन में हुआ मगर वे पेरिस में अपनी अम्मा के साथ दफ़नाए गए। मिजऱ्ा हामिद अली पेरिस में ही बस गए।
    कलकत्त्ते मंे 13 जून 1857 में एक हादसा हुआ। फ़ोर्ट विलियम में एक अब्दुल सुबहान पकड़ा गया। पूछताछ होने पर उसने बताया कि वह बादषाह के लिए काम कर रहा था। उसने इस बात का भी दावा किया कि बहुत जल्द बादशाह की फ़ौज फ़ोर्ट विलियम पर क़ब्जा करने वाली है। अब्दुल सुबहान गिरफ़्तार कर लिया गया, मगर शक वाजिद अली शाह पर हुआ। 15 जून 1857 को हुक्म हुआ कि वाजिद अली शाह को गिरफ़्तार कर लिया जाएँ। वाजिद अली शाह के साथ नवाब अली नक़ी ख़ान, अहसान हुसैन ख़ान, अहमद हुसैन ख़ान, टिकैत राय को भी गिरफ्तार किया गया और उन्हें फ़ोर्ट विलियम में नज़रबन्द किया गया। यह दिन उनके लिए बहुत दुख भरे और मुसीबतज़दा  थे, उन्हीं की ज़ुबानी:-
कि बरसों मुझे क़ैद में हो गए
मेरे बख़्त बेदार सो सो गए
अभी तक रिहाई की सूरत नहीं
वो दौलत नहीं है वो तख़्त नहीं
नहीं पूछी जाती ख़ता बा ख़ता
बहुत तंग इस जा पे है दिल मेरा
(हुज्न-ए-अख्तर)

    19 जुलाई 1857 को उनकी रिहाई हुई। मटिया बुर्ज़ में फिर से आके रहने लगे। आज भी मटिया बुजऱ् में लखनऊ की तहज़ीब जि़न्दा है।
 -रणवीर सिंह
अमजद अली ख़ान के दूसरे बेटे थे। अमजद अली ख़ान अपने पहले बेटे मुस्तफा से नाराज थे। उन्हें इस बात के सबूत मिल गए थे कि मुस्तफा ब्रिटिश हुकूमत की तरफ से उनके खिलाफ जासूसी कर रहा है। लिहाज़ा उसके हक़ को नज़र अन्दाज़ करके वाजिद अली शाह को अपना वली अहद मुकर्रर किया। इस बात का जि़क्र वाजिद अली शाह ने अपनी नज्म में कुछ इस तरह से किया- 

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