शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

पुरस्कार में दोयम दर्जें के लेखकों की भरमार :वीरेन्द्र यादव


 वीरेन्द्र यादव से विनयदास/डाॅ0 श्याम सुन्दर दीक्षित की बातचीत
    सुप्रसिद्ध आलोचक वीरेन्द्र यादव को हिन्दी संस्थान द्वारा साहित्य भूषण सम्मान की घोषणा के बाद विनय दास और डाॅ0 श्याम सुन्दर दीक्षित वीरेन्द्र यादव जी के यहाँ इन्दिरा नगर स्थित सेक्टर-सी जा पहुँचे। वीरेन्द्र जी प्रतीक्षारत थे। गर्मजोशी से उन्होंने स्वागत किया। बैठाया। चाय आई। रफ्ता-रफ्ता बातचीत रंग जमाने लगी। उनकी यशः कीर्ति उनकी एक मात्र समीक्षा पुस्तक ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ पर केन्द्रित है। अपने तमाम लेखन के बावजूद मात्र एक पुस्तक के पीछे उनका संकोची व्यक्तित्व है। दूसरे आलोचना का किताबी व्यापार-बाजार कम होना है। उनके सामाजिक उपादेयता के निकष और तुलनात्मक विश्लेषण पद्धति के नए-पुराने दोनों तरह के समीक्षक कायल हैं। उनका गंभीर अध्ययन नयों के लिए प्रेरणाप्रद है। वे हिन्दी के एक मात्र समीक्षक है जिन्होंने केवल उपन्यासों की ही विस्तृत आलोचना की है।
    प्रश्न-साहित्य भूषण पुरस्कार पाने के बाद इन पुरस्कारों पर आपकी क्या प्रतिक्रियाएँ हैं?
    उत्तर-आज के दौर में साहित्यिक सम्मान एवं पुरस्कारों का जिस तरह से अवमूल्यन हुआ है यह विवादों के घेरे में आते रहे हैं उससे मेरे लिए किसी भी पुरस्कार या सम्मान की उतनी अर्थवत्ता नहीं है जितनी सामान्यतः होती है। फिर भी यह सम्मान मुझे मिला है तो मैं इसे साहित्य के एक स्वायत्त संस्थान के माध्यम से व्यापक सामाजिक स्वीकृति के रूप में स्वीकार करता हूँ मेरे लिए यह पुरस्कार अतिरिक्त मान्यता न होकर दायित्व बोध का एहसास अधिक है। मैं अपनी प्रतिबद्धता एवं व्यापक समाज के हित में और बेहतर लेखन कर सकूँ यही इस सम्मान का महत्व है।
    प्रश्न-सरकारी संस्थानों से दिए जाने वाले पुरस्कार प्रायः विवादों के घेरे में रहते हैं क्यो?   
    उत्तर-सरकार द्वारा नियंत्रित संस्थानों के पुरस्कारों का अवमूल्यन इसलिए भी हुआ है कि उनकी पुरस्कार समितियों में प्रायः निष्पक्ष, गंभीर, साहित्यिक व्यक्तित्वों को शामिल नहीं किया जाता है यही कारण है कि यह विवाद के घेरे में रहते हैं और इन पुरस्कारों में दोयम दर्जें के लेखकों की भरमार दिखाई पड़ती है।
    प्रश्न - जौनपुर से लखनऊ आकर बसना किस सिलसिले में हुआ?
    उत्तर - मैं बहुत छोटा था तभी पिताजी पूरा परिवार लेकर एक नौकरी के सिलसिले में लखनऊ आए। मेरा जन्म केवल जौनपुर में हुआ है। एक वर्ष की अवस्था में ही मैं पिताजी के साथ यहाँ आया। मेरी सारी शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में हुई है।
    प्रश्न - क्या कभी जौनपुर जाना होता है?
    उत्तर - पहले पिताजी के साथ गर्मी की छुट्टियों में जाता था। बाद के वर्षों में परिवारिक उत्सवों के सिलसिले में जाना होता था। अब वह भी समाप्त प्राय है।
    प्रश्न - वहाँ की भू सम्पदा आदि क्या बेंचकर यहाँ आ गए?
    उत्तर - नहीं। मेरे पिताजी ने अपने हिस्से की सारी भूसम्पदा अपने भाइयों को दे रखी है। मैं उसमें से कभी कुछ लेता भी नहीं।
    प्रश्न - साहित्य की दुनिया में किस कारण से आना हुआ? परिवारिक संस्कारों से या विद्यार्थी जीवन के साहित्यिक परिवेश की प्रेरणा से।
    उत्तर - मूलतः मेरा स्वभाव अध्ययन की ओर रहा है। उसी सिलसिले में पत्र-पत्रिकाएँ पुस्तकें चाव से पढ़ना शुरू हुआ जो धीरे-धीरे गम्भीर रुचि में बदल गया। यह संस्कार मुझे पिताजी से मिला। मेरे पिताजी को भी किताबें पढ़ने का शौक था। यह संयोग है कि मुझे घर पर ही यशपाल और कुछ अन्य लेखकों का कथा साहित्य पढ़ने को मिला। जहाँ तक लिखने का प्रश्न है, मैंने अपने आरंभिक दौर में राजनैतिक व सामाजिक विषयों पर लेखन से ही शुरुआत की। मैं कभी हिन्दी भाषा या साहित्य का छात्र नहीं रहा। राजनीति शास्त्र से एम.ए. किया। हाँ, स्नातक स्तर पर अंग्रेजी साहित्य मेरा विषय था और आरंभिक लेखन मैंने अंग्रेजी में भी किया। मेरे कई लेख अंग्रेजी की पत्र-पत्रिकाओं में शुरू के दौर में प्रकाशित होते रहे हैं।
    प्रश्न - समीक्षा के अतिरिक्त क्या कभी कविता और कहानी भी लिखी। यदि हाँ, तो उस विषय में कुछ कहें?
    उत्तर - कविता मैंने 1962 में लिखी। जब मैं 11 वर्ष का था। भारत पर चीन के हमले के बाद कविता लिखी थी। जो ‘स्वतंत्र भारत’ के साप्ताहिक परिशिष्ट के ‘बाल स्तम्भ’ में छपी। उसके बाद दूसरी कविता न लिखी गई। रही बात कहानियों की तो बताता चलूँ आरंभ में मैंने कुछ कहानियाँ भी लिखीं। जो ‘जन युग’ के साप्ताहिक अंक में छपीं। इसे आप चाहें तो मेरे साहित्यिक लेखन की शुरूआत मान सकते हैं।
    प्रश्न - आपने अपने समीक्षात्मक लेखों की शुरुआत किस प्रकार की?
    उत्तर - साहित्यिक समीक्षा लिखने की शुरुआत मैंने ‘नवजीवन’ और ‘स्वतंत्र भारत’ जैसे समाचार पत्रों में लेखों के माध्यम से की और बाद में ‘अमृत प्रभात’ में पुस्तक समीक्षा लिखने की जो शुरुआत हुई उससे मेरी आलोचना के क्षेत्र का रास्ता भी खुला।
    प्रश्न - आपने पहली समीक्षा कब और किस पुस्तक पर लिखी?
    उत्तर - मैंने पहली पुस्तक समीक्षा भीष्म साहनी के एक कथा संग्रह पर लिखी थी। जो लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा प्रकाशित की जाने वाली एक पत्रिका ‘विधेय’ में प्रकाशित हुई।
    प्रश्न - आपकी सर्वाधिक रुचि प्रेमचन्द्र के कथा साहित्य में रही है। यह रुचि उनके साहित्य के अध्ययन के उपरान्त बनी या पहले से थी?
    उत्तर - प्रेमचन्द्र को मैंने अपने छात्रजीवन से ही पढ़ा था। प्रेमचन्द्र की महानता से बिना अवगत हुए ही उनकी कहानियाँ बड़ी रुचि और आनंद से पढ़ता था। जब मुझे प्रेमचन्द्र की रचना मिलती तो उसे जरूर पढ़ता था। मैं पे्रमचन्द्र के कथारस से पहले जुड़ा और उनकी महनीयता से बाद में परिचित हुआ।
    प्रश्न - क्या कथारस आपके अध्ययन और लेखन के महत्वपूर्ण अंग बने?
    उत्तर - मुझे लगता है कि अब मेरी साहित्यिक पसंद में कथारस निर्णायक भूमिका का निर्वाह नहीं करता। किसी कृति की सामाजिक उपादेयता अब मेरी पहली पसंद है।
    प्रश्न - आपने ज्यादातर उपन्यासों की समीक्षा की है। कहानी और कविता आपके दायरे से बाहर रहे हैं। इसके पीछे आप क्या कारण पाते है?
    उत्तर - यह सही है कि मैंने कविता पर बिल्कुल नहीं लिखा। कभी कभार कहानी संग्रहों पर जरूर लिखा है। लेकिन आलोचना के लिए मेरी मुख्य विधा उपन्यास ही है। कारण यह कि समय और समाज को जिस व्यापक परिप्रेक्ष्य में मैं देखना चाहता हूँ उसकी पड़ताल प्रायः उपन्यास में ही संभव है।
    प्रश्न - इसका अभिप्राय आप सामाजिक मूल्य मानक को बड़ा फलक मानते हैं?
    उत्तर - हाँ! विगत, वर्तमान, आगत इन तीनों को जानने समझने में मुझे उपन्यास अधिक संगत प्रतीत होते हैं।
    प्रश्न - समीक्षा के क्षेत्र में काम करने की प्रेरणा किससे मिली और आपने किसे अपना आदर्श माना?
    उत्तर - आलोचना के क्षेत्र में मेरी आलोचकीय सोच बनाने में मैं डाॅ. रामविलास शर्मा का आभारी हूँ। उनकी पुस्तक ‘आस्था और सौन्दर्य’ ने आलोचना की सामाजिक भूमिका की ओर सोचने को प्रेरित किया और मैं सचमुच यह कह सकता हूँ कि उनकी यह पुस्तक यदि मैंने न पढ़ी होती तो मेरा आलोचकीय मानस शायद न बन पाता। आज मैं उन्हीं रामविलास शर्मा की तमाम स्थापनाओं से स्वयं को असहमत पाता हूँ। मैं आलोचना के क्षेत्र में, समग्रता मंे ंकोई अनुकरणीय हो ऐसा कोई आदर्श नहीं मानता हूँ।
    प्रश्न - पुस्तक समीक्षा और आलोचना में आप क्या अंतर पाते है?
    उत्तर - पुस्तक समीक्षा प्रायः पुस्तक के परिचय उसकी गुणवत्ता और उसके विषय निर्वहन तक सीमित होती है जबकि किसी कृति की आलोचना के सन्दर्भ में आप व्यापक और विस्तृत हो सकते हैं। उदाहरण के लिए ‘आधा गाँव’ पर लिखते हुए जब उसकी तुलना विभाजन या मुस्लिम प्रश्न पर केन्द्रित अन्य उपन्यासों के सन्दर्भ में जुड़ जाते हैं तो वह कृति के बड़े और व्यापक सरोकारों को उद्घाटित करती है। इन्हीं अर्थाें मंे मुझे लगता है कि पुस्तक समीक्षा की भूमिका सीमित है जबकि किसी कृति पर आलोचनात्मक लेख व्यापक संभावनाओं से परिपूर्ण है।
    प्रश्न - आपकी पुस्तक ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ क्या मुकम्मल हिन्दी उपन्यासों को जानने-समझने में पर्याप्त है?
    उत्तर - मुझे कोई ऐसा भ्रम नहीं है। न गुमान है। मैं अपने नजरिए से कृतियों के बारे में जो सोचता हूँ, इस पुस्तक में देखा जा सकता है। कुछ लोगों को इसमें संभावनाएँ दिख सकती हैं तो अन्य लोगों को सीमाएँ।
    प्रश्न - निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, सुरेन्द्र वर्मा, कमलेश्वर और मनोहर श्याम जोशी जैसे सिद्ध उपन्यास लेखकों पर चुप्पी क्यों?
    उत्तर - चुप्पी कहाँ? मैंने इन सभी पर लिखा है। निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, सुरेन्द्र वर्मा, मनोहर श्याम जोशी, कमलेश्वर इन पाँचों पर लिखा है। लेकिन उस तरह विस्तृत और स्वतंत्र रूप से नहीं जिस तरह मैंने प्रेमचन्द्र यशपाल, राही मासूम रजा, श्रीलाल शुक्ल और अन्य लेखकों पर लिखा है। डाॅ. नामवर सिंह द्वारा संपादित ‘आधुनिक हिन्दी उपन्यास के खण्ड-2’ में उस पुस्तक की भूमिका के रूप में समकालीन उपन्यास पर मेरा एकचालीस पृष्ठों का आलेख उसमें शामिल है। जिसमंे मनोहर श्याम जोशी, विनोद कुमार शुक्ल, सुरेन्द्र वर्मा और निर्मल वर्मा के उपन्यासों की विस्तृत विवेचना की गई है।
    मेरा नजरिया इन उपन्यासकारों के बारे में सुस्पष्ट है। जहाँ तक निर्मल वर्मा का प्रश्न है उनसे मेरी वैचारिक मुठभेड़ मेरे द्वारा गोदान पर लिखित और इण्डियन इंग्लिश नाॅबेल वाले लेख में हुई है।
    प्रश्न - इस तरह के विस्तृत आलोचनात्मक लेखों की शुरुआत आपने कब की?
    उत्तर - सन् 1998 में पहली पुस्तिका में प्रकाशित ‘इस दौर में उपन्यास’ मेरा उपन्यासों पर पहला विस्तृत आलोचनात्मक लेख है।
    प्रश्न - आपने जिस तरह की गहन अध्ययनशीलता भारतीय और पाश्चात्य नाॅबेल, से समता-तुलना और तार्किक विश्लेषण के साथ उपन्यासों की मुद्दा आधारित समीक्षा की है, क्या हिन्दी में यह प्रयास पहला है या इसके पूर्व भी ऐसे प्रयास हुए हैं?
    उत्तर - दरअसल, इस तरह के व्यापाक सामाजिक प्रश्नों के साथ तुलनात्मक आलोचनात्मक लेखन की कोई पूर्व परम्परा हमें हिन्दी में नहीं दिखती। मुझे इसकी प्रेरणा अंग्रेजी के आलोचना कर्म से मिली। जहाँ तुलनात्मक अध्ययन की समृद्ध परम्परा है। इस सम्बन्ध में मैं इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ शिमला द्वारा अंग्रेजी साहित्य पर प्रकाशित कुछ पुस्तकों के माध्यम से प्रेरित भी हुआ।
    प्रश्न - आप अंगे्रजी के किन समीक्षकों से प्रभावित हुए?
    उत्तर - मैंनें अंग्रेजी में कुछ माक्र्सवादी और कुछ गैर माक्र्सवादी आलोचकों का गहराई से अध्ययन किया है। जिसमें जार्ज लूकाँच, रेमंड विलियम, क्रिस्टोफर कांडवेल, ग्रैम्सी प्रमुख रूप से शामिल हैं। इनका असर मेरी सोच पर व्यापक रूप से पड़ा भी है। इसे मैं स्वीकार करता हूँ।
    प्रश्न - क्या आंचलिक उपन्यासों की शुरुआत शिवूजन सहाय के उपन्यास ‘देहाती दुनिया’ से मानना उचित होगा?
    उत्तर - शिवपूजन सहाय के उपन्यास में अंचल की कहानी तो है। अतः इसे आंचलिक मानने में कोई कठिनाई नहीं है। यूँ तो बाद के दौर के कई उपन्यासकार आंचलिक लेखन करते रहे हैं जिसमें वृन्दावन लाल वर्मा, रांगेय राघव से लेकर रेणु तक शामिल हैं।
    प्रश्न - इस तरह तो हम प्रेमचन्द्र को भी आंचलिक कह सकते हैं?
    उत्तर - नहीं, प्रेमचन्द्र उन अर्थों में आंचलिक उपन्यासकार नहीं हैं। इनमें आंचलिक का रूप, रस, गंध नहीं है। यहाँ पर सिर्फ मुद्दे हैं। जबकि आंचलिक उपन्यास में उसकी स्थानीय भाषा, भाव, लोकतत्व, संस्कृति, खान-पान, पहनावा, आचरण और पूरी प्रकृति समग्रता के साथ उसमें शामिल होती है।
    प्रश्न - ‘उपन्यास और वर्चस्व की सत्ता’ पर जैसी गम्भीर चर्चा अपेक्षित थी वैसी न हो सकी। क्या इसने आपको निराश किया?
    उत्तर - मैं समझता हूँ इसकी समीक्षा सभी पत्र-पत्रिकाओं में हुई है। तद्भव, वसुधा, हंस, जनसत्ता में समीक्षाएँ आई हैं। किताब व्यापक रूप से चर्चा में है। बहुत से विश्वविद्यालयों में पढ़ी जा रही है।
    प्रश्न - आलोचना जैसे गंभीर विषय पर क्या लिखना कठिन नहीं लगता है?
    उत्तर - जरूर कठिन है। मगर, लिखा जा सकता हैं। लिखा जाना चाहिए। यह एक श्रम साध्य कार्य है। मेरे इस किताब की बिक्री भी अच्छी जा रही है। ऐसा प्रकाशकों का कहना है। हर पुस्तक मेले में इसकी माँग अवश्य रहती है।
    प्रश्न - वर्तमान औपन्यासिक दुनिया में मैत्रेयी पुष्पा के योगदान पर कोई टिप्पणी करना चाहेंगे?
    उत्तर - पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से मैत्रेयी पुष्पा का लेखन हमारे सामने आया है उससे वे इस दौर की सर्वाधिक चर्चित और महत्वपूर्ण उपन्यास लेखिका सिद्ध हुई हैं। मेरा यह भी मानना है कि इदन्नमम्, चाक और झूलानट सरीखे उपन्यासों के माध्यम से वे जिस ग्रामीण यथार्थ व स्त्री जीवन को लेकर सामने आई हैं, वह हिन्दी कथा साहित्य में उनका मौलिक योगदान है। उनके पहले हाड-मास की ऐसी ग्रामीण स्त्रियों के जीवन की गोपन सच्चाइयां उनकी इच्छा- आकांक्षा और जिजीविषा इस रूप में हमारे सामने लगभग नहीं थी।
    प्रश्न -वर्तमान दौर में आप और किन उपन्यासकारों को महत्वपूर्ण मानते हैं?
    उत्तर - मैं समझता हूँ कि इस दौर में दूधनाथ सिंह का उपन्यास ‘आखिरी कलाम’ अत्यन्त महत्वपूर्ण है। काशीनाथ सिंह का ‘काशी का अस्सी’ एक ऐसा कथा रिपोर्ताज है जो अपने समय-समाज की हलचलों को अत्यन्त रोचक ढंग से उद्घाटित करता है। इसके अलावा वीरेन्द्र जैन, अब्दुल बिस्मिल्लाह, भगवानदास गौरवाल, अनामिका, कमलाकान्त त्रिपाठी, तेजिन्दर, मधु कांकरिया और महुआमांझी आदि के उपन्यास मेरा ध्यान आकर्षित करते हैं।
    प्रश्न - और आलोचकों में कौन से लोग ध्यान आकर्षित करते हैं?
    उत्तर - वर्तमान समय में डाॅ0 नामवर सिंह, विजय मोहन सिंह, विश्वनाथ त्रिपाठी, और डाॅ0 परमानंद श्रीवास्तव आदि महत्वपूर्ण और पढ़े जाने वाले आलोचक है।
    प्रश्न - किन्हीं नए समीक्षकों का उल्लेख करना चाहेंगे?
    उत्तर - हमारे साथ और हमारे बाद कई तेज-तर्रार युवा आलोचक सामने आ रहे हैं। मेरे अपने साथ के रोहणी अग्रवाल, प्रणय कृष्ण और बाद के लोगों मेें कृष्ण मोहन, वैभव सिंह, राहुल सिंह, पल्लव आदि इन दिनों ध्यान आकर्षित कर रहे हैं।
    प्रश्न - इस तरह के विस्तृत आलोचनात्मक लेख अमूमन कितने दिनों में लिख पाते हैं?   
    उत्तर - इस मामले में मैं बहुत बेतरतीब हूँ। सम्पादक का कोड़ा होने पर एकलेख की समयावधि कुछ कम हो जाती है और अपनी इच्छा की छूट होने पर कई-कई महीनों तक विस्तृत हो जाती है।
    प्रश्न - ‘द इंडियन इंग्लिश नाॅबंल और भारतीय यथार्य’ लेख को क्या आपने अंग्रेजी में लिखा था?
    उत्तर - इस लेख को मैंने हिन्दी में लिखा है। तब तक अंग्रेजी में लिखना छूट चुका था। एक बार इच्छा हुई थी इसे अंग्रेजी में अनुवाद करने की। मगर, संभव न हुआ। हाँ, दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर हरीश त्रिवेदी ने इसका अंग्रेजी में अनुवाद करके पाठ्यक्रम में शामिल करने के लिए उसकी संस्तुति भी की है। श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास ‘राग दरबारी’ पर लिखा लेख इग्नू के पाठ्यक्रम में चलता था।
    प्रश्न - किसी उपन्यास पर आलोचनात्मक लेख लिखने का आधार क्या होता है?
    उत्तर - जब हमें कोई कृति झकझोरती है। जिसके मूल में सामाजिक उपादेयता का प्रश्न मेरे लिए जरूरी होता है। यदि सामाजिक उपादेयता की कसौटी पर कृति खरी नहीं तो वह हमें चैलेन्ज भी नहीं करती और हम उसकी समीक्षा भी नहीं करते। दूसरा तौर वह है जब कृति से मेरी असहमतियाँ हों। इसलिए भेंट में मिलने वाली कृतियों को बहुत संकोच से ग्रहण करते हैं।
    प्रश्न - क्या किसी ऐसी समीक्षा को याद करना चाहेंगे जो बड़ी ध्वस्तकारी रही हो?
    उत्तर - हाँ, हिन्दी-उर्दू के प्रख्यात लेखक रामलाल की पुस्तक ‘मेरा सफरनामा’ ‘जर्द पत्तों की बहार’ जो पाकिस्तान के यात्रा वृतान्त पर आधारित है। जिसका सम्बन्ध वहाँ के सामाजिक जीवन देखे-सुने गए सरोकारों से कम, आवाभगत, स्वागत-सत्कार और गोष्ठी आदि के बहिरंग स्वभाव से ज्यादा है। जो मुझे अच्छा न लगा। उसकी मैंने एक बड़ी ध्वस्तकारी समीक्षा ‘अमृत प्रभात’ में लिखी। जबकि रामलाल मेरे बड़े अच्छे मित्र रहे हैं। उनके घर प्रायः मेरा आना जाना रहता था। किन्तु पुस्तक से तमाम असहमतियों के कारण ऐसा लिखा। हालाँकि बाद को मेरे मित्रों ने इसके लिए मुझे बहुत कुछ कहा।
    प्रश्न - आज की राजनीति पर आपके क्या विचार है?
    उत्तर - कुल मिलाकर वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य काफी कुछ निराशाजनक है। जैसा पहले कभी नहीं था। स्थिति यह है कि स्वयं को समाजवादी कहने वाली पार्टी का न कोई समाजवाद से ताल्लुक रहा है और न दलित हित की पक्षधर कही जाने वाली बसपा का अम्बेडकर के मूल सिद्धान्तों से। कांग्रेस और भाजपा तो पहले ही सत्ता के समीकरणों के खिलाड़ी बनकर अपनी सामाजिक उपादेयता खो चुके हैं। अफसोस यह कि जिन वामपंथी दलों पर एक दौर में बहुत कुछ उम्मीदें टिकी थीं वे अब नेपथ्य में पहुँचकर भूमिकाविहीन हो गये हैं। इसलिए वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य न तो उत्साहजनक हैं और न उम्मीदों से भरा।
    प्रश्न - वर्तमान सामाजिक सन्दर्भों में देश के बहुसंख्यक वर्ग को ही साम्प्रदायिक कहा जा रहा है। उसे ही धर्म निरपेक्षता की सीख दी जा रही है। आज आप इसे किस तरह परिभाषित करना चाहेंगे?
    उत्तर - धर्मनिरपेक्षता इस देश की मात्र संवैधानिक प्रतिबद्धता ही नहीं बल्कि नागरिक जरूरत भी है। लेकिन बाबरी मस्जिद के ध्वंस और गुजरात 2002 की घटनाओं ने हमारे देश और समाज के धर्मनिरपेक्ष ढाँचे को काफी कुछ क्षत-विक्षत किया है। जरूरत इस बात की है कि धर्म निरपेक्षता को महज नारे की तरह न उछाला जाए और बहुसंख्यक की राजनीति को ही धर्म निरपेक्षता के साँचे में समायोजित करने की कोशिश की जाए। देश में जन तंत्र तभी बचेगा जब धर्म की भूमिका नेपथ्य में होगी और साम्प्रदायिकता राजनीति या वोट बैंक का हथियार न बनेगी।
    प्रश्न - आज की भारतीय राजनीति को आपका क्या सन्देश होगा या वे किस राह के राहगीर बनकर समता मूलक समाज की स्थापना कर सकते हैं?
    उत्तर - मंै समझता हूँ कि गांधी ने अन्तिम व्यक्ति की आँखों से आँसू मिटाने का जो ताबीज भारतीय जनता को दिया था उसे ध्यान में रखने और न भुलाने की जरूरत है। यदि राजनीतिज्ञ अपनी सोच और कार्यों को उस अन्तिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर क्रियान्वित करें तो ही अपने प्रति और समाज के प्रति भी वे उत्तरदायी हो सकेंगे।
    धन्यवाद!

परिकल्पना   समय से

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि का लिंक आज शनिवार (24-08-2013) को मुद्रा हुई रसातली, भोगें नरक करोड़-चर्चा मंच 1347 में "मयंक का कोना" पर भी है!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Amrita Tanmay ने कहा…

प्रभावित करता हुआ साक्षात्कार ..